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संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

पूर्वभाग-प्रथम पाद

  • पूर्वभाग-प्रथम पाद *
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गौको हाँकनेके लिये अँगूठेके बराबर मोटी, बाँहके बराबर बड़ी पल्लवयुक्त और गीली पतली डालका डंडा उचित बताया गया है। यदि गौओंके मारनेपर उनका गर्भ भी हो और वह मर जाय तो उनके लिये पृथक्-पृथक् एक-एक कृच्छ्रव्रत करे। यदि कोई काठ, ढेला, पत्थर अथवा किसी प्रकारके शस्त्रद्वारा गौओंको मार डाले तो भिन्न-भिन्न शस्त्रके लिये शास्त्रमें इस प्रकार प्रायश्चित्त बताया गया है। काष्ठसे मारनेपर शान्तपनव्रतका विधान है। ढेलेसे मारनेपर प्राजापत्यव्रत करना चाहिये। पत्थरसे आघात करनेपर तप्तकृच्छ्रव्रत और किसी शस्त्रसे मारनेपर अतिकृच्छ्रव्रत करना चाहिये। यदि कोई गौओं और ब्राह्मणोंके लिये (अच्छी नीयतसे) ओषधि, तेल एवं भोजन दे और उसके देनेके बाद उसकी मृत्यु हो जाय तो उस दशामें कोई प्रायश्चित्त नहीं है। तेल और दवा पीनेपर अथवा दवा खानेपर या शरीरमें धँसे हुए लोहे या काँटे आदिको निकालनेका प्रयत्न करनेपर मृत्यु हो जाय तो भी कोई प्रायश्चित्त नहीं है। चिकित्सा या दवा करनेके लिये बछड़ोंका कण्ठ बाँधनेसे अथवा शामको उनकी रक्षाके लिये उन्हें घरमें रोकने या बाँधनेसे भी कोई दोष नहीं होता।

(उपर्युक्त पापोंका प्रायश्चित्त करते समय मनुष्यको इस विधिसे मुण्डन कराना चाहिये)—एक पाद (चौथाई) प्रायश्चित्त करनेपर कुछ रोममात्र कटा देने चाहिये। दो पादके प्रायश्चित्तमें केवल दाढ़ी-मूँछ मुड़ा ले, तीन पादका प्रायश्चित्त करते समय शिखाके सिवा और सब बाल बनवा दे और पूरा प्रायश्चित्त करनेपर सब कुछ मुड़ा देना चाहिये। यदि स्त्रियोंको प्रायश्चित्त करना पड़े तो उनके सब केश समेटकर दो अंगुल कटा देना चाहिये। इसी प्रकार स्त्रियोंके सिर मुड़ानेका विधान है। स्त्रीके लिये सारे बाल कटाने और वीरासनसे बैठनेका नियम नहीं है। उनके लिये गोशालामें निवास करनेकी विधि नहीं है। यदि गौ कहीं जाती हो तो उसके पीछे नहीं जाना चाहिये। राजा, राजकुमार अथवा बहुत-से शास्त्रोंका ज्ञाता ब्राह्मण हो तो उन सबके लिये केश मुड़ाये बिना ही प्रायश्चित्त बताना चाहिये। उन्हें केशोंकी रक्षाके लिये दूने व्रतका पालन करनेकी आज्ञा दे। दूना व्रत करनेपर उसके लिये दक्षिणा भी दूनी ही होनी चाहिये। यदि ऐसा न करे तो हत्या करनेवालेका पाप नष्ट नहीं होता और दाता नरकमें पड़ता है। जो लोग वेद और स्मृतिके विरुद्ध व्रत-प्रायश्चित्त बताते हैं, वे धर्मपालनमें विघ्न डालनेवाले हैं। राजा उन्हें दण्डद्वारा पीड़ित करे, परंतु किसी कामना या स्वार्थसे मोहित होकर राजा उन्हें कदापि दण्ड न दे; नहीं तो उनका पाप सौगुना होकर उस राजापर ही पड़ता है। तदनन्तर प्रायश्चित्त पूरा कर लेनेपर ब्राह्मणोंको भोजन करावे। बीस गाय और एक बैल उन्हें दक्षिणामें दे। यदि गौओंके अङ्गोंमें घाव होकर उसमें कीड़े पड़ जायँ अथवा मक्खी आदि लगने लगें और इन कारणोंसे उन गौओंकी मृत्यु हो जाय तो उन गायोंको रखनेवाला पुरुष आधे कृच्छ्रव्रतका अनुष्ठान करे और अपनी शक्तिके अनुसार दक्षिणा दे। इस प्रकार प्रायश्चित्त करके श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको भोजन कराकर कम-से-कम एक माशा सुवर्ण दान करे तो शुद्धि होती है।

जलके भीतरकी, बाँबीकी, चूहोंके बिलकी, ऊसर भूमिकी, रास्तेकी, श्मशान-भूमिकी तथा शौचसे बची हुई—ये सात प्रकारकी मृत्तिका काममें नहीं लानी चाहिये। ब्राह्मणको प्रयत्नपूर्वक इष्टापूर्त कर्म करने चाहिये। इष्ट (यज्ञ-याग आदि) से वह स्वर्ग पाता है और पूर्त कर्मसे वह मोक्षसुखका भागी होता है। धनकी अपेक्षा रखनेवाले यज्ञ, दान आदि कर्म इष्ट कहलाते हैं और जलाशय

७२ * संक्षिप्त नारदपुराण *


बनवाना आदि कार्य पूर्त कहा जाता है। विशेषतः
बगीचा, किसी देवताके लिये बने हुए तालाब,
बावड़ी, कुआँ, पोखरा और देवमन्दिर—ये यदि
गिरते या नष्ट होते हों तो जो इनका उद्धार करता
है, वह पूर्त कर्मका फल भोगता है; क्योंकि ये
सब पूर्त कर्म हैं। सफेद गायका मूत्र, काली
गौका गोबर, ताँबेके रंगवाली गायका दूध, सफेद
गायका दही और कपिला गायका घी—इन सब
वस्तुओंको लेकर एकत्र करे तो वह पञ्चगव्य
बड़े-बड़े पातकोंका नाश करनेवाला होता है।
कुशोंद्वारा लाये हुए तीर्थ-जल और नदी-जलके
साथ उक्त सभी द्रव्योंको पृथक्-पृथक् प्रणवमन्त्रसे
लाकर प्रणवद्वारा ही उन्हें उठावे, प्रणव-जप करते
हुए ही उनका आलोडन करे और प्रणवके
उच्चारणपूर्वक ही पीये। पलाश वृक्षके बिचले
पत्तेमें अथवा ताँबेके शुभ पात्रमें अथवा कमलके
पत्तेमें या मिट्टीके बर्तनमें कुशोदकसहित उस
पञ्चगव्यको पीना चाहिये।

एक सूतकमें दूसरा सूतक उपस्थित हो जाय
तो दूसरेमें दोष नहीं लगता। पहले सूतकके साथ
ही उसकी शुद्धि हो जाती है। एक जननाशौचके
साथ दूसरा जननाशौच और एक मरणाशौचके
साथ दूसरा मरणाशौच भी शुद्ध हो जाता है। एक
मासके भीतर गर्भस्राव हो तो तीन दिनका
अशौच बताये। दो माससे ऊपर होनेपर जितने
महीनेमें गर्भस्राव हो, उतनी ही रात्रियोंमें उसके
अशौचकी निवृत्ति होती है। साध्वी रजस्वला स्त्री
रज बंद हो जानेपर स्नानमात्रसे शुद्ध होती है।
विवाहसे सातवें पदपर अर्थात् सप्तपदीकी क्रिया
पूरी होनेपर अपने पितृ-सम्बन्धी गोत्रसे च्युत हो
जाती है यानी उसके पतिका गोत्र हो जाता है;
अतः उसके लिये श्राद्ध और तर्पण पतिके गोत्रसे
ही करने चाहिये। पिण्डदानमें पति और पत्नी
दोनोंका उद्देश्य होता है; अतः प्रत्येक पिण्डमें दो
नामसे संकल्प होना चाहिये। तात्पर्य यह है कि
पिता या पितामह आदिको सपत्नीक विशेषण
लगाकर पिण्डदान करना चाहिये। इस प्रकार छः
व्यक्तियोंके लिये तीन पिण्ड देने योग्य हैं। ऐसा
दाता मोहमें नहीं पड़ता। माता अपने पतिके साथ
विश्वेदेवपूर्वक श्राद्धका उपभोग करती है। इसी
प्रकार पितामही और प्रपितामही भी अपने-अपने
पतिके ही साथ श्राद्ध-भोग करती हैं। प्रत्येक
वर्षमें माता-पिताका एकोद्दिष्टश्राद्धद्वारा सत्कार
करे। उस वार्षिक श्राद्धमें विश्वेदेवका पूजन नहीं
किया जाता। अतः उनके बिना ही वह श्राद्धभोजन
करावे। उसमें एक ही पिण्ड दे। नित्य, नैमित्तिक,
काम्य, वृद्धिश्राद्ध तथा पार्वण—विद्वान् पुरुषोंको
ये पाँच प्रकारके श्राद्ध जानने चाहिये। ग्रहण,
संक्रान्ति, पूर्णिमा या अमावास्या पर्व, उत्सवकाल
तथा महालयके अवसरपर मनुष्य तीन पिण्ड दे
और मृत्यतिथिको एक ही पिण्ड दे। जिस
कन्याका विवाह नहीं हुआ है, वह पिण्ड, गोत्र
और सूतकके विषयमें पिताके गोत्रसे पृथक् नहीं
है। पाणिग्रहण और मन्त्रोंद्वारा वह अपने पिताके
गोत्रसे पृथक् होती है। जिस कन्याका विवाह
जिस वर्णके साथ होता है, उसके समान उसे
सूतक भी लगता है। उसके लिये पिण्ड और
तर्पण भी उसी वर्णके अनुसार होने चाहिये।
विवाह हो जानेपर चौथी रातमें वह पिण्ड, गोत्र
और सूतकके विषयमें अपने पतिके साथ एक हो
जाती है। मृत व्यक्तिके प्रति हितबुद्धि रखनेवाले
बन्धुजनोंको शवदाहके प्रथम, द्वितीय, तृतीय
अथवा चतुर्थ दिन अस्थि-संचय करना चाहिये
अथवा ब्राह्मण आदि चारों वर्णोंका अस्थि-संचय
क्रमशः चौथे, पाँचवें, सातवें और नवें दिन भी
कर्तव्य बताया गया है। जिस मृत व्यक्तिके लिये
ग्यारहवें दिन वृषोत्सर्ग किया जाता है, वह
प्रेतलोकसे मुक्त और स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता