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संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

मोहिनी-वसु-संवाद—गङ्गाजीके माहात्म्यका वर्णन

* उत्तरभाग *६५५

इस प्रकार कहा।
वसु बोले—देवि! मैंने ब्रह्माजीके कहनेसे क्रोध त्याग दिया। अब तीर्थ-स्नानादि पुण्य-कर्मसे तुम्हारी सद्गति कराऊँगा।
मोहिनीसे ऐसा कहकर ब्राह्मणने उसके पिता जगत्पति ब्रह्माजीको नमस्कार करके प्रसन्नतापूर्वक विदा किया। तब ब्रह्माजी अपने लोकको चले गये, जो परम ज्योतिर्मय है। रुक्माङ्गदके पुरोहित विप्रवर वसु मोहिनीको कृपाके योग्य मानकर मन-ही-मन उसकी सद्गतिका उपाय सोचने लगे। दो घड़ीतक ध्यानमें स्थित होकर उन्होंने उसकी सद्गतिका उपाय जान लिया।


मोहिनी-वसु-संवाद—गङ्गाजीके माहात्म्यका वर्णन

वसिष्ठजी कहते हैं—नृपश्रेष्ठ! सम्पूर्ण लोकोंके हितमें तत्पर रहनेवाले पुरोहित वसु यजमानपत्नी मोहिनीसे मधुर वाणीमें बोले।

पुरोहित वसुने कहा—मोहिनी! सुनो, मैं तुम्हें तीर्थोंके पृथक्-पृथक् लक्षण बतलाता हूँ। जिसके जान लेनेमात्रसे पापियोंकी उत्तम गति होती है। पृथ्वीपर सब तीर्थोंमें श्रेष्ठ गङ्गा हैं। गङ्गाके समान पापनाशक तीर्थ दूसरा कोई नहीं है।

अपने पुरोहित वसुका यह वचन सुनकर मोहिनीके मनमें गङ्गा-स्नानके प्रति आदर बढ़ गया। वह पुरोहितजीको प्रणाम करके बोली।

मोहिनीने कहा—भगवन्! सम्पूर्ण पुराणोंकी सम्मतिके अनुसार इस समय गङ्गाजीका उत्तम माहात्म्य बताइये। पहले गङ्गाजीके अनुपम तथा पापनाशक माहात्म्यको सुनकर फिर आपके साथ पापनाशिनी गङ्गाजीमें स्नान करनेके लिये चलूँगी। वसु सब पुराणोंके ज्ञाता थे। उन्होंने मोहिनीका वचन सुनकर गङ्गाजीके पापनाशक माहात्म्यका इस प्रकार वर्णन किया।

पुरोहित वसु बोले—देवि! वे देश, वे जनपद, वे पर्वत और वे आश्रम भी धन्य हैं, जिनके समीप सदा पुण्यसलिला भगवती भागीरथी बहती रहती हैं*। जीव गङ्गाजीका सेवन करके जिस गतिको पाता है, उसे तपस्या, ब्रह्मचर्य, यज्ञ अथवा त्यागके द्वारा भी नहीं पा सकता। जो मनुष्य पहली अवस्थामें पापकर्म करके अन्तिम अवस्थामें गङ्गाजीका सेवन करते हैं, वे भी परम गतिको प्राप्त होते हैं। इस संसारमें दुःखसे व्याकुल जो जीव उत्तम गतिकी खोजमें लगे हैं, उन सबके लिये गङ्गाके समान दूसरी कोई गति नहीं है। गङ्गाजी बड़े-बड़े भयंकर पातकोंके कारण अपवित्र नरकमें गिरनेवाले नराधम पापियोंको जबरन तार देती हैं। गङ्गा देवी अंधों, जड़ों तथा द्रव्यहीनोंको भी पवित्र बनाती हैं। मोहिनी! (विशेषरूपसे) पक्षोंके आदि अर्थात् कृष्णपक्षमें षष्ठीसे लेकर पुण्यमयी अमावास्यातक दस दिन गङ्गाजी इस पृथ्वीपर निवास करती हैं। शुक्लपक्षकी प्रतिपदासे लेकर दस दिनतक वे स्वयं ही पातालमें निवास करती हैं। फिर शुक्लपक्षकी एकादशीसे कृष्ण-पक्षकी पञ्चमीतक जो दस दिन होते हैं, उनमें गङ्गाजी सदा स्वर्गमें रहती हैं। [इसलिये इन्हें 'त्रिपथगा' कहते हैं] सत्ययुगमें सब तीर्थ उत्तम


* ते देशास्ते जनपदास्ते शैलास्तेऽपि चाश्रमाः। येषां भागीरथी पुण्या समीपे वर्तते सदा॥
(ना० उत्तर० ३८। ८)

६५६ * संक्षिप्त नारदपुराण *


हैं। त्रेतामें पुष्कर तीर्थ सर्वोत्तम है, द्वापरमें कुरुक्षेत्रकी विशेष महिमा है और कलियुगमें गङ्गा ही सबसे बढ़कर है। कलियुगमें सब तीर्थ स्वभावतः अपनी-अपनी शक्तिको गङ्गाजीमें छोड़ते हैं, परंतु गङ्गादेवी अपनी शक्तिको कहीं नहीं छोड़तीं। गङ्गाजीके जलकणोंसे परिपुष्ट हुई वायुके स्पर्शसे भी पापाचारी मनुष्य भी परम गतिको प्राप्त होते हैं। जो सर्वत्र व्यापक हैं, जिनका स्वरूप चिन्मय है, वे जनार्दन भगवान् विष्णु ही द्रवरूपसे गङ्गाजीके जल हैं, इसमें संशय नहीं है। महापातकी भी गङ्गाजीके जलमें स्नान करनेसे पवित्र हो जाते हैं, इस विषयमें अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये। गङ्गाजीका जल अपने क्षेत्रमें हो या निकालकर लाया गया हो, ठंडा हो या गरम हो, वह सेवन करनेपर आमरण किये हुए पापोंको हर लेता है। बासी जल और बासी दल त्याग देने योग्य माना गया है, परंतु गङ्गाजल और तुलसीदल बासी होनेपर भी त्याज्य नहीं है। मेरुके सुवर्णकी, सब प्रकारके रत्नोंकी, वहाँके प्रस्तर और जलके एक-एक कणकी गणना हो सकती है, परंतु गङ्गाजलके गुणोंका परिमाण बतानेकी शक्ति किसीमें भी नहीं है*। जो मनुष्य तीर्थयात्राकी पूरी विधि न कर सके वह भी केवल गङ्गाजलके माहात्म्यसे यहाँ उत्तम फलका भागी होता है। गङ्गाजीके जलसे एक बार भक्तिपूर्वक कुल्ला कर लेनेपर मनुष्य स्वर्गमें जाता और वहाँ कामधेनुके थनोंसे प्रकट हुए दिव्य रसोंका आस्वादन करता है। जो शालग्राम शिलापर गङ्गाजल डालता है, वह पापरूपी तीव्र अन्धकारको मिटाकर उदयकालीन सूर्यकी भाँति पुण्यसे प्रकाशित होता है। जो पुरुष मन, वाणी और शरीरद्वारा किये हुए अनेक प्रकारके पापोंसे ग्रस्त हो, वह भी गङ्गाजीका दर्शन करके पवित्र हो जाता है; इसमें संशय नहीं है। जो सदा गङ्गाजीके जलसे सींचकर पवित्र की हुई भिक्षा भोजन करता है, वह केंचुलका त्याग करनेवाले सर्पकी भाँति पापसे शून्य हो जाता है। हिमालय और विन्ध्यके समान पापराशियाँ भी गङ्गाजीके जलसे उसी प्रकार नष्ट हो जाती हैं, जिस प्रकार भगवान् विष्णुकी भक्तिसे सब प्रकारकी आपत्तियाँ। गङ्गाजीमें भक्तिपूर्वक स्नानके लिये प्रवेश करनेपर मनुष्योंके ब्रह्महत्या आदि पाप 'हाय-हाय' करके भाग जाते हैं। जो प्रतिदिन गङ्गाजीके तटपर रहता और सदा गङ्गाजीका जल पीता है, वह पुरुष पूर्वसंचित पातकोंसे मुक्त हो जाता है। जो गङ्गाजीका आश्रय लेकर नित्य निर्भय रहता है, वही देवताओं, ऋषियों और मनुष्योंके लिये


* कृते तु सर्वतीर्थानि त्रेतायां पुष्करं परम्। द्वापरे तु कुरुक्षेत्रं कलौ गङ्गा विशिष्यते॥
कलौ तु सर्वतीर्थानि स्वं स्वं वीर्यं स्वभावतः। गङ्गायां प्रतिमुञ्चन्ति सा तु देवी न कुत्रचित्॥
गङ्गाम्भःकणदिग्धस्य वायोः संस्पर्शनादपि। पापशीला अपि नराः परां गतिमवाप्नुयुः॥
योऽसौ सर्वगतो विष्णुश्चित्स्वरूपी जनार्दनः। स एव द्रवरूपेण गङ्गाम्भो नात्र संशयः॥
ब्रह्महा गुरुहा गोघ्नः स्तेयी च गुरुतल्पगः। गङ्गाम्भसा च पूयन्ते नात्र कार्या विचारणा॥
क्षेत्रस्थमुद्धतं वापि शीतमुष्णमथापि वा। गाङ्गेयं तु हरेत्तोयं पापमामरणान्तिकम्॥
वर्ज्यं पर्युषितं तोयं वर्ज्यं पर्युषितं दलम्। न वर्ज्यं जाह्नवीतोयं न वर्ज्यं तुलसीदलम्॥
मेरोः सुवर्णस्य च सर्वरत्नैः संख्योपलानामुदकस्य वापि।
गङ्गाजलानां न तु शक्तिरस्ति वक्तुं गुणाख्यापरिमाणमत्र॥
(ना० उत्तर० ३८। २०-२७)