संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पूर्वभाग-द्वितीय पाद २८९
- पूर्वभाग-द्वितीय पाद * २८९
सूचक होती है¹ ॥१३६-१३७॥
स्वाक्षार्कनतभागानां दिक्साम्येऽन्तरमन्यथा।
दिग्भेदेऽपक्रमः शेषस्तस्य ज्या त्रिज्यया हता ॥१३८॥
परमापक्रमज्याप्ता चापं मेषादिगो रविः।
कर्क्यादौ प्रोज्झ्य चक्रार्द्धात्तु लादौ भार्धसंयुतात् ॥१३९॥
मृगादौ प्रोज्झ्य चक्रात्तु मध्याह्नेऽर्कः स्फुटो भवेत्।
तन्मान्दमसकृद्रामं फलं मध्यो दिवाकरः ॥ १४०॥
( मध्याह्न-छायासे-सूर्यसाधन— ) अपने 'अक्षांश' और मध्याह्नकालिक सूर्यके 'नतांश' दोनों एक दिशाके हों तो अन्तर करनेसे और यदि भिन्न दिशाके हों तो योग करनेसे जो फल हो, वह सूर्यकी 'क्रान्ति' होती है। 'क्रान्तिज्या' को 'त्रिज्या' से गुणा करके उसमें 'परमक्रान्तिज्या' (१३९७)-से भाग देनेपर लब्धि सूर्यकी 'भुजज्या' होती है। उसके चाप बनाकर मेषादि ३ राशिमें सूर्य हों तो वही स्पष्ट सूर्य होता है²। कर्कादि ३ राशिमें हों तो उस चापको ६ राशिमें घटानेसे, तुलादि ३ राशिमें हों तो ६ राशिमें जोड़नेसे और मकरादि ३ राशिमें हों तो १२ राशिमें घटानेसे जो योग या अन्तर हो, वह मध्याह्नमें स्पष्ट सूर्य होता है। उस स्पष्ट सूर्यसे विपरीत क्रियाद्वारा मन्दफलसाधन कर बार-बार संस्कार करनेसे मध्यम सूर्यका ज्ञान होता है ॥ १३८–१४०॥
ग्रहोदयाप्राणहता खखाष्टैकोद्धृता गतिः।
चक्रासवो लब्धयुताः स्वाहोरात्रासवः स्मृताः ॥ १४१ ॥
(ग्रहोंके अहोरात्र-मान— ) जिस राशिमें तत्काल ग्रह हो, उस राशिके उदयमानसे उस ग्रहकी गतिको गुणा करके उसमें १८०० से भाग देकर लब्ध असुको 'अहोरात्रासु' (२१६००)-में जोड़नेपर उस ग्रहका अहोरात्रमान होता है। (असुसे पल और घड़ी बना लेनी चाहिये।)³ ॥ १४१ ॥
१. यदि मध्याह्नकालिक राश्यादि ०।९।५१ सायन सूर्य है तो उस दिन गोरखपुरमें मध्याह्नकालिक छायाका प्रमाण क्या होगा ?
उत्तर—सायन सूर्य ०।९।५१ की भुजकला ५९१ की ज्या ५८७ को परमक्रान्तिज्या १३९७ से गुणा करके गुणनफल ८२००३९ में त्रिज्या ३४३८ का भाग देनेसे लब्धि सूर्यकी क्रान्तिज्या २३८ कलाका चाप भी स्वल्पान्तरसे इतना ही हुआ। अतः इसके अंश बनानेसे ३।५८ यह सूर्यकी अंशादि क्रान्ति सूर्यके उत्तर गोलमें होनेके कारण उत्तरकी हुई। अतः अक्षांश २६।२६ और क्रान्त्यंश ३।५८ का अन्तर करनेसे २२।२८ यह नतांश हुआ। इसको ९० अंशमें घटानेसे नतांशकी कोटि ६७।३२ हुई। नतांशकी भुजज्या १३०८ और कोटिज्या ३१७८ हुई। भुजज्या १३०८ को १२ से गुणा कर गुणनफल १५६९६ में कोटिज्यासे भाग देनेपर लब्धि स्वल्पान्तरसे ५ अङ्गुल मध्याह्नकालिक छायाका प्रमाण हुआ।
२. गोरखपुरमें सायन मेष-संक्रान्तिके बाद वैशाख कृष्णपक्षमें यदि मध्याह्नके समय १२ अङ्गुल शंकुकी छाया ५ अङ्गुल उत्तर दिशाकी है तो उस दिन राश्यादि स्पष्ट सूर्य क्या होगा ?
उत्तर—छाया ५ के वर्ग २५ में शंकु १२ का वर्ग १४४ जोड़नेसे १६९ हुआ। इसका वर्गमूल १३ छाया-कर्ण हुआ। छाया ५ को त्रिज्यासे गुणा करके गुणनफल ३४३८×५=१७१९० छाया कर्ण १३ का भाग देनेसे लब्धि १३२२ सूर्यकी नतज्या हुई। इसका चाप १३५८ हुआ। इसको अंशात्मक बनानेसे २२।३८ सूर्यका नतांश हुआ। यह उत्तर छाया होनेके कारण दक्षिण दिशाका हुआ। अतः इसको गोरखपुरके अक्षांश २६।२६ में घटानेसे ३।४८ यह सूर्यकी क्रान्ति हुई, इसकी कला २२८ की ज्या भी इतनी ही हुई। इस क्रान्तिज्या २२८ को त्रिज्यासे गुणा करके गुणनफलमें परमक्रान्तिज्या १३९७ से भाग देनेपर लब्धि ५६१ सूर्यकी भुजज्या हुई। इसकी चापकला ५६३ को अंशादि बनानेसे ०।९।२३ राश्यादि सूर्य हुआ, यही मेषादि ३ राशिके भीतर होनेके कारण उस दिन मध्याह्नकालिक सायनसूर्य हुआ।
३. जैसे स्पष्ट सूर्य ०।९।५१।१५ हो, उसकी गतिकला ५८ हो तो उसको मेषके स्वदेशोदयमान १३१० असुसे गुणा करके गुणनफल ७५९८० में १८०० से भाग देनेपर लब्धि ४२ असु हुई। उसको अहोरात्रासु (२१६००) में जोड़नेसे २१६४२ असु सूर्यके अहोरात्रका प्रमाण हुआ। इसका पल बनानेसे ३६०७ अर्थात् नाक्षत्र अहोरात्रसे सूर्यका
२९० * संक्षिप्त नारदपुराण *
त्रिभद्युकर्णादर्द्धगुणाः स्वाहोरात्रार्द्धभाजिताः।
क्रमादेकद्वित्रिभज्यास्तच्चापानि पृथक् पृथक्॥ १४२॥
स्वाधोऽधः प्रविशोध्याथ मेषाल्लङ्कोदयासवः।
खागाष्टयोऽर्थगोऽगैकाः शरत्र्यङ्केहिमांशवः॥ १४३॥
स्वदेशचरखण्डोना भवन्तीष्टोदयासवः।
व्यस्ता व्यस्तैर्युताः स्वैः स्वैः कर्कटाद्यास्ततस्त्रयः॥ १४४॥
उत्क्रमेण षडेवैते भवन्तीष्टास्तुलादयः।
राशियोंके उदयमान— १ राशि, २ राशि, ३ राशिकी ज्याको पृथक्-पृथक् 'परमाल्पद्युज्या' (परमक्रान्तिकी कोटिज्या)-से गुणा करके उसमें अपनी-अपनी द्युज्या (क्रान्तिकोटिज्या) से भाग देकर लब्धियोंके चाप बनावे। उनमें प्रथम चाप मेषका उदय (लङ्कोदय)-मान होता है। प्रथम चापको द्वितीय चापमें घटानेपर शेष वृषका उदयमान होता है एवं द्वितीय चापको तृतीय चापमें घटाकर जो शेष रहे, वह मिथुनका लङ्कोदयमान होता है। यथा—१६७० असु मेषका, १७९५ वृषका तथा १९३५ मिथुनका सिद्ध लङ्कोदयमान हैं। इन तीनोंमें क्रमसे अपने देशीय तीनों चरखण्डोंको घटावे तो क्रमशः तीनों अपने देशके मेष आदि तीन राशियोंके उदयमान होते हैं। पुनः उन्हीं तीनों लङ्कोदयमानोंको उत्क्रमसे रखकर—इन तीनोंमें अपने देशके तीनों चरखण्डोंको उत्क्रमसे जोड़नेपर कर्क आदि ३ राशियोंके स्वदेशोदयमान होते हैं एवं मेषादि कन्यापर्यन्त ६ राशियोंके उदयमान सिद्ध होते हैं। पुनः ये ही उत्क्रमसे तुलादि ६ राशियोंके मान होते हैं॥ १४२—१४४ १/२ ॥
गतभोग्यासवः कार्याः सायनात् स्वेष्टभास्करात्॥ १४५॥
अहोरात्र ७ पल अधिक हुआ। इसी प्रकार सब ग्रहोंके अहोरात्रमान समझे।
१. राशियोंके लङ्कोदयमान-साधनका उदाहरण—एक राशि (१८०० कला)-की ज्या १७१९ उसकी द्युज्या ३३५१ तथा परमाल्पद्युज्या ३१३९ कला है तो एक राशिज्या १७१९ को परमाल्पद्युज्या ३१३९ से गुणा करके गुणनफल ५३९५९४१ में एक राशिकी द्युज्या ३३५१ से भाग देकर लब्धि एक राशि उदयज्या १६१० हुई। इसका चाप मेषका उदयासु स्वल्पान्तरसे १६७० हुआ। इसी प्रकार आगे अपनी-अपनी ज्या और द्युज्यासे साधन करके राशियोंके उदयासु लिखे गये हैं। यथा—
| लङ्कोदयासु | चरासु | स्वदेशोदयासु | ||||
|---|---|---|---|---|---|---|
| मेष | १६७० | - | ३६० | = | १३१० | मीन |
| वृष | १७९५ | - | २८८ | = | १५०७ | कुम्भ |
| मिथुन | १९३५ | - | १२० | = | १८१५ | मकर |
| कर्क | २९३५ | + | १२० | = | ३०५५ | धनु |
| सिंह | १७९५ | + | २८८ | = | २०८३ | वृश्चिक |
| कन्या | १६७० | + | ३६० | = | २०३० | तुला |
ये उदयमान अनुसंख्यामें हैं। इनमें ६ के भाग देनेसे पलात्मक होते हैं। यथा—मेषोदयासू = १६७०, अतः मेषोदयपल = १६७०/६ = २७८ स्वल्पान्तरसे। एवं अन्य मान निम्नाङ्कित चित्रमें देखिये।
२. उदाहरण—पलमान ६ हैं, वहाँ चरखण्ड-क्रमसे पलात्मक ६०। ४८। २० हुए। इनको क्रम-उत्क्रमसे पलात्मक लङ्कोदयमें घटाने और जोड़नेसे ६ पलभादेशीय (स्वदेशोदय)-मान हुए। चक्रमें देखिये—
| लङ्कोदया | चरखण्ड | स्वदेशोदया | ||||
|---|---|---|---|---|---|---|
| मे. | २७८ | - | ६० | = | २१८ | मी. |
| वृ. | २९९ | - | ४८ | = | २५१ | कुं. |
| मि. | ३२३ | - | २० | = | ३०३ | म. |
| क. | ३२३ | + | २० | = | ३४३ | ध. |
| सि. | २९९ | + | ४८ | = | ३४७ | वृ. |
| क. | २७८ | + | ६० | = | ३३८ | तु. |