श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
एक सौ चौदहवाँ सर्ग
एक सौ चौदहवाँ सर्ग
श्रीरामकी आज्ञासे विभीषणका सीताको उनके समीप लाना और सीताका प्रियतमके मुखचन्द्रका दर्शन करना
तदनन्तर परम बुद्धिमान् वानरवीर हनुमान्जीने सम्पूर्ण धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ कमलनयन श्रीरामको प्रणाम करके कहा— ॥ १ ॥
‘भगवन्! जिनके लिये इन युद्ध आदि कर्मोंका सारा उद्योग आरम्भ किया गया था, उन शोकसंतप्त मिथिलेशकुमारी सीतादेवीको आप दर्शन दें॥ २ ॥
‘वे शोकमें डूबी रहती हैं। उनके नेत्र आँसुओंसे भरे हुए हैं। आपकी विजयका समाचार सुनकर वे मिथिलेशकुमारी आपका दर्शन करना चाहती हैं॥ ३ ॥
‘पहली बार जो मैं आपका संदेश लेकर आया था, तभीसे उनका मेरे ऊपर विश्वास हो गया है कि यह मेरे स्वामीका आत्मीय जन है। उसी विश्वाससे युक्त हो उन्होंने नेत्रोंमें आँसू भरकर मुझसे कहा है कि मैं प्राणनाथका दर्शन करना चाहती हूँ’॥ ४ ॥
हनुमान्जीके ऐसा कहनेपर धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजी सहसा ध्यानस्थ हो गये। उनकी आँखें डबडबा आयीं और वे लम्बी साँस खींचकर भूमिकी ओर देखते हुए पास ही खड़े मेघके समान श्याम कान्तिवाले विभीषणसे बोले— ॥ ५-६ ॥
‘तुम विदेहनन्दिनी सीताको मस्तकपरसे स्नान कराकर दिव्य अङ्गराग तथा दिव्य आभूषणोंसे विभूषित करके शीघ्र मेरे पास ले आओ’ ॥ ७ ॥
श्रीरामके ऐसा कहनेपर विभीषण बड़ी उतावलीके साथ अन्तःपुरमें गये और पहले अपनी स्त्रियोंको भेजकर उन्होंने सीताको अपने आनेकी खबर दी॥ ८ ॥
इसके बाद श्रीमान् राक्षसराज विभीषणने स्वयं ही जाकर महाभाग सीताका दर्शन किया और मस्तकपर अञ्जलि बाँध विनीतभावसे कहा— ॥ ९ ॥
‘विदेहराजकुमारी! आप स्नान करके दिव्य अङ्गराग तथा दिव्य वस्त्राभूषणोंसे भूषित होकर सवारीपर बैठिये। आपका कल्याण हो। आपके स्वामी आपको देखना चाहते हैं’॥ १० ॥
उनके ऐसा कहनेपर वैदेहीने विभीषणको उत्तर दिया— ‘राक्षसराज! मैं बिना स्नान किये ही अभी पतिदेवका दर्शन करना चाहती हूँ’॥ ११ ॥
सीताकी यह बात सुनकर विभीषण बोले— 'देवि! आपके पतिदेव श्रीरामचन्द्रजीने जैसी आज्ञा दी है, आपको वैसा ही करना चाहिये'॥ १२ ॥
उनका यह वचन सुनकर पतिभक्तिसे सुरक्षित तथा पतिको ही देवता माननेवाली सती-साध्वी मिथिलेशकुमारी सीताने ‘बहुत अच्छा’ कहकर स्वामीकी आज्ञा शिरोधार्य कर ली॥ १३ ॥
तत्पश्चात् विदेहकुमारीने सिरसे स्नान करके सुन्दर शृङ्गार किया तथा बहुमूल्य वस्त्र और आभूषण पहनकर वे चलनेको तैयार हो गयीं॥ १४ ॥
तब विभीषण बहुमूल्य वस्त्रोंसे आवृत्त दीप्तिमती सीतादेवीको शिबिकामें बिठाकर भगवान् श्रीरामके पास ले आये। उस समय बहुत-से निशाचर चारों ओरसे घेरकर उनकी रक्षा कर रहे थे॥ १५ ॥
भगवान् श्रीराम ध्यानस्थ हैं, यह जानकर भी विभीषण उनके पास गये और उन्हें प्रणाम करके प्रसन्नतापूर्वक बोले— ‘प्रभो! सीतादेवी आ गयी हैं’॥ १६ ॥
राक्षसके घरमें बहुत दिनोंतक निवास करनेके बाद आज सीताजी आयी हैं, यह सोच उनके आगमनका समाचार सुनकर शत्रुसूदन श्रीरघुनाथजीको एक ही समय रोष, हर्ष और दुःख प्राप्त हुआ॥ १७ ॥
तदनन्तर ‘सीता सवारीपर आयी हैं’ इस बातपर तर्क-वितर्कपूर्ण विचार करके श्रीरघुनाथजीको प्रसन्नता नहीं हुई। वे विभीषणसे इस प्रकार बोले— ॥ १८ ॥
‘सदा मेरी विजयके लिये तत्पर रहनेवाले सौम्य राक्षसराज! तुम विदेहकुमारीसे कहो, वे शीघ्र मेरे पास आयें’॥ १९ ॥
श्रीरघुनाथजीकी यह बात सुनकर धर्मज्ञ विभीषणने तुरंत वहाँसे दूसरे लोगोंको हटाना प्रारम्भ किया॥ २० ॥
पगड़ी बाँधे और अङ्गा पहिने हुए बहुत-से सिपाही हाथोंमें झाँझकी तरह बजती हुई छड़ी लिये उन वानरयोद्धाओंको हटाते हुए चारों ओर घूमने लगे॥ २१ ॥
उनके द्वारा हटाये जाते हुए रीछों, वानरों और राक्षसोंके समुदाय अन्ततोगत्वा दूर जाकर खड़े हो गये॥
जैसे वायुके थपेड़े खाकर उद्वेलित हुए समुद्रकी गर्जना बढ़ जाती है, उसी प्रकार वहाँसे हटाये जाते हुए उन वानर आदिके हटनेसे वहाँ बड़ा भारी कोलाहल मच गया॥ २३ ॥
जिन्हें हटाया जाता था, उनके मनमें बड़ा उद्वेग होता था, सब ओर यह उद्वेग देखकर श्रीरघुनाथजीने अपनी सहज उदारताके कारण उन हटानेवालोंको रोषपूर्वक रोका—॥ २४ ॥
उस समय श्रीराम हटानेवाले सिपाहियोंकी ओर इस तरह रोषपूर्ण दृष्टिसे देख रहे थे, मानो उन्हें जलाकर भस्म कर डालेंगे। उन्होंने परम बुद्धिमान् विभीषणको उलाहना देते हुए क्रोधपूर्वक कहा—॥ २५ ॥
‘तुम किसलिये मेरा अनादर करके इन सब लोगोंको कष्ट दे रहे हो। रोक दो इस उद्वेगजनक कार्यको। यहाँ जितने लोग हैं यह सब मेरे आत्मीय जन हैं॥ २६ ॥
‘घर, वस्त्र (कनात आदि) और चहारदीवारी आदि वस्तुएँ स्त्रीके लिये परदा नहीं हुआ करती हैं। इस तरह लोगोंको दूर हटानेके जो निष्ठुरतापूर्ण व्यवहार हैं, ये भी स्त्रीके लिये आवरण या पर्देका काम नहीं देते हैं। पतिसे प्राप्त होनेवाले सत्कार तथा नारीके अपने सदाचार—ये ही उसके लिये आवरण हैं॥ २७ ॥
‘विपत्तिकालमें, शारीरिक या मानसिक पीड़ाके अवसरोंपर, युद्धमें, स्वयंवरमें, यज्ञमें अथवा विवाहमें स्त्रीका दीखना (या दूसरोंकी दृष्टिमें आना) दोषकी बात नहीं है॥ २८ ॥
‘यह सीता इस समय विपत्तिमें है। मानसिक कष्टसे भी युक्त है और विशेषतः मेरे पास है; इसलिये इसका परदेके बिना सबके सामने आना दोषकी बात नहीं है॥ २९ ॥
‘अतः जानकी शिबिका (पालकी) छोड़कर पैदल ही मेरे पास आयें और ये सभी वानर उनका दर्शन करें’॥ ३० ॥
श्रीरामके ऐसा कहनेपर विभीषण बड़े विचारमें पड़ गये और विनीतभावसे सीताको उनके समीप ले आये॥
उस समय श्रीरामचन्द्रजीका पूर्वोक्त वचन सुनकर लक्ष्मण, सुग्रीव तथा कपिवर हनुमान् तीनों ही अत्यन्त व्यथित हो उठे॥ ३२ ॥
श्रीरामचन्द्रजीकी भयंकर चेष्टाएँ यह सूचित कर रही थीं कि वे पन्तीकी ओरसे निरपेक्ष हो गये हैं। इसीलिये उन तीनोंने यह अनुमान किया कि श्रीरघुनाथजी सीतापर अप्रसन्न-से जान पड़ते हैं॥ ३३ ॥
आगे-आगे सीता थीं और पीछे विभीषण। वे लज्जासे अपने अङ्गोंमें ही सिकुड़ी जा रही थीं। इस तरह वे अपने पतिदेवके सामने उपस्थित हुईं॥ ३४ ॥
सीताजीका मुख अत्यन्त सौम्यभावसे युक्त था। वे पतिको ही देवता माननेवाली थीं। उन्होंने बड़े विस्मय, हर्ष और स्नेहके साथ अपने स्वामीके सौम्य (मनोहर) मुखका दर्शन किया॥ ३५ ॥
उदयकालीन पूर्ण चन्द्रमाको भी लज्जित करनेवाले प्रियतमके सुन्दर मुखको, जिसके दर्शनसे वे बहुत दिनोंसे वञ्चित थीं, सीताने जी भरकर निहारा और अपने मनकी पीड़ा दूर की। उस समय उनका मुख प्रसन्नतासे खिल उठा और निर्मल चन्द्रमाके समान शोभा पाने लगा॥ ३६ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें एक सौ चौदहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ११४ ॥