संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पूर्वभाग-द्वितीय पाद ३०१
- पूर्वभाग-द्वितीय पाद * ३०१
होता है और जोड़नेसे अन्तकाल होता हैं। पातके आरम्भकालसे अन्तकालतक जो मध्यका काल है, वह प्रज्वलित अग्निके समान अत्यन्त दारुण (भयानक) होता है। जो सब कार्यमें निषिद्ध है। ब्रह्मन्! इस प्रकार मैंने गणितस्कन्धमें संक्षेपसे कुछ (उपयोगी) विषयोंका प्रतिपादन किया है। अब (अगले अध्यायमें) राशियोंके संज्ञादि कथनपूर्वक जातकका वर्णन करूँगा॥ १८४-१८५॥
॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने द्वितीयपादे ज्योतिषगणितवर्णनं नाम चतुःपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५४ ॥
त्रिसकन्ध ज्योतिषका जातकस्कन्ध
सनन्दनजी कहते हैं—नारद! मेष आदि राशियाँ कालपुरुषके क्रमशः मस्तक, मुख, बाहु, हृदय, उदर, कटि, वस्ति (पेंड़), लिङ्ग, ऊरु, जानु, जङ्घा और दोनों चरण हैं॥ १॥ मङ्गल, शुक्र, बुध, चन्द्रमा, सूर्य, बुध, शुक्र, मङ्गल, गुरु, शनि, शनि तथा गुरु—ये क्रमशः मेष आदि राशियोंके अधीश्वर (स्वामी) हैं॥ २॥ विषम राशियोंमें पहले सूर्यकी, फिर चन्द्रमाकी होरा बीतती है तथा सम राशियोंमें पहले चन्द्रमाकी, फिर सूर्यकी होरा बीतती है। आदिके दश अंशतक उसी राशिका द्रेष्काण होता है और उस राशिके स्वामी ही उस द्रेष्काणके स्वामी होते हैं। ग्यारहसे बीसवें अंशतक उस राशिसे पाँचवीं राशिका द्रेष्काण होता है और उसके स्वामी ही उस द्रेष्काणके स्वामी होते हैं; इसी प्रकार अन्तिम दश अंश (अर्थात् २१ से ३० वें अंशतक) उस राशिसे नवम राशिका द्रेष्काण होता है और उसीके स्वामी उस द्रेष्काणके स्वामी कहे गये हैं॥ ३॥ विषम राशियोंमें पहले पाँच अंशतक मङ्गल, फिर पाँच अंशतक शनि, फिर आठ अंशतक बृहस्पति, फिर सात अंशतक बुध और अन्तिम पाँच अंशतक शुक्र त्रिंशांशेश कहे गये हैं। सम राशियोंमें इसके विपरीत क्रमसे पहले पाँच अंशतक शुक्र, फिर सात अंशतक बुध, फिर आठ अंशतक बृहस्पति, फिर पाँच अंशतक शनि और अन्तिम पाँच अंशतक मङ्गल त्रिंशांशेश बताये गये हैं॥ ४॥ मेष आदि राशियोंके नवमांश मेष, मकर, तुला और कर्कसे प्रारम्भ होते हैं (यथा—मेष, सिंह, धनुके मेषसे; वृष, कन्या, मकरके मकरसे; मिथुन, तुला और कुम्भके तुलासे तथा कर्क, वृश्चिक और मीनके नवमांश कर्कसे चलते हैं।) २ १/२ अंशके द्वादशांश होते हैं, जो अपनी राशिसे प्रारम्भ होकर अन्तिम राशिपर पूरे होते हैं और उन-उन राशियोंके स्वामी ही उन द्वादशांशोंके स्वामी कहे गये हैं। इस प्रकार ये राशि, होरा आदि षड्वर्ग² कहलाते हैं॥ ५॥
वृष, मेष, धनु, कर्क, मिथुन और मकर—ये रात्रिसंज्ञक हैं अर्थात् रातमें बली माने गये हैं—ये पृष्ठभागसे उदय लेनेके कारण पृष्ठोदय
१. क्रान्ति-साम्य-साधनमें कथित सूर्यकी गति ६०।१५ द्वारा सूर्यविम्ब १०।५७ हुआ एवं चन्द्रगति ७८३।१५ द्वारा चन्द्रविम्ब १०।३५ हुआ। इन दोनोंके योग २०।९२ के आधे १०।४६ को ६० से गुणा कर गुणनफल ६४६ में सूर्य और चन्द्रमाकी गतिके अन्तर ७२३ से भाग देनेपर लब्धि (स्वल्पान्तरसे) १ घड़ी हुई; यह पातकालकी स्थित्यर्थ घड़ी हुई। इसको पातमध्यकाल ४४।१५ में घटानेसे शेष ४३।१५ आरम्भकाल एवं जोड़नेसे ४५।१५ पातका अन्तकाल हुआ।
२. गृह (राशि), होरा, द्रेष्काण, नवमांश, द्वादशांश तथा त्रिंशांश—ये षड्वर्ग कहे गये हैं। जिन राशियोंके जो स्वामी हैं, वे ही राशियाँ उन ग्रहोंके घर हैं। एक राशिमें ३० अंश होते हैं। उनमेंसे पंद्रह अंशकी एक होरा होती है। एक राशिमें दो होराएँ होती हैं। दश अंशका द्रेष्काण होता है, अतः एक राशिमें तीन द्रेष्काण व्यतीत होते हैं। ३ १/२
३०२ * संक्षिप्त नारदपुराण *
कहलाते हैं (किंतु मिथुन पृष्ठोदय नहीं है)। शेष राशियोंकी दिन संज्ञा है (वे दिनमें बली और शीर्षोदय माने गये हैं); मीन राशिको उभयोदय कहा गया है। मेष आदि राशियाँ क्रमसे क्रूर और सौम्य (अर्थात् मेष आदि विषम राशियाँ क्रूर और वृष आदि सम राशियाँ सौम्य) हैं॥६॥ मेष आदि राशियाँ क्रमसे पुरुष, स्त्री और नपुंसक होती हैं (नवीन मतमें दो विभाग हैं, मेष आदि विषम राशियाँ पुरुष और वृष आदि सम राशियाँ स्त्री हैं)। इसी प्रकार मेष आदि राशियाँ क्रमशः चर, स्थिर और द्विस्वभावमें विभाजित हैं (अर्थात् मेष चर, वृष स्थिर और मिथुन द्विस्वभाव हैं, कर्क चर, सिंह स्थिर और कन्या द्विस्वभाव हैं। इसी क्रमसे शेष राशियोंको भी समझे)। मेष आदि राशियाँ पूर्व आदि दिशाओंमें स्थित हैं (यथा—मेष, सिंह, धनु पूर्वमें; वृष कन्या, मकर दक्षिणमें; मिथुन, तुला, कुम्भ पश्चिममें और कर्क, वृश्चिक, मीन उत्तरमें स्थित हैं)। ये सब अपनी-अपनी दिशामें रहती हैं॥७॥ सूर्यका उच्च मेष, चन्द्रमाका वृष, मङ्गलका मकर, बुधका कन्या, गुरुका कर्क, शुक्रका मीन तथा शनिका उच्च तुला है। सूर्यका मेषमें १० अंश, चन्द्रमाका वृषमें ३ अंश, मङ्गलका मकरमें २८ अंश, बुधका कन्यामें १५ अंश, गुरुका कर्कमें ५ अंश, शुक्रका मीनमें २७ अंश तथा शनिका तुलामें २० अंश उच्चांश (परमोच्च) है॥८॥ सूर्यादि ग्रहोंकी जो उच्च राशियाँ कही गयी हैं, उनसे सातवीं राशि उन ग्रहोंका नीच स्थान है।
अंशका एक नवमांश होता है। राशिमें नौ नवमांश होते हैं। २ १/२ अंशका एक द्वादशांश होता है; राशिमें बारह द्वादशांश होते हैं। एक-एक अंशका त्रिंशांश होता है, इसीलिये उसका यह नाम है।
राशि-स्वामी-ज्ञानार्थ-चक्र
| राशि | मेष | वृष | मिथुन | कर्क | सिंह | कन्या | तुला | वृश्चिक | धनु | मकर | कुम्भ | मीन |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स्वामी | मङ्गल | शुक्र | बुध | चन्द्र | सूर्य | बुध | शुक्र | मङ्गल | गुरु | शनि | शनि | गुरु |
(राश्यर्ध) होरा-ज्ञानार्थ-चक्र
| होरा-अंश | मेष | वृष | मिथुन | कर्क | सिंह | कन्या | तुला | वृश्चिक | धनु | मकर | कुम्भ | मीन |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| १-१५ तक | रवि | चन्द्र | रवि | चन्द्र | रवि | चन्द्र | रवि | चन्द्र | रवि | चन्द्र | रवि | चन्द्र |
| १६-३० तक | चन्द्र | रवि | चन्द | रवि | चन्द्र | रवि | चन्द्र | रवि | चन्द्र | रवि | चन्द्र | रवि |
(राशितृतीयांश) द्रेष्काण-ज्ञानार्थ-चक्र
| मेष | वृष | मिथुन | कर्क | सिंह | कन्या | तुला | वृश्चिक | धनु | मकर | कुम्भ | मीन | ||
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| १-१० | १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | राशि |
| तक | मङ्गल | शुक्र | बुध | चन्द्र | सूर्य | बुध | शुक्र | मङ्गल | गुरु | शनि | शनि | गुरु | स्वामी |
| ११-२० | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १ | २ | ३ | ४ | राशि |
| तक | सूर्य | बुध | शुक्र | मङ्गल | गुरु | शनि | शनि | गुरु | मङ्गल | शुक्र | बुध | चन्द्र | स्वामी |
| २१-३० | ९ | १० | ११ | १२ | १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | राशि |
| तक | गुरु | शनि | शनि | गुरु | मङ्गल | शुक्र | बुध | चन्द्र | सूर्य | बुध | शुक्र | मङ्गल | स्वामी |