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संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

पूर्वभाग-द्वितीय पाद २४३

  • पूर्वभाग-द्वितीय पाद * २४३

हैं। निम्नाङ्कित शब्द अपत्यवाचक संज्ञाके रूपमें प्रयुक्त होते हैं। पाण्डव, श्रैधर, गार्ग्य, नाडायन, आत्रेय, गाङ्गेय, पैतृष्वस्रीय¹ ॥ ५१ ॥

देवतायें चेदमर्थे हैन्द्रं ब्राह्मो हविर्बलिः ।
क्रियायुजोः कर्मकर्त्रोधौरेयः कौङ्कुमं तथा ॥ ५२ ॥

निम्नाङ्कित शब्द देवतार्थक और इदमर्थक प्रत्ययसे युक्त हैं। यथा—ऐन्द्रं हविः, ब्राह्मो बलिः²। क्रियामें संयुक्त कर्म और कर्तासे तद्धित प्रत्यय होते हैं—धुरं वहति इति धौरेयः। जो धुर् अर्थात् भारको वहन करे, वह धौरेय है। यहाँ धुर् शब्द कर्म है और वहन-क्रियामें संयुक्त भी है, अतः उससे 'एय' यह तद्धित प्रत्यय हुआ। आदि स्वरकी वृद्धि हुई और 'धौरेय' शब्द सिद्ध हुआ। इसी प्रकार कुङ्कुमेन रक्तं वस्त्रम्—इसमें कुङ्कुम शब्द 'रँगना' क्रियाका कर्ता है और वह उसमें संयुक्त भी है। अतः उससे तद्धित अण् प्रत्यय होकर आदिपदकी वृद्धि हुई और 'कौङ्कुम' शब्द सिद्ध हुआ ॥ ५२ ॥

भवाद्यर्थे तु कानीनः क्षत्रियो वैदिकः स्वकः ।
स्वार्थे चौरस्तु तुल्यार्थे चन्द्रवन्मुखमीक्षते ॥ ५३ ॥

अब 'भव' आदि अर्थोंमें होनेवाले तद्धित प्रत्ययोंका उदाहरण देते हैं—कन्यायां भवः कानीनः। जो अविवाहिता कन्यासे उत्पन्न हुआ हो, उसे 'कानीन'³ कहते हैं। क्षत्रस्यापत्यं जातिः क्षत्रियः। क्षत्रकुलसे उत्पन्न उसी जातिका बालक 'क्षत्रिय'⁴ कहलाता है। वेदे भवः वैदिकः। इक्-प्रत्यय और आदि स्वरकी वृद्धि हुई है। स्व एव स्वकः। यहाँ स्वार्थमें 'क' प्रत्यय है। चोर एव चौरः, स्वार्थमें अण् प्रत्यय हुआ है। तुल्य-अर्थमें वत् प्रत्यय होता है। यथा—चन्द्रवन्मुखमीक्षते—चन्द्रमाके समान मुख देखता है। चन्द्र+वत्=चन्द्रवत् ॥ ५३ ॥

ब्राह्मणत्वं ब्राह्मणता भावे ब्राह्मण्यमेव च ।
गोमान्धनी च धनवानस्त्यर्थे प्रमितौ कियान् ॥ ५४ ॥

भाव-अर्थमें त्व, ता और य प्रत्यय होते हैं यथा—ब्राह्मणस्य भावः ब्राह्मणत्वम्, ब्राह्मणता, ब्राह्मण्यम्। अस्त्यर्थमें मतुप् और इन् प्रत्यय होते हैं—गौः अस्यास्ति इति गोमान्। धनमस्यास्ति इति धनी (जिसके पास गौ हो, वह 'गोमान्', जिसके पास धन हो, वह 'धनी' है⁵)। अकारान्त, मकारान्त तथा मकारोपध शब्दसे एवं झयन्त शब्दसे परे मत्के 'म' का 'व' हो जाता है—यथा धनमस्यास्ति इति धनवान्। परिमाण-अर्थमें 'इदम्', 'किम्', 'यत्', 'तत्', 'एतत्'—इन शब्दोंसे वतुप् प्रत्यय होता है, किंतु 'इदम्' और 'किम्' शब्दोंसे परे वतुप्के वकारका 'इय्' आदेश हो जाता है। दृक्, दृश्, वतु—ये परे हों तो इदम्के स्थानमें 'ई' तथा 'किम्' के स्थानमें 'कि' हो जाते हैं। किं परिमाणं यस्य स कियान्—यहाँ परिमाण-अर्थमें वतुप्-


१. इनके क्रमशः अर्थ इस प्रकार हैं—पाण्डुपुत्र, श्रीधर-पुत्र, गर्गकी संतानपरम्परा, नडगोत्रमें उत्पन्न संतान, अत्रि-पुत्र, गङ्गापुत्र (भीष्म) तथा बुआका पुत्र। यहाँ प्रथम दोमें अण्, तीसरेमें यञ्, चौथेमें आयन, पाँचवें, छठेमें एय और सातवेंमें ईय प्रत्यय हुए हैं। प्रत्येकमें आदि स्वरकी वृद्धि हुई है। तद्धित शब्दोंमें 'कृत्तद्धितसमासाश्च' (कृदन्त, तद्धितान्त और समासकी प्रातिपदिक संज्ञा होती है) इस नियमसे प्रातिपदिक संज्ञा करके सु आदि विभक्तियाँ आती हैं।
२. ऐन्द्रं हविः का अर्थ है—इस हविष्यके देवता इन्द्र हैं। ब्राह्मो वलिः का अर्थ है—यह ब्रह्माके लिये वलि है। एकमें देवता-अर्थमें अण् प्रत्यय हुआ है और दूसरेमें 'तस्य इदम्' (उसका यह) इस अर्थमें अण् प्रत्यय हुआ है। दोनोंमें आदि स्वरकी वृद्धि हुई है।
३. महर्षि व्यास और कर्ण कानीन थे। कन्या-शब्दसे अण् होनेपर कन्या-शब्दके स्थानमें कनीन आदेश होता है और आदिपदकी वृद्धि होनेसे कानीन बनता है।
४. क्षत्र+इय=क्षत्रियः । 'त्र' के 'अ' का लोप होकर वह 'इय' के 'इ' में मिला है।
५. मतुपमें उपका लोप हो जाता है, फिर धीमान्-शब्दकी तरह रूप चलते हैं। धनिन् शब्दका रूप दण्डिन्-शब्दके समान समझना चाहिये।

२४४* संक्षिप्त नारदपुराण *

प्रत्यय, इयादेश तथा 'कि'-भाव करनेसे कियान् बनता है। इसका अर्थ है—'कितना' ॥ ५४॥

जातार्थे तुन्दिलः श्रद्धालौरुन्नत्ये तु दन्तुरः ।
स्रग्वी तपस्वी मेधावी मायाव्यस्त्यर्थ एव च ॥ ५५ ॥

अब जातार्थमें होनेवाले प्रत्ययोंका उदाहरण देते हैं। तुन्दः संजातः अस्य तुन्दिलः। जिसको तोंद हो जाय, उसे 'तुन्दिल' कहते हैं। तुन्द+इल = तुन्दिल। श्रद्धा संजाता अस्य इति श्रद्धालुः। श्रद्धा+आलु। (इसी प्रकार दयालु, कृपालु आदि बनते हैं।) दाँतोंकी ऊँचाई व्यक्त करनेके लिये दन्त शब्दसे उर-प्रत्यय होता है। उन्नताः दन्ता अस्य इति दन्तुरः (ऊँचे दाँतवाला)। अस्, माया, मेधा तथा स्रज्—इन शब्दोंसे अस्त्यर्थमें विन् प्रत्यय होता है। इनके उदाहरण क्रमसे तपस्वी, मायावी, मेधावी (बुद्धिमान्) और स्रग्वी हैं। स्रग्वीका अर्थ माला धारण करनेवाला है ॥ ५५ ॥

वाचालश्चैव वाचाटो बहुकुत्सितभाषिणि ।
ईषदपरिसमाप्तौ कल्पब्देशीय एव च ॥ ५६ ॥

खराब बातें अधिक बोलनेवालेके अर्थमें वाच् शब्दसे 'आल' और 'आट' प्रत्यय होते हैं। कुत्सितं बहु भाषते इति वाचालः, वाचाटः। ईषत् (अल्प) और असमाप्तिके अर्थमें कल्पप्, देश्य और देशीय प्रत्यय होते हैं ॥ ५६ ॥

कविकल्पः कविदेश्यः प्रकारवचने तथा।
पटुजातीयः कुत्सायां वैद्यपाशः प्रशंसने ॥ ५७ ॥
वैद्यरूपो भूतपूर्वे मतो दृष्टचरो मुने ।
प्राचुर्यादिष्वन्नमयो मृन्मयः स्त्रीमयस्तथा ॥ ५८ ॥

जैसे—ईषत् ऊनः कविः कविकल्पः, कविदेश्यः, कविदेशीयः। जहाँ प्रकार बतलाना हो, वहाँ किम् और सर्वनाम आदि शब्दोंसे 'था' प्रत्यय होता है। तेन प्रकारेण तथा। तत्+था=तथा। त्यदादि शब्दोंका अन्तिम हल् निवृत्त होकर वे अकारान्त हो जाते हैं, विभक्ति परे रहनेपर। (था, दा, त्र, तस् आदि प्रत्यय विभक्तिरूप माने गये हैं)। इस नियमके अनुसार तत्के स्थानमें त हो जानेसे 'तथा' बना। जहाँ किसी विशेष प्रकारके व्यक्तिका प्रतिपादन हो, वहाँ जातीय प्रत्यय होता है। यथा—पटुप्रकारः—पटुजातीयः। पटु-शब्दसे जातीय प्रत्यय हुआ। किसीकी हीनता प्रकाशित करनेके लिये संज्ञाशब्दसे पाश प्रत्यय होता है। जैसे—कुत्सितो वैद्यः वैद्यपाशः (खराब वैद्य)। प्रशंसा-अर्थमें रूप प्रत्यय होता है। यथा—प्रशस्तो वैद्यः वैद्यरूपः (उत्तम वैद्य)। मुनिवर नारदजी ! भूतपूर्व अर्थको व्यक्त करनेके लिये चर प्रत्यय होता है। यथा—पूर्वं दृष्टो दृष्टचरः (पहलेका देखा हुआ)।

प्राचुर्य (अधिकता) और विकारार्थ आदि व्यक्त करनेके लिये मय प्रत्यय होता है। जैसे—अन्नमयो यज्ञः। जिसमें अधिक अन्न व्यय किया जाय, वह अन्नमय यज्ञ है। यहाँ अन्न-शब्दसे मयट् प्रत्यय हुआ। इसी प्रकार मृन्मयः अश्वः (मिट्टीका घोड़ा) तथा स्त्रीमयः पुरुषः इत्यादि उदाहरण समझने चाहिये ॥ ५७-५८ ॥

जातार्थे लज्जितोऽत्यर्थे श्रेयाञ्छ्रेष्ठश्च नारद।
कृष्णतरः शुक्लमः किम् आख्यानतोऽव्ययात् ॥ ५९ ॥
किन्तरां चैवातितरामपि ह्युच्चैस्तरामपि।
परिमाणे जानुदघ्नं जानुद्वयसमित्यपि ॥ ६० ॥

जात-अर्थमें तारकादि शब्दोंसे इत प्रत्यय होता है। यथा—लज्जा संजाता अस्य इति लज्जितः* (जिसके मनमें लज्जा पैदा हो गयी हो, उसे लज्जित कहते हैं)। नारदजी ! यदि बहुतोंमेंसे किसी एककी अधिक विशेषता बतानी हो तो तम और इष्ठ प्रत्यय होते हैं और दोमेंसे एककी विशेषता बतलानी हो तो तर और ईयसु प्रत्यय होते हैं। ईयसुमें उकार इत्संज्ञक है। अयम् एषां अतिशयेन प्रशस्यः


* ईकार और तद्धित परे रहनेपर असंज्ञक इवर्ण और अवर्णका लोप हो जाता है, इस नियमके अनुसार 'लज्जा+इत' इस स्थितिमें 'अ'का लोप हो जाता है।