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संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

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DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

इस ग्रन्थ के बारे में

नारद पुराण अठारह महापुराणों में से एक वैष्णव पुराण है, जिसकी रचना परम्परा महर्षि वेदव्यास को देती है। इसके पूर्वभाग में सनक, सनन्दन, सनातन और सनत्कुमार देवर्षि नारद को धर्म, भक्ति और ज्ञान का उपदेश देते हैं, और उत्तरभाग में वसिष्ठ और मान्धाता के संवाद के रूप में कथाएँ चलती हैं। यह पुराण विशेष रूप से इसलिए उल्लेखनीय है कि इसमें शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, ज्योतिष और छन्द जैसे वेदांगों का सार, तथा अठारहों पुराणों की विषय-सूची दी गई है।

यह गीताप्रेस, गोरखपुर का 'संक्षिप्त नारदपुराण' है, जो सचित्र, मोटे टाइप में और केवल हिन्दी में छपा है; अर्थात् इसमें संस्कृत मूल नहीं, पुराण का संक्षिप्त हिन्दी रूपान्तर है। इस प्रति में संवत् 2076 के अठारहवें पुनर्मुद्रण का उल्लेख है। पुस्तक पूर्वभाग के चार पादों और उत्तरभाग के क्रम में चलती है।

उत्तरभाग में एकादशी-व्रत की महिमा, राजा रुक्मांगद की कथा और विभिन्न तीर्थों के माहात्म्य प्रमुख हैं। लगभग 770 पृष्ठों का यह संस्करण उन पाठकों के लिए है जो संस्कृत के बिना पुराण की कथाएँ और उपदेश सरल हिन्दी में पढ़ना चाहते हैं।

७६८ * संक्षिप्त नारदपुराण *


ब्रह्मात्माको नमस्कार है। जहाँसे वाणी निवृत्त हो जाती है और जहाँतक मन पहुँच नहीं पाता, वही रूपरहित सच्चिदानन्दघन परमात्माका स्वरूप जानना चाहिये। जिनकी सत्यतासे यह जगत् सत्य-सा प्रतीत होता है, जो निर्गुण तथा अज्ञानान्धकारसे परे हैं, उन विचित्ररूप परमात्माको मैं नमस्कार करता हूँ। जो अजन्मा परमात्मा आदि, मध्य और अन्तमें भी एक एवं अविनाशी होते हुए भी नाना रूपोंमें प्रकाशित हो रहे हैं, उन निरञ्जन भगवान्‌की मैं वन्दना करता हूँ। जिन निरञ्जन परमात्मासे यह चराचर जगत् उत्पन्न हुआ है, जिनमें यह स्थित है और जिनमें ही इसका लय होता है, वही सत्य तथा अद्वैत ज्ञान है। इन्हींको शिवोपासक शिव कहते हैं और सांख्यवेत्ता विद्वान् प्रधान कहते हैं। ब्राह्मणो! योगी जिन्हें पुरुष कहते हैं, मीमांसक लोग कर्म मानकर जिनकी उपासना करते हैं, वैशेषिक मतावलम्बी जिन्हें विभु और शक्तिका चिन्तन करनेवाले जिन्हें चिन्मयी आद्याशक्ति कहते हैं, नाना प्रकारके रूप और क्रियाओंके चरम आश्रय उन अद्वितीय ब्रह्माकी मैं वन्दना करता हूँ*। भगवान्‌की भक्ति मनुष्योंको भगवत्स्वरूपकी प्राप्ति करानेवाली है। उसे पाकर पशुके सिवा दूसरा कौन होगा, जो अन्य किसी लाभकी इच्छा करता हो। ब्राह्मणो! जो मनुष्य भगवान्‌से विमुख होकर संसारमें आसक्त होते हैं, उन्हें सत्सङ्गके सिवा और किसी उपायसे इस भवरूपी गहन वनसे छुटकारा नहीं मिलता। विप्रवरो! साधुपुरुष उत्तम आचारवाले, सर्वलोकहितैषी तथा दीन जनोंपर कृपा रखनेवाले होते हैं। वे अपनी शरणमें आये हुए लोगोंका उद्धार कर देते हैं। मुनियो! संसारमें आप लोग साधुपुरुषोंके द्वारा सम्मान पानेयोग्य और परम धन्य हैं; क्योंकि आप भगवान् वासुदेवकी नूतन पल्लवोंसे युक्त कीर्तिलताका बारंबार सेवन करते हैं। आप लोगोंने समस्त कारणोंके भी कारण तथा जगत्का मङ्गल करनेवाले साक्षात् भगवान् श्रीहरिका मुझे स्मरण दिलाया है, इसलिये मैं भी धन्य और अनुगृहीत हूँ॥ ॐ ॥

॥ उत्तर भाग सम्पूर्ण ॥

॥ श्रीनारदमहापुराण समाप्त ॥


* शिवं शैवा वदन्त्येनं प्रधानं सांख्यवेदिनः। योगिनः पुरुषं विप्राः कर्म मीमांसका जनाः ॥
विभुं वैशेषिकाद्याश्च चिच्छक्तिं शक्तिचिन्तकाः । ब्रह्माद्वितीयं तद्वन्दे नानारूपक्रियास्पदम् ॥
(ना० उत्तर० ८२ । ५६-५७)