श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
अठानबेवाँ सर्ग
अठानबेवाँ सर्ग
अंगदके द्वारा महापार्श्वका वध
सुग्रीवके द्वारा महोदरके मारे जानेपर उनकी ओर देखकर महाबली महापार्श्वके नेत्र क्रोधसे लाल हो गये॥
उसने अपने बाणोंद्वारा अंगदकी भयंकर सेनामें हलचल मचा दी। वह राक्षस मुख्य-मुख्य वानरोंके मस्तक धड़से काट-काटकर गिराने लगा, मानो वायु वृन्त या डंठलसे फल गिरा रही हो॥ २ १/२ ॥
क्रोधसे भरे हुए महापार्श्वने अपने बाणोंसे कितनोंकी बाँहें काट दीं और कितने ही वानरोंकी पसलियाँ उड़ा दीं॥ ३ १/२ ॥
महापार्श्वकी बाणवर्षासे पीड़ित हो बहुत-से वानर युद्धसे विमुख हो गये। सबकी चेतना जाती रही॥ ४ १/२ ॥
उस राक्षससे पीड़ित वानर-सेनाको उद्विग्न हुई देख महान् वेगशाली अङ्गदने पूर्णिमाके दिन समुद्रकी भाँति अपना भारी वेग प्रकट किया॥ ५ १/२ ॥
उन वानरशिरोमणिने सूर्यकी किरणोंके समान दमकनेवाला एक लोहेका परिघ उठाकर महापार्श्वपर दे मारा॥ ६ १/२ ॥
उस प्रहारसे महापार्श्वकी सुध-बुध जाती रही और वह मूर्च्छित हो सारथिसहित रथसे नीचे जा पड़ा॥
इसी समय काले कोयलेके ढेरके समान कृष्ण वर्णवाले, महान् पराक्रमी और तेजस्वी ऋक्षराज जाम्बवान्ने मेघोंकी घटाके सदृश अपने यूथसे बाहर निकलकर कुपित हो एक पर्वत-शिखरके समान विशाल शिला हाथमें ले ली और उसके द्वारा उस राक्षसके घोड़ोंको मार डाला तथा उसके रथको भी चूर्ण कर दिया॥
दो घड़ीके बाद होशमें आनेपर महाबली महापार्श्वने बहुत-से बाणोंद्वारा पुनः अङ्गदको घायल कर दिया और जाम्बवान्की छातीमें भी तीन बाण मारे॥ १०-११ ॥
इतना ही नहीं, उसने रीछोंके राजा गवाक्षको भी बहुत-से बाणोंद्वारा क्षत-विक्षत कर दिया। गवाक्ष और जाम्बवान्को बाणोंसे पीड़ित देख अङ्गदके क्रोधकी सीमा न रही। उन्होंने भयंकर परिघ हाथमें ले लिया॥ १२ १/२ ॥
उनका वह परिघ सूर्यकी किरणोंके समान अपनी प्रभा बिखेर रहा था। वालिपुत्र अङ्गदके नेत्र क्रोधसे लाल हो उठे थे। उन्होंने उस लोहमय परिघको दोनों हाथोंसे पकड़कर घुमाया और दूर खड़े हुए महापार्श्वके वधके लिये वेगपूर्वक चला दिया॥ १३-१४ १/२ ॥
बलवान् वीर अङ्गदके चलाये हुए उस परिघने राक्षस महापार्श्वके हाथसे बाणसहित धनुष और मस्तकसे टोप गिरा दिये॥ १५ १/२ ॥
फिर प्रतापी वालिपुत्र अङ्गद बड़े वेगसे उसके पास जा पहुँचे और कुपित होकर उन्होंने उसके कुण्डलयुक्त कानके पास गालपर एक थप्पड़ मारा॥ १६ १/२ ॥
तब महान् वेगशाली महातेजस्वी महापार्श्वने कुपित होकर एक हाथमें बहुत बड़ा फरसा ले लिया॥ १७ १/२ ॥
उस फरसेको तेलमें डुबोकर साफ किया गया था और वह अच्छे लोहेका बना हुआ एवं सुदृढ़ था। राक्षस महापार्श्वने अत्यन्त कुपित हो वह फरसा वालिपुत्र अङ्गदपर दे मारा॥ १८ १/२ ॥
उसने अङ्गदके बायें कंधेपर बड़े वेगसे उस फरसेका प्रहार किया था, परंतु रोषसे भरे हुए अङ्गदने कतराकर अपनेको बचा लिया और उस फरसेको व्यर्थ कर दिया॥ १९ १/२ ॥
तत्पश्चात् अत्यन्त क्रोधसे भरे हुए वीर अङ्गदने, जो अपने पिताके समान ही पराक्रमी थे, वज्रके समान मुट्ठी बाँधी॥ २० १/२ ॥
वे हृदयके मर्मस्थानसे परिचित थे; अतः उन्होंने उस राक्षसके स्तनोंके निकट छातीमें बड़े वेगसे मुक्का मारा, जिसका स्पर्श इन्द्रके वज्रके समान असह्य था॥
उनका वह घूसा लगते ही उस महासमरमें राक्षस महापार्श्वका हृदय फट गया और वह मरकर पृथ्वीपर गिर पड़ा॥ २२ १/२ ॥
उसके मरकर पृथ्वीपर गिर जानेके पश्चात् उसकी सेना विक्षुब्ध हो उठी तथा समरभूमिमें रावणको भी महान् क्रोध हुआ॥ २३ १/२ ॥
उस समय हर्षसे भरे हुए वानरोंका महान् सिंहनाद होने लगा। वह अट्टालिकाओं तथा गोपुरोंसहित लङ्कापुरीको फोड़ता हुआ-सा प्रतीत हुआ। अङ्गदसहित वानरोंका वह महानाद इन्द्रसहित देवताओंके गम्भीर घोष-सा जान पड़ता था॥ २४-२५ ॥
युद्धस्थलमें देवताओं और वानरोंकी वह बड़ी भारी गर्जना सुनकर इन्द्रद्रोही राक्षसराज रावण पुनः रोषपूर्वक युद्धके लिये उत्सुक हो वहाँ खड़ा हो गया॥ २६ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें अट्ठानबेवाँ सर्ग पूरा
हुआ॥ ९८ ॥