संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पूर्वभाग-द्वितीय पाद ३२३
- पूर्वभाग-द्वितीय पाद * ३२३
योगमें जन्म लेनेवाला भोगी, सुखी, धनवान्,
दाता और विषयोंसे निःस्पृह होता है तथा
'केमद्रुम' योगमें उत्पन्न मनुष्य अत्यन्त मलिन,
दुःखी, नीच और निर्धन होता है॥२०१-२०२॥
(द्विग्रहयोगफल—) मुने! सूर्य यदि चन्द्रमासे
युक्त हो तो भाँति-भाँतिके यन्त्र (मशीन) और
पत्थरके कार्यमें कुशल बनाता है। मङ्गलसे युक्त
हो तो वह बालकको नीच कर्ममें लगाता है,
बुधसे युक्त हो तो यशस्वी, कार्यकुशल, विद्वान्
एवं धनी बनाता है, गुरुसे युक्त हो तो दूसरोंके
कार्य करनेवाला, शुक्रसे युक्त हो तो धातुओं
(ताँबा आदि)-के कार्यमें निपुण तथा पात्र-
निर्माण-कलाका जानकार बनाता है॥ २०३-२०४॥
चन्द्रमा यदि मङ्गलसे युक्त हो तो जातक कूट
वस्तु (नकली सामान), स्त्री और आसव-
अरिष्टादिका क्रय-विक्रय करनेवाला तथा माताका
द्रोही होता है। बुधके साथ चन्द्रमा हो तो उत्पन्न
शिशुको धनी, कार्यकुशल तथा विनय और
कीर्तिसे युक्त करता है; गुरुसे युक्त हो तो
चञ्चलबुद्धि, कुलमें मुख्य, पराक्रमी और अधिक
धनवान् बनाता है। मुने! यदि शुक्रसे युक्त चन्द्रमा
हो तो बालकको वस्त्रनिर्माण-कलाका ज्ञाता
बनाता है और यदि शनिसे युक्त हो तो वह
बालकको ऐसी स्त्रीके पेटसे उत्पन्न कराता है,
जिसने पतिके मरनेपर या जीते-जी दूसरे पतिसे
सम्बन्ध स्थापित कर लिया हो॥ २०५-२०६॥
मङ्गल यदि बुधसे युक्त हो तो उत्पन्न हुआ
बालक बाहुसे युद्ध करनेवाला (पहलवान) होता
है। गुरुसे युक्त हो तो नगरका मालिक, शुक्रसे
युक्त हो तो जूआ खेलनेवाला तथा गायोंको
पालनेवाला और शनिसे युक्त हो तो मिथ्यावादी
तथा जुआरी होता है॥ २०७॥
नारद! बुध यदि बृहस्पतिसे युक्त हो तो
उत्पन्न शिशु नृत्य और सङ्गीतका प्रेमी होता है।
शुक्रसे युक्त हो तो मायावी और शनिसे युक्त हो
तो उत्पन्न मनुष्य लोभी और क्रूर होता है॥ २०८॥
गुरु यदि शुक्रसे युक्त हो तो मनुष्य विद्वान्,
शनिसे युक्त हो तो रसोइया अथवा घड़ा बनानेवाला
(कुम्हार) होता है। शुक्र यदि शनिके साथ हो तो
मन्द दृष्टिवाला तथा स्त्रीके आश्रयसे धनोपार्जन
करनेवाला होता है॥ २०९॥
(प्रव्रज्यायोग—) यदि जन्म-समयमें चार
या चारसे अधिक ग्रह एक स्थानमें बलवान् हों
तो मनुष्य गृहत्यागी संन्यासी होता है। उन ग्रहोंमें
मङ्गल, बुध, गुरु, चन्द्रमा, शुक्र, शनि और सूर्य
बली हों तो मनुष्य क्रमशः शाक्य (रक्त-
वस्त्रधारी बौद्ध), आजीवक (दण्डी), भिक्षु,
(यती), वृद्ध (वृद्धश्रावक), चरक (चक्रधारी),
अही (नग्न) और फलाहारी होता है। प्रव्रज्याकारक
ग्रह यदि अन्य ग्रहसे पराजित हो तो मनुष्य उस
प्रव्रज्यासे गिर जाता है। यदि प्रव्रज्याकारक ग्रह
सूर्य-सान्निध्यवश अस्त हो तो मनुष्य उसकी
दीक्षा ही नहीं लेता और यदि वह ग्रह बलवान्
हो तो उसकी 'प्रव्रज्या' में प्रीति रहती है।
जन्मराशीशको यदि अन्य ग्रह नहीं देखता हो
और जन्मराशीश यदि शनिको देखता हो अथवा
निर्बल जन्मराशीशको शनि देखता हो या शनिके
द्रेष्काण अथवा मङ्गल या शनिके नवमांशमें
चन्द्रमा हो और उसपर शनिकी दृष्टि हो तो इन
योगोंमें विरक्त होकर गृहत्याग करनेवाला पुरुष
संन्यास-धर्मकी दीक्षा लेता है॥ २१०-२१३॥
(अश्विन्यादि नक्षत्रोंमें जन्मका फल—)
अश्विनी नक्षत्रमें जन्म हो तो बालक सुन्दर रूपवाला
और भूषणप्रिय होता है। भरणीमें उत्पन्न शिशु
सब कार्य करनेमें समर्थ और सत्यवक्ता होता है।
कृत्तिकामें जन्म लेनेवाला अमिताहारी, परस्त्रीमें
आसक्त, स्थिरबुद्धि और प्रियवक्ता होता है। रोहिणीमें
पैदा हुआ मनुष्य धनवान्; मृगशिरामें भोगी; आर्द्रामें
हिंसास्वभाववाला, शठ और अपराधी; पुनर्वसुमें
जितेन्द्रिय, रोगी और सुशील तथा पुष्यमें कवि
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और सुखी होता है॥ २१४-२१५॥ आश्लेषा नक्षत्रमें उत्पन्न मनुष्य धूर्त, शठ, कृतघ्न, नीच और खान-पानका विचार न रखनेवाला होता है। मघामें भोगी, धनी तथा देवादिका भक्त होता है। पूर्वा फाल्गुनीमें दाता और प्रियवक्ता होता है। उत्तरा फाल्गुनीमें धनी और भोगी; हस्तमें चोरस्वभाव, ढीठ और निर्लज्ज तथा चित्रामें नाना प्रकारके वस्त्र धारण करनेवाला और सुन्दर नेत्रोंसे युक्त होता है। स्वातीमें जन्म लेनेवाला मनुष्य धर्मात्मा और दयालु होता है। विशाखामें लोभी, चतुर और क्रोधी; अनुराधामें भ्रमणशील और विदेशवासी; ज्येष्ठामें धर्मात्मा और संतोषी तथा मूलमें धनीमानी और सुखी होता है। पूर्वाषाढ़में मानी, सुखी और हृष्ट; उत्तराषाढ़में विनयी और धर्मात्मा; श्रवणमें धनी, सुखी और लोकमें विख्यात तथा धनिष्ठामें दानी, शूरवीर और धनवान् होता है। शतभिषामें शत्रुको जीतनेवाला और व्यसनमें आसक्त; पूर्वभाद्रपदमें स्त्रीके वशीभूत और धनवान्; उत्तरभाद्रपदमें वक्ता, सुखी और सुन्दर तथा रेवतीमें जन्म लेनेवाला शूरवीर, धनवान् और पवित्र हृदयवाला होता है॥ २१६-२२०॥
(मेषादि चन्द्रराशिमें जन्मका फल—) मेषराशिमें जन्म लेनेवाला कामी, शूरवीर और कृतज्ञ; वृषमें सुन्दर, दानी और क्षमावान्; मिथुनमें स्त्रीभोगासक्त, द्यूतविद्याको जाननेवाला तथा कर्कराशिमें स्त्रीके वशीभूत और छोटे शरीरवाला होता है। सिंहराशिमें स्त्रीद्वेषी, क्रोधी, मानी, पराक्रमी, स्थिरबुद्धि और सुखी होता है। कन्याराशिमें धर्मात्मा, कोमल शरीरवाला तथा सुबुद्धि होता है। तुलाराशिमें उत्पन्न पुरुष पण्डित, ऊँचे कदवाला और धनवान् होता है। वृश्चिकराशिमें जन्म लेनेवाला रोगी, लोकमें पूज्य और क्षत (आघात)-युक्त होता है। धनुमें जन्म लेनेवाला कवि, शिल्पज्ञ और धनवान्; मकरमें कार्य करनेमें अनुत्साही, व्यर्थ घूमनेवाला और सुन्दर नेत्रोंसे युक्त; कुम्भमें परस्त्री और परधन हरण करनेके स्वभाववाला तथा मीनमें धनु-सदृश (कवि और शिल्पज्ञ) होता है॥ २२१-२२३॥
यदि चन्द्रमाकी राशि बली हो तथा राशिका स्वामी और चन्द्रमा दोनों बलवान् हों तो ऊपर कहे हुए फल पूर्णरूपसे संघटित होते हैं—ऐसा समझना चाहिये। अन्यथा विपरीत फल (अर्थात् निर्बल हो तो फलका अभाव या बलके अनुसार फलमें भी तारतम्य) जानना चाहिये। इसी प्रकार अन्य ग्रहोंकी राशिके अनुसार फलका विचार करना चाहिये॥ २२४॥
(सूर्यादि ग्रह-राशि-फल—) सूर्य यदि मेषराशिमें हो तो जातक लोकमें विख्यात होता है। वृषमें हो तो स्त्रीका द्वेषी, मिथुनमें हो तो धनवान्, कर्कमें हो तो उग्र स्वभाववाला, सिंहमें हो तो मूर्ख, कन्यामें हो तो कवि, तुलामें हो तो कलवार, वृश्चिकमें हो तो धनवान्, धनुमें हो तो लोकपूज्य, मकरमें हो तो लोभी, कुम्भमें हो तो निर्धन और मीनमें हो तो जातक सुखसे रहित होता है॥ २२५॥
मङ्गल यदि सिंहमें हो तो जातक निर्धन, कर्कमें हो तो धनवान्, स्वराशि (मेष, वृश्चिक)-में हो तो भ्रमणशील, बुधराशि (कन्या-मिथुन)-में हो तो कृतज्ञ, गुरुराशि (धनु-मीन)-में हो तो विख्यात, शुक्रराशि (वृष-तुला)-में हो तो परस्त्रीमें आसक्त, मकरमें हो तो बहुत पुत्र और धनवाला तथा कुम्भमें हो तो दुःखी, दुष्ट और मिथ्यास्वभाववाला होता है॥ २२६ १/२॥
बुध यदि सूर्यकी राशि (सिंह)-में हो तो स्त्रीका द्वेषी, चन्द्रराशि (कर्क)-में हो तो अपने परिजनोंका द्वेषी, मङ्गलकी राशि (मेष-वृश्चिक)-में हो तो निर्धन और सत्त्वहीन, अपनी राशि (मिथुन-कन्या)-में हो तो बुद्धिमान् और धनवान्, गुरुकी राशि (धनु-मीन)-में हो तो मान और धनसे युक्त, शुक्रकी राशि (वृष-तुला)-में हो तो