संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पूर्वभाग-प्रथम पाद
- पूर्वभाग-प्रथम पाद *
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वह समस्त पुरुषार्थोंका एकमात्र साधन, भगवान् विष्णुको प्रसन्न करनेवाला तथा सम्पूर्ण सिद्धियोंको देनेवाला है। 'ॐ नमो नारायणाय' यही अष्टाक्षर-मन्त्र है। इसका जप करना चाहिये। महाराज! 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' यह द्वादशाक्षर-मन्त्र कहा गया है। राजन्! इन अष्टाक्षर और द्वादशाक्षर—दोनों मन्त्रोंका समान फल है। इनकी प्रवृत्ति और निवृत्ति—इन दोनों मार्गवालोंके लिये समता बतायी गयी है। इन दोनों मन्त्रोंके जपके लिये भगवान्का ध्यान इस प्रकार करना चाहिये। भगवान् नारायण अपने हाथोंमें शङ्ख और चक्र धारण किये शान्तभावसे विराजमान हैं। रोग और शोक उनका कभी स्पर्श नहीं करते। उनके वामाङ्गमें लक्ष्मीजी विराज रही हैं। वे सर्वशक्तिमान् प्रभु सबको अभयदान कर रहे हैं। उनके मस्तकपर किरीट और कानोंमें कुण्डल शोभा पाते हैं। वे नाना प्रकारके अलंकारोंसे सुशोभित हैं। गलेमें कौस्तुभमणि और वनमाला धारण किये हुए हैं। उनका वक्षःस्थल श्रीवत्सचिह्नसे चिह्नित है। वे पीताम्बरधारी भगवान् देवताओं और दानवोंसे भी वन्दित हैं। उनका आदि और अन्त नहीं है। वे सम्पूर्ण मनोवाञ्छित फलोंके देनेवाले हैं। इस प्रकार भगवान्का ध्यान करना चाहिये। वे अन्तर्यामी, ज्ञानस्वरूप, सर्वव्यापी तथा सनातन हैं। राजा भगीरथ! तुमने जो कुछ पूछा, वह सब इस रूपमें बताया गया है। तुम्हारा कल्याण हो। अब सुखपूर्वक तपस्यामें सिद्धि प्राप्त करनेके लिये जाओ।
महर्षि भृगुके ऐसा कहनेपर राजा भगीरथ बहुत प्रसन्न हुए और तपस्याके लिये वनमें गये। हिमालय पर्वतपर पहुँचकर वहाँके मनोहर पावन प्रदेशमें स्थित नादेश्वर महाक्षेत्रमें उन्होंने अत्यन्त दुष्कर तपस्या की। राजा तीनों काल स्नान करते। कन्द, मूल तथा फल खाकर रहते और उसीसे आये हुए अतिथियोंका सत्कार भी करते थे। वे प्रतिदिन होममें तत्पर रहते। सम्पूर्ण भूतोंके हितैषी होकर शान्तभावसे स्थित थे। उन्होंने भगवान् नारायणकी शरण ले रखी थी। पत्र, पुष्प, फल और जलसे वे तीनों काल श्रीहरिकी आराधना करते थे। इस प्रकार अत्यन्त धैर्यपूर्वक भगवान् नारायणका ध्यान करते हुए वे सूखे पत्ते खाकर रहने लगे। तदनन्तर परम धर्मात्मा राजा भगीरथने प्राणायाम करते हुए श्वास बंद करके तपस्या करना प्रारम्भ किया। जिनका कहीं अन्त नहीं है या जो किसीसे पराजित नहीं होते, उन्हीं श्रीनारायणदेवका चिन्तन करते हुए वे साठ हजार वर्षोंतक श्वास रोके रहे। उस समय राजाकी नासिकाके छिद्रसे भयंकर अग्नि प्रकट हुई। उसे देखकर सब देवता थर्रा उठे और उस अग्निसे संतप्त होने लगे। फिर वे देवेश्वरगण क्षीरसागरके उत्तर तटपर जहाँ जगदीश्वर श्रीहरि निवास करते हैं, पहुँचकर भगवान् महाविष्णुकी शरणमें गये और शरणागतोंकी रक्षा करनेवाले देवदेवेश्वर भगवान्की इस प्रकार स्तुति करने लगे।
देवताओंने कहा—जो जगत्के एकमात्र स्वामी तथा स्मरण करनेवाले भक्तजनोंकी समस्त पीड़ा दूर कर देनेवाले हैं, उन परमेश्वर श्रीविष्णुको हम नमस्कार करते हैं। ज्ञानी पुरुष उन्हें स्वभावतः शुद्ध, सर्वत्र परिपूर्ण एवं ज्ञानस्वरूप कहते हैं। श्रेष्ठ योगीजन जिनका सदा ध्यान करते हैं, जो परमात्मा अपनी इच्छाके अनुसार शरीर धारण करके देवताओंका कार्य सिद्ध करते हैं, यह सम्पूर्ण जगत् जिनका स्वरूप है तथा जो जगत्के आदिस्वामी हैं, उन भगवान् पुरुषोत्तमको हम प्रणाम करते हैं। जिनके नामोंका संकीर्तन करनेमात्रसे दुष्ट पुरुषोंके भी समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं; जो सबके शासक, स्तवन करने योग्य एवं पुराणपुरुष हैं, उन भगवान् विष्णुको हम पुरुषार्थसिद्धिके
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* संक्षिप्त नारदपुराण *
लिये नमस्कार करते हैं। सूर्य आदि जिनके तेजसे प्रकाशित होते हैं और कभी भी जिनकी आज्ञाका उल्लङ्घन नहीं करते, जो सम्पूर्ण देवताओंके अधीश्वर तथा पुरुषार्थरूप हैं, उन कालस्वरूप श्रीहरिको हम नमस्कार करते हैं। जिनकी आज्ञाके अनुसार ब्रह्माजी इस जगत्की सृष्टि करते हैं, रुद्र संहार करते हैं और ब्राह्मणलोग श्रुतियोंके द्वारा सब लोगोंको पवित्र करते हैं, जो गुणोंके भण्डार और सबके उपदेशक गुरु हैं, उन आदिदेव भगवान् विष्णुकी हम शरणमें आये हैं। जो सबसे श्रेष्ठ, वरण करने योग्य तथा मधु और कैटभको मारनेवाले हैं, देवता और दैत्य भी जिनकी चरणपादुकाका पूजन करते हैं, जो श्रेष्ठ भक्तोंकी मनोवाञ्छित कामनाओंकी सिद्धिके कारण हैं तथा एकमात्र ज्ञानद्वारा जिनके तत्त्वका बोध होता है, उन दिव्यशक्तिसम्पन्न भगवान्को हम प्रणाम करते हैं। जो आदि, मध्य और अन्तसे रहित, अजन्मा, अनादि, अविद्या नामक अन्धकारका नाश करनेवाले, सत्, चित्, परमानन्दघन स्वरूप तथा रूप आदिसे रहित हैं, उन भगवान् परमेश्वरको हम प्रणाम करते हैं। जो जलमें शयन करनेके कारण नारायण, सर्वव्यापी होनेसे विष्णु, अविनाशी होनेसे अनन्त और सबके शासक होनेसे ईश्वर कहलाते हैं, अपने श्रीअङ्गोंपर रेशमी पीताम्बर धारण करते हैं, ब्रह्मा तथा रुद्र आदि जिनकी सेवामें लगे रहते हैं, जो यज्ञके प्रेमी, यज्ञ करनेवाले, विशुद्ध, सर्वोत्तम एवं अव्यय हैं, उन भगवान् विष्णुको हम नमस्कार करते हैं।
इन्द्र आदि देवताओंके इस प्रकार स्तुति करनेपर भगवान् महाविष्णुने देवताओंको राजर्षि भगीरथका चरित्र बतलाया। नारदजी ! फिर उन सबको आश्वासन तथा अभय देकर निरञ्जन भगवान् विष्णु उस स्थानपर गये, जहाँ राजर्षि भगीरथ तपस्या करते थे। सम्पूर्ण जगत्के गुरु शङ्ख-चक्रधारी सच्चिदानन्दस्वरूप भगवान् श्रीहरिने राजा भगीरथको प्रत्यक्ष दर्शन दिया। राजाने देखा, सामने कमलनयन भगवान् विराजमान हैं। उनकी प्रभासे सम्पूर्ण दिग्दिगन्त उद्भासित हो रहा है। उनके अङ्गोंकी कान्ति अलसीके फूलकी भाँति श्याम है। कानोंमें झलमलाते हुए कुण्डल उनकी शोभा बढ़ा रहे हैं। चिकने घुँघराले केशोंवाले मुखारविन्दसे सुशोभित हैं। मस्तकपर जगमगाता हुआ मुकुट उनके स्वरूपको और भी प्रकाशपूर्ण किये देता है। वक्षःस्थलमें श्रीवत्सका चिह्न और कौस्तुभमणि है। वे वनमालासे विभूषित हैं। उनकी भुजाएँ बड़ी-बड़ी हैं। अङ्ग-अङ्गसे उदारता टपक रही है। उनके चरणारविन्द लोकेश ब्रह्माजीके द्वारा पूजित हैं। भगवान्की यह झाँकी देखकर राजा भगीरथ भूतलपर दण्डकी भाँति पड़ गये। उनका कंधा झुक गया और वे बार-बार प्रणाम करने लगे। उनका हृदय अत्यन्त हर्षसे भरा हुआ था। शरीरमें रोमाञ्च हो आया था और वे गद्गद कण्ठसे 'कृष्ण, कृष्ण, कृष्ण, श्रीकृष्ण'—इस प्रकार उच्चारण कर रहे थे। अन्तर्यामी जगद्गुरु भगवान् विष्णु भगीरथपर प्रसन्न थे। उन भूतभावन भगवान्ने करुणासे भरकर कहा।
श्रीभगवान् बोले—महाभाग भगीरथ ! तुम्हारा अभीष्ट सिद्ध होगा, तुम्हारे पूर्व पितामह मेरे लोकमें जायँगे। राजन् ! भगवान् शिव मेरे दूसरे स्वरूप हैं। तुम यथाशक्ति स्तुति-पाठ करके उनका स्तवन करो। वे तुम्हारा सम्पूर्ण मनोरथ तत्काल सिद्ध करेंगे। जिन्होंने अपनी शरणमें आये हुए चन्द्रमाको स्वीकार किया है, वे बड़े शरणागतवत्सल हैं। अतः स्तोत्रोंद्वारा स्तवन करने योग्य उन सुखदाता ईशानकी तुम आराधना करो। अनादि अनन्तदेव महेश्वर सम्पूर्ण कामनाओं तथा फलोंके दाता हैं। राजन् ! तुमसे भलीभाँति पूजित