संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
\ पूर्वभाग-द्वितीय पाद २६७
* पूर्वभाग-द्वितीय पाद * २६७
योगोऽन्तरेणोनयुतोऽर्धितो राशी तु संक्रमे।
राश्यन्तरहृतं वर्गान्तरं योगस्ततश्च तौ ॥ ३१ ॥
इष्टवर्गकृतिश्चेष्टघनोऽष्टघ्नौ च सैककः।
आद्यः स्यातामुभे व्यक्ते गणितेऽव्यक्त एव च ॥ ३४ ॥
संक्रमण-गणितमें (यदि दो संख्याओंका योग और अन्तर ज्ञात हो तो) योगको दो जगह लिखकर एक जगह अन्तरको जोड़कर आधा करे तो एक संख्याका ज्ञान होगा और दूसरी जगह अन्तरको घटाकर आधा करे तो दूसरी संख्या ज्ञात होगी—इस प्रकार दोनों राशियाँ (संख्याएँ) ज्ञात हो जाती हैं२। वर्गसंक्रमणमें (यदि दो संख्याओंका वर्गान्तर तथा अन्तर ज्ञात हो तो) वर्गान्तरमें अन्तरसे भाग देनेपर जो लब्धि आती है, वही उनका योग है; योगका ज्ञान हो जानेपर फिर पूर्वोक्त प्रकारसे दोनों संख्याओंका ज्ञान प्राप्त करना चाहिये३ ॥ ३१ ॥
गजघ्नीष्टकृतिर्व्यैका दलिता चेष्टभाजिता।
एकोऽस्य वर्गो दलितः सैको राशिः परो मतः ॥ ३२ ॥
द्विगुणेष्टहृतं रूपं सेष्टं प्राग्रूपकं परम्।
वर्गयोगान्तरे व्येके राश्योर्वर्गौ स्त एतयोः ॥ ३३ ॥
वर्गकर्मगणितमें४ इष्टका वर्ग करके उसमें आठसे गुणा करे, फिर एक घटा दे, उसका आधा करे। तत्पश्चात्—उसमें इष्टसे भाग दे तो एक राशि ज्ञात होगी। फिर उसका वर्ग करके आधा करे और उसमें एक जोड़ दे तो दूसरी संख्या ज्ञात होगी५ ॥ ३२ ॥ अथवा कोई इष्ट-कल्पना करके उस द्विगुणित इष्टसे १ में भाग देकर लब्धिमें इष्टको जोड़े तो प्रथम संख्या होगी और दूसरी संख्या १ होगी। ये दोनों संख्याएँ वे ही होंगी, जिनके वर्गोंके योग और अन्तरमें एक घटानेपर भी वर्गाङ्क ही शेष रहता है६ ॥ ३३ ॥ किसी इष्टके वर्गका वर्ग तथा पृथक् उसीका घन करके दोनोंको पृथक्-पृथक् आठसे गुणा करे। फिर पहलेमें एक जोड़े तो दोनों संख्याएँ ज्ञात होंगी। यह विधि व्यक्त और अव्यक्त दोनों गणितोंमें उपयुक्त है७ ॥ ३४ ॥
जोड़नेसे ६८ होता है। इसमें गुणक ५। ऊन १/३। हर १०। युक्त होनेवाले राश्यंश १/३, १/२, १/४ और दृश्य संख्या ६८ है। कल्पना कीजिये कि इष्ट राशि ३ है। इसमें प्रश्नकर्ताके कथनानुसार ५ से गुणा किया तो १५, इसमें अपना १/३ अर्थात् ५ घटा दिया तो १० हुआ। इसमें दससे भाग दिया तो १ लब्धि अङ्क हुआ, उसमें कल्पित राशि ३ के १/३, १/२, १/४ जोड़नेसे १/१+३/३+३/२+३/४=१२+१२+१८+९=५१/१२=१७/४ हुआ। फिर दृश्य ६८ में कल्पित इष्ट ३ से गुणा किया और १७/४ से भाग दिया तो (६८×३×४)/१७ = ४८ यही इष्ट संख्या हुई।
२. जैसे किसीने पूछा—वे दोनों कौन-सी संख्याएँ हैं, जिनका योग १०१ और अन्तर २५ है? यहाँ योगको दो जगह लिखा—
| १०१ | १०१ |
|---|---|
| २५ जोड़ा | २५ घटाया |
| १२६÷२=६३ | ७६÷२=३८ उत्तर—वे दोनों संख्याएँ ६३ एवं ३८ हैं। |
३. उदाहरणके लिये यह प्रश्न है—जिन दो संख्याओंका अन्तर ८ और वर्गान्तर ४०० है, उन्हें बताओ। ४००÷८=५० यह योग हुआ ५०+८÷२=२९ एक संख्या। ५०-८÷२=२१ दूसरी संख्या हुई। अथवा वर्गान्तरमें राशियोंका भाग देनेसे अन्तर ज्ञात होगा। यथा—४००÷५०=८ यह राश्यन्तर है। फिर पूर्वोक्त प्रक्रियासे दोनों राशियाँ ज्ञात होंगी।
४. जहाँ किन्हीं दो संख्याओंका वर्गयोग और वर्गान्तर करके दोनोंमें पृथक्-पृथक् १ घटानेपर भी वर्गाङ्क ही शेष रहता है उसको 'वर्गकर्म' कहते हैं।
५. कल्पना कीजिये कि इष्ट १/२ है, उसका वर्ग हुआ १/४ उसको आठसे गुणा किया तो २ हुआ। उसमें १ घटाकर आधा किया तो १/२ हुआ, उसमें इष्ट १/२ से भाग दिया तो १ हुआ—यह प्रथम संख्या है। उसका वर्ग किया तो एक ही हुआ। इसका आधा करनेसे १/२ हुआ। इसमें एक जोड़नेसे ३/२ हुआ यह दूसरी संख्या हुई।
६. कल्पना कीजिये कि इष्ट १ है, उसको दोसे गुणा किया तो २ हुआ, उससे १ में भाग दिया तो १÷२/१=१×१/२=१/२ हुआ। उसमें इष्ट १ जोड़ दिया तो १ १/२=३/२ प्रथम संख्या निकल आयी और दूसरी संख्या १ है ही।
७. कल्पना कीजिये कि इष्ट २ है। इसके वर्गका वर्ग हुआ १६ और उसका घन हुआ ८। दोनोंको अलग-अलग
| २६८ | * संक्षिप्त नारदपुराण * |
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गुणघ्नमूलोनयुते सगुणार्धकृतेः पदम्।
दृष्टस्य च गुणार्धोनयुतं वर्गीकृतं गुणः ॥ ३५ ॥
यदा लवोनयुगराशिर्दृश्यं भागोनयुग्भुवा।
भक्तं तथा मूलगुणं ताभ्यां साध्योऽथ व्यक्तवत् ॥ ३६ ॥
गुणकर्म अपने इष्टाङ्गगुणित मूलसे ऊन या युक्त होकर यदि कोई संख्या दृश्य हुई हो तो मूल गुणकके आधेका वर्ग दृश्य-संख्यामें जोड़कर मूल लेना चाहिये। उसमें क्रमसे मूल गुणकके आधा जोड़ना और घटाना चाहिये। (अर्थात् जहाँ इष्टगुणितमूलसे ऊन होकर दृश्य हो वहाँ गुणकार्धको जोड़ना तथा यदि इष्टगुणितमूलयुक्त होकर दृश्य हो तो उक्त मूलमें गुणकार्ध घटाना चाहिये) फिर उसका वर्ग कर लेनेसे प्रश्नकर्ताकी अभीष्ट राशि (संख्या) सिद्ध होती है¹। यदि राशि मूलोन या मूलयुक्त होकर पुनः अपने किसी भागसे भी ऊन या युत होकर दृश्य होती हो तो उस भागको १ में ऊन या युत कर (यदि भाग ऊन हुआ हो तो घटा करके और यदि युत हुआ हो तो जोड़ करके) उसके द्वारा पृथक्-पृथक् दृश्य और मूल गुणकमें भाग दे; फिर इस नूतन दृश्य और मूलगुणकसे पूर्ववत् राशिका साधन करना चाहिये ॥ ३५-३६ ॥
प्रमाणेच्छे सजातीये आद्यन्ते मध्यगं फलम्।
इच्छाघ्नमाद्यहृत्वेष्टं फलं व्यस्ते विपर्ययात् ॥ ३७॥
(त्रैराशिकमें) प्रमाण और इच्छा ये समान जातिके होते हैं, इन्हें आदि और अन्तमें रखे, फल भिन्न जातिका है, अतः उसे मध्यमें स्थापित करे। फलको इच्छासे गुणा करके प्रमाणके द्वारा भाग देनेसे लब्धि इष्टफल होती है। (यह क्रम त्रैराशिक बताया गया है।) व्यस्त त्रैराशिकमें इससे विपरीत क्रिया करनी चाहिये। अर्थात् प्रमाण-फलको प्रमाणसे गुणा करके इच्छासे भाग देनेपर लब्धि इष्टफल होती है। (प्रमाण, प्रमाण-फल और इच्छा—इन तीन राशियोंको जानकर इच्छाफल जाननेकी क्रियाको त्रैराशिक कहते हैं।)² ॥३७॥
८ से गुणा करनेपर एक हुआ १२८ और दूसरा हुआ ६४। यहाँ पहलेमें १ जोड़नेसे १२९ हुआ, यह पहली संख्या है और ६४ दूसरी संख्या हुई।
१. यदि कोई पूछे—किसी हंस-समूहके मूलका सप्तगुणित आधा (७/२) भाग सरोवरके तटपर चला गया और बचे हुए २ हंस जलमें ही क्रीड़ा करते देखे गये तो उन हंसोंकी कुल संख्या कितनी थी? यहाँ मूल गुणक ७/२ है। दृष्ट संख्या २ है। गुणार्ध हुआ ७/४ उसका वर्ग हुआ ४९/१६ उससे दृष्ट २ का योग करनेपर ८१/१६ हुआ। इसका मूल हुआ ९/४ फिर इसे गुणार्ध ७/४ से युक्त किया तो १६/४=४ हुआ, इसका वर्ग किया तो १६ हुआ, यही हंसकुलका मान है। (यह मूलोन दृष्टका उदाहरण है।)
भागोन दृष्टका उदाहरण इस प्रकार है—किसी व्यक्तिने अपने धनका आधा १/२ अपने पुत्रको दिया और धन-संख्याके मूलका १२ गुना भाग अपनी स्त्रीको दे दिया। इसके बाद उसके पास १०८०) बच गये तो बताओ उसके सम्पूर्ण धनकी संख्या क्या है?
उत्तर—इस प्रश्नमें मूलगुणक १२ है और १/२ भागसे ऊन दृष्ट १०८० है। अतः मूल श्लोकमें वर्णित रीतिसे अनुसार भागको एकमें घटानेसे १-१/२=१/२ हुआ। इससे मूल गुणक १२ और दृश्य १०८० में भाग देनेसे क्रमशः नवीन मूलगुणक २४ और नवीन दृश्य २१६० हुआ। पुनः उपर्युक्त रीतिसे इस मूलगुणकके आधे १२ के वर्ग १४४ को दृश्यमें जोड़नेसे २३०४ हुआ। इसके मूल ४८ में गुणक २४ के आधे १२ को जोड़नेसे ६० हुआ और उसका वर्ग ३६०० हुआ; यही उत्तर है।
भागयुत दृष्टका उदाहरण—एक भगवद्भक्त प्रातःकाल जितनी संख्यामें हरिनामका जप करते हैं; उस संख्याके पञ्चमांशमें उसी जपसंख्याके मूलका १२ गुना जोड़नेसे जो संख्या हो, उतना जप सायंकालमें करते हैं, यदि दोनों समयकी जपसंख्या मिलकर १३२०० है तो प्रातःकाल और सायंकालकी पृथक्-पृथक् जपसंख्या बताइये।
उत्तर—यहाँ मूलगुणक १२ और भाग १/५ से युत दृष्ट १३२०० है। अतः उक्त रीतिके अनुसार भागको १ में जोड़ा गया तो ६/५ हुआ। इससे मूलगुणक १२ और दृश्य १३२०० में भाग देनेपर नवीन मूलगुणक १० और नवीन दृश्य ११००० हुआ। उपर्युक्त रीतिके अनुसार गुणकके आधे ५ के वर्ग २५ को नवीन दृश्यमें जोड़नेपर ११०२५ हुआ। इसका मूल १०५ हुआ। इसमें नवीन गुणकके आधे ५ को घटानेसे १०० हुआ। इसका वर्ग १०००० है। यही प्रातःकालकी जपसंख्या हुई। शेष ३२०० सायंकालकी जपसंख्या हुई।
२. उदाहरणके लिये यह प्रश्न है—यदि पाँच रुपयेमें १०० आम मिलते हैं तो सात रुपयेमें कितने मिलेंगे? इस प्रश्नमें ५ प्रमाण है, १०० प्रमाण-फल है और ७ इच्छा है। प्रमाण और इच्छा एक जाति (रुपया) तथा प्रमाण-फल भिन्न जाति (आम) है। आदिमें प्रमाण, मध्यमें फल और अन्तमें इच्छाकी स्थापना की गयी—५) में १०० आम तो ७) में कितने? यहाँ प्रमाण-