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संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

पूर्वभाग-प्रथम पाद १०७

  • पूर्वभाग-प्रथम पाद * १०७

जाय तो मन्त्रसे नूतन यज्ञोपवीत आदि धारण करके नष्ट-भ्रष्ट हुए पुराने यज्ञोपवीत आदिको जलमें फेंक दे। ब्रह्मचारीके लिये केवल भिक्षाके अन्नसे ही जीवन-निर्वाह करना बताया गया है। वह मन-इन्द्रियोंको संयममें रखकर श्रोत्रिय पुरुषके घरसे भिक्षा ले आवे। भिक्षा माँगते समय ब्राह्मण वाक्यके आदिमें, क्षत्रिय वाक्यके मध्यमें और वैश्य वाक्यके अन्तमें 'भवत्' शब्दका प्रयोग करे। जैसे—ब्राह्मण 'भवति! भिक्षां मे देहि' (पूजनीय देवि! मुझे भिक्षा दीजिये), क्षत्रिय 'भिक्षां भवति! मे देहि' और वैश्य 'भिक्षां मे देहि भवति' कहे। जितेन्द्रिय ब्रह्मचारी प्रतिदिन सायंकाल और प्रातःकाल शास्त्रीय विधिके अनुसार अग्निहोत्र (ब्रह्मयज्ञ) तथा तर्पण करे। जो अग्निहोत्रका परित्याग करता है, उसे विद्वान् पुरुष पतित कहते हैं। ब्रह्मयज्ञसे रहित ब्रह्मचारी ब्रह्महत्यारा कहा गया है। वह प्रतिदिन देवताकी पूजा और गुरुकी उत्तम सेवा करे। ब्रह्मचारी नित्यप्रति भिक्षाका ही अन्न भोजन करे। किसी एक घरका अन्न कभी न खाय। वह इन्द्रियोंको वशमें रखते हुए श्रेष्ठ ब्राह्मणोंके घरसे भिक्षा लाकर गुरुको समर्पित कर दे और उनकी आज्ञासे मौन होकर भोजन करे। ब्रह्मचारी मधु, मांस, स्त्री, नमक, पान, दन्तधावन, उच्छिष्ट-भोजन, दिनका सोना तथा छाता लगाना आदि न करे। पादुका, चन्दन, माला, अनुलेपन, जलक्रीड़ा, नृत्य, गीत, वाद्य, परनिन्दा, दूसरोंको सताना, बहकी-बहकी बातें करना, अंजन लगाना, पाखण्डी लोगोंका साथ करना और शूद्रोंकी संगतिमें रहना आदि न करे।

वृद्ध पुरुषोंको क्रमशः प्रणाम करे। वृद्ध तीन प्रकारके होते हैं। एक ज्ञानवृद्ध, दूसरे तपोवृद्ध और तीसरे वयोवृद्ध हैं। जो गुरु वेद-शास्त्रोंके उपदेशसे आध्यात्मिक आदि दुःखोंका निवारण करते हैं, उन्हें पहले प्रणाम करे। प्रणाम करते समय द्विज बालक 'मैं अमुक हूँ, इस प्रकार अपना परिचय भी दे। ब्राह्मण किसी प्रकार क्षत्रिय आदिको प्रणाम न करे। जो नास्तिक, धर्ममर्यादाको तोड़नेवाला, कृतघ्न, ग्राम-पुरोहित, चोर और शठ हो, उसे ब्राह्मण होनेपर भी प्रणाम न करे। पाखण्डी, पतित, संस्कार-भ्रष्ट, नक्षत्रजीवी (ज्यौतिषी) तथा पातकीको भी प्रणाम न करे। पागल, शठ, धूर्त, दौड़ते हुए, अपवित्र, सिरमें तेल लगाये हुए तथा मन्त्र-जप करते हुए पुरुषको भी प्रणाम नहीं करना चाहिये। जो झगड़ालू और क्रोधी हो, वमन कर रहा हो, पानीमें खड़ा हो, हाथमें भिक्षाका अन्न लिये हो और सो रहा हो, उसको भी प्रणाम न करे। स्त्रियोंमें जो पतिकी हत्या करनेवाली, रजस्वला, परपुरुषसे सम्बन्ध रखनेवाली, सूतिका, गर्भपात करनेवाली, कृतघ्न और क्रोधिनी हो, उसे कभी प्रणाम न करे। सभा, यज्ञशाला और देवमन्दिरमें भी एक-एक व्यक्तिके लिये किया जानेवाला नमस्कार पूर्वकृत पुण्यका नाश करता है। श्राद्ध, व्रत, दान, देवपूजा, यज्ञ और तर्पण करते हुए पुरुषको प्रणाम न करे; क्योंकि प्रणाम करनेपर जो शास्त्रीय विधिसे आशीर्वाद न दे सके, वह प्रणाम करने योग्य नहीं। बुद्धिमान् शिष्य दोनों पैर धोकर आचमन करके सदा गुरुके सामने बैठे और उनके चरण पकड़कर नमस्कार करे। फिर अध्ययन करे। अष्टमी, चतुर्दशी, प्रतिपदा, अमावास्या, पूर्णिमा, महाभरणी (भरणी-नक्षत्रके योगसे होनेवाले पर्वविशेष) श्रवणयुक्त द्वादशी, पितृपक्षकी द्वितीया, माघशुक्ला सप्तमी, आश्विन शुक्ला नवमी—इन तिथियोंमें तथा सूर्यके चारों ओर घेरा लगनेपर एवं किसी श्रोत्रिय विद्वान्‌के अपने यहाँ पधारनेपर अध्ययन बंद रखना चाहिये। जिस दिन किसी श्रेष्ठ ब्राह्मणका स्वागत-सत्कार किया गया हो या किसीके साथ कलह बढ़ गया हो, उस दिन भी अनध्याय रखना चाहिये। देवर्षे!

१०८ * संक्षिप्त नारदपुराण *

संध्याके समय, अकालमें मेघकी गर्जना होनेपर, असमयमें वर्षा होनेपर, उल्कापात तथा वज्रपात होनेपर, अपने द्वारा किसी ब्राह्मणका अपमान हो जानेपर, मन्वादि तिथियोंके आनेपर तथा युगादि चार तिथियोंके उपस्थित होनेपर सब कर्मोंके फलकी इच्छा रखनेवाला कोई भी द्विज अध्ययन न करे। वैशाख शुक्ला तृतीया, भाद्र कृष्णा त्रयोदशी, कार्तिक शुक्ला नवमी तथा माघकी पूर्णिमा—ये तिथियाँ युगादि कही गयी हैं। इनमें जो दान दिया जाता है, उसके पुण्यको ये अक्षय बनानेवाली हैं¹। नारदजी! आश्विन शुक्ला नवमी, कार्तिक शुक्ला द्वादशी, चैत्र तथा भाद्रपदमासकी तृतीया, आषाढ़ शुक्ला दशमी, माघ शुक्ला सप्तमी, श्रावण कृष्णा अष्टमी, आषाढ़ शुक्ला पूर्णिमा, फाल्गुनकी अमावास्या, पौष शुक्ला एकादशी तथा कार्तिक, फाल्गुन, चैत्र और ज्येष्ठकी पूर्णिमा तिथियाँ—ये मन्वन्तरकी आदितिथियाँ बतायी गयी हैं, जो दानके पुण्यको अक्षय बनानेवाली हैं²। द्विजोंको मन्वादि और युगादि तिथियोंमें श्राद्ध करना चाहिये। श्राद्धका निमन्त्रण हो जानेपर, चन्द्रग्रहण और सूर्यग्रहणके दिन, उत्तरायण और दक्षिणायन प्रारम्भ होनेके दिन, भूकम्प होनेपर, गलग्रहमें और बादलोंके आनेसे अँधेरा हो जानेपर कभी अध्ययन न करे। नारदजी! इन सब अनध्यायोंमें जो अध्ययन करते हैं, उन मूढ़ पुरुषोंकी संतति, बुद्धि, यश, लक्ष्मी, आयु, बल तथा आरोग्यका साक्षात् यमराज नाश करते हैं। जो अनध्यायकालमें अध्ययन करता है, उसे ब्रह्म-हत्यारा समझना चाहिये। जो ब्राह्मण वेद-शास्त्रोंका अध्ययन न करके अन्य कर्मोंमें परिश्रम करता है, उसे शूद्रके तुल्य जानना चाहिये, वह नरकका प्रिय अतिथि है। वेदाध्ययनरहित ब्राह्मणके नित्य, नैमित्तिक, काम्य तथा दूसरे जो वैदिककर्म हैं, वे सब निष्फल होते हैं। भगवान् विष्णु शब्द-ब्रह्ममय हैं और वेद साक्षात् श्रीहरिका स्वरूप माना गया है। जो ब्राह्मण वेदोंका अध्ययन करता है, वह सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेता है।


१. तृतीया माधवे शुक्ला भाद्रे कृष्णा त्रयोदशी। कार्त्तिके नवमी शुद्धा माघे पञ्चदशी तिथिः॥
एता युगाद्याः कथिता दत्तस्याक्षयकारिकाः। (ना० पूर्व० २५। ५०-५१)
स्कन्दपुराणके अनुसार भिन्न-भिन्न युगकी आदितिथि इस प्रकार हैं—कार्त्तिक शुक्ला नवमी सत्ययुगकी, वैशाख शुक्ला तृतीया त्रेतायुगकी, माघकी पूर्णिमा द्वापरकी और भाद्रपद कृष्णा त्रयोदशी कलियुगकी आदितिथि है।
२. अश्वयुक्शुक्लनवमी कार्त्तिके द्वादशी सिता। तृतीया चैत्रमासस्य तथा भाद्रपदस्य च॥
आषाढशुक्लदशमी सिता माघस्य सप्तमी। श्रावणस्याष्टमी कृष्णा तथाषाढी च पूर्णिमा॥
फाल्गुनस्य त्वमावास्या पौषस्यैकादशी सिता। कार्त्तिकी फाल्गुनी चैत्री ज्यैष्ठी पञ्चदशी सिता॥
मन्वादयः समाख्याता दत्तस्याक्षयकारिकाः। (ना० पूर्व० २५। ५१-५५)
स्कन्दपुराणमें भी मन्वादि तिथियोंका पाठ ऐसा ही है। केवल श्लोकोंके क्रममें थोड़ा अन्तर है।

  • पूर्वभाग-प्रथम पाद * | १०९
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विवाहके योग्य कन्या, विवाहके आठ भेद तथा गृहस्थोचित शिष्टाचारका वर्णन

श्रीसनकजी कहते हैं—नारदजी ! वेदाध्ययन-कालतक ब्रह्मचारी निरन्तर गुरुकी सेवामें लगा रहे, उसके बाद उनकी आज्ञा लेकर अग्निपरिग्रह (गार्हपत्य-अग्निकी स्थापना) करे। द्विज वेद, शास्त्र और वेदाङ्गोंका अध्ययन करके गुरुको दक्षिणा देकर अपने घर जाय। वहाँ उत्तम कुलमें उत्पन्न, रूप और लावण्यसे युक्त, सद्गुणवती तथा सुशीला और धर्मपरायणा कन्याके साथ विवाह करे। जो कन्या रोगिणी हो अथवा किसी विशेष रोगसे युक्त कुलमें उत्पन्न हुई हो, जिसके केश बहुत अधिक या कम हों, जो सर्वथा केशरहित हो और बहुत बोलनेवाली हो, उससे विद्वान् पुरुष विवाह न करे। जो क्रोध करनेवाली, बहुत नाटी, बहुत बड़े शरीरवाली, कुरूपा, किसी अङ्गसे हीन या अधिक अङ्गवाली, उन्मादिनी और चुगली करनेवाली हो तथा जो कुबड़ी हो, उससे भी विवाह न करे। जो सदा दूसरेके घरमें रहती हो, झगड़ालू हो, जिसकी मति भ्रान्त हो तथा जो निष्ठुर स्वभावकी हो, जो बहुत खानेवाली हो, जिसके दाँत और ओठ मोटे हों, जिसकी नाकसे घुर्घुर्राहटकी आवाज होती हो और जो धूर्त हो, उससे विद्वान् पुरुष विवाह न करे। जो सदा रोनेवाली हो, जिसके शरीरकी आभा श्वेत रंगकी हो, जो निन्दित, खाँसी और दमे आदिके रोगसे पीड़ित तथा अधिक सोनेवाली हो, जो अनर्थकारी वचन बोलती हो, लोगोंसे द्वेष रखती हो और चोरी करती हो, उससे विद्वान् पुरुष विवाह न करे। जिसकी नाक बड़ी हो, जो छल-कपट करनेवाली हो, जिसके शरीरमें अधिक रोएँ बढ़ गये हों तथा जो बहुत घमंडी और बगुलावृत्तिवाली (ऊपरसे साधु और भीतरसे दुष्ट हो), उससे भी विद्वान् पुरुष विवाह न करे।

मुनिश्रेष्ठ ! ब्राह्म आदि आठ प्रकारके विवाह होते हैं, यह जानना चाहिये। इनमें पहला-पहला श्रेष्ठ है। पहलेवालेके अभावमें दूसरा श्रेष्ठ एवं ग्राह्य माना गया है। ब्राह्म, दैव, आर्ष, प्राजापत्य, आसुर, गान्धर्व, राक्षस तथा आठवाँ पैशाच विवाह है। श्रेष्ठ द्विजको ब्राह्मविवाहकी विधिसे विवाह करना चाहिये। अथवा दैवविवाहकी रीतिसे भी विवाह किया जा सकता है। कोई-कोई आर्ष-विवाहको भी श्रेष्ठ बतलाते हैं। ब्रह्मन् ! शेष प्राजापत्य आदि पाँच विवाह निन्दित हैं।

(अब गृहस्थ पुरुषका शिष्टाचार बताया जाता है—) दो यज्ञोपवीत तथा एक चादर धारण करे। कानोंमें सोनेके दो कुण्डल पहने। धोती दो रखे। सिरके बाल और नख कटाता रहे। पवित्रतापूर्वक रहे। स्वच्छ पगड़ी, छाता तथा चरणपादुका धारण करे। वेष ऐसा रखे जो देखनेमें प्रिय लगे। प्रतिदिन वेदोंका स्वाध्याय करे। शास्त्रोक्त आचारका पालन करे। दूसरोंका अन्न न खाय। दूसरोंकी निन्दा छोड़ दे। पैरसे पैरको न दबाये, जूठी चीजको न लाँघे। दोनों हाथोंसे अपना सिर न खुजलाये। पूज्य पुरुष तथा देवालयको बायें करके न चले। देवपूजा, स्वाध्याय, आचमन, स्नान, व्रत तथा श्राद्धकर्म आदिमें शिखाको खुली न रखे और एक वस्त्र धारण करके न रहे। गदहे आदिकी सवारी न करे। सूखा वाद-विवाद त्याग दे। परायी स्त्रीके पास कभी न जाय। ब्रह्मन् ! गौ, पीपल तथा अग्निको भी अपनेसे बायें करके न जाय। इसी प्रकार चौराहेको, देववृक्षको, देवसम्बन्धी कुण्ड या सरोवरको तथा राजाको भी अपनेसे बायें करके न चले। दूसरोंके दोष देखना, डाह रखना और दिनमें सोना छोड़ दे। दूसरोंके पाप न कहे। अपना पुण्य प्रकट न करे। अपने

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* संक्षिप्त नारदपुराण *


नामको, जन्म-नक्षत्रको तथा मानको अत्यन्त गुप्त रखे। दुष्टोंके साथ निवास न करे। अशास्त्रीय बात न सुने। द्विजको मद्य, जूआ तथा गीतमें कभी आसक्ति नहीं रखनी चाहिये। गीली हड्डी, जूठी वस्तु, पतित तथा मुर्दा और कुत्तेको छूकर मनुष्य वस्त्रसहित स्नान कर ले। चिता, चिताकी लकड़ी, यूप, चाण्डालका स्पर्श कर लेनेपर मनुष्य वस्त्रसहित जलमें प्रवेश करे। दीपककी, खाटकी और शरीरकी छाया, केशका, वस्त्रका और चटाईका जल तथा बकरीके, झाडूके और बिल्लीके नीचेकी धूल—ये सब शुभ प्रारब्धको हर लेते हैं। सूपकी हवा, प्रेतके दाहका धुआँ, शूद्रके अन्नका भोजन तथा वृषलीके पतिका साथ दूरसे ही त्याग दे। असत् शास्त्रोंके अर्थका विचार, नख और केशोंका दाँतोंसे चबाना तथा नंगे होकर सोना सर्वदा छोड़ दे। सिरमें लगानेसे बचे हुए तेलको शरीरमें न लगावे। अपवित्र ताम्बूल (बाजारके लगाये हुए पान) न खाय तथा सोतेको न जगाये। अशुद्ध हुआ मनुष्य अग्निकी सेवा, देवताओं और गुरुजनोंका पूजन न करे। बायें हाथसे अथवा केवल मुखसे जल न पीये। मुनीश्वर! गुरुकी छायापर पैर न रखे। उनकी आज्ञा भी न टाले। योगी, ब्राह्मण और यति पुरुषोंकी कभी निन्दा न करे। द्विजको चाहिये कि वह आपसकी गुप्त (रहस्य)-की बातें कभी न कहे। अमावास्या तथा पूर्णिमाको विधिपूर्वक याग करे। द्विजोंको सुबह-शाम उपासना और होम अवश्य करने चाहिये। जो उपासनाका परित्याग करता है, उसे विद्वान् पुरुष 'शराबी' कहते हैं। अयन आरम्भ होनेके दिन, विषुवयोगमें (जब दिन-रात बराबर होते हैं), चार युगादि तिथियोंमें, अमावास्याको और प्रेतपक्षमें गृहस्थ द्विजको अवश्य श्राद्ध करना चाहिये। नारदजी! मन्वादि तिथियोंमें, मृत्युकी तिथिको, तीनों अष्टकाओंमें तथा नूतन अन्न घरमें आनेपर गृहस्थ पुरुष अवश्य श्राद्ध करे। कोई श्रोत्रिय ब्राह्मण घरपर आ जाय या चन्द्रमा और सूर्यका ग्रहण लगा हो अथवा पुण्यक्षेत्र एवं तीर्थमें पहुँच जाय तो गृहस्थ पुरुष निश्चय ही श्राद्ध करे। जो उपर्युक्त सदाचारमें तत्पर हैं, उनपर भगवान् विष्णु प्रसन्न होते हैं। द्विजश्रेष्ठ! भगवान् विष्णुके प्रसन्न हो जानेपर क्या असाध्य रह जाता है?


गृहस्थ-सम्बन्धी शौचाचार, स्नान, संध्योपासन आदि तथा वानप्रस्थ और संन्यास-आश्रमके धर्म

श्रीसनकजी कहते हैं— मुनिश्रेष्ठ! अब मैं गृहस्थका सदाचार बतलाता हूँ, सुनो। उन सदाचारोंके पालन करनेवाले पुरुषोंके सब पाप नष्ट हो जाते हैं, इसमें संशय नहीं है। ब्रह्मन्! गृहस्थ पुरुष ब्राह्ममुहूर्त (सूर्योदयसे पूर्वकी चार घड़ी)-में उठकर जो पुरुषार्थ (मोक्ष) साधनकी विरोधिनी