संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पूर्वभाग-द्वितीय पाद ४०९
- पूर्वभाग-द्वितीय पाद * ४०९
प्रश्न किया—'ब्रह्मन्! किसलिये आपका यहाँ शुभागमन हुआ है?'
शुकदेवजी बोले—राजन्! आपका कल्याण हो! पिताजीने मुझसे कहा है कि 'मेरे यजमान विदेहराज जनक मोक्ष-धर्मके तत्त्वको जाननेमें कुशल हैं। तुम उन्हींके पास जाओ। तुम्हारे हृदयमें प्रवृत्ति या निवृत्तिके विषयमें जो भी संदेह होगा, उसका वे शीघ्र ही निवारण कर देंगे। इसमें संशय नहीं है।' अतः मैं पिताजीकी आज्ञासे आपके समीप अपना हार्दिक संशय मिटानेके लिये यहाँ आया हूँ। आप धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ हैं। मुझे यथावत् उपदेश देनेकी कृपा करें। ब्राह्मणका इस जगत्में क्या कर्तव्य है? तथा मोक्षका स्वरूप कैसा है? उसे ज्ञान या तपस्या किस साधनसे प्राप्त करना चाहिये?
राजा जनकने कहा—ब्रह्मन्! इस जगत्में जन्मसे लेकर जीवनपर्यन्त ब्राह्मणका जो कर्तव्य है, वह बतलाता हूँ, सुनो—तात! उपनयन-संस्कारके पश्चात् ब्राह्मण-बालकको वेदोंके स्वाध्यायमें लग जाना चाहिये। वह तपस्या, गुरुसेवा और ब्रह्मचर्य-पालनमें संलग्न रहे। होम तथा श्राद्ध-तर्पणद्वारा देवताओं और पितरोंके ऋणसे मुक्त हो। किसीकी निन्दा न करे। सम्पूर्ण वेदोंका नियमपूर्वक अध्ययन पूरा करके गुरुको दक्षिणा दे, फिर उनकी आज्ञा लेकर द्विजबालक अपने घरको लौटे। समावर्तन-संस्कारके पश्चात् गुरुकुलसे लौटा हुआ ब्राह्मणकुमार विवाह करके अपनी ही पत्नीमें अनुराग रखते हुए गृहस्थ-आश्रममें निवास करे। किसीके दोष न देखे। न्यायपूर्वक बर्ताव करे। अग्निकी स्थापना करके प्रतिदिन आदरपूर्वक अग्निहोत्र करे। पुत्र और पौत्रोंकी उत्पत्ति हो जानेपर वानप्रस्थ-आश्रममें रहे और पहलेकी स्थापित अग्निका ही विधिपूर्वक आहुतिद्वारा पूजन करे। वानप्रस्थीको भी अतिथि-सेवामें प्रेम रखना चाहिये। तदनन्तर धर्मज्ञ पुरुष वनमें न्यायपूर्वक सम्पूर्ण अग्नियोंको (भावनाद्वारा) अपने भीतर ही लीन करके वीतराग हो ब्रह्मचिन्तनपरायण संन्यास-आश्रममें निवास करे और शीत, उष्ण आदि द्वन्द्वोंको धैर्यपूर्वक सहन करे।
शुकदेवजीने पूछा—राजन्! यदि किसीको ब्रह्मचर्य-आश्रममें ही सनातन ज्ञान-विज्ञानकी प्राप्ति हो जाय और हृदयके राग-द्वेष आदि द्वन्द्व दूर हो गये हों तो भी उसके लिये क्या शेष तीन आश्रमोंमें निवास करना अत्यन्त आवश्यक है? इस संदेहके विषयमें मैं आपसे पूछ रहा हूँ। आप बतानेकी कृपा करें।
राजा जनकने कहा—ब्रह्मन्! जैसे ज्ञान-विज्ञानके बिना मोक्षकी प्राप्ति नहीं होती, उसी प्रकार सद्गुरुसे सम्बन्ध हुए बिना ज्ञानकी उपलब्धि भी नहीं होती। गुरु इस संसार-सागरसे पार उतारनेवाले हैं और उनका दिया हुआ ज्ञान नौकाके समान बताया गया है। लोककी धार्मिक मर्यादाका उच्छेद न हो और कर्मानुष्ठानकी परम्पराका भी नाश न होने पावे, इसके लिये पहलेके विद्वान् चारों आश्रमोंके धर्मोंका पालन करते थे। इस प्रकार क्रमशः अनेक प्रकारके सत्कर्मोंका अनुष्ठान करते हुए शुभाशुभ कर्मोंकी आसक्तिका त्याग हो जानेपर यहीं मोक्ष प्राप्त हो जाता है। अनेक जन्मोंसे सत्कर्म करते-करते जब सम्पूर्ण इन्द्रियाँ पवित्र हो जाती हैं, तब शुद्ध अन्तःकरणवाला पुरुष प्रथम आश्रममें ही उत्तम मोक्षरूप ज्ञान प्राप्त कर लेता है। उसे पाकर जब ब्रह्मचर्य-आश्रममें ही तत्त्वका साक्षात्कार एवं मुक्ति सुलभ हो जाय तब परमात्माको चाहनेवाले जीवन्मुक्त विद्वान्के लिये शेष तीनों आश्रमोंमें जानेकी क्या आवश्यकता है। विद्वान्को चाहिये कि वह राजस और तामस दोषोंका परित्याग कर दे और सात्त्विक मार्गका आश्रय लेकर बुद्धिके
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द्वारा आत्माका दर्शन करे। जो सम्पूर्ण भूतोंको अपनेमें और अपनेको सम्पूर्ण भूतोंमें स्थित देखता है, वह संसारमें रहकर भी उसके दोषोंसे लिप्त नहीं होता और अक्षय पदको प्राप्त कर लेता है। तात! इस विषयमें राजा ययातिकी कही हुई गाथा सुनो—
जिसे मोक्ष-शास्त्रमें निपुण विद्वान् द्विज सदा धारण किये हुए हैं, अपने भीतर ही उस आत्मज्योतिका प्रकाश है, अन्यत्र नहीं। वह ज्योति सम्पूर्ण प्राणियोंके भीतर समान रूपसे स्थित है। समाधिमें अपने चित्तको भलीभाँति एकाग्र करनेवाला पुरुष उसको स्वयं देख सकता है। जिससे दूसरा कोई प्राणी नहीं डरता, जो स्वयं किसी दूसरे प्राणीसे भयभीत नहीं होता तथा जो इच्छा और द्वेषसे रहित हो गया है, वह ब्रह्मभावको प्राप्त हो जाता है। जब मनुष्य मन, वाणी और क्रियाद्वारा किसी भी प्राणीकी बुराई नहीं करता, उस समय वह ब्रह्मरूप हो जाता है। जब मोहमें डालनेवाली ईर्ष्या, काम और लोभका त्याग करके पुरुष अपने-आपको तपमें लगा देता है, उस समय उसे ब्रह्मानन्दका अनुभव होता है। जब सुनने और देखने योग्य विषयोंमें तथा सम्पूर्ण प्राणियोंके ऊपर मनुष्यका समानभाव हो जाय और सुख-दुःख आदि द्वन्द्व उसके चित्तपर प्रभाव न डाल सकें, तब वह ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है। जिस समय निन्दा-स्तुति, लोहा-सोना, सुख-दुःख, सर्दी-गरमी, अर्थ-अनर्थ, प्रिय-अप्रिय तथा जीवन-मरणमें समान दृष्टि हो जाती है, उस समय मनुष्य ब्रह्मभावको प्राप्त हो जाता है। जैसे कछुआ अपने अङ्गोंको फैलाकर फिर समेट लेता है, उसी प्रकार संन्यासीको मनके द्वारा इन्द्रियोंपर नियन्त्रण रखना चाहिये*। जिस प्रकार अन्धकारसे व्याप्त हुआ घर दीपकके प्रकाशसे स्पष्ट दीख पड़ता है, उसी तरह बुद्धिरूपी दीपककी सहायतासे आत्माका दर्शन हो सकता है। बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ शुकदेवजी! उपर्युक्त सारी बातें मुझे आपमें दिखायी देती हैं। इनके अतिरिक्त जो कुछ भी जानने योग्य विषय है, उसे आप ठीक-ठीक जानते हैं। ब्रह्मर्षे! मैं आपको अच्छी तरह जानता हूँ। आप अपने पिताजीकी कृपा और शिक्षाके कारण विषयोंसे परे हो गये हैं। उन्हीं महामुनि गुरुदेवकी कृपासे मुझे भी यह दिव्य विज्ञान प्राप्त हुआ है, जिससे मैं आपकी स्थितिको पहचानता हूँ। आपका विज्ञान, आपकी गति और आपका ऐश्वर्य—ये सब अधिक हैं। किंतु आपको इस बातका पता नहीं है। ब्रह्मन्! आपको ज्ञान हो चुका है और आपकी बुद्धि भी स्थिर है; साथ ही आपमें लोलुपता भी नहीं है; परंतु विशुद्ध निश्चयके बिना किसीको भी परब्रह्मकी प्राप्ति नहीं होती। आप सुख-दुःखमें कोई अन्तर नहीं समझते! आपके मनमें तनिक भी लोभ नहीं है। आपको न नाच देखनेकी
* न बिभेति परो यस्मान्न बिभेति पराच्च यः। यश्च नेच्छति न द्वेष्टि ब्रह्म सम्पद्यते स तु॥
यदा भावं न कुरुते सर्वभूतेषु पापकम। कर्मणा मनसा वाचा ब्रह्म सम्पद्यते तदा॥
संयोज्य तपसाऽऽत्मानमीर्ष्यामुत्सृज्य मोहिनीम्। त्यक्त्वा कामं च लोभं च ततो ब्रह्मत्वमश्नुते॥
यदा श्रव्ये च दृश्ये च सर्वभूतेषु चाव्ययम्। समो भवति निर्द्वन्द्वो ब्रह्म सम्पद्यते तदा॥
यदा स्तुतिं च निन्दां च समत्वेन चपश्यति। काञ्चनं चायसं चैव सुखदुःखे तथैव च॥
शीतमुष्णं तथैवार्थमनर्थं प्रियमप्रियम्। जीवितं मरणं चैव ब्रह्म सम्पद्यते तदा॥
प्रसार्यह यथाङ्गानि कूर्मः संहरते पुनः। तथेन्द्रियाणि मनसा संयन्तव्यानि भिक्षुणा॥
(ना० पूर्व० ५९। २९—३५)
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उत्कण्ठा होती है, न गीत सुननेकी। आपका कहीं भी राग है ही नहीं। न तो बन्धुओंके प्रति आपकी आसक्ति है, न भयदायक पदार्थोंसे भय। महाभाग! मैं देखता हूँ—आपकी दृष्टिमें अपनी निन्दा और स्तुति एक-सी है। मैं तथा दूसरे मनीषी विद्वान् भी आपको अक्षय एवं अनामय पथ (मोक्षमार्ग)—पर स्थित मानते हैं। विप्रवर! इस लोकमें ब्राह्मण होनेका जो फल है और मोक्षका जो स्वरूप है, उसीमें आपकी स्थिति है।
सनन्दनजी कहते हैं—नारद! राजा जनककी यह बात सुनकर शुद्ध अन्तःकरणवाले शुकदेवजी एक दृढ़ निश्चयपर पहुँच गये और बुद्धिके द्वारा आत्माका साक्षात्कार करके उसीमें स्थित होकर कृतार्थ हो गये। उस समय उन्हें परम आनन्द और परम शान्तिका अनुभव हुआ। इसके बाद वे | हिमालय पर्वतको लक्ष्य करके चुपचाप उत्तर दिशाकी ओर चल दिये और वहाँ पहुँचकर उन्होंने अपने पिता व्यासजीको देखा, जो पैल आदि शिष्योंको वैदिकसंहिता पढ़ा रहे थे। शुद्ध अन्तःकरणवाले शुकदेव अपनी दिव्य प्रभासे सूर्यके समान प्रकाशित हो रहे थे। उन्होंने प्रसन्नचित्त होकर बड़े आदरसे पिताके चरणोंमें प्रणाम किया। तदनन्तर उदार-बुद्धि शुकने राजा जनकके साथ जो मोक्षसाधन-विषयक संवाद हुआ था, वह सब अपने पिताको बताया। उसे सुनकर वेदोंका विस्तार करनेवाले व्यासजीने हर्षोल्लासपूर्ण हृदयसे पुत्रको छातीसे लगा लिया और अपने पास बिठाया। तत्पश्चात् पैल आदि ब्राह्मण व्यासजीसे वेदोंका अध्ययन करके उस शैलशिखरसे पृथ्वीपर आये और यज्ञ कराने तथा वेद पढ़ानेके कार्यमें संलग्न हो गये।
व्यासजीका शुकदेवको अनध्यायका कारण बताते हुए 'प्रवह' आदि सात वायुओंका परिचय देना तथा सनत्कुमारका शुकको ज्ञानोपदेश
सनन्दनजी कहते हैं—नारदजी! जब पैल आदि ब्राह्मण पर्वतसे नीचे उतर आये, तब पुत्रसहित परम बुद्धिमान् भगवान् व्यास एकान्तमें मौनभावसे ध्यान लगाकर बैठ गये। उस समय आकाशवाणीने पुत्रसहित व्यासजीको सम्बोधित करके कहा—'वसिष्ठ-कुलमें उत्पन्न महर्षि व्यास! इस समय वेद-ध्वनि क्यों नहीं हो रही है? तुम अकेले कुछ चिन्तन करते हुए-से चुपचाप ध्यान लगाये क्यों बैठे हो? इस समय वेदोच्चारणकी ध्वनिसे रहित होकर यह पर्वत सुशोभित नहीं हो रहा है। अतः भगवन्! अपने वेदज्ञ पुत्रके साथ परम प्रसन्नचित्त हो सदा वेदोंका स्वाध्याय करो।' आकाशवाणीद्वारा उच्चारित यह वचन सुनकर व्यासजीने अपने पुत्र शुकदेवजीके साथ | वेदोंकी आवृत्ति आरम्भ कर दी। द्विजश्रेष्ठ! वे दोनों पिता-पुत्र दीर्घकालतक वेदोंका पारायण करते रहे। इसी बीचमें एक दिन समुद्री हवासे प्रेरित होकर बड़े जोरकी आँधी उठी। इसे अनध्यायका हेतु समझकर व्यासजीने पुत्रको वेदोंके स्वाध्यायसे रोक दिया। तब उन्होंने पितासे पूछा—'भगवन्! यह इतने जोरकी हवा क्यों उठी थी? वायुदेवकी यह सारी चेष्टा आप बतानेकी कृपा करें।'<br><br>शुकदेवजीकी यह बात सुनकर व्यासजी अनध्यायके निमित्तस्वरूप वायुके विषयमें इस प्रकार बोले—'बेटा! तुम्हें दिव्यदृष्टि उत्पन्न हुई है, तुम्हारा मन स्वतः निर्मल है। तुम तमोगुण तथा रजोगुणसे दूर एवं सत्यमें प्रतिष्ठित हुए हो,
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अतः अपने हृदयमें वेदोंका विचार करके स्वयं ही बुद्धिद्वारा अनध्यायके कारणरूप वायुके विषयमें आलोचना करो।
पृथ्वी और अन्तरिक्षमें जो वायु चलती है, उसके सात मार्ग हैं। जो धूम तथा गरमीसे उत्पन्न बादल-समूहों और ओलोंको इधर-से-उधर ले जाता है, वह प्रथम मार्गमें प्रवाहित होनेवाला 'प्रवह' नामक प्रथम वायु है। जो आकाशमें रसकी मात्राओं और बिजली आदिकी उत्पत्तिके लिये प्रकट होता है, वह महान् तेजसे सम्पन्न द्वितीय वायु 'आवह' नामसे प्रसिद्ध है और बड़ी भारी आवाजके साथ बहता है। जो सदा सोम-सूर्य आदि ज्योतिर्मय ग्रहोंका उदय एवं उद्भव करता है, मनीषी पुरुष शरीरके भीतर जिसे उदान कहते हैं, जो चारों समुद्रोंसे जल ग्रहण करता है और उसे ऊपर उठाकर 'जीमूतों' को देता है तथा जीमूतोंको जलसे संयुक्त करके उन्हें 'पर्जन्य' के हवाले करता है, वह महान् वायु 'उद्वह' कहलाता है। जिससे प्रेरित होकर अनेक प्रकारकेनीले महामेघ घटा बाँधकर जल बरसाना आरम्भ करते हैं तथा जो देवताओंके आकाशमार्गसे जानेवाले विमानोंको स्वयं ही वहन करता है, वह पर्वतोंका मान मर्दन करनेवाला चतुर्थ वायु 'संवह' नामसे प्रसिद्ध है। जो रूक्षभावसे वेगपूर्वक बहकर वृक्षोंको तोड़ता और उखाड़ फेंकता है तथा जिसके द्वारा संगठित हुए प्रलयकालीन मेघ 'बलाहक' संज्ञा धारण करते हैं, जिसका संचरण भयानक उत्पात लानेवाला है तथा जो अपने साथ मेघोंकी घटाएँ लिये चलता है, वह अत्यन्त वेगवान् पञ्चम वायु 'विवह' कहा गया है। जिसके आधारपर आकाशमें दिव्य जल प्रवाहित होते हैं, जो आकाशगङ्गाके पवित्र जलको धारण करके स्थित है और जिसके द्वारा दूरसे ही प्रतिहत होकर सहस्रों किरणोंके उत्पत्तिस्थान सूर्यदेव एक ही किरणसे युक्त प्रतीत होते हैं, जिनसे यह पृथ्वी प्रकाशित होती है तथा अमृतकी दिव्यनिधि चन्द्रमाका भी जिससे पोषण होता है, उस छठे वायुका नाम 'परिवह' है, वह सम्पूर्ण विजयशील तत्त्वोंमें श्रेष्ठ है। जो अन्तकालमें सम्पूर्ण प्राणियोंके प्राणोंको शरीरसे निकालता है, जिसके इस प्राणनिष्कासनरूप मार्गका मृत्यु तथा वैवस्वत यम अनुगमन मात्र करते हैं, सदा अध्यात्मचिन्तनमें लगी हुई शान्त बुद्धिके द्वारा भलीभाँति विचार या अनुसंधान : करनेवाले ध्यानाभ्यासपरायण पुरुषोंको जो अमृतत्व देनेमें समर्थ है, जिसमें स्थित होकर प्रजापति दक्षके दस हजार पुत्र बड़े वेगसे सम्पूर्ण दिशाओंके अन्तमें पहुँच गये तथा जिससे वृष्टिका जल तिरोहित होकर वर्षा बंद हो जाती है, वह सर्वश्रेष्ठ सप्तम वायु 'परावह' नामसे प्रसिद्ध है। उसका अतिक्रमण करना सबके लिये कठिन है। इस प्रकार ये सात मरुद्गण दितिके परम अद्भुत पुत्र हैं। इनकी सर्वत्र गति है। ये सब जगह विचरते रहते हैं; किंतु बड़े आश्चर्यकी बात है कि उस वायुके वेगसे आज यह पर्वतोंमें श्रेष्ठ