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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

उनचासवाँ सर्ग

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उनचासवाँ सर्ग

मुनिकुमारोंसे समाचार पाकर वाल्मीकिका सीताके पास आ उन्हें सान्त्वना देना और आश्रममें लिवा ले जाना

जहाँ सीता रो रही थीं, वहाँसे थोड़ी ही दूरपर ऋषियोंके कुछ बालक थे। वे उन्हें रोते देख अपने आश्रमकी ओर दौड़े, जहाँ उग्र तपस्यामें मन लगानेवाले भगवान् वाल्मीकि मुनि विराजमान थे॥ १ ॥

उन सब मुनिकुमारोंने महर्षिके चरणोंमें अभिवादन करके उनसे सीताजीके रोनेका समाचार सुनाया॥ २ ॥

वे बोले—‘भगवन्! गङ्गातटपर किन्हीं महात्मा नरेशकी पत्नी हैं, जो साक्षात् लक्ष्मीके समान जान पड़ती हैं। इन्हें हमलोगोंने पहले कभी नहीं देखा था। वे मोहके कारण विकृतमुख होकर रो रही हैं॥ ३ ॥

‘भगवन्! आप स्वयं चलकर अच्छी तरह देख लें। वे आकाशसे उतरी हुई किसी देवी-सी दिखायी देती हैं। प्रभो! गङ्गाजीके तटपर जो वे कोई श्रेष्ठ सुन्दरी स्त्री बैठी हैं, बहुत दुःखी हैं॥ ४ ॥

‘हमने अपनी आँखों देखा है, वे बड़े जोर-जोरसे रोती हैं और गहरे शोकमें डूबी हुई हैं। वे दुःख और शोक भोगनेके योग्य नहीं हैं। अकेली हैं, दीन हैं और अनाथकी तरह बिलख रही हैं॥ ५ ॥

‘हमारी समझमें ये मानवी स्त्री नहीं हैं। आपको इनका सत्कार करना चाहिये। इस आश्रमसे थोड़ी ही दूरपर होनेके कारण ये वास्तवमें आपकी शरणमें आयी हैं॥ ६ ॥

‘भगवन्! ये साध्वी देवी अपने लिये कोई रक्षक ढूँढ़ रही हैं। अतः आप इनकी रक्षा करें।’ उन मुनिकुमारोंकी यह बात सुनकर धर्मज्ञ महर्षिने बुद्धिसे निश्चित करके असली बातको जान लिया; क्योंकि उन्हें तपस्याद्वारा दिव्य दृष्टि प्राप्त थी। जानकर वे उस स्थानपर दौड़े हुए आये, जहाँ मिथिलेशकुमारी सीता विराजमान थीं॥ ७½ ॥

उन परम बुद्धिमान् महर्षिको जाते देख उनके शिष्य भी उनके साथ हो लिये। कुछ पैदल चलकर वे महामति महर्षि सुन्दर अर्घ्य लिये गङ्गातटवर्ती उस स्थानपर आये। वहाँ आकर उन्होंने

श्रीरघुनाथजीकी प्रिय पत्नी सीताको अनाथकी-सी दशामें देखा॥ ८-९ ॥

शोकके भारसे पीड़ित हुई सीताको अपने तेजसे आह्लादित-सी करते हुए मुनिवर वाल्मीकि मधुर वाणीमें बोले— ॥ १० ॥

‘पतिव्रते! तुम राजा दशरथकी पुत्रवधू, महाराज श्रीरामकी प्यारी पटरानी और मिथिलाके राजा जनककी पुत्री हो। तुम्हारा स्वागत है॥ ११ ॥

‘जब तुम यहाँ आ रही थी, तभी अपनी धर्मसमाधिके द्वारा मुझे इसका पता लग गया था। तुम्हारे परित्यागका जो सारा कारण है, उसे मैंने अपने मनसे ही जान लिया है॥ १२ ॥

‘महाभागे! तुम्हारा सारा वृत्तान्त मैंने ठीक-ठीक जान लिया है। त्रिलोकीमें जो कुछ हो रहा है, वह सब मुझे विदित है॥ १३ ॥

‘सीते! मैं तपस्याद्वारा प्राप्त हुई दिव्य-दृष्टिसे जानता हूँ कि तुम निष्पाप हो। अतः विदेहनन्दिनि! अब निश्चिन्त हो जाओ। इस समय तुम मेरे पास हो॥ १४ ॥

‘बेटी! मेरे आश्रमके पास ही कुछ तापसी स्त्रियाँ रहती हैं, जो तपस्यामें संलग्न हैं। वे अपनी बच्चीके समान सदा तुम्हारा पालन करेंगी॥ १५ ॥

‘यह मेरा दिया हुआ अर्घ्य ग्रहण करो और

निश्चिन्त एवं निर्भय हो जाओ। अपने ही घरमें आ गयी हो, ऐसा समझकर विषाद न करो’॥ १६ ॥

महर्षिका यह अत्यन्त अद्भुत भाषण सुनकर सीताने उनके चरणोंमें मस्तक झुकाकर प्रणाम किया और हाथ जोड़कर कहा— ‘जो आज्ञा’॥ १७ ॥

तब मुनि आगे-आगे चले और सीता हाथ जोड़े उनके पीछे हो लीं। विदेहनन्दिनीके साथ महर्षिको आते देख मुनिपत्नियाँ उनके पास आयीं और बड़ी प्रसन्नताके साथ इस प्रकार बोलीं— ॥ १८ ॥

‘मुनिश्रेष्ठ! आपका स्वागत है। बहुत दिनोंके बाद यहाँ आपका शुभागमन हुआ है। हम सभी आपको अभिवादन करती हैं। बताइये, हम आपकी क्या सेवा करें’॥ १९ ॥

उनका यह वचन सुनकर वाल्मीकिजी बोले— ‘ये परम बुद्धिमान् राजा श्रीरामकी धर्मपत्नी सीता यहाँ आयी हैं॥ २० ॥

‘सती सीता राजा दशरथकी पुत्रवधू और जनककी पुत्री हैं। निष्पाप होनेपर भी पतिने इनका परित्याग कर दिया है। अतः मुझे ही इनका सदा लालन-पालन करना है॥

‘अतः आप सब लोग इनपर अत्यन्त स्नेह-दृष्टि रखें। मेरे कहनेसे तथा अपने ही गौरवसे भी ये आपकी विशेष आदरणीया हैं’॥ २२ ॥

इस प्रकार बारम्बार सीताजीको मुनिपत्नियोंके हाथमें सौंपकर महायशस्वी एवं महातपस्वी वाल्मीकिजी शिष्योंके साथ फिर अपने आश्रमपर लौट आये॥ २३ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें उनचासवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ४९॥