संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पूर्वभाग-द्वितीय पाद ३५३
- पूर्वभाग-द्वितीय पाद * ३५३
वृष अर्थात् श्रेष्ठ वृक्ष हैं उनकी उत्पत्ति अश्विनीसे हुई है। भरणीसे यमक (जुड़े हुए दो) वृक्ष, कृत्तिकासे उदुम्बर (गूलर), रोहिणीसे जामुन, मृगशिरासे खैर, आर्द्रासे काली पाकर, पुनर्वसुसे बाँस, पुष्यसे पीपल, आश्लेषासे नागकेसर, मघासे बरगद, पूर्वाफाल्गुनीसे पलाश, उत्तराफाल्गुनीसे रुद्राक्षका वृक्ष, हस्तसे अरिष्ट (रीठीका वृक्ष), चित्रासे श्रीवृक्ष (बेल), स्वातीसे अर्जुन वृक्ष, विशाखासे विकङ्कत (जिसकी लकड़ीसे कलछियाँ बनती हैं), अनुराधासे बकुल (मौलश्री), ज्येष्ठासे विष्टिवृक्ष, मूलसे सर्ज (शालका वृक्ष), पूर्वाषाढ़से वञ्जुल (अशोक), उत्तराषाढ़से कटहल, श्रवणसे आक, धनिष्ठासे शमीवृक्ष, शतभिषासे कदम्ब, पूर्व भाद्रपदसे आम्रवृक्ष, उत्तर भाद्रपदसे पिचुमन्द (नीमका पेड़) तथा रेवतीसे महुआकी उत्पत्ति हुई है। इस प्रकार ये नक्षत्रसम्बन्धी वृक्ष कहे गये हैं॥ २०४-२१०॥
जब जिस नक्षत्रमें शनैश्चर विद्यमान हो, उस समय उस नक्षत्र-सम्बन्धी वृक्षका यत्नपूर्वक पूजन करना चाहिये॥ २११½॥
(योगोंके स्वामी—) यम, विश्वेदेव, चन्द्र, ब्रह्मा, गुरु, चन्द्र, इन्द्र, जल, सर्प, अग्नि, सूर्य, भूमि, रुद्र, ब्रह्मा, वरुण, गणेश, रुद्र, कुबेर, विश्वकर्मा, मित्र, षडानन, सावित्री, कमला, गौरी, अश्विनीकुमार, पितर और अदिति—ये क्रमशः विष्कुम्भ आदि सत्ताईस योगोंके स्वामी हैं॥ २१२½॥
(निन्द्य योग—) वैधृति और व्यतीपात—ये दोनों महापात हैं, इन दोनोंको शुभ कार्योंमें सदा त्याग देना चाहिये। परिघ योगका पूर्वार्ध और वज्रयोगके आरम्भकी तीन घड़ियाँ, गण्ड और अतिगण्डकी छः घड़ी, व्याघात योगकी ९ घड़ी और शूल योगकी ५ घड़ी सब शुभ कार्योंमें निन्दित हैं।
(खार्जूरचक्र—) इन नौ निन्द्य योगों (वैधृति, व्यतीपात, परिघ, विष्कुम्भ, वज्र, गण्ड, अतिगण्ड, व्याघात और शूल)-में क्रमशः पुनर्वसु, मृगशिरा, मघा, आश्लेषा, अश्विनी, मूल, अनुराधा, पुष्य और चित्रा—ये नौ मूर्धा (मस्तक)-के नक्षत्र माने गये हैं। एक ऊर्ध्वरेखा लिखे, फिर उसके ऊपर तेरह तिरछी रेखाएँ अङ्कित करे। यह 'खार्जूरचक्र' कहलाता है। इस चक्रमें ऊपर कहे हुए निन्द्य योगोंमें उनके मूर्धगत नक्षत्रको रेखाके मस्तकके ऊपर लिखकर क्रमशः २८ नक्षत्रोंको लिखे। इसमें यदि सूर्य और चन्द्रमा एक रेखामें विभिन्न भागमें पड़ें तो उन दोनोंका परस्परका दृष्टिपात 'एकार्गल' दोष कहलाता है, जो शुभकार्यमें त्याज्य है, परंतु यदि सूर्य और चन्द्रमामें कोई एक अभिजित्में हो तो वेध-दोष नहीं होता है॥ २१३-२१७½॥
(प्रत्येक योगमें अन्तर्भोग—) १२ पलरहित २ घड़ीके मानसे एक-एक योगमें सत्ताईस योग बीतते हैं॥ २१८½॥
(करणके स्वामी और शुभाशुभ-विभाग—) इन्द्र, ब्रह्मा, मित्र, विश्वकर्मा, भूमि, हरितप्रिया (लक्ष्मी), कीनाश (यम), कलि, रुद्र, सर्प तथा मरुत्—ये ग्यारह देवता, क्रमशः बव आदि (बव, बालव, कौलव, तैतिल, गर, वणिज, विष्टि, शकुनि, चतुष्पद, नाग और किंस्तुघ्न—इन) ग्यारह करणोंके स्वामी हैं। इनमें बवसे लेकर छः करण शुभ होते हैं। किंतु 'विष्टि' नामक करण क्रमसे आया हो या विपरीतक्रमसे, किसी भी दशामें वह मङ्गलकार्यमें शुभ नहीं है॥ २१९-२२०½॥
(विष्टिके अङ्गोंमें घटी और फल—) विष्टिके मुखमें पाँच घटी, गलेमें एक, हृदयमें ग्यारह, नाभिमें चार, कटिमें छः और पुच्छमें तीन घड़ियाँ होती हैं। मुखकी घड़ियोंमें कार्य आरम्भ करनेसे कार्यकी हानि होती है। गलेकी घड़ीमें मृत्यु, हृदयकी घड़ीमें निर्धनता, कटिकी घड़ीमें उन्मत्तता, नाभिकी घड़ीमें पतन तथा पुच्छकी घड़ीमें कार्य करनेसे निश्चय ही विजय (सिद्धि) प्राप्त होती है। भद्राके बाद जो चार स्थिर करण हैं, वे मध्यम
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हैं, विशेषतः नाग और चतुष्पद ॥ २२१-२२३ ॥
( मुहूर्त-कथन— ) दिनमें क्रमशः रुद्र, सर्प, मित्र, पितर, वसु, जल, विश्वेदेव, विधि (अभिजित्), ब्रह्मा, इन्द्र, इन्द्राग्नि, राक्षस, वरुण, अर्यमा और भग—ये पंद्रह मुहूर्त जानने चाहिये। रात्रिमें शिव, अजपाद, अहिर्बुध्न्य, पूषा, अश्विनीकुमार, यम, अग्नि, ब्रह्मा, चन्द्रमा, अदिति, बृहस्पति, विष्णु, सूर्य, विश्वकर्मा और वायु—ये क्रमशः पंद्रह मुहूर्त व्यतीत होते हैं। दिनमानका पंद्रहवाँ भाग दिनके मुहूर्तका मान है और रात्रिमानका पंद्रहवाँ भाग रात्रिके मुहूर्तका मान समझना चाहिये; इनसे दिन तथा रात्रिमें क्षण-नक्षत्रका विचार करे* ॥ २२४-२२६ \frac{१}{२} ॥
( वारोंमें निन्द्य मुहूर्त— ) रविवारको अर्यमा, सोमवारको ब्राह्म तथा राक्षस, मङ्गलवारको पितर और अग्नि, बुधवारको अभिजित्, गुरुवारको राक्षस और जल, शुक्रवारको ब्राह्म और पितर तथा शनिवारको शिव और सर्प मुहूर्त निन्द्य माने गये हैं; इसलिये इन्हें शुभ कार्योंमें त्याग देना चाहिये॥ २२७-२२८॥
( मुहूर्तका विशेष प्रयोजन— ) जिस-जिस नक्षत्रमें यात्रा आदि जो-जो कर्म शुभ या अशुभ कहे गये हैं; वे कार्य उस-उस नक्षत्रके स्वामीके मुहूर्तमें भी शुभ या अशुभ होते हैं। ऐसा समझकर उस मुहूर्तमें सदा वैसे कार्य करने या त्याग देने चाहिये ॥ २२९ ॥
( भूकम्पादि संज्ञाओंसे युक्त नक्षत्र— ) सूर्य जिस नक्षत्रमें हो, उससे सातवें नक्षत्रकी भूकम्प, पाँचवेंकी विद्युत्, आठवेंकी शूल, दसवेंकी अशनि, अठारहवेंकी केतु, पंद्रहवेंकी दण्ड, उन्नीसवेंकी उल्का, चौदहवेंकी निर्घातपात, इक्कीसवेंकी मोह, बाईसवेंकी निर्घात, तेईसवेंकी कम्प, चौबीसवेंकी कुलिश तथा पचीसवेंकी परिवेश संज्ञा समझनी चाहिये; इन संज्ञाओंसे युक्त चन्द्र-नक्षत्रोंमें शुभ कर्म नहीं करने चाहिये ॥ २३०-२३२ \frac{१}{२} ॥
सूर्यके नक्षत्रसे आश्लेषा, मघा, चित्रा, अनुराधा, रेवती तथा श्रवणतककी जितनी संख्या हो, उतनी ही यदि अश्विनीसे चन्द्र-नक्षत्रतककी संख्या हो तो उसपर दुष्टयोगका सम्पात अर्थात् रुद्रके प्रचण्ड अस्त्रका प्रहार होता है। अतः उसका नाम ‘चण्डीशचण्डायुध’ योग है। उसमें शुभ कर्म नहीं करना चाहिये ॥ २३३-२३४ \frac{१}{२} ॥
( क्रकचयोग— ) प्रतिपदादि तिथिकी तथा रवि आदि वारकी संख्या मिलानेसे यदि १३ हो तो वह क्रकचयोग होता है जो शुभ कार्यमें अत्यन्त निन्दित माना गया है ॥ २३५ \frac{१}{२} ॥
( संवर्तयोग— ) रविवारको सप्तमी और बुधवारको प्रतिपदा हो तो ‘संवर्तयोग’ जानना चाहिये। यह शुभ कार्यको नष्ट करनेवाला है ॥ २३६ \frac{१}{२} ॥
( आनन्दादि योग— ) १ आनन्द, २ कालदण्ड, ३ धूम्र, ४ धाता, ५ सुधाकर (सौम्य), ६ ध्वाङ्क्ष, ७ केतु, ८ श्रीवत्स, ९ वज्र, १० मुद्गर, ११ छत्र, १२ मित्र, १३ मानस, १४ पद्म, १५ लुम्ब, १६ उत्पात, १७ मृत्यु, १८ काण, १९ सिद्धि, २० शुभ, २१ अमृत, २२ मुसल, २३ अन्तक (गद), २४ कुञ्जर (मातङ्ग), २५ राक्षस, २६ चर, २७ सुस्थिर और २८ वर्धमान—ये क्रमशः पठित २८ योग अपने-अपने नामके समान ही फल देनेवाले कहे गये हैं।
( इन योगोंको जाननेकी रीति— ) रविवारको अश्विनी नक्षत्रसे, सोमवारको मृगशिरासे, मङ्गलवारको आश्लेषासे, बुधवारको हस्तसे, गुरुवारको अनुराधासे, शुक्रवारको उत्तराषाढ़से और शनिवारको
* १. उदाहरण— जिस समय ब्रह्माका मुहूर्त हो, उस समय उसीका क्षण-नक्षत्र होता है। जैसे—दिनमें नवाँ मुहूर्त ब्रह्माका है और दिनमान ३० घड़ीका है तो १६ घड़ीके बाद १८ घड़ीतक ब्रह्माजीके ही नक्षत्र (रोहिणी)-को क्षण-नक्षत्र समझना चाहिये। इसलिये दिनमें नवम मुहूर्त ‘ब्राह्म’ या ‘रौहिण’ कहलाता है, जो श्राद्धमें श्रेष्ठ माना गया है।