संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पूर्वभाग-द्वितीय पाद २४९
- पूर्वभाग-द्वितीय पाद * २४९
अदेवीददेविष्यत्सुनोति सुषाव सोता सोष्यति वै।
सुनोत्सुनोत् सुनुयात्सूयादसावीदसोष्यत् तुदति च ॥७५॥
तुतोद तोत्ता तोत्स्यति तुदत्वतुदत्तुदेत्तुद्याद्धि।
अतौत्सीदतोत्स्यदिति च रुणद्धि रुरोध रोद्धा रोत्स्यति वै॥७६॥
रुणद्ध्वरुणद्रुन्ध्याद्रुध्यादरौत्सीदरोत्स्यच्च ।
तनोति ततान तनिता तनिष्यति तनोत्वतनोत्तनुयाद्धि॥७७॥
तन्यादतनीच्चातानीदतनिष्यत् क्रीणाति चिक्राय क्रेता
क्रेष्यति क्रीणात्विति च। अक्रीणात् क्रीणीयात्
क्रीयादक्रैषीदक्रेष्यच्चोरयति चोरयामास चोरयिता
चोरयिष्यति चोरयत्वचोरयच्चोरयेच्चोर्याद-
चूचुरदचोरयिष्यदित्येवं दश वै गणाः॥७८॥
जुहोत्यादि गणमें 'हु' धातु प्रधान है। इसका प्रयोग अग्निमें आहुति डालनेके अर्थमें या देवताको तृप्त करनेके अर्थमें होता है। इसका प्रत्येक लकारमें रूप इस प्रकार है—जुहोति। जुहाव, जुहवाञ्चकार, जुहवाम्बभूव, जुहवामास। होता। होष्यति। जुहोतु। अजुहोत्। जुहुयात्। हूयात्। अहौषीत्। अहोष्यत्। दिवादि गणमें 'दिव' धातु प्रधान है। इसके अनेक अर्थ हैं—क्रीडा, विजयकी इच्छा, व्यवहार, द्युति, स्तुति, मोद, मद, स्वप्न, कान्ति और गति। इसके रूप पूर्ववत् विभिन्न लकारोंमें इस प्रकार हैं—दीव्यति। दिदेव। देविता। देविष्यति। दीव्यतु। अदीव्यत्। दीव्येत्। दीव्यात्। अदेवीत्। अदेविष्यत्। स्वादिगणमें 'सु' धातु प्रधान है। यह मूलतः 'षूञ्' धातुके नामसे प्रसिद्ध है। इसका अर्थ है अभिषव अर्थात् नहलाना, रस निचोड़ना, नहाना एवं सोमरस निकालना। रूप इस प्रकार हैं—सुनोति। सुषाव। सोता। सोष्यति। सुनोतु। असुनोत्। सुनुयात्। सूयात्। असावीत्। असोष्यत्। ये परस्मैपदके रूप हैं; आत्मनेपदमें सुनते, 'सुषुवे' इत्यादि रूप होते हैं। तुदादिगणमें 'तुद्' धातु प्रधान है, जिसका अर्थ है पीड़ा देना। रूप इस प्रकार हैं—तुदति। तुतोद। तोत्ता। तोत्स्यति। तुदतु। अतुदत्। तुदेत्। तुद्यात्। अतौत्सीत्। अतोत्स्यत्। रुधादिगणमें 'रुध्' धातु प्रधान है, जिसका अर्थ है—रूँधना, बाड़ लगाना, घेरा डालना या रोकना। रूप इस प्रकार हैं—रुणद्धि। रुरोध। रोद्धा। रोत्स्यति। रुणद्धु। अरुणत्। रुन्ध्यात्। रुद्ध्यात्। अरौत्सीत्। अरोत्स्यत्।१ तनादिगणमें 'तन्' धातु प्रधान है। इसका अर्थ है विस्तार करना, फैलाना; रूप इस प्रकार हैं—तनोति। ततान। तनिता। तनिष्यति। तनोतु। अतनोत्। तनुयात्। तन्यात्। अतनीत्, अतानीत्। अतनिष्यत्२। क्र्यादिमें क्री-धातु प्रधान है—जिसका अर्थ है खरीदना, एक द्रव्य देकर दूसरा द्रव्य लेना। रूप इस प्रकार हैं—क्रीणाति। चिक्राय। क्रेता। क्रेष्यति। क्रीणातु। अक्रीणात् क्रीणीयात्। क्रीयात्। अक्रैषीत्३। अक्रेष्यत्। चुरादिगणमें 'चुर्' धातु प्रधान है, जिसका अर्थ है चुराना; रूप इस प्रकार हैं—चोरयति। चोरयामास, चोरयाञ्चकार, चोरयाम्बभूव। चोरयिता। चोरयिष्यति। चोरयतु। अचोरयत्। चोरयेत्। चोर्यात्। अचूचुरत्। अचोरयिष्यत्४। इस प्रकार ये धातुओंके दस गुण माने गये हैं॥७४-७८॥
प्रयोजके भावयति सनीच्छायां बुभूषति।
क्रियासमभिहारे तु पण्डितो बोभूयते मुने॥७९॥
१. यह उभयपदीय धातु है। मूलमें केवल परस्मैपदीय रूप दिया गया है। इसका आत्मनेपदीय रूप इस प्रकार है—रुन्धे। रुरुधे। रोद्धा। रोत्स्यते। रुन्धाम्। अरुन्ध। रुन्धीत। रोत्सीष्ट। अरुद्ध। अरोत्स्यत।
२. यह भी उभयपदीय धातु है। इसका आत्मनेपदीय रूप इस प्रकार है—तनुते। तेने। तनिता। तनिष्यते। तनुताम्। अतनुत। तन्वीत। तनिषीष्ट। अतत, अतनिष्ट। अतनिष्यत।
३. इसका आत्मनेपदीय रूप इस प्रकार है—क्रीणीते। चिक्रिये। क्रेता। क्रेष्यते। क्रीणीताम्। अक्रीणीत। क्रीणीत। क्रेषीष्ट। अक्रेष्ट। अक्रेष्यत।
४. इसका आत्मनेपदीय रूप इस प्रकार है—चोरयते। चोरयाञ्चक्रे, चोरयामासे, चोरयाम्बभूवे। चोरयिता। चोरयिष्यते। चोरयताम्। अचोरयत। चोरयेत। चोरयिषीष्ट। अचूचुरत। अचोरयिष्यत।
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प्रयोजकके व्यापारमें प्रत्येक धातुसे णिच् प्रत्यय होता है। 'च'कार और 'ण'कार इत्संज्ञक हैं। णिच् प्रत्यय परे रहनेपर स्वरान्त अङ्गकी वृद्धि होती है। भू से णिच् करनेपर भू+इ बना; फिर वृद्धि और आव् आदेश करनेपर भावि बना, उससे धातुसम्बन्धी अन्य कार्य करनेपर भावयति रूप बनता है। जो कर्ताको प्रेरणा दे, उसे प्रयोजक कहते हैं। जैसे—'चैत्रः पण्डितो भवति' (चैत्र पण्डित होता है), 'तं मैत्रः अध्यापनादिना प्रेरयति' (उसे मैत्र पढ़ाने आदिके द्वारा पण्डित होनेमें प्रेरणा देता है)। इस वाक्यमें चैत्र प्रयोज्य कर्ता है और मैत्र प्रयोजक कर्ता है। इस प्रयोजकके व्यापारमें ही णिच् प्रत्यय होता है; इसलिये उसीके अनुसार प्रथम, मध्यम आदि पुरुषकी व्यवस्था एवं क्रिया होती है। प्रयोज्य कर्ता प्रयोजकके व्यापारमें कर्म बन जाता है, इसलिये उसमें द्वितीया विभक्ति होती है और प्रयोजक कर्तामें प्रथमा विभक्ति। यथा—'मैत्रः चैत्रं पण्डितं भावयति' (मैत्र चैत्रको पण्डित बनानेमें योग देता है)। इसी प्रकार अन्य धातुओंसे भी प्रेरणार्थक प्रत्यय होता है। यथा—'छात्रः पठति, गुरुः प्रेरयति इति गुरुः छात्रं पाठयति' (छात्र पढ़ता है, गुरु उसे प्रेरित करता है; इसलिये गुरु छात्रको पढ़ाता है)।
इच्छा-अर्थमें 'सन्' प्रत्यय होता है 'भवितुम् इच्छति बुभूषति' (होनेकी इच्छा करता है)। इसी प्रकार पठ्, गम् आदि अन्य धातुओंसे भी इच्छा-अर्थमें पिपठिषति (पढ़नेकी इच्छा करता है), जिगमिषति (जाना चाहता है)—इत्यादि सन्नन्त रूप होते हैं। मुने! क्रिया-समभिहारमें एक स्वरवाले हलादि धातुसे 'यङ्' प्रत्यय होता है, इस नियमके अनुसार भू-धातुसे यङ्प्रत्यय होनेपर धातुका द्वित्व होता है; क्योंकि सन् और यङ् परे रहनेपर धातुके द्वित्व होने (एकसे दो हो जाने)-का नियम है। फिर धातु-प्रत्ययसम्बन्धी अन्य कार्य करनेपर बोभूयते रूप बनता है। यथा—'देवदत्तः पण्डितो बोभूयते' (देवदत्त बड़ा भारी पण्डित हो रहा है)। 'बार-बार' या 'अधिक' अर्थका बोध कराना ही क्रियासमभिहार कहलाता है। इस तरहके प्रयोगको यङन्त कहते हैं। पठ् और गम् आदि धातुओंसे यङ्-प्रत्यय करनेपर पापठ्यते, (बार-बार या बहुत पढ़ता है)। जङ्गम्यते (बार-बार या बहुत जाता है) इत्यादि रूप होते हैं॥७९॥
तथा यङ्लुकि विप्रेन्द्र बोभवीति च पठ्यते।
पुत्रीयतीत्यात्मनीच्छायां तथाचारेऽपि नारद।
अनुदात्तङितो धातोः क्रियाविनिमये तथा ॥८०॥
यङ्-प्रत्ययका लुक् (लोप होना) भी देखा जाता है। उस दशामें बोभवीति, बोभोति, पापठीति और जङ्घमीति इत्यादि रूप होते हैं। इन रूपोंको यङ्लुगन्त रूप कहते हैं। अर्थ यङन्तके ही समान होते हैं। 'आत्मनः पुत्रम् इच्छति' (अपने लिये पुत्र चाहता है)। इस वाक्यसे पुत्रकी इच्छा व्यक्त होती है। ऐसे स्थलोंमें इच्छा-क्रियाके कर्मभूत शब्दसे क्यच्-प्रत्यय होता है। ककार और चकारकी इत्संज्ञा होती है। उपर्युक्त उदाहरणमें पुत्र-शब्दसे क्यच्-प्रत्यय करनेपर पुत्र+य इस अवस्थामें पुत्रमें 'त्र'के अकारका इ हो जाता है, फिर 'पुत्रीय' की धातुसंज्ञा करके तिङन्तके समान रूप चलते हैं। इस प्रकार 'पुत्रीयति' इत्यादि रूप होते हैं। 'पुत्रीयति'का अर्थ है—अपने लिये पुत्र चाहता है। ऐसे प्रयोगको नामधातु कहते हैं। नारदजी! कर्मभूत उपमानवाचक शब्दसे आचार-अर्थमें भी क्यच् होता है। यथा—'पुत्रमिवाचरति पुत्रीयति छात्रम्' (गुरुजी छात्रके साथ पुत्रका-सा बर्ताव करते हैं)।
अब आत्मनेपदका प्रकरण आरम्भ करते हैं। जिस धातुमें अनुदात्त स्वर और ङकारकी इत्संज्ञा
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होती है, उससे आत्मनेपदके प्रत्यय होते हैं। यथा—एधते, वर्धते इत्यादि। ये अनुदात्तेत् हैं। त्रैङ् पालने—यह ङित् धातु है, इसके केवल आत्मनेपदमें 'त्रायते' इत्यादि रूप होते हैं। जहाँ क्रियाका विनिमय व्यक्त होता हो, वहाँ भी आत्मनेपद होता है। यथा—व्यतिलुनीते (दूसरेके योग्य लवनरूप कार्य दूसरा करता है) ॥८०॥
निविशादेस्तथा विप्र विजानीह्यात्मनेपदम्।
परस्मैपदमाख्यातं शेषात् कर्तरि शाब्दिकैः ॥८१॥
विप्रवर ! निपूर्वक 'विश्' एवं वि और परापूर्वक 'जि' इत्यादि धातुओंसे भी आत्मनेपद ही जानो। यथा—निविशते, विजयते, पराजयते इत्यादि। भाव और कर्ममें प्रत्यय होनेपर भी आत्मनेपद ही होता है। आत्मनेपदके जितने निमित्त हैं, उन्हें छोड़कर शेष धातुओंसे कर्तामें परस्मैपद होता है—ऐसा वैयाकरणोंका कथन है॥८१॥
ञित्स्वरितेतश्च उभे यक्च स्याद्भावकर्मणोः।
जिन धातुओंमें 'स्वरित' और 'ञ्' की इत्संज्ञा हुई हो, उनसे परस्मैपद और आत्मनेपद दोनों होते हैं। यथा—'खनति, खनते। श्रयति, श्रयते' इत्यादि।
(अब भाव-कर्म-प्रकरण आरम्भ करते हैं—) भाव और कर्ममें धातुसे यक् प्रत्यय होता है। भावमें प्रत्यय होनेपर क्रियामें केवल औत्सर्गिक एकवचन होता है और सदा प्रथम पुरुषके ही एकवचनका रूप लिया जाता है। उस दशामें कर्ता तृतीयान्त होता है। भू धातुसे भावमें प्रत्यय करनेपर 'भूयते' रूप होता है। वाक्यमें उसका प्रयोग इस प्रकार है—'त्वया मया अन्यैश्च भूयते।' सकर्मक धातुसे कर्ममें प्रत्यय होनेपर कर्म उक्त हो जाता है, अतः उसमें प्रथमा विभक्ति होती है और अनुक्त कर्तामें तृतीया विभक्तिका प्रयोग होता है। कर्ताके अनुसार ही क्रियामें पुरुष और वचनकी व्यवस्था होती है। यथा—'चैत्रः आनन्दमनुभवति इति कर्मणि प्रत्यये चैत्रेणानन्दोऽनुभूयते', (चैत्रसे आनन्दका अनुभव किया जाता या आनन्द भोगा जाता है) चैत्रस्त्वामनुभवति, चैत्रेण त्वमनुभूयसे, (चैत्रसे तुम अनुभव किये जाते हो) चैत्रो मामनुभवति, चैत्रेणाहमनुभूये' (चैत्रसे मैं अनुभव किया जाता हूँ) इत्यादि उदाहरण भाव-कर्मके हैं।
सौकर्यातिशयं चैव यदा द्योतयितुं मुने॥८२॥
विवक्ष्यते न व्यापारो लक्ष्ये कर्तुस्तदापरे।
लभन्ते कर्तृतां पश्य पच्यते ह्योदनः स्वयम्॥८३॥
साध्वसिश्छिनत्त्येवं स्थाली पचति वै मुने।
धातोः सकर्मकात् कर्तृकर्मणोरपि प्रत्ययाः ॥८४॥
मुने! जब अतिशय सौकर्य प्रकाशित करनेके लिये लक्ष्यमें कर्ताके व्यापारकी विवक्षा नहीं रह जाती, तब कर्म और करण आदि दूसरे कारक ही कर्तृभावको प्राप्त होते हैं। यथा—'चैत्रो वह्निना स्थाल्यामोदनं पचति' (चैत्र आगसे बटलोईमें भात पकाता है)—इस वाक्यमें जब चैत्रके कर्तृत्वकी विवक्षा न रहे और करण आदिके कर्तृत्वकी विवक्षा हो जाय तो वे ही कर्ता हो जाते हैं और तदनुकूल क्रिया होती है। यथा—'वह्निः पचति' (आग पकाती है)। यहाँ करण ही कर्तारूपमें प्रयुक्त हुआ है। 'स्थाली पचति' (बटलोई पकाती है)—यहाँ अधिकरण ही कर्ताके रूपमें प्रयुक्त हुआ है। 'ओदनः स्वयं पच्यते' (भात स्वयं पकता है)—यहाँ कर्म ही कर्तारूपमें प्रयुक्त हुआ है। जब कर्म ही कर्तारूपमें प्रयुक्त हो तो कर्तामें लकार होता है; परंतु कर्मवद्भाव होनेसे यक् और आत्मनेपद आदि ही होते हैं। अतः 'पचति' न होकर 'पच्यते' रूप होता है। ऐसे प्रयोगको कर्म-कर्तृप्रकरणके अन्तर्गत मानते हैं। दूसरा उदाहरण इस प्रकार है—'असिना साधु छिनत्ति' (तलवारसे अच्छी तरह काटता है)—इस वाक्यमें उपर्युक्त नियमानुसार करणमें कर्तृत्वकी विवक्षा होनेपर
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ऐसा वाक्य बनेगा—‘साधु असिश्छिनत्ति' (तलवार अच्छा काटती है)। मुने! सकर्मक धातु भी कर्मकर्तृमें अकर्मक हो जाता है, अतः उससे भाव तथा कर्तामें भी लकार होता है। यथा भावे—पच्यते ओदनेन। कर्तरि—पच्यते ओदनः। सम्प्रदान और अपादान कारकोंमें कर्तृत्वकी विवक्षा कभी नहीं की जाती, क्योंकि यह अनुभवके विरुद्ध है। सामान्य स्थितिमें सकर्मक धातुसे ‘कर्ता' और 'कर्म'में प्रत्यय होते हैं ॥ ८२—८४ ॥
तस्माद् वाकर्मकाद्विप्र भावे कर्तरि कीर्तिताः।
फलव्यापारयोरेकनिष्ठतायामकर्मकः ॥ ८५ ॥
धातुस्तयोर्धर्मभेदे सकर्मक उदाहृतः।
गौणे कर्मणि दुह्वादेः प्रधाने नीहृकृष्वहाम् ॥ ८६ ॥
बुद्धिभक्षार्थयोः शब्दकर्मकाणां निजेच्छया।
प्रयोज्यकर्मण्यन्येषां ण्यन्तानां लादयो मताः ॥ ८७ ॥
विप्रवर! वही धातु यदि अकर्मक हो तो उससे 'भाव' और 'कर्ता' में प्रत्यय कहे गये हैं।
सभी धातुओंके फल और व्यापार—ये दो अर्थ हैं। ये दोनों जहाँ एकमात्र कर्तामें ही मौजूद हों, उन धातुओंको अकर्मक कहते हैं। जैसे—भू-धातुका अर्थ सत्ता है। सत्ताका तात्पर्य है—आत्मधारणानुकूल व्यापार। इसमें आत्मधारणरूप फल और तदनुकूल व्यापार दोनों केवल कर्तामें ही स्थित हैं; अतः भू-धातु अकर्मक है।
जहाँ फल और व्यापार दोनों भिन्न-भिन्न धर्मोंमें स्थित हों, वहाँ धातुको सकर्मक माना गया है। जैसे—'पच्' धातुका अर्थ है—विक्लेत्त्यनुकूल व्यापार (चावल आदिको गलानेके अनुरूप प्रयत्न)। इसमें विक्लेत्ति (गलना) यह फल है, जो चावलमें होता है और इसके अनुकूल जो चूल्हेमें आग जलाने आदिका व्यापार है, वह कर्तामें है; अतः 'पच्' धातु सकर्मक हुआ है। 'दुह' आदि* धातुओंके दो कर्म होते हैं। यथा—'गां दोग्धि पयः' (गायसे दूध दुहता है)—इसमें गाय गौण कर्म है और दूध प्रधान कर्म। दुह आदि धातुओंके गौण कर्ममें ही प्रत्यय होता है। यथा—'गौर्दुह्यते पयः, बलिर्याच्यते वसुधाम्' इत्यादि। नी, हृ, कृष् और वह्—इन चार धातुओंके प्रधान कर्ममें प्रत्यय होता है। यथा—'अजां ग्रामं नयति'—इस वाक्यमें अजा प्रधान कर्म और ग्राम गौण कर्म है। प्रधान कर्ममें प्रत्यय होनेपर वाक्यका स्वरूप इस प्रकार होगा—'अजा ग्रामं नीयते।' ज्ञानार्थक और भक्षणार्थक धातुओंके एवं शब्दकर्मक धातुओंके ण्यन्त होनेपर उनसे प्रधान या अप्रधान किसी भी कर्ममें अपनी इच्छाके अनुसार प्रत्यय कर सकते हैं। यथा—'बोध्यते माणवकं धर्मः, माणवको धर्मम् इति वा।' अन्य गत्यर्थक एवं अकर्मक धातुओंके ण्यन्त होनेपर उनके प्रयोज्य कर्ममें लकार आदि प्रत्यय माने गये हैं। यथा—'मासमास्यते माणवकः' ॥ ८५-८७ ॥
फलव्यापारयोर्धातुराश्रये तु तिङः स्मृताः।
फले प्रधानं व्यापारस्तिङर्थस्तु विशेषणम् ॥ ८८ ॥
धातु फल और व्यापाररूप अर्थोंका बोधक होता है। जैसे—भू-धातु आत्मधारणरूप फल और तदनुकूल व्यापारका बोधक है। फल और व्यापार दोनोंका जो आश्रय है, उसमें अर्थात् कर्ता एवं कर्ममें (तथा भावमें भी) तिङ्-प्रत्यय होते हैं, फलमें व्यापारकी ही प्रधानता है, तिङर्थरूप जो फल है वह उस व्यापारका विशेषण होता है। जैसे—'पचति'—इस क्रियाद्वारा चावल आदिके गलनेका प्रतिपादन होता है। यहाँ विक्लेत्तिरूप फलके अनुकूल जो अग्निप्रज्वालन और फूत्कारादि व्यापार हैं, उनके आश्रयभूत कर्तामें प्रत्यय हुआ है। 'ओदनः पच्यते' इत्यादिमें फलाश्रयभूत कर्ममें
*दुह्, याच्, पच्, दण्ड्, रुध्, प्रच्छ्, चि, ब्रू, शास्, जि, मथ्, मुष्—ये दुह् आदिके अन्तर्गत हैं, इनके दो कर्म होते हैं। इसी प्रकार नी, हृ, कृष् और वह्—इनके भी दो कर्म होते हैं।