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संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

पूर्वभाग-द्वितीय पाद २४७

  • पूर्वभाग-द्वितीय पाद * २४७

ये शब्द मत्वर्थमें निपातनसिद्ध हैं। ‘भौरिकिविधम्’ इसकी व्युत्पत्ति यों है—भौरिकीणां विषयो देशः—भौरिकिविधम् (भौरिकि नामवाले वर्ग-विशेषके लोगोंका देश)। ऐषुकारीणाम् विषयो देशः—ऐषुकारिभक्तम् (ऐषुकारि—बाण बनानेवाले लोगोंका देश)। इन दोनों उदाहरणोंमें क्रमशः ‘विध’ एवं ‘भक्त’ प्रत्यय हुए हैं। भौरिक्यादि तथा ऐषुकार्यादि शब्दोंसे ‘विध’ एवं ‘भक्त’ प्रत्यय होनेका नियम है। उत्कटम्—इसकी सिद्धिका नियम पहले बताया गया है, नासिकाकी निचाई व्यक्त करनेके लिये ‘अव’ उपसर्गसे ‘टीट’, ‘नाट’ और ‘भ्रट’ प्रत्यय होते हैं। तथा नि उपसर्गसे ‘विड’ और ‘विरीस’ प्रत्यय होते हैं। इसके सिवा ‘नि’से ‘इन’ और ‘पिट’ प्रत्यय भी होते हैं। ‘इन’-प्रत्यय परे होनेपर ‘नि’के स्थानमें चिक् आदेश हो जाता है और ‘पिट’प्रत्यय परे होनेपर ‘नि’के स्थानमें ‘चि’ आदेश होता है। मूलोक्त उदाहरण इस प्रकार हैं—अवटीटः, अवनाटः (अवभ्रटः)=नीची नाकवाला पुरुष। निविडम् (नीची नाक), निविरीसम्, चिकिनम्, चिपिटम्, चिक्कम्—इन सबका अर्थ नीची नाक है। जिसके आँखसे पानी आता हो, उसको ‘चिल्ल’ और ‘पिल्ल’ कहते हैं। ल प्रत्यय है और क्लिन्न-शब्द प्रकृति है—जिसके स्थानमें चिल्ल और पिल्ल आदेश हुए हैं। पैदा करनेवाले खेतके अर्थमें पैदावार-वाचक शब्दसे शाकट और शाकिन प्रत्यय होते हैं। जैसे ‘इक्षुशाकटम्’ ‘इक्षुशाकिनम्’। उसके द्वारा विख्यात है, इस अर्थमें चञ्चु और चण प्रत्यय होते हैं। जो विद्यासे विख्यात है, उसे ‘विद्याचण’ और ‘विद्याचञ्चु’ कहते हैं। बहु आदि शब्दोंसे ‘तिथ’ प्रत्यय होता है, पूरण अर्थमें। बहूनां पूरणम् इति=बहुतिथम्। शृङ्खिण-शब्द पर्वतका वाचक है, इसे निपात-सिद्ध बताया जा चुका है। ऐश्वर्यवाचक स्व-शब्दसे आमिन् प्रत्यय होता है—स्व+आमिन्=स्वामी (अधीश्वर या मालिक)। ‘रूप’ शब्दसे आहत और प्रशंसा अर्थमें ‘य’ प्रत्यय होता है। यथा विषमम्, आहतं वा रूपमस्यास्तीति—रूप्यः कार्षापणः (खराब पैसा), रूप्यम् आभूषणम् (खराब आभूषण) इत्यादि। ‘उप’ और ‘अधि’ से त्यक प्रत्यय होता है, क्रमशः समीप एवं ऊँचाईकी भूमिका बोधक होनेपर। पर्वतके पासकी भूमिको ‘उपत्यका’ (तराई) कहते हैं और पर्वतके ऊपरकी (ऊँची) भूमिको ‘अधित्यका’ कहते हैं। ‘वात’ शब्दसे ‘ऊल’ प्रत्यय होता है, असहन एवं समूहके अर्थमें। वातं न सहते वातूलः। जो हवा न सह सके, वह ‘वातूल’ है। वात+ऊल, अलोप=वातूलः। वातके समूह (आँधी)-को भी ‘वातूल’ कहते हैं। ‘कुतू’ शब्दसे ‘डुप’ प्रत्यय होता है, डकार इत्संज्ञक, टिलोप। ह्रस्वा कुतूः कुतुपः (चमड़ेका तैलपात्र—कुप्पी)। बलं न सहते (बल नहीं सहता)—इस अर्थमें बल-शब्दसे ‘ऊल’-प्रत्यय होता है। बल+ऊल=बलूलः। हिमं न सहते (हिमको नहीं सहता) इस अर्थमें हिमसे एलु प्रत्यय होता है। हिम+एलु=हिमेलुः। अनुकम्पा-अर्थमें मनुष्यके नामवाचक शब्दसे ‘इक’ एवं ‘अड’ आदि प्रत्यय होते हैं तथा स्वरादि प्रत्यय परे रहनेपर पूर्ववर्ती शब्दके द्वितीय स्वरसे आगेके सभी अक्षर लुप्त हो जाते हैं। यदि द्वितीय स्वर सन्धि-अक्षर हो तो उसका भी लोप हो जाता है। इन सब नियमोंके अनुसार ये दो उदाहरण हैं—अनुकम्पितः कहोडः=कहिकः। अनुकम्पितः उपेन्द्रदत्तः=उपडः। ‘ऊर्णायुः’ का अर्थ है ऊनवाला जीव (भेड़ आदि) अथवा ऊनी कम्बल आदि। ‘ऊर्णा’से युस् प्रत्यय होकर ‘ऊर्णायुः’ बना है। पर्व और मरुत् शब्दोंसे त प्रत्यय होता है। पर्व+त=पर्वतः (पहाड़)। मरुत्+त=मरुत्तः (मरुआ नामक पौधा अथवा महाराज मरुत्त)। एक शब्दसे असहाय-अर्थमें आकिन्, कन् और उसका लुक्, ये तीनों कार्य बारी-बारीसे होते हैं। एक+आकिन्=एकाकी। एक+क=एककः।

२४८ * संक्षिप्त नारदपुराण *


कन्का लोप होनेपर एकः। इन सबका अर्थ— अकेला, असहाय है। चर्मण्वती एक नदीका नाम है। (इसमें चर्मन् शब्दसे मतुप्, मकारका वकारादेश, नलोपका अभाव और णत्व आदि कार्य निपातसिद्ध हैं। स्त्रीलिङ्गबोधक ङीप् प्रत्यय हुआ है)। 'ज्योत्स्ना' और 'तमिस्रा' निपात-सिद्ध हैं, यह बात गोमीके प्रसङ्गमें कही गयी है। इसी प्रकार अष्ठीवत्, कक्षीवत्, रुमण्वत्, आसन्दीवत् तथा चक्रीवत्—ये शब्द भी निपात-सिद्ध हैं। यथा—आसन्दीवान् ग्रामः, अष्ठीवान् नाम ऋषिः, चक्रीवान् नाम राजा, कक्षीवान् नाम ऋषिः, रुमण्वान् नाम पर्वततः। तूष्णीं शब्दसे काम् प्रत्यय होता है, अकच्के प्रकरणमें। तूष्णीकाम् आस्ते (चुप बैठता है)। मित् कार्य अन्तिम स्वरके बाद होता है। तिङन्त, अव्यय और सर्वनामसे 'टि' के पहले अकच् होता है, चकार इत्संज्ञक है। इस नियमके अनुसार 'जल्पति' इस तिङन्त पदके इकारसे पहले अकच् होनेसे 'जल्पतकि' (बोलता है) रूप बनता है॥ ६६—७०॥

कंवः कम्भश्च कंयुश्च कन्तिः कन्तुस्तथैव च।
कन्तः कंयश्च शंवश्च शम्भः शंयुस्तथा पुनः ॥ ७१ ॥
शन्तिः शन्तुः शन्तशंयौ तथाहंयुः शुभंयुवत् ।

कम् और शम्—ये मकारान्त अव्यय हैं। कम्का अर्थ जल और सुख है, शम्का अर्थ सुख है। इन दोनोंसे सात प्रत्यय होते हैं—व, भ, युस्, ति, तु, त और यस्। युस् और यस्का सकार इत्संज्ञक है। इन सबके उदाहरण क्रमशः इस प्रकार हैं— कंवः, कम्भः, कंयुः, कन्तिः, कन्तुः, कन्तः, कंयः। शंवः, शंभः, शंयुः, शन्तिः, शन्तुः, शन्तः, शंयः। अहम्—यह मकारान्त अव्यय अहंकारके अर्थमें प्रयुक्त होता है और शुभम्—यह मकारान्त अव्यय शुभ-अर्थमें है। इनसे 'युस्'-प्रत्यय होता है, सकार इत्संज्ञक है। अहम्+यु=अहंयुः (अहंकारवान्), शुभम्+यु= शुभंयुः (शुभयुक्त पुरुष) ॥ ७१ ॥

भवति बभूव भविता भविष्यति भवतद्भवद्वेच्चापि ॥ ७२ ॥
भूयादभूद्भविष्यल्लादावेतानि रूपाणि।
अत्ति जघासात्तात्स्यत्त्वाद्दद्यादद्विरघसदात्स्यत् ॥ ७३ ॥

(अब तिङन्तप्रकरण प्रारम्भ करके कुछ धातुओंके रूपोंका दिग्दर्शन कराते हैं। वैयाकरणोंने दस प्रकारके धातु-समुदाय माने हैं, उन्हें 'नवगणी या दसगणी' के नामसे जाना जाता है। उनके नाम हैं—भ्वादि, अदादि, जुहोत्यादि, दिवादि, स्वादि, तुदादि, रुधादि, तनादि, क्र्यादि तथा चुरादि। भ्वादिगणके सभी धातुओंके रूप प्रायः एक प्रकार एवं एक शैलीके होते हैं, दूसरे-दूसरे गणोंके धातु भी अपने-अपने ढंगमें एक ही तरहके होते हैं। यहाँ सभी गणोंके एक-एक धातुके नौ लकारोंमें एक-एक रूप दिया जाता है। शेष धातु और उनके रूपोंका ज्ञान विद्वान् गुरुसे प्राप्त करना चाहिये।) 'भू' धातुके लट् लकारमें 'भवति भवतः भवन्ति' इत्यादि रूप बनते हैं। लिट् लकारमें 'बभूव बभूवतुः बभूवुः' इत्यादि, लुट्में 'भविता भवितारौ भवितारः' इत्यादि, लृट्में 'भविष्यति भविष्यतः भविष्यन्ति' इत्यादि, लोट्में 'भवतु भवतात् भवताद्, भवताम् भवन्तु इत्यादि, लङ्लकारमें 'अभवत् अभवताम् अभवन्' इत्यादि। विधिलिङ्में 'भवेत् भवेताम् भवेयुः' इत्यादि, आशिष् लिङ्में भूयात् 'भूयास्ताम् भूयासुः' इत्यादि लुङ्में 'अभूत् अभूताम् अभूवन्' इत्यादि तथा लृङ् लकारमें 'अभविष्यत् अभविष्यताम् अभविष्यन्' इत्यादि—ये सब रूप होते हैं। 'भू' धातुका अर्थ सत्ता है, 'भवति'का अर्थ 'होता है'—ऐसा किया जाता है। अब अदादि गणके 'अद्' धातुका पूर्ववत् प्रत्येक लकारमें एक-एक रूप दिया जाता है, 'अद्' धातु भक्षण अर्थमें प्रयुक्त होता है। अत्ति। जघास। अत्ता। अत्स्यति। अत्तु। आदत्। अद्यात्। अद्यात्। अघसत्। आत्स्यत् ॥ ७२-७३ ॥

जुहोति जुहाव जुहवाञ्चकार होता होष्यति जुहोतु।
अजुहोज्जुहुयाद्दूयादहौषीदहोष्यद्धीव्यति ।
दिदेव देविता देविष्यति दीव्यतु चादीव्यद्दीव्येद्दीव्याद्वै ॥ ७४ ॥