श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
एक सौ तीनवाँ सर्ग
एक सौ तीनवाँ सर्ग
श्रीरामके यहाँ कालका आगमन और एक कठोर शर्तके साथ उनका वार्ताके लिये उद्यत होना
तदनन्तर कुछ समय और बीत जानेपर जब कि भगवान् श्रीराम धर्मपूर्वक अयोध्याके राज्यका पालन कर रहे थे, साक्षात् काल तपस्वीके रूपमें राजभवनके द्वारपर आया॥ १ ॥
उसने द्वारपर खड़े हुए धैर्यवान् एवं यशस्वी लक्ष्मणसे कहा—'मैं एक भारी कार्यसे आया हूँ। तुम श्रीरामचन्द्रजीसे मेरे आगमनकी सूचना दे दो॥ २ ॥
'महाबली लक्ष्मण! मैं अमित तेजस्वी महर्षि अतिबलका दूत हूँ और एक आवश्यक कार्यवश श्रीरामचन्द्रजीसे मिलने आया हूँ'॥ ३ ॥
उसकी वह बात सुनकर सुमित्राकुमार लक्ष्मणने बड़ी उतावलीके साथ भीतर जाकर श्रीरामचन्द्रजीसे उस तापसके आगमनकी सूचना दी—॥ ४ ॥
'महातेजस्वी महाराज! आप अपने राजधर्मके प्रभावसे इहलोक और परलोकपर भी विजयी हों। एक महर्षि दूतके रूपमें आपसे मिलने आये हैं। वे तपस्याजनित तेजसे सूर्यके समान प्रकाशित हो रहे हैं'॥ ५ ॥
लक्ष्मणकी कही हुई वह बात सुनकर श्रीरामने कहा—'तात! उन महातेजस्वी मुनिको भीतर ले आओ, जो कि अपने स्वामीके संदेश लेकर आये हैं'॥ ६ ॥
तब 'जो आज्ञा' कहकर सुमित्राकुमार उन मुनिको भीतर ले आये। वे तेजसे प्रज्वलित होते और अपनी प्रखर किरणोंसे दग्ध करते हुए-से जान पड़ते थे॥ ७ ॥
अपने तेजसे दीप्तिमान् रघुकुलतिलक श्रीरामके पास पहुँचकर ऋषिने उनसे मधुर वाणीमें कहा—'रघुनन्दन! आपका अभ्युदय हो'॥ ८ ॥
महातेजस्वी श्रीरामने उन्हें पाद्य-अर्घ्य आदि पूजनोपचार समर्पित किया और शान्तभावसे उनका कुशल-समाचार पूछना आरम्भ किया॥ ९ ॥
श्रीरामके पूछनेपर वक्ताओंमें श्रेष्ठ महायशस्वी मुनि कुशल-समाचार बताकर दिव्य सुवर्णमय आसनपर विराजमान हुए॥ १० ॥
तदनन्तर श्रीरामने उनसे कहा — ‘महामते! आपका स्वागत है। आप जिनके दूत होकर यहाँ पधारे हैं, उनका संदेश सुनाइये’॥ ११ ॥
राजसिंह श्रीरामके द्वारा इस प्रकार प्रेरित होनेपर मुनि बोले— ‘यदि आप हमारे हितपर दृष्टि रखें तो जहाँ हम और आप दो ही आदमी रहें, वहीं इस बातको कहना उचित है॥ १२ ॥
‘यदि आप मुनिश्रेष्ठ अतिबलके वचनपर ध्यान दें तो आपको यह भी घोषित करना होगा कि जो कोऽइ मनुष्य हम दोनोंकी बातचीत सुन ले अथवा हमें वार्तालाप करते देख ले, वह आप (श्रीराम) का वध्य होगा’॥ १३ ॥
श्रीरामने ‘तथास्तु’ कहकर इस बातके लिये प्रतिज्ञा की और लक्ष्मणसे कहा — ‘महाबाहो! द्वारपालको बिदा कर दो और स्वयं ड्योढ़ीपर खड़े होकर पहरा दो॥
‘सुमित्रानन्दन! जो ऋषि और मेरी—दोनोंकी कही हुऽइ बात सुन लेगा या बात करते हमें देख लेगा, वह मेरे द्वारा मारा जायगा’॥ १५ ॥
इस प्रकार अपनी बात ग्रहण करनेवाले लक्ष्मणको दरवाजेपर तैनात करके श्रीरघुनाथजीने समागत महर्षिसे कहा— ‘मुने! अब आप निःशङ्क होकर वह बात कहिये, जिसे कहना आपको अभीष्ट है अथवा जिसे कहनेके लिये ही आप यहाँ भेजे गये हैं। मेरे हृदयमें भी उसे सुननेके लिये उत्कण्ठा है’॥ १६-१७ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें एक सौ तीनवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १०३ ॥