श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
उनहत्तरवाँ सर्ग
उनहत्तरवाँ सर्ग
शत्रुघ्न और लवणासुरका युद्ध तथा लवणका वध
महामना शत्रुघ्नका वह भाषण सुनकर लवणासुरको बड़ा क्रोध हुआ और बोला— ‘अरे! खड़ा रह, खड़ा रह’॥ १ ॥
वह हाथ-पर-हाथ रगड़ता और दाँत कटकटाता हुआ रघुकुलके सिंह शत्रुघ्नको बारंबार ललकारने लगा॥ २ ॥
भयंकर दिखायी देनेवाले लवणको इस प्रकार बोलते देख देवशत्रुओंका नाश करनेवाले शत्रुघ्नने यह बात कही—॥ ३ ॥
‘राक्षस! जब तूने दूसरे वीरोंको पराजित किया था, उस समय शत्रुघ्नका जन्म नहीं हुआ था। अतः आज मेरे इन बाणोंकी चोट खाकर तू सीधे यमलोककी राह ले॥ ४ ॥
‘पापात्मन्! जैसे देवताओंने रावणको धराशायी हुआ देखा था, उसी तरह विद्वान् ब्राह्मण और ऋषि आज रणभूमिमें मेरे द्वारा मारे गये तुझ दुराचारी राक्षसको भी देखें॥ ५ ॥
‘निशाचर! आज मेरे बाणोंसे दग्ध होकर जब तू धरतीपर गिर जायगा, उस समय इस नगर और जनपदमें भी सबका कल्याण ही होगा॥ ६ ॥
‘आज मेरी भुजाओंसे छूटा हुआ वज्रके समान मुखवाला बाण उसी तरह तेरी छातीमें धँस जायगा, जैसे सूर्यकी किरण कमलकोशमें प्रविष्ट हो जाती है’॥ ७ ॥
शत्रुघ्नके ऐसा कहनेपर लवण क्रोधसे मूर्च्छित-सा हो गया और एक महान् वृक्ष लेकर उसने शत्रुघ्नकी छातीपर दे मारा; परंतु शत्रुघ्नने उसके सैकड़ों टुकड़े कर दिये॥ ८ ॥
वह वार खाली गया देख उस बलवान् राक्षसने पुनः बहुत-से वृक्ष ले-लेकर शत्रुघ्नपर चलाये॥ ९ ॥
परंतु शत्रुघ्न भी बड़े तेजस्वी थे। उन्होंने अपने ऊपर आते हुए उन बहुसंख्यक वृक्षोंमेंसे प्रत्येकको झुकी हुई गाँठवाले तीन-तीन या चार-चार बाण मारकर काट डाला॥ १० ॥
फिर पराक्रमी शत्रुघ्नने उस राक्षसपर बाणोंकी झड़ी लगा दी, किंतु वह निशाचर इससे व्यथित या विचलित नहीं हुआ॥ ११ ॥
तब बल-विक्रमशाली लवणने हँसकर एक वृक्ष उठाया और उसे शूरवीर शत्रुघ्नके सिरपर दे मारा। उसकी चोट खाकर शत्रुघ्नके सारे अङ्ग शिथिल हो गये और उन्हें मूर्च्छा आ गयी॥ १२ ॥
वीर शत्रुघ्नके गिरते ही ऋषियों, देवसमूहों, गन्धर्वों और अप्सराओंमें महान् हाहाकार मच गया॥ १३ ॥
शत्रुघ्नजीको भूमिपर गिरा देख लवणने समझा ये मर गये, इसलिये अवसर मिलनेपर भी वह राक्षस अपने घरमें नहीं गया और न शूल ही ले आया। उन्हें धराशायी हुआ देख सर्वथा मरा हुआ समझकर ही वह अपनी उस भोजनसामग्रीको एकत्र करने लगा॥ १४-१५ ॥
दो ही घड़ीमें शत्रुघ्नको होश आ गया। वे अस्त्र-शस्त्र लेकर उठे और फिर नगरद्वारपर खड़े हो गये। उस समय ऋषियोंने उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा की॥ १६ ॥
तदनन्तर शत्रुघ्नने उस दिव्य, अमोघ और उत्तम बाणको हाथमें लिया, जो अपने घोर तेजसे प्रज्वलित हो दसों दिशाओंमें व्याप्त-सा हो रहा था॥ १७ ॥
उसका मुख और वेग वज्रके समान था। वह मेरु और मन्दराचलके समान भारी था। उसकी गाँठें झुकी हुईं थीं तथा वह किसी भी युद्धमें पराजित होनेवाला नहीं था॥ १८ ॥
उसका सारा अङ्ग रक्तरूपी चन्दनसे चर्चित था। पंख बड़े सुन्दर थे। वह बाण दानवराजरूपी पर्वतराजों एवं असुरोंके लिये बड़ा भयंकर था॥ १९ ॥
वह प्रलयकाल उपस्थित होनेपर प्रज्वलित हुई कालाग्निके समान उद्दीप्त हो रहा था। उसे देखकर समस्त प्राणी त्रस्त हो गये॥ २० ॥
देवता, असुर, गन्धर्व, मुनि और अप्सराओंके साथ सारा जगत् अस्वस्थ हो ब्रह्माजीके पास पहुँचा॥ २१ ॥
जगत्के उन सभी प्राणियोंने वर देनेवाले देवदेवेश्वर प्रपितामह ब्रह्माजीसे कहा— 'भगवन्! समस्त लोकोंके संहारकी सम्भावनासे देवताओंपर भी भय और मोह छा गया है॥ २२ ॥
‘देव! कहीं लोकोंका संहार तो नहीं होगा अथवा प्रलयकाल तो नहीं आ पहुँचा है? प्रपितामह! संसारकी ऐसी अवस्था न तो पहले कभी देखी गयी थी और न सुननेमें ही आयी थी’॥ २३ ॥
उनकी यह बात सुनकर देवताओंका भय दूर करनेवाले लोकपितामह ब्रह्माने प्रस्तुत भयका कारण बताते हुए कहा॥ २४ ॥
वे मधुर वाणीमें बोले—‘सम्पूर्ण देवताओ! मेरी बात सुनो। आज शत्रुघ्नने युद्धस्थलमें लवणासुरका वध करनेके लिये जो बाण हाथमें लिया है, उसीके तेजसे हम सब लोग मोहित हो रहे हैं। ये श्रेष्ठ देवता भी उसीसे घबराये हुए हैं॥ २५ १/२ ॥
‘पुत्रो! यह तेजोमय सनातन बाण आदिपुरुष लोककर्ता भगवान् विष्णुका है। जिससे तुम्हें भय प्राप्त हुआ है॥ २६ १/२ ॥
‘परमात्मा श्रीहरिने मधु और कैटभ—इन दोनों दैत्योंका वध करनेके लिये इस महान् बाणकी सृष्टि की थी॥ २७ १/२ ॥
‘एकमात्र भगवान् विष्णु ही इस तेजोमय बाणको जानते हैं; क्योंकि यह बाण साक्षात् परमात्मा विष्णुकी ही प्राचीन मूर्ति है॥ २८ १/२ ॥
‘अब तुमलोग यहाँसे जाओ और श्रीरामचन्द्रजीके छोटे भाई महामनस्वी वीर शत्रुघ्नके हाथसे राक्षसप्रवर लवणासुरका वध होता देखो’॥ २९ १/२ ॥
देवाधिदेव ब्रह्माजीका यह वचन सुनकर देवतालोग उस स्थानपर आये, जहाँ शत्रुघ्नजी और लवणासुर दोनोंका युद्ध हो रहा था॥ ३० १/२ ॥
शत्रुघ्नजीके द्वारा हाथमें लिये गये उस दिव्य बाणको सभी प्राणियोंने देखा। वह प्रलयकालके अग्निके समान प्रज्वलित हो रहा था॥ ३१ १/२ ॥
आकाशको देवताओंसे भरा हुआ देख रघुकुलनन्दन शत्रुघ्नने बड़े जोरसे सिंहनाद करके लवणासुरकी ओर देखा॥ ३२ १/२ ॥
महात्मा शत्रुघ्नके पुनः ललकारनेपर लवणासुर क्रोधसे भर गया और फिर युद्धके लिये उनके सामने आया॥ ३३ १/२ ॥
तब धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ शत्रुघ्नजीने अपने धनुषको कानतक खींचकर उस महाबाणको लवणासुरके विशाल वक्षःस्थलपर चलाया॥ ३४ १/२ ॥
वह देवपूजित दिव्य बाण तुरंत ही उस राक्षसके हृदयको विदीर्ण करके रसातलमें घुस गया तथा रसातलमें जाकर वह फिर तत्काल ही इक्ष्वाकुकुलनन्दन शत्रुघ्नजीके पास आ गया॥
३५-३६ ॥
शत्रुघ्नजीके बाणसे विदीर्ण होकर निशाचर लवण वज्रके मारे हुए पर्वतके समान सहसा पृथ्वीपर गिर पड़ा॥ ३७ ॥
लवणासुरके मारे जाते ही वह दिव्य एवं महान् शूल सब देवताओंके देखते-देखते भगवान् रुद्रके पास आ गया॥ ३८ ॥
इस प्रकार उत्तम धनुष-बाण धारण करनेवाले रघुकुलके प्रमुख वीर शत्रुघ्न एक ही बाणके प्रहारसे तीनों लोकोंके भयको नष्ट करके उसी प्रकार सुशोभित हुए, जैसे त्रिभुवनका अन्धकार दूर करके सहस्र किरणधारी सूर्यदेव प्रकाशित हो उठते हैं॥ ३९ ॥
‘सौभाग्यकी बात है कि दशरथनन्दन शत्रुघ्नने भय छोड़कर विजय प्राप्त की और सर्पके समान लवणासुर मर गया’ ऐसा कहकर देवता, ऋषि, नाग और समस्त अप्सराएँ उस समय शत्रुघ्नजीकी भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगीं॥ ४० ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें उनहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ६९॥