संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पूर्वभाग-प्रथम पाद ९७
- पूर्वभाग-प्रथम पाद * ९७
अत्यन्त सूक्ष्म; परम प्रकाशमय परब्रह्म कहा गया है, उन श्रीहरिको मैं बारम्बार प्रणाम करता हूँ। योगीश्वरगण जिन्हें निर्विकार, अजन्मा, शुद्ध, सब ओर बाँहवाले तथा ईश्वर मानते हैं, जो समस्त कारणतत्त्वोंके भी कारण हैं, जो भगवान् सम्पूर्ण प्राणियोंके अन्तर्यामी आत्मा हैं, यह जगत् जिनका स्वरूप है तथा जो निर्गुण परमात्मा हैं, वे भगवान् विष्णु मुझपर प्रसन्न हों। जो मायासे मोहित चित्तवाले अज्ञानी पुरुषोंके लिये हृदयमें रहकर भी उनसे दूर बने हुए हैं और ज्ञानियोंके लिये जो सर्वत्र प्राप्त हैं, वे भगवान् विष्णु मुझपर प्रसन्न हों। चार¹, चार², दो³, पाँच⁴ और दो⁵ अक्षरवाले मन्त्रोंसे जिनके लिये आहुति दी जाती है, वे विष्णुभगवान् मुझपर प्रसन्न हों। जो ज्ञानियों, कर्मयोगियों तथा भक्त पुरुषोंको उत्तम गति प्रदान करनेवाले हैं, वे विश्वपालक भगवान् मुझपर प्रसन्न हों। जगत्का कल्याण करनेके लिये श्रीहरि लीलापूर्वक जिन शरीरोंको धारण करते हैं, विद्वान् लोग उन सबकी पूजा करते हैं, वे लीलाविग्रहधारी भगवान् मुझपर प्रसन्न हों। ज्ञानी महात्मा जिन्हें सच्चिदानन्दस्वरूप निर्गुण तथा गुणोंके अधिष्ठान मानते हैं, वे भगवान् विष्णु मुझपर प्रसन्न हों।
इस प्रकार स्तुति करके भगवान् विष्णुको प्रणाम और ब्राह्मणोंका पूजन करे। तत्पश्चात् दक्षिणा और वस्त्र आदिके द्वारा आचार्यकी भी पूजा करे। विप्रवर! उसके बाद भक्तिभावसे पूर्ण होकर यथाशक्ति ब्राह्मणोंको भोजन करावे। फिर स्त्री-पुत्र और मित्र आदि बन्धुजनोंके साथ स्वयं भी भोजन करे तथा निरन्तर भगवान् नारायणके चिन्तनमें लगा रहे। नारदजी! जितने क्षणोंतक उस ध्वजाकी पताका वायुसे फहराती रहती है, आरोहण करनेवाले मनुष्यकी उतनी ही पाप-राशियाँ निस्सन्देह नष्ट हो जाती हैं। महापातकोंसे युक्त अथवा सम्पूर्ण पातकोंसे दूषित पुरुष भी भगवान् विष्णुके मन्दिरमें ध्वजा फहराकर सब पातकोंसे मुक्त हो जाता है। जो धार्मिक पुरुष ध्वजाको आरोपित देखकर उसका अभिनन्दन करते हैं, वे सभी अनेकों महापातकोंसे मुक्त हो जाते हैं। भगवान् विष्णुके मन्दिरमें स्थापित किया हुआ ध्वज जब अपनी पताका फहराने लगता है, उस समय आधे पलमें ही वह उसे आरोपित करनेवाले पुरुषके सम्पूर्ण पापोंको नष्ट कर देता है।
हरिपञ्चक-व्रतकी विधि और माहात्म्य
**श्रीसनकजी कहते हैं—**नारदजी! अब मैं दूसरे व्रतका यथार्थरूपसे वर्णन करता हूँ, सुनिये। यह व्रत हरिपञ्चक नामसे प्रसिद्ध है और सम्पूर्ण लोकोंमें दुर्लभ है। मुनिश्रेष्ठ! स्त्रियों तथा पुरुषोंके सम्पूर्ण दुःखोंका इससे निवारण हो जाता है तथा यह धर्म, अर्थ, काम और मोक्षकी प्राप्ति करानेवाला एवं सम्पूर्ण मनोरथों और समस्त व्रतोंके फलको देनेवाला है।
मार्गशीर्ष मासके शुक्लपक्षकी दशमी तिथिको मनुष्य अपने मन और इन्द्रियोंको संयममें रखते हुए शौच, दन्तधावन और स्नान करके शास्त्रविहित नित्यकर्म करे। फिर भलीभाँति देवपूजन तथा पञ्च महायज्ञोंका अनुष्ठान करके उस दिन नियमपूर्वक रहकर केवल एक समय
१. ओ श्रावय। २. अस्तु श्रौषट्। ३. यज। ४. ये यजामहे। ५. वषट्
९८ * संक्षिप्त नारदपुराण *
भोजन करे। मुनीश्वर! दूसरे दिन एकादशीको प्रातः-काल उठकर स्नान और नित्यकर्मसे निवृत्त होकर अपने घरपर भगवान् विष्णुकी पूजा करे। पञ्चामृतकी विधिसे देवदेवेश्वर श्रीहरिको स्नान करावे। तत्पश्चात् गन्ध, पुष्प आदिसे तथा धूप, दीप, नैवेद्य, ताम्बूल और परिक्रमाद्वारा उत्तम भक्तिभावके साथ क्रमशः भगवान्की अर्चना करे। देवदेवेश्वर भगवान्की भलीभाँति पूजा करके इस मन्त्रका उच्चारण करे—
नमस्ते ज्ञानरूपाय ज्ञानदाय नमोऽस्तु ते॥
नमस्ते सर्वरूपाय सर्वसिद्धिप्रदायिने।
(ना० पूर्व० २१। ८-९)
'प्रभो! आप ज्ञानस्वरूप हैं, आपको नमस्कार है। आप ज्ञानदाता हैं, आपको नमस्कार है। आप सर्वरूप तथा सम्पूर्ण सिद्धियोंको देनेवाले हैं, आपको नमस्कार है।'
इस प्रकार सर्वव्यापी देवेश्वर भगवान् जनार्दनको प्रणाम करके आगे बताये जानेवाले मन्त्रके द्वारा अपना उपवास-व्रत भगवान्को समर्पित करे—
पञ्चरात्रं निराहारो ह्यद्यप्रभृति केशव॥
त्वदाज्ञया जगत्स्वामिन् ममाभीष्टप्रदो भव।
(ना० पूर्व० २१। १०-११)
'सम्पूर्ण जगत्के स्वामी केशव! आपकी आज्ञासे मैं आजसे पाँच राततक निराहार रहूँगा। आप मुझे मेरी अभीष्ट वस्तु प्रदान करें।'
इस प्रकार भगवान्को उपवास समर्पित करके जितेन्द्रिय पुरुष रातमें जागरण करे। मुने! एकादशी, द्वादशी, त्रयोदशी, चतुर्दशी तथा पूर्णिमाको इन्द्रियसंयम एवं उपवासपूर्वक इसी प्रकार भगवान् विष्णुका पूजन करना चाहिये। विप्रवर! एकादशी तथा पूर्णिमाकी रात्रिमें ही जागरण करना चाहिये। पञ्चामृत आदि सामग्रियोंसे की जानेवाली पूजा तो पाँचों दिन समानरूपसे आवश्यक है; परंतु पूर्णिमाके दिन यथाशक्ति दूधके द्वारा भगवान् विष्णुको स्नान कराना चाहिये। साथ ही तिलका होम और दान भी करना चाहिये। तत्पश्चात् छठा दिन आनेपर अपना आश्रमोचित कर्म करके पञ्चगव्य पीकर विधिपूर्वक श्रीहरिकी पूजा करे। यदि अपने पास धन हो तो ब्राह्मणोंको बेरोक-टोक भोजन करावे। तदनन्तर भाई-बन्धुओंके साथ स्वयं भी मौन होकर भोजन करे। नारदजी! इस प्रकार पौषसे लेकर कार्तिकतकके महीनोंमें भी शुक्लपक्षमें मनुष्य पूर्वोक्त विधिसे इस व्रतको करे। इस प्रकार इस पापनाशक व्रतको एक वर्षतक करे। फिर मार्गशीर्ष मास आनेपर व्रती पुरुष उसका उद्यापन करे। ब्रह्मन्! एकादशीको पहलेकी ही भाँति निराहार रहना चाहिये और द्वादशीको एकाग्रचित्त हो पञ्चगव्य पीना चाहिये। फिर गन्ध, पुष्प आदि सामग्रियोंसे देवदेव जनार्दनकी भलीभाँति पूजा करके जितेन्द्रिय पुरुष ब्राह्मणको भेंट दे। मुनीश्वर! मधु और घृतयुक्त खीर, फल, सुगन्धित जलसे भरा और वस्त्रसे ढका हुआ पञ्चरत्न और दक्षिणासहित कलश अध्यात्मतत्त्वके ज्ञाता ब्राह्मणको दान करे। (उस समय निम्नाङ्कितरूपसे प्रार्थना करे—)
सर्वात्मन् सर्वभूतेश सर्वव्यापिन् सनातन।
परमान्नप्रदानेन सुप्रीतो भव माधव॥
(ना० पूर्व० २१। २३)
'सबके आत्मा, सम्पूर्ण भूतोंके स्वामी, सर्वव्यापी, सनातन माधव! आप इस उत्तम अन्नके दानसे अत्यन्त प्रसन्न हों।'
इस मन्त्रसे खीर दान करके यथाशक्ति ब्राह्मण-भोजन करावे और स्वयं भी मौन होकर भाई-बन्धुओंके साथ भोजन करे। जो इस हरिपञ्चक नामक व्रतका पालन करता है, उसका ब्रह्मलोक अर्थात् परमात्माके परम धामसे कभी पुनरागमन नहीं होता। उत्तम मोक्षकी इच्छा