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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

एक सौ एकवाँ सर्ग

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एक सौ एकवाँ सर्ग

श्रीरामका विलाप तथा हनुमान्‌जीकी लायी हुई ओषधिके सुषेणद्वारा किये गये प्रयोगसे लक्ष्मणका सचेत हो उठना

महाबली रावणने शूरवीर लक्ष्मणको अपनी शक्तिसे युद्धमें धराशायी कर दिया था। वे रक्तके प्रवाहसे नहा उठे थे। यह देख भगवान् श्रीरामने दुरात्मा रावणके साथ घोर युद्ध करके बाण-समूहोंकी वर्षा करते हुए ही सुषेणसे इस प्रकार कहा— ॥ १-२ ॥

‘ये वीर लक्ष्मण रावणके पराक्रमसे घायल होकर पृथ्वीपर पड़े हैं और चोट खाये हुए सर्पकी भाँति छटपटा रहे हैं। इस अवस्थामें इन्हें देखकर मेरा शोक बढ़ता जा रहा है॥ ३ ॥

‘ये वीर सुमित्राकुमार मुझे प्राणोंसे भी बढ़कर प्रिय हैं, इन्हें लहूलुहान देखकर मेरा मन व्याकुल हो रहा है, ऐसी दशामें मुझमें युद्ध करनेकी शक्ति क्या होगी?॥

‘ये मेरे शुभलक्षण भाई, जो सदा युद्धका हौसला रखते थे, यदि मर गये तो मुझे इन प्राणोंके रखने और सुख भोगनेसे क्या प्रयोजन है?॥ ५ ॥

‘इस समय मेरा पराक्रम लज्जित-सा हो रहा है, हाथसे धनुष खिसकता-सा जा रहा है, मेरे सायक शिथिल हो रहे हैं और नेत्रोंमें आँसू भर आये हैं॥ ६ ॥

‘जैसे स्वप्नमें मनुष्योंके शरीर शिथिल हो जाते हैं, वही दशा मेरे इन अङ्गोंकी है। मेरी तीव्र चिन्ता बढ़ती जा रही है और दुरात्मा रावणके द्वारा घायल होकर मार्मिक आघातसे अत्यन्त पीड़ित एवं दुःखातुर हुए भाई लक्ष्मणको कराहते देख मुझे मर जानेकी इच्छा हो रही है’॥ ७-८ ॥

श्रीरघुनाथजी बाहर विचरनेवाले प्राणोंके समान प्रिय भाई लक्ष्मणको इस अवस्थामें देख महान् दुःखसे व्याकुल हो गये, चिन्ता और शोकमें डूब गये॥ ९ ॥

उनके मनमें बड़ा विषाद हुआ। इन्द्रियोंमें व्याकुलता छा गयी और वे रणभूमिकी धूलमें घायल होकर पड़े हुए भाई लक्ष्मणकी ओर देखकर विलाप करने लगे— ॥ १० ॥

‘शूरवीर! अब संग्राममें विजय भी मिल जाय तो मुझे प्रसन्नता नहीं होगी। अन्धेके सामने चन्द्रमा अपनी चाँदनी बिखेर दें तो भी वे उसके मनमें कौन-सा आह्लाद पैदा कर सकेंगे?॥ ११ ॥

‘अब इस युद्धसे अथवा प्राणोंकी रक्षासे मुझे क्या प्रयोजन है? अब लड़ने-भिड़नेकी कोई आवश्यकता नहीं है। जब संग्रामके मुहानेपर मारे जाकर लक्ष्मण ही सदाके लिये सो गये, तब युद्ध जीतनेसे क्या लाभ है?॥

‘वनमें आते समय जैसे महातेजस्वी लक्ष्मण मेरे पीछे-पीछे चले आये थे, उसी तरह यमलोकमें जाते समय मैं भी इनके पीछे-पीछे जाऊँगा॥ १३ ॥

‘हाय! जो सदा मुझमें अनुराग रखनेवाले मेरे प्रिय बन्धुजन थे, छलसे युद्ध करनेवाले निशाचरोंने आज उनकी यह दशा कर दी॥ १४ ॥

‘प्रत्येक देशमें स्त्रियाँ मिल सकती हैं, देश-देशमें जाति-भाई उपलब्ध हो सकते हैं; परंतु ऐसा कोई देश मुझे नहीं दिखायी देता, जहाँ सहोदर भाई मिल सके॥

‘दुर्धर्ष वीर लक्ष्मणके बिना मैं राज्य लेकर क्या करूँगा? पुत्रवत्सला माता सुमित्रासे किस तरह बात कर सकूँगा?॥ १६ ॥

‘माता सुमित्राके दिये हुए उलाहनेको कैसे सह सकूँगा? माता कौसल्या और कैकेयीको क्या जवाब दूँगा?॥

‘भरत और महाबली शत्रुघ्न जब पूछेंगे कि आप लक्ष्मणके साथ वनमें गये थे, फिर उनके बिना ही कैसे लौट आये तो उन्हें मैं क्या उत्तर दूँगा?॥ १८ ॥

‘अतः मेरे लिये यहीं मर जाना अच्छा है। भाई-बन्धुओंमें जाकर उनकी कही हुई खोटी-खरी बातें सुनना अच्छा नहीं। मैंने पूर्वजन्ममें कौन-सा अपराध किया था, जिसके कारण मेरे सामने खड़ा हुआ मेरा धर्मात्मा भाई मारा गया॥ १९ १/२ ॥

‘हा भाई नरश्रेष्ठ लक्ष्मण! हा प्रभावशाली शूरप्रवर! तुम मुझे छोड़कर अकेले क्यों परलोकमें जा रहे हो?॥ २० १/२ ॥

‘भैया! मैं तुम्हारे बिना रो रहा हूँ। तुम मुझसे बोलते क्यों नहीं हो? प्रिय बन्धु! उठो। आँख खोलकर देखो। क्यों सो रहे हो? मैं बहुत दुःखी हूँ। मुझपर दृष्टिपात करो॥ २१ १/२ ॥

‘महाबाहो! पर्वतों और वनोंमें जब मैं शोकसे पीड़ित हो प्रमत्त एवं विषादग्रस्त हो जाता था, तब तुम्हीं मुझे धैर्य बँधाते थे (फिर इस समय मुझे क्यों नहीं सान्त्वना देते हो?)’॥ २२ १/२ ॥

इस तरह विलाप करते हुए भगवान् श्रीरामकी सारी इन्द्रियाँ शोकसे व्याकुल हो उठी थीं। उस समय सुषेणने उन्हें आश्वासन देते हुए यह उत्तम बात कही— ॥

‘पुरुषसिंह! व्याकुलता उत्पन्न करनेवाली इस चिन्तायुक्त बुद्धिका परित्याग कीजिये; क्योंकि युद्धके मुहानेपर की हुई चिन्ता बाणोंके समान होती है और केवल शोकको जन्म देती है॥ २४ १/२ ॥

‘आपके भाई शोभावर्द्धक लक्ष्मण मरे नहीं हैं। देखिये, इनके मुखकी आकृति अभी बिगड़ी नहीं है और न इनके चेहरेपर कालापन ही आया है। इनका मुख प्रसन्न एवं कान्तिमान् दिखायी दे रहा है॥ २५-२६ ॥

‘इनके हाथोंकी हथेलियाँ कमल-जैसी कोमल हैं, आँखें भी बहुत साफ हैं। प्रजानाथ! मरे हुए प्राणियोंका ऐसा रूप नहीं देखा जाता है॥ २७ ॥

‘शत्रुओंका दमन करनेवाले वीर! आप विषाद न करें। इनके शरीरमें प्राण हैं। वीर! ये सो गये हैं। इनका शरीर शिथिल होकर भूतलपर पड़ा है। साँस चल रही है और हृदय बारम्बार कम्पित हो रहा है—उसकी गति बंद नहीं हुई है। यह लक्षण इनके जीवित होनेकी सूचना दे रहा है’॥ २८ १/२ ॥

श्रीरामचन्द्रजीसे ऐसा कहकर परम बुद्धिमान् सुषेणने पास ही खड़े हुए महाकपि हनुमान्जीसे कहा— ॥ २९ १/२ ॥

‘सौम्य! तुम शीघ्र ही यहाँसे महोदय पर्वतपर, जिसका पता जाम्बवान् तुम्हें पहले बता चुके हैं, जाओ और उसके दक्षिण शिखरपर उगी हुई विशल्यकरणी^१, सावर्ण्यकरणी^२, संजीवकरणी^३ तथा संधानी^४ नामसे प्रसिद्ध महौषधियोंको यहाँ ले आओ। वीर! उन्हींसे वीरवर लक्ष्मणके जीवनकी रक्षा होगी’॥ ३०—३२ १/२ ॥

उनके ऐसा कहनेपर हनुमान्जी ओषधिपर्वत (महोदयगिरि)-पर गये; परंतु उन महौषधियोंको न पहचाननेके कारण वे चिन्तामें पड़ गये॥ ३३ ॥

इसी समय अमित तेजस्वी हनुमान्जीके हृदयमें यह विचार उत्पन्न हुआ कि ‘मैं पर्वतके इस शिखरको ही ले चलूँ’॥ ३४ ॥

‘इसी शिखरपर वह सुखदायिनी ओषधि उत्पन्न होती होगी, ऐसा मुझे अनुमानतः ज्ञात होता है; क्योंकि सुषेणने ऐसा ही कहा था॥ ३५ ॥

‘यदि विशल्यकरणीको लिये बिना ही लौट जाऊँ तो अधिक समय बीतनेसे दोषकी सम्भावना है और उससे बड़ी भारी घबराहट हो सकती है’॥ ३६॥

ऐसा सोचकर महाबली हनुमान् तुरंत उस श्रेष्ठ पर्वतके पास जा पहुँचे और उसके शिखरको तीन बार हिलाकर उसे उखाड़ लिया। उसके ऊपर नाना प्रकारके वृक्ष खिले हुए थे। वानरश्रेष्ठ महाबली हनुमान्ने उसे दोनों हाथोंपर उठाकर तौला॥ ३७-३८॥

जलसे भरे हुए नीले मेघके समान उस पर्वतशिखरको लेकर हनुमान्जी ऊपरको उछले॥ ३९॥

उनका वेग महान् था। उस शिखरको सुषेणके पास पहुँचाकर उन्होंने पृथ्वीपर रख दिया और थोड़ी देर विश्राम करके हनुमान्जीने सुषेणसे इस प्रकार कहा—॥

‘कपिश्रेष्ठ! मैं उन ओषधियोंको पहचानता नहीं हूँ। इसलिये उस पर्वतका सारा शिखर ही लेता आया हूँ’॥ ४१॥

ऐसा कहते हुए हनुमान्जीकी भूरि-भूरि प्रशंसा करके वानरश्रेष्ठ सुषेणने उन ओषधियोंको उखाड़ लिया॥ ४२॥

हनुमान्जीका वह कर्म देवताओंके लिये भी अत्यन्त दुष्कर था। उसे देखकर समस्त वानर-यूथपति बड़े विस्मित हुए॥ ४३॥

महातेजस्वी कपिश्रेष्ठ सुषेणने उस ओषधिको कूट-पीसकर लक्ष्मणजीकी नाकमें दे दिया॥ ४४॥

शत्रुका संहार करनेवाले लक्ष्मणके सारे शरीरमें बाण धँसे हुए थे। उस अवस्थामें उस ओषधिको सूँघते ही उनके शरीरसे बाण निकल गये और वे नीरोग हो शीघ्र ही भूतलसे उठकर खड़े हो गये॥ ४५॥

लक्ष्मणको भूतलसे उठकर खड़ा हुआ देख वे वानर अत्यन्त प्रसन्न हो ‘साधु-साधु’ कहकर उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे॥ ४६॥

तब शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले भगवान् श्रीरामने लक्ष्मणसे कहा— ‘आओ-आओ’ ऐसा कहकर उन्होंने उन्हें दोनों भुजाओंमें भर लिया और गाढ़ आलिङ्गन करके हृदयसे लगा लिया। उस समय उनके नेत्रोंमें आँसू छलक रहे थे॥ ४७॥

सुमित्राकुमारको हृदयसे लगाकर श्रीरघुनाथजीने कहा— 'वीर! बड़े सौभाग्यकी बात है कि मैं तुम्हें मृत्युके मुखसे पुनः लौटा हुआ देखता हूँ॥ ४८ ॥

'तुम्हारे बिना मुझे जीवनकी रक्षासे, सीतासे अथवा विजयसे भी कोई मतलब नहीं है। जब तुम्हीं नहीं रहोगे, तब मैं इस जीवनको रखकर क्या करूँगा?'॥ ४९॥

महात्मा रघुनाथजीके ऐसा कहनेपर लक्ष्मण खिन्न हो शिथिल वाणीमें धीरे-धीरे बोले—॥ ५०॥

'आर्य! आप सत्यपराक्रमी हैं। आपने पहले रावणका वध करके विभीषणको लङ्काका राज्य देनेकी प्रतिज्ञा की थी। वैसी प्रतिज्ञा करके अब किसी ओछे और निर्बल मनुष्यकी भाँति आपको ऐसी बात नहीं कहनी चाहिये॥ ५१॥

'सत्यवादी पुरुष झूठी प्रतिज्ञा नहीं करते हैं। प्रतिज्ञाका पालन ही बड़प्पनका लक्षण है। निष्पाप रघुवीर! मेरे लिये आपको इतना निराश नहीं होना चाहिये। आज रावणका वध करके आप अपनी प्रतिज्ञा पूरी कीजिये॥

'आपके बाणोंका लक्ष्य बनकर शत्रु जीवित नहीं लौट सकता। ठीक उसी तरह, जैसे गरजते हुए तीखी दाढ़वाले सिंहके सामने आकर महान् गजराज जीवित नहीं रह सकता॥ ५४ ॥

'ये सूर्यदेव अपने दिनभरका भ्रमणकार्य पूरा करके अस्ताचलको नहीं चले जाते, तबतक ही जितना शीघ्र सम्भव हो सके, मैं उस दुरात्मा रावणका वध देखना चाहता हूँ॥ ५५ ॥

'आर्य! वीरवर! यदि आप युद्धमें रावणका वध करना चाहते हैं, यदि आपके मनमें अपनी प्रतिज्ञाके पूरी करनेकी इच्छा है तथा आप राजकुमारी सीताको पानेकी अभिलाषा रखते हैं तो आज शीघ्र ही रावणको मारकर मेरी प्रार्थना सफल करें'॥ ५६ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें एक सौ एकवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १०१ ॥


१. शरीरमें धँसे हुए बाण आदिको निकालकर घाव भरने और पीड़ा दूर करनेवाली।
२. शरीरमें पहलेकी-सी रंगत लानेवाली।
३. मूर्च्छा दूर कर चेतना प्रदान करनेवाली।
४. टूटी हुई हड्डियोंको जोड़नेवाली। ९७३