श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
इकसठवाँ सर्ग
इकसठवाँ सर्ग
ऋषियोंका मधुको प्राप्त हुए वर तथा लवणासुरके बल और अत्याचारका वर्णन करके उससे प्राप्त होनेवाले भयको दूर करनेके लिये श्रीरघुनाथजीसे प्रार्थना करना
इस प्रकार कहते हुए ऋषियोंसे प्रेरित हो श्रीरामचन्द्रजीने कहा—‘महर्षियो! बताइये, आपका कौन-सा कार्य मुझे सिद्ध करना है! आपलोगोंका भय तो अभी दूर हो जाना चाहिये’॥ १ ॥
श्रीरघुनाथजीके ऐसा कहनेपर भृगुपुत्र च्यवन बोले—‘नरेश्वर! समूचे देशपर और हमलोगोंपर जो भय प्राप्त हुआ है, उसका मूल कारण क्या है, सुनिये॥ २ ॥
‘राजन्! पहले सत्ययुगमें एक बड़ा बुद्धिमान् दैत्य था। वह लोलाका ज्येष्ठ पुत्र था। उस महान् असुरका नाम था मधु॥ ३ ॥
‘वह बड़ा ही ब्राह्मण-भक्त और शरणागतवत्सल था। उसकी बुद्धि सुस्थिर थी। अत्यन्त उदार स्वभाववाले देवताओंके साथ भी उसकी ऐसी गहरी मित्रता थी, जिसकी कहीं तुलना नहीं थी॥ ४ ॥
‘मधु बल-विक्रमसे सम्पन्न था और एकाग्रचित्त होकर धर्मके अनुष्ठानमें लगा रहता था। उसने भगवान् शिवकी बड़ी आराधना की थी, जिससे उन्होंने उसे अद्भुत वर प्रदान किया था॥ ५ ॥
‘महामना भगवान् शिवने अत्यन्त प्रसन्न हो अपने शूलसे एक चमचमाता हुआ परम शक्तिशाली शूल प्रकट करके उसे मधुको दिया और यह बात कही—॥ ६ ॥
‘“तुमने मुझे प्रसन्न करनेवाला यह बड़ा अनुपम धर्म किया है; अतः मैं अत्यन्त प्रसन्न होकर तुम्हें यह उत्तम आयुध प्रदान करता हूँ॥ ७ ॥
‘“महान् असुर! जबतक तुम ब्राह्मणों और देवताओंसे विरोध नहीं करोगे, तभीतक यह शूल तुम्हारे पास रहेगा, अन्यथा अदृश्य हो जायगा॥ ८ ॥
‘“जो पुरुष निःशङ्क होकर तुम्हारे सामने युद्धके लिये आयेगा, उसे भस्म करके यह शूल पुनः तुम्हारे हाथमें लौट आयेगा’॥ ९ ॥
“भगवान् रुद्रसे ऐसा वर पाकर वह महान् असुर महादेवजीको प्रणाम करके फिर इस प्रकार बोला—॥ १० ॥
“भगवन्! देवाधिदेव! आप समस्त देवताओंके स्वामी हैं; अतः आपसे प्रार्थना है कि परम उत्तम शूल मेरे वंशजोंके पास भी सदा रहे'॥ ११ ॥
‘ऐसी बात कहनेवाले उस मधुसे समस्त प्राणियोंके अधिपति महान् देवता भगवान् शिवने इस प्रकार कहा— ‘ऐसा तो नहीं हो सकता॥ १२ ॥
“परंतु मुझे प्रसन्न जानकर तुम्हारे मुखसे जो शुभ वाणी निकली है, वह भी निष्फल न हो; इसलिये मैं वर देता हूँ कि तुम्हारे एक पुत्रके पास यह शूल रहेगा॥ १३ ॥
“यह शूल जबतक तुम्हारे पुत्रके हाथमें मौजूद रहेगा, तबतक वह समस्त प्राणियोंके लिये अवध्य बना रहेगा'॥ १४ ॥
‘महादेवजीसे इस प्रकार अत्यन्त अद्भुत वर पाकर असुरश्रेष्ठ मधुने एक सुन्दर भवन तैयार कराया, जो अत्यन्त दीप्तिमान् था॥ १५ ॥
‘उसकी प्रिय पत्नी महाभागा कुम्भीनसी थी, जो विश्वावसुकी संतान थी। उसका जन्म अनलाके गर्भसे हुआ था। कुम्भीनसी बड़ी कान्तिमती थी॥ १६ ॥
‘उसका पुत्र महापराक्रमी लवण है, जिसका स्वभाव बड़ा भयंकर है। वह दुष्टात्मा बचपनसे ही केवल पापाचारमें प्रवृत्त रहा है॥ १७ ॥
‘अपने पुत्रको उद्दण्ड हुआ देख मधु क्रोधसे जलता रहता था। उसे बेटेकी दुष्टता देखकर बड़ा शोक हुआ, तथापि वह इससे कुछ नहीं बोला॥ १८ ॥
‘अन्तमें वह इस देशको छोड़कर समुद्रमें रहनेके लिये चला गया। चलते समय उसने वह शूल लवणको दे दिया और उसे वरदानकी बात भी बता दी॥ १९ ॥
‘अब वह दुष्ट उस शूलके प्रभावसे तथा अपनी दुष्टताके कारण तीनों लोकोंको विशेषतः तपस्वी मुनियोंको बड़ा संताप दे रहा है॥ २० ॥
‘उस लवणासुरका ऐसा प्रभाव है और उसके पास वैसा शक्तिशाली शूल भी है। रघुनन्दन! यह सब सुनकर यथोचित कार्य करनेमें आप ही प्रमाण हैं और आप ही हमारी परम गति हैं॥ २१ ॥
‘श्रीराम! आजसे पहले भयसे पीड़ित हुए ऋषि अनेक राजाओंके पास जा-जाकर अभयकी भिक्षा माँग चुके हैं; परंतु वीर रघुवीर! अबतक हमें कोऽइ रक्षक नहीं मिला॥ २२ ॥
‘तात! हमने सुना है कि आपने सेना और सवारियोंसहित रावणका संहार कर डाला है; इसलिये हम आपहीको अपनी रक्षा करनेमें समर्थ समझते हैं, भूतलपर दूसरे किसी राजाको नहीं। अतः हमारी इच्छा है कि आप भयसे पीड़ित हुए महर्षियोंकी लवणासुरसे रक्षा करें॥ २३ ॥
‘बल-विक्रमसे सम्पन्न श्रीराम! इस प्रकार हमारे सामने जो भयका कारण उपस्थित हो गया है, वह हमने आपके आगे निवेदन कर दिया। आप इसे दूर करनेमें समर्थ हैं, अतः हमारी यह अभिलाषा पूर्ण करें’॥ २४ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें इकसठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ६१॥