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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

इकतीसवाँ सर्ग

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इकतीसवाँ सर्ग

मायारचित श्रीरामका कटा मस्तक दिखाकर रावणद्वारा सीताको मोहमें डालनेका प्रयत्न

राक्षसराज रावणके गुप्तचरोंने जब लङ्कामें लौटकर यह बताया कि श्रीरामचन्द्रजीकी सेना सुवेल पर्वतपर आकर ठहरी है और उसपर विजय पाना असम्भव है, तब उन गुप्तचरोंकी बात सुनकर और महाबली श्रीराम आ गये, यह जानकर रावणको कुछ उद्वेग हुआ। उसने अपने मन्त्रियोंसे इस प्रकार कहा— ॥ १-२ ॥

‘मेरे सभी मन्त्री एकाग्रचित्त होकर शीघ्र यहाँ आ जायँ। राक्षसो! यह हमारे लिये गुप्त मन्त्रणा करनेका अवसर आ गया है’॥ ३ ॥

रावणका आदेश सुनकर समस्त मन्त्री शीघ्रतापूर्वक वहाँ आ गये। तब रावणने उन राक्षसजातीय सचिवोंके साथ बैठकर आवश्यक कर्तव्यपर विचार किया॥ ४ ॥

दुर्घर्ष वीर रावणने जो उचित कर्तव्य था, उसके विषयमें शीघ्र ही विचार-विमर्श करके उन सचिवोंको विदा कर दिया और अपने भवनमें प्रवेश किया॥ ५ ॥

फिर उसने महाबली, महामायावी, मायाविशारद राक्षस विद्युज्जिह्वको साथ लेकर उस प्रमदावनमें प्रवेश किया, जहाँ मिथिलेशकुमारी सीता विद्यमान थीं॥ ६ ॥

उस समय राक्षसराज रावणने माया जाननेवाले विद्युज्जिह्वसे कहा—‘हम दोनों मायाद्वारा जनकनन्दिनी सीताको मोहित करेंगे॥ ७ ॥

‘निशाचर! तुम श्रीरामचन्द्रजीका मायानिर्मित मस्तक लेकर एक महान् धनुष-बाणके साथ मेरे पास आओ’॥

रावणकी यह आज्ञा पाकर निशाचर विद्युज्जिह्वने कहा—‘बहुत अच्छा’। फिर उसने रावणको बड़ी कुशलतासे प्रकट की हुई अपनी माया दिखायी॥ ९ ॥

इससे राजा रावण उसपर बहुत प्रसन्न हुआ और उसे अपना आभूषण उतारकर दे दिया। फिर वह महाबली राक्षसराज सीताजीको देखनेके लिये अशोकवाटिकामें गया॥ १० १/२ ॥

कुबेरके छोटे भाई रावणने वहाँ सीताको दीन दशामें पड़ी देखा, जो उस दीनताके योग्य नहीं थीं। वे अशोक-वाटिकामें रहकर भी शोकमग्न थीं और सिर नीचा किये पृथ्वीपर बैठकर अपने पतिदेवका चिन्तन कर रही थीं॥

उनके आसपास बहुत-सी भयंकर राक्षसियाँ बैठी थीं। रावणने बड़े हर्षके साथ अपना नाम बताते हुए जनककिशोरी सीताके पास जाकर धृष्टतापूर्ण वचनोंमें कहा—॥ १३ १/२ ॥

‘भद्रे! मेरे बार-बार सान्त्वना देने और प्रार्थना करनेपर भी तुम जिनका आश्रय लेकर मेरी बात नहीं मानती थीं, खरका वध करनेवाले वे तुम्हारे पतिदेव श्रीराम समरभूमिमें मारे गये॥ १४ १/२ ॥

‘तुम्हारी जो जड़ थी, सर्वथा कट गयी। तुम्हारे दर्पको मैंने चूर्ण कर दिया। अब अपने ऊपर आये हुए इस संकटसे ही विवश होकर तुम स्वयं मेरी भार्या बन जाओगी। मूढ़ सीते! अब यह रामविषयक चिन्तन छोड़ दो। उस मरे हुए रामको लेकर क्या करोगी॥ १५-१६ ॥

‘भद्रे! मेरी सब रानियोंकी स्वामिनी बन जाओ। मूढ़े! तुम अपनेको बड़ी बुद्धिमती समझती थी न। तुम्हारा पुण्य बहुत कम हो गया था। इसीलिये ऐसा हुआ है। अब रामके मारे जानेसे तुम्हारा जो उनकी प्राप्तिरूप प्रयोजन था, वह समाप्त हो गया। सीते! यदि सुनना चाहो तो वृत्रासुरके वधकी भयंकर घटनाके समान अपने पतिके मारे जानेका घोर समाचार सुन लो॥ १७ ॥

‘कहा जाता है राम मुझे मारनेके लिये समुद्रके किनारेतक आये थे। उनके साथ वानरराज सुग्रीवकी लायी हुई विशाल सेना भी थी॥ १८ ॥

‘उस विशाल सेनाके द्वारा राम समुद्रके उत्तर तटको दबाकर ठहरे। उस समय सूर्यदेव अस्ताचलको चले गये थे॥ १९ ॥

‘जब आधी रात हुई, उस समय रास्तेकी थकी-माँदी सारी सेना सुखपूर्वक सो गयी थी। उस अवस्थामें वहाँ पहुँचकर मेरे गुप्तचरोंने पहले तो उसका भलीभाँति निरीक्षण किया॥ २० ॥

‘फिर प्रहस्तके सेनापतित्वमें वहाँ गयी हुई मेरी बहुत बड़ी सेनाने रातमें, जहाँ राम और लक्ष्मण थे, उस वानर-सेनाको नष्ट कर दिया॥ २१ ॥

‘उस समय राक्षसोंने पट्टिश, परिघ, चक्र, ऋष्टि, दण्ड, बड़े-बड़े आयुध, बाणोंके समूह, त्रिशूल, चमकीले कूट और मुद्गर, डंडे, तोमर, प्रास तथा मूसल उठा-उठाकर वानरोंपर प्रहार किया था॥ २२-२३ ॥

‘तदनन्तर शत्रुओंको मथ डालनेवाले प्रहस्तने, जिसके हाथ खूब सधे हुए हैं, बहुत बड़ी तलवार हाथमें लेकर उससे बिना किसी रुकावटके रामका मस्तक काट डाला॥ २४ ॥

‘फिर अकस्मात् उछलकर उसने विभीषणको पकड़ लिया और वानरसैनिकोंसहित लक्ष्मणको विभिन्न दिशाओंमें भाग जानेको विवश किया॥ २५॥

‘सीते! वानरराज सुग्रीवकी ग्रीवा काट दी गयी, हनुमान्‌की हनु (ठोढ़ी) नष्ट करके उसे राक्षसोंने मार डाला॥ २६॥

‘जाम्बवान् ऊपरको उछल रहे थे, उसी समय युद्धस्थलमें राक्षसोंने बहुत-से पट्टिशोंद्वारा उनके दोनों घुटनोंपर प्रहार किया। वे छिन्न-भिन्न होकर कटे हुए पेड़की भाँति धराशायी हो गये॥ २७॥

‘मैन्द और द्विविद दोनों श्रेष्ठ वानर खूनसे लथपथ होकर पड़े हैं। वे लंबी साँसें खींचते और रोते थे। उसी अवस्थामें उन दोनों विशालकाय शत्रुसूदन वानरोंको तलवारद्वारा बीचसे ही काट डाला गया है॥

‘पनस नामका वानर पककर फटे हुए पनस (कटहल) के समान पृथ्वीपर पड़ा-पड़ा अन्तिम साँसें ले रहा है। दरीमुख अनेक नाराचोंसे छिन्न-भिन्न हो किसी दरी (कन्दरा) में पड़ा सो रहा है। महातेजस्वी कुमुद सायकोंसे घायल हो चीखता-चिल्लाता हुआ मर गया॥ २९-३०॥

‘अङ्गदधारी अङ्गदपर आक्रमण करके बहुत-से राक्षसोंने उन्हें बाणोंद्वारा छिन्न-भिन्न कर दिया है। वे सब अङ्गोंसे रक्त बहाते हुए पृथ्वीपर पड़े हैं॥ ३१॥

‘जैसे बादल वायुके वेगसे फट जाते हैं, उसी प्रकार बड़े-बड़े हाथियों तथा रथसमूहोंने वहाँ सोये हुए वानरोंको रौंदकर मथ डाला॥ ३२॥

‘जैसे सिंहके खदेड़नेसे बड़े-बड़े हाथी भागते हैं, उसी प्रकार राक्षसोंके पीछा करनेपर बहुत-से वानर पीठपर बाणोंकी मार खाते हुए भाग गये हैं॥ ३३॥

‘कोई समुद्रमें कूद पड़े और कोई आकाशमें उड़ गये हैं। बहुत-से रीछ वानरी वृत्तिका आश्रय ले पेड़ोंपर चढ़ गये हैं॥ ३४॥

‘विकराल नेत्रोंवाले राक्षसोंने इन बहुसंख्यक भूरे बंदरोंको समुद्रतट, पर्वत और वनोंमें खदेड़-खदेड़कर मार डाला है॥ ३५॥

‘इस प्रकार मेरी सेनाने सैनिकोंसहित तुम्हारे पतिको मौतके घाट उतार दिया। खूनसे भीगा और धूलमें सना हुआ उनका यह मस्तक यहाँ लाया गया है’॥ ३६॥

‘ऐसा कहकर अत्यन्त दुर्जय राक्षसराज रावणने सीताके सुनते-सुनते एक राक्षसीसे कहा—॥ ३७॥

‘तुम क्रूरकर्मा राक्षस विद्युज्जिह्वको बुला ले आओ, जो स्वयं संग्रामभूमिसे रामका सिर यहाँ ले आया है’॥ ३८॥

तब विद्युज्जिह्व धनुषसहित उस मस्तकको लेकर आया और सिर झुका रावणको प्रणाम करके उसके सामने खड़ा हो गया। उस समय अपने पास खड़े हुए विशाल जिह्वावाले राक्षस विद्युज्जिह्वसे राजा रावण यों बोला—॥ ४०॥

‘तुम दशरथकुमार रामका मस्तक शीघ्र ही सीताके आगे रख दो, जिससे यह बेचारी अपने पतिकी अन्तिम अवस्थाका अच्छी तरह दर्शन कर ले’॥ ४१॥

रावणके ऐसा कहनेपर वह राक्षस उस सुन्दर मस्तकको सीताके निकट रखकर तत्काल अदृश्य हो गया॥ ४२॥

रावणने भी उस विशाल चमकीले धनुषको यह कहकर सीताके सामने डाल दिया कि यही रामका त्रिभुवनविख्यात धनुष है॥ ४३॥

फिर बोला—‘सीते! यही तुम्हारे रामका प्रत्यञ्चासहित धनुष है। रातके समय उस मनुष्यको मारकर प्रहस्त इस धनुषको यहाँ ले आया है’॥ ४४॥

जब विद्युज्जिह्वने मस्तक वहाँ रखा, उसके साथ ही रावणने वह धनुष पृथ्वीपर डाल दिया। तत्पश्चात् वह विदेहराजकुमारी यशस्विनी सीतासे बोला—‘अब तुम मेरे वशमें हो जाओ’॥ ४५॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें इकतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ३१॥