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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

उनसठवाँ सर्ग

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उनसठवाँ सर्ग

ययातिका अपने पुत्र पूरुको अपना बुढ़ापा देकर बदलेमें उसका यौवन लेना और भोगोंसे तृप्त होकर पुनः दीर्घकालके बाद उसे उसका यौवन लौटा देना, पूरुका अपने पिताकी गद्दीपर अभिषेक तथा यदुको शाप

शुक्राचार्यके कुपित होनेका समाचार सुनकर नहुषकुमार ययातिको बड़ा दुःख हुआ। उन्हें ऐसी वृद्धावस्था प्राप्त हुई, जो दूसरेकी जवानीसे बदली जा सकती थी। उस विलक्षण जरावस्थाको पाकर राजाने यदुसे कहा— ॥ १ ॥

‘यदो! तुम धर्मके ज्ञाता हो। मेरे महायशस्वी पुत्र! तुम मेरे लिये दूसरेके शरीरमें संचारित करनेके योग्य इस जरावस्थाको ले लो। मैं भोगोंद्वारा रमण करूँगा— अपनी भोगविषयक इच्छाको पूर्ण करूँगा॥ २ ॥

‘नरश्रेष्ठ! अभीतक मैं विषयभोगोंसे तृप्त नहीं हुआ हूँ। इच्छानुसार विषयसुखका अनुभव करके फिर अपनी वृद्धावस्था मैं तुमसे ले लूँगा’॥ ३ ॥

उनकी यह बात सुनकर यदुने नरश्रेष्ठ ययातिको उत्तर दिया— ‘आपके लाड़ले बेटे पूरु ही इस वृद्धावस्थाको ग्रहण करें॥ ४ ॥

‘पृथ्वीनाथ! मुझे तो आपने धनसे तथा पास रहकर लाड़-प्यार पानेके अधिकारसे भी वञ्चित कर दिया है; अतः जिनके साथ बैठकर आप भोजन करते हैं, उन्हीं लोगोंसे युवावस्था ग्रहण कीजिये’॥ ५ ॥

यदुकी यह बात सुनकर राजाने पूरुसे कहा— ‘महाबाहो! मेरी सुख-सुविधाके लिये तुम इस वृद्धावस्थाको ग्रहण कर लो’॥ ६ ॥

नहुष-पुत्र ययातिके ऐसा कहनेपर पूरु हाथ जोड़कर बोले— ‘पिताजी! आपकी सेवाका अवसर पाकर मैं धन्य हो गया। यह आपका मेरे ऊपर महान् अनुग्रह है। आपकी आज्ञाका पालन करनेके लिये मैं हर तरहसे तैयार हूँ’॥ ७ ॥

पूरुका यह स्वीकारसूचक वचन सुनकर नहुषकुमार ययातिको बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्हें अनुपम हर्ष प्राप्त हुआ और उन्होंने अपनी वृद्धावस्था पूरुके शरीरमें संचारित कर दी॥ ८ ॥

तदनन्तर तरुण हुए राजा ययातिने सहस्रों यज्ञोंका अनुष्ठान करते हुए कई हजार वर्षोंतक इस पृथ्वीका पालन किया॥ ९ ॥

इसके बाद दीर्घकाल व्यतीत होनेपर राजाने पूरुसे कहा—'बेटा! तुम्हारे पास धरोहरके रूपमें रखी हुई मेरी वृद्धावस्थाको मुझे लौटा दो॥ १० ॥

'पुत्र! मैंने वृद्धावस्थाको धरोहरके रूपमें ही तुम्हारे शरीरमें संचारित किया था; इसलिये उसे वापस ले लूँगा। तुम अपने मनमें दुःख न मानना॥ ११ ॥

'महाबाहो! तुमने मेरी आज्ञा मान ली, इससे मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई। अब मैं बड़े प्रेमसे राजाके पदपर तुम्हारा अभिषेक करूँगा'॥ १२ ॥

अपने पुत्र पूरुसे ऐसा कहकर नहुषकुमार राजा ययाति देवयानीके बेटेसे कुपित होकर बोले—॥ १३ ॥

'यदो! मैंने दुर्जय क्षत्रियके रूपमें तुम-जैसे राक्षसको जन्म दिया। तुमने मेरी आज्ञाका उल्लङ्घन किया है, अतः तुम अपनी संतानोंको राज्याधिकारी बनानेके विषयमें विफल-मनोरथ हो जाओ॥ १४ ॥

'मैं पिता हूँ, गुरु हूँ; फिर भी तुम मेरा अपमान करते हो, इसलिये भयंकर राक्षसों और यातुधानोंको तुम जन्म दोगे॥ १५ ॥

'तुम्हारी बुद्धि बहुत खोटी है। अतः तुम्हारी संतान सोमकुलमें उत्पन्न वंशपरम्परामें राजाके रूपसे प्रतिष्ठित नहीं होगी। तुम्हारी संतति भी तुम्हारे ही समान उद्दण्ड होगी'॥ १६ ॥

यदुसे ऐसा कहकर राजर्षि ययातिने राज्यकी वृद्धि करनेवाले पूरुको अभिषेकके द्वारा सम्मानित करके वानप्रस्थ-आश्रममें प्रवेश किया॥ १७ ॥

तदनन्तर दीर्घकालके पश्चात् प्रारब्ध-भोगका क्षय होनेपर नहुषपुत्र राजा ययातिने शरीरको त्याग दिया और स्वर्गलोकको प्रस्थान किया॥ १८ ॥

उसके बाद महायशस्वी पूरुने महान् धर्मसे संयुक्त हो काशिराजकी श्रेष्ठ राजधानी प्रतिष्ठानपुरमें रहकर उस राज्यका पालन किया॥ १९ ॥

राजकुलसे बहिष्कृत यदुने नगरमें तथा दुर्गम क्रौञ्चवनमें सहस्रों यातुधानोंको जन्म दिया॥ २० ॥

शुक्राचार्यके दिये हुए इस शापको राजा ययातिने क्षत्रियधर्मके अनुसार धारण कर लिया। परंतु राजा निमिने वसिष्ठजीके शापको नहीं सहन किया॥ २१ ॥

सौम्य! यह सारा प्रसंग मैंने तुम्हें सुना दिया। समस्त कृत्योंका पालन करनेवाले सत्पुरुषोंकी दृष्टि (विचार)-का ही हम अनुसरण करते हैं, जिससे राजा नृगकी भाँति हमें भी दोष न प्राप्त हो॥ २२ ॥

चन्द्रमाके समान मनोहर मुखवाले श्रीराम जब इस प्रकार कथा कह रहे थे, उस समय आकाशमें दो-ही-एक तारे रह गये। पूर्व दिशा अरुण किरणोंसे रञ्जित हो लाल दिखायी देने लगी, मानो कुसुम-रंगमें रँगे हुए अरुण वस्त्रसे उसने अपने अङ्गोंको ढक लिया हो॥ २३ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें उनसठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ५९॥