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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

एकसठवाँ सर्ग

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एकसठवाँ सर्ग

विश्वामित्रकी पुष्कर तीर्थमें तपस्या तथा राजर्षि अम्बरीषका ऋचीकके मध्यम पुत्र शुनःशेपको यज्ञ-पशु बनानेके लिये खरीदकर लाना

[शतानन्दजी कहते हैं—] पुरुषसिंह श्रीराम! यज्ञमें आये हुए उन सब वनवासी ऋषियोंको वहाँसे जाते देख महातेजस्वी विश्वामित्रने उनसे कहा— ॥ १ ॥

‘महर्षियो! इस दक्षिण दिशामें रहनेसे हमारी तपस्यामें महान् विघ्न आ पड़ा है; अतः अब हम दूसरी दिशामें चले जायेंगे और वहीं रहकर तपस्या करेंगे॥ २ ॥

‘विशाल पश्चिम दिशामें जो महात्मा ब्रह्माजीके तीन पुष्कर हैं, उन्हींके पास रहकर हम सुखपूर्वक तपस्या करेंगे; क्योंकि वह तपोवन बहुत ही सुखद है’॥ ३ ॥

ऐसा कहकर वे महातेजस्वी महामुनि पुष्करमें चले गये और वहाँ फल-मूलका भोजन करके उग्र एवं दुर्जय तपस्या करने लगे॥ ४ ॥

इन्हीं दिनों अयोध्याके महाराज अम्बरीष एक यज्ञकी तैयारी करने लगे॥ ५ ॥

जब वे यज्ञमें लगे हुए थे, उस समय इन्द्रने उनके यज्ञपशुको चुरा लिया। पशुके खो जानेपर पुरोहितजीने राजासे कहा— ॥ ६ ॥

‘राजन्! जो पशु यहाँ लाया गया था, वह आपकी दुर्नीतिके कारण खो गया। नरेश्वर! जो राजा यज्ञ-पशुकी रक्षा नहीं करता, उसे अनेक प्रकारके दोष नष्ट कर डालते हैं॥ ७ ॥

‘पुरुषप्रवर! जबतक कर्मका आरम्भ होता है, उसके पहले ही खोये हुए पशुकी खोज कराकर उसे शीघ्र यहाँ ले आओ। अथवा उसके प्रतिनिधिरूपसे किसी पुरुष पशुको खरीद लाओ। यही इस पापका महान् प्रायश्चित्त है’॥

पुरोहितकी यह बात सुनकर महाबुद्धिमान् पुरुषश्रेष्ठ राजा अम्बरीषने हजारों गौओंके मूल्यपर खरीदनेके लिये एक पुरुषका अन्वेषण किया॥ ९ ॥

तात रघुनन्दन! विभिन्न देशों, जनपदों, नगरों, वनों तथा पवित्र आश्रमोंमें खोज करते हुए राजा अम्बरीष भृगुतुंग पर्वतपर पहुँचे और वहाँ उन्होंने पत्नी तथा पुत्रोंके साथ बैठे हुए ऋचीक मुनिका दर्शन किया॥ १०-११ ॥

अमित कान्तिमान् एवं महातेजस्वी राजर्षि अम्बरीषने तपस्यासे उद्दीप्त होनेवाले महर्षि ऋचीकको प्रणाम किया और उन्हें प्रसन्न करके कहा॥ १२ ॥

पहले तो उन्होंने ऋचीक मुनिसे उनकी सभी वस्तुओंके विषयमें कुशल-समाचार पूछा, उसके बाद इस प्रकार कहा—‘महाभाग भृगुनन्दन! यदि आप एक लाख गौएँ लेकर अपने एक पुत्रको पशु बनानेके लिये बेचें तो मैं कृतकृत्य हो जाऊँगा॥ १३ १/२ ॥

‘मैं सारे देशोंमें घूम आया; परंतु कहीं भी यज्ञोपयोगी पशु नहीं पा सका। अतः आप उचित मूल्य लेकर यहाँ मुझे अपने एक पुत्रको दे दीजिये’॥ १४ १/२ ॥

उनके ऐसा कहनेपर महातेजस्वी ऋचीक बोले— ‘नरश्रेष्ठ! मैं अपने ज्येष्ठ पुत्रको तो किसी तरह नहीं बेचूँगा’॥ १५ १/२ ॥

ऋचीक मुनिकी बात सुनकर उन महात्मा पुत्रोंकी माताने पुरुषसिंह अम्बरीषसे इस प्रकार कहा—॥ १६ १/२ ॥

‘प्रभो! भगवान् भार्गव कहते हैं कि ज्येष्ठ पुत्र कदापि बेचनेयोग्य नहीं है; परंतु आपको मालूम होना चाहिये जो सबसे छोटा पुत्र शूनक है, वह मुझे भी बहुत ही प्रिय है। अतः पृथ्वीनाथ! मैं अपना छोटा पुत्र आपको कदापि नहीं दूँगी॥ १७-१८ ॥

‘नरश्रेष्ठ! प्रायः जेठे पुत्र पिताओंको प्रिय होते हैं और छोटे पुत्र माताओंको। अतः मैं अपने कनिष्ठ पुत्रकी अवश्य रक्षा करूँगी’॥ १९ ॥

श्रीराम! मुनि और उनकी पत्नीके ऐसा कहनेपर मझले पुत्र शुनःशेपने स्वयं कहा—॥ २० ॥

‘राजपुत्र! पिताने ज्येष्ठको और माताने कनिष्ठ पुत्रको बेचनेके लिये अयोग्य बतलाया है। अतः मैं समझता हूँ इन दोनोंकी दृष्टिमें मझला पुत्र ही बेचनेके योग्य है। इसलिये तुम मुझे ही ले चलो’॥ २१ ॥

महाबाहु रघुनन्दन! ब्रह्मवादी मझले पुत्रके ऐसा कहनेपर राजा अम्बरीष बड़े प्रसन्न हुए और एक करोड़ स्वर्णमुद्रा, रत्नोंके ढेर तथा एक लाख गौओंके बदले शुनःशेपको लेकर वे घरकी ओर चले॥ २२-२३ ॥

महातेजस्वी महायशस्वी राजर्षि अम्बरीष शुनःशेपको रथपर बिठाकर बड़ी उतावलीके साथ तीव्र गतिसे चले॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें एकसठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ६१॥