संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पूर्वभाग-द्वितीय पाद ३६९
- पूर्वभाग-द्वितीय पाद * ३६९
त्याग करना चाहिये^१ ॥ ४६४-४६८ ॥
रवि आदि वारोंमें जो मुहूर्त निन्दित कहा गया है, वह यदि अन्य लाख गुणोंसे युक्त हो तो भी विवाह आदि शुभ कार्योंमें वर्जनीय ही है॥ ४६९॥ रवि आदि दिनोंमें जो-जो वार-दोष कहे गये हैं, वे अन्य सब गुणोंसे युक्त हों तो भी शुभ कार्यमें वर्जनीय हैं ॥ ४७० ॥
नक्षत्रके जिस चरणमें पूर्वोक्त 'एकार्गल दोष' हो, उस चरण (नवांश)-से युक्त जो लग्न हो उसमें यदि गुरु, शुक्रका योग हो तो भी विषयुक्त दूधके समान उसको त्याग देना चाहिये ॥ ४७१ ॥
ग्रहण तथा उत्पातसे दूषित नक्षत्रको तीन ऋतु (छः मास)-तक शुभ कार्यमें छोड़ देना चाहिये। जब चन्द्रमा उस नक्षत्रको भोगकर छोड़ दे तो वह नक्षत्र जली हुई लकड़ीके समान निष्फल हो जाता है अर्थात् दोष-कारक नहीं रह जाता। शुभ कार्योंमें ग्रहसे विद्ध और पापग्रहसे युक्त सम्पूर्ण नक्षत्रको मदिरामिश्रित पञ्चगव्यके समान त्याग देना चाहिये; परंतु यदि नक्षत्र शुभग्रहसे विद्ध हो तो उसका विद्ध चरणमात्र त्याज्य है, सम्पूर्ण नक्षत्र नहीं; किंतु पापग्रहसे विद्ध नक्षत्र शुभकार्यमें सम्पूर्ण रूपसे त्याग देने योग्य है ॥ ४७२-४७४ ॥
(विहित नवमांश—) वृष, तुला, मिथुन, कन्या और धनुका उत्तरार्ध तथा इन राशियोंके नवमांश विवाहलग्नमें शुभप्रद हैं। किसी भी लग्नमें अन्तिम नवमांश यदि वर्गोत्तम हो तभी उसे शुभप्रद समझना चाहिये^२। अन्यथा विवाह-लग्नका अन्तिम नवमांश (२६ अंश ४० कलाके बाद) अशुभ होता है। यहाँ अन्य नवमांश नहीं ग्रहण करने चाहिये; क्योंकि वे 'कुनवांश' कहलाते हैं। लग्नमें कुनवांश हो तो अन्य सब गुणोंसे युक्त होनेपर भी वह त्याज्य है। जिस दिन महापात (सूर्य-चन्द्रमाका क्रान्ति-साम्य) हो, वह दिन भी शुभ कार्यमें छोड़ देने योग्य है; क्योंकि वह अन्य सब गुणोंसे युक्त होनेपर भी वर-वधूके लिये घातक होता है। इन दोषोंसे भिन्न विद्युत्, नीहार (कुहरा) और वृष्टि आदि दोष, जिनका अभी वर्णन नहीं किया गया है, 'स्वल्पदोष' कहलाते हैं ॥ ४७५-४७८ ॥
(लघुदोष—) विद्युत्, नीहार, वृष्टि, प्रतिसूर्य (दो सूर्य-सा दीखना), परिवेष (घेरा), इन्द्रधनुष, घनगर्जन, लत्ता, उपग्रह^३, पात, मासदग्ध^४ तिथि, दग्ध, अन्ध, बधिर तथा पङ्गु—इन राशियोंके लग्न^५, एवं छोटे-छोटे और भी अनेक दोष हैं; अब उनकी व्यवस्थाका प्रतिपादन किया जाता है॥ ४७९-४८०॥
१. विशेष—यदि नक्षत्रका मान ६० घड़ी हो तब इतने ध्रुवाङ्क और उसके पंद्रहवें भाग चार घटीतक 'विषघटी' का अवस्थान मध्यममानके अनुसार कहा गया है। इससे यह स्वयं सिद्ध होता है कि यदि नक्षत्रका मान ६० घड़ीसे अधिक या अल्प होगा तो विषघटीका मान और ध्रुवाङ्क भी उसी अनुपातसे अधिक या कम हो जायगा तथा स्पष्ट भभोगमानका पंद्रहवाँ भाग ही विषघटीका स्पष्ट मान होगा।
मान लीजिये कि पुनर्वसुका भभोगमान ५६ घड़ी है तो त्रैराशिकसे अनुपात निकालिये। यदि ६० घड़ीमें ३० ध्रुवाङ्क तो इष्ट भभोग ५६ घड़ीमें क्या होगा ? इस प्रकार ५६ से ३० को गुणा करके ६० के द्वारा भाग देनेसे लब्धि २८ पुनर्वसुका स्पष्ट ध्रुवाङ्क हुआ तथा भभोग ५६ का पंद्रहवाँ भाग ३ घड़ी ४४ पल स्पष्ट 'विषघटी' हुई। इसलिये २८ घड़ीके बाद ३ घड़ी ४ पलतक विषघटी रहेगी।
२. किसी भी राशिमें अपना ही नवमांश हो तो वह वर्गोत्तम कहलाता है। जैसे मेषमें मेषका नवमांश तथा वृषमें वृषका नवमांश इत्यादि।
३. सूर्य जिस नक्षत्रमें वर्तमान हो, उसमें ५, ७, ८, १०, १४, १५, १८, १९, २१, २२, २३, २४, २५—इन संख्याओंके किसी भी नक्षत्रमें चन्द्रमा हो तो 'उपग्रहदोष' कहलाता है।
४. सूर्य यदि धनु या मीनमें हो तो द्वितीया, वृष या कुम्भमें हो तो चतुर्थी, कर्क या मेषमें हो तो षष्ठी, कन्या या मिथुनमें हो तो अष्टमी, सिंह या वृश्चिकमें हो तो दशमी तथा तुला या मकरमें हो तो द्वादशी 'दग्ध तिथि' कहलाती है।
५. कुम्भ, मीन, वृष, मिथुन, मेष, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु और कर्क—ये क्रमशः चैत्र आदि मासोंमें 'दग्ध राशियाँ' हैं।
३७० * संक्षिप्त नारदपुराण *
विद्युत् (बिजली), नीहार (कुहरा या पाला), वृष्टि (वर्षा)—ये यदि असमयमें हों तभी दोष समझे जाते हैं। यदि समयपर हों (जैसे जाड़ेके दिनमें पाला पड़े, वर्षा ऋतुमें वर्षा हो तथा सघन मेघमें बिजली चमके, तो सब शुभ ही समझे जाते हैं॥४८१॥ यदि बृहस्पति, शुक्र अथवा बुध इनमेंसे एक भी केन्द्रमें हों तो इन सब दोषोंको नष्ट कर देते हैं। इसमें संशय नहीं है॥४८२॥
(पञ्चशलाका-वेध—) पाँच रेखाएँ पड़ी और पाँच रेखाएँ खड़ी खींचकर दो-दो रेखाएँ कोणोंमें खींचने (बनाने)-से पञ्चशलाका-चक्र¹ बनता है। इस चक्रके ईशान कोणवाली दूसरी रेखामें कृत्तिकाको लिखकर आगे प्रदक्षिण-क्रमसे रोहिणी आदि अभिजित्सहित सम्पूर्ण नक्षत्रोंका उल्लेख करे। जिस रेखामें ग्रह हो, उसी रेखाकी दूसरी ओरवाला नक्षत्र विद्ध² समझा जाता है॥४८३ १/२॥
(लत्तादोष—) सूर्य आदि³ ग्रह क्रमशः अपने आश्रित नक्षत्रसे आगे और पीछे⁴ १२, २२, ३, ७, ६, ५, ८ तथा ९ वें दैनिक नक्षत्रको लातोंसे दूषित करते हैं, इसलिये इसका नाम 'लत्तादोष' है।
(पातदोष—) सूर्य जिस नक्षत्रमें हों उससे आश्लेषा, मघा, रेवती, चित्रा, अनुराधा और श्रवणतककी जितनी संख्या हो, उतनी ही यदि अश्विनीसे दिन-नक्षत्रतक गिननेसे संख्या हो तो वह नक्षत्र पातदोषसे दूषित समझा जाता है॥४८४-४८५ ॥
(परिहार—) सौराष्ट्र (काठियावाड़) और शाल्वदेशमें लत्तादोष वर्जित है। कलिङ्ग (जगन्नाथपुरीसे कृष्णा नदीतकके भूभाग), वङ्ग (बङ्गाल), वाह्लिक (बलख) और कुरु (कुरुक्षेत्र) देशमें पातदोष त्याज्य हैं; अन्य देशोंमें ये दोष त्याज्य नहीं हैं॥४८६-४८७॥ मासदग्ध तिथि तथा दग्ध लग्न—ये मध्यदेश (प्रयागसे पश्चिम, कुरुक्षेत्रसे पूर्व, विन्ध्य और हिमालयके मध्य)में वर्जित हैं। अन्य देशोंमें ये दूषित नहीं हैं॥४८८॥ पङ्गु, अन्ध, काण, लग्न तथा मासोंमें जो शून्य राशियाँ कही गयी हैं, वे गौड़ (बङ्गालसे भुवनेश्वरतक) और मालव (मालवा) देशमें त्याज्य हैं। अन्य देशोंमें निन्दित नहीं हैं॥४८९॥
(विशेष—) अधिक दोषोंसे दुष्ट कालको तो ब्रह्माजी भी शुभ नहीं बना सकते हैं; इसलिये जिसमें थोड़ा दोष और अधिक गुण हों, ऐसा काल ग्रहण करना चाहिये॥४९०॥
(वेदी और मण्डप-) इस प्रकार वर-वधूके लिये शुभप्रद उत्तम समयमें श्रेष्ठ लग्नका निरीक्षण (खोज) करना चाहिये। तदनन्तर एक हाथ ऊँची,
तुला और वृश्चिक—ये दोनों केवल दिनमें तथा धनु और मकर—ये दोनों केवल रात्रिमें 'बधिर' होते हैं। एवं मेष, वृष और सिंह—ये तीनों दिनमें तथा मिथुन, कर्क, कन्या—ये तीनों रात्रिमें 'अन्ध' होते हैं।
दिनमें कुम्भ और रात्रिमें मीन 'पङ्गु' होते हैं।
१. पञ्चशलाकाचक्र—
ध० शृ० पू० उ० रे० अ० भ०
श्र० \ | | | | / कृ०
अ० ——\———|———|———|———|——/—— रो०
उ० ———\——|———|———|——/———-— मृ०
पू० ————\—|———|—/——————- आ०
मू० ————/—|———|—\——————- पु०
आ० ———/——|———|———\———-— पु०
अ० ——/———|———|———|———\—— आ०
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वि० स्वा० चि० ह० उ० पू० म०
२. जैसे—श्रवणमें कोई ग्रह हो तो मघा नक्षत्र विद्ध समझा जायगा।
३. सूर्य, पूर्ण चन्द्र, मङ्गल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु।
४. इनमें सूर्य अपनेसे आगे और पूर्ण चन्द्र पीछे, फिर मङ्गल आगे और बुध पीछेके नक्षत्रोंको दूषित करते हैं। ऐसा ही क्रम आगे भी समझना चाहिये।