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संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

पूर्वभाग-द्वितीय पाद २३५

  • पूर्वभाग-द्वितीय पाद * २३५

रामः १ (वही ये श्रीराम हैं)। इस प्रकार संहिता (सन्धि)-का प्रकरण बताया गया है॥ ३४॥
(अब सुबन्तका प्रकरण आरम्भ करते हुए पहले स्वरान्त शब्दोंका शुद्ध रूप देते हैं। उसमें भी एक श्लोकद्वारा मङ्गलाचरणके लिये श्रीरामका स्मरण करते हुए 'राम' शब्दके प्रायः सभी विभक्तियोंके एक-एक रूपका उल्लेख करते हैं—)
रामेणाभिहितं करोमि सततं २ रामं भजे सादरं
रामेणापहृतं समस्तदुरितं रामाय तुभ्यं नमः।
रामान्मुक्तिरभीप्सिता मम सदा रामस्य दासोऽस्म्यहं
रामे रज्यतु मे मनः सुविशदं हे राम तुभ्यं नमः॥ ३५॥
'मैं श्रीरामके द्वारा दिये हुए आदेशका सदा पालन करता हूँ। श्रीरामका आदरपूर्वक भजन करता हूँ। रामने (मेरा) सारा पाप हर लिया। भगवान् श्रीराम! तुम्हें नमस्कार है। मुझे श्रीरामसे मोक्षकी प्राप्ति अभीष्ट है। मैं सदाके लिये श्रीरामका दास हूँ। मेरा निर्मल मन श्रीराममें अनुरक्त हो। हे श्रीराम! तुम्हें नमस्कार है३॥ ३५॥
सर्व इत्यादिका गोपाः सखा चैव पतिर्हरिः ॥ ३६ ॥
सर्व आदि शब्द सर्वनाम४ माने जाते हैं।५ 'गोपाः' का अर्थ है गौओंका पालन करनेवाला६। सखाका अर्थ है मित्र। यह 'सखि' शब्दका रूप है७। पतिका अर्थ है स्वामी८। हरि शब्दका अर्थ है भगवान् विष्णु९॥ ३६॥
सुश्रीर्भानुः स्वयम्भूश्च कर्ता रा गौस्तु नौरिति ।
अनड्वागोधुग्लिट् च द्वौ त्रयश्चत्वार एव च ॥ ३७॥
जो उत्तम श्रीसे सम्पन्न हो, उसे सुश्री कहते हैं१०। भानुका अर्थ है सूर्य और किरण११। स्वयम्भूका अर्थ है स्वयं प्रकट होनेवाला। इसका


१. यहाँ 'एष रामः' की सिद्धि तो पूर्ववत् हो जाती है; किंतु 'सस्' के 'सु' का लोप करनेके लिये एक विशेष नियम है—'सस्' के 'सु' का लोप होता है अच् परे रहनेपर, यदि उसके लोप होनेके बाद ही श्लोकके पादकी पूर्ति होती हो तब। जैसे—सैष रामः समायाति (वही ये श्रीराम आते हैं)। २. कहीं-कहीं इस अंशका पाठ इस प्रकार मिलता है—'रामो राजमणिः सदा विजयते।' प्रथमा विभक्तिके रूपकी दृष्टिसे यही पाठ ठीक जान पड़ता है। ३. 'राम' शब्दका रूप सब विभक्तियोंमें इस प्रकार समझना चाहिये—रामः रामौ रामाः। रामम् रामौ रामान्। रामेण रामाभ्याम् रामैः। रामाय रामाभ्याम् रामेभ्यः। रामात्, रामाद् रामाभ्याम् रामेभ्यः। रामस्य रामयोः रामाणाम्। रामे रामयोः रामेषु। हे राम हे रामौ हे रामाः। ४. इसी प्रकरणमें आगे (श्लोक ४७-४८ में) सर्वनाम शब्द गिनाये गये हैं। ५. इनमें सर्व शब्दका रूप इस प्रकार है—सर्वः सर्वौ सर्वे। सर्वम् सर्वौ सर्वान्। सर्वेण सर्वाभ्याम् सर्वैः। सर्वस्मै सर्वाभ्याम् सर्वेभ्यः। सर्वस्मात् सर्वाभ्याम् सर्वेभ्यः। सर्वस्य सर्वयोः सर्वेषाम्। सर्वस्मिन् सर्वयोः सर्वेषु। अन्य सर्वनामोंके रूप भी प्रायः ऐसे ही होते हैं। ६. इसके रूप इस प्रकार हैं—गोपाः गोपौ गोपाः। गोपाम् गोपौ गोपः। गोपा गोपाभ्याम् गोपाभिः। गोपे गोपाभ्याम् गोपाभ्यः। गोपः गोपाभ्याम् गोपाभ्यः। गोपः गोपोः गोपाम्। गोपि गोपोः गोपासु। हे गोपाः हे गोपौ हे गोपाः। ७. सखि शब्दके पूरे रूप इस प्रकार हैं—सखा सखायौ सखायः। सखायम् सखायौ सखीन्। सख्या सखिभ्याम् सखिभिः। सख्ये सखिभ्याम् सखिभ्यः। सख्युः सखिभ्याम् सखिभ्यः। सख्युः सख्योः सखीनाम्। सख्यौ सख्योः सखिषु। हे सखे हे सखायौ हे सखायः। ८. इसके दो विभक्तियोंमें रूप इस प्रकार होते हैं—पतिः पती पतयः। पतिम् पती पतीन्। शेष विभक्तियोंमें सखि शब्दके समान रूप होते हैं। सम्बोधनमें हे पते हे पती हे पतयः—इस प्रकार रूप जानने चाहिये। ९. इसके रूप इस प्रकार हैं—हरिः हरी हरयः। हरिम् हरी हरीन्। हरिणा हरिभ्याम् हरिभिः। हरये हरिभ्याम् हरिभ्यः। हरेः हरिभ्याम् हरिभ्यः। हरेः हर्योः हरीणाम्। हरौ हर्योः हरिषु। हे हरे हे हरी हे हरयः। १०. इसके रूप इस प्रकार हैं—सुश्रीः सुश्रियौ सुश्रियः। सुश्रियम् सुश्रियौ सुश्रियः। सुश्रिया सुश्रीभ्याम् सुश्रीभिः। सुश्रिये सुश्रीभ्याम् सुश्रीभ्यः। सुश्रियः सुश्रीभ्याम् सुश्रीभ्यः। सुश्रियः सुश्रियोः सुश्रियाम्। सुश्रियि सुश्रियोः सुश्रीषु। हे सुश्रीः हे सुश्रियौ हे सुश्रियः। ११. इसके रूप इस प्रकार हैं—भानुः भानू भानवः। भानुम् भानू भानून्। भानुना भानुभ्याम् ३ भानुभिः। भानवे भानुभ्यः २। भानोः

२३६* संक्षिप्त नारदपुराण *

प्रयोग प्रायः ब्रह्माजीके लिये होता है^१। काम करनेवालेको कर्ता कहते हैं। यह 'कर्तृ' शब्दका रूप है^२। 'रै' शब्द धनका वाचक है^३। पुँल्लिङ्गमें 'गो' शब्दका अर्थ बैल होता है और स्त्रीलिङ्गमें गाय^४। 'नौ' शब्द नौकाका वाचक है^५। यहाँतक स्वरान्त पुँल्लिङ्ग शब्दोंके रूप दिये गये हैं।

अब हलन्त पुँल्लिङ्ग शब्दोंके रूप दिये जा रहे हैं। गाड़ी खींचनेवाले बैलको अनड्वान् कहते हैं। यह अनडुहशब्दका रूप है^६। गाय दुहनेवालेको गोधुक् कहते हैं। मूल शब्द गोदुह् है^७। लिह शब्दका अर्थ है चाटनेवाला^८। 'द्वि' शब्द संख्या दोका, 'त्रि' शब्द तीनका और 'चतुर्' शब्द चारका वाचक है। इनमेंसे पहला केवल द्विवचनमें और शेष दोनों केवल बहुवचनमें प्रयुक्त होते हैं^९॥३७॥

राजा पन्थास्तथा दण्डी ब्रह्महा पञ्च चाष्ट च।
अष्टौ अयं मुने सम्राट् सुराड्बिभ्रद्वपुष्मतः ॥३८॥

राजा राजन्-शब्दका रूप है^{१०}। पन्थाः कहते हैं मार्गको। यह पथिन् शब्दका रूप है^{११}। जो दण्ड धारण करे, उसे दण्डी कहते हैं^{१२}। ब्रह्महन् शब्द ब्राह्मणघातीके अर्थमें प्रयुक्त होता है^{१३}। पञ्चन्-शब्द पाँचका और अष्टन् शब्द आठका


२ भान्वोः २ भानूनाम्। भानौ भानुषु। हे भानो हे भानू हे भानवः।

१. स्वयम्भू शब्दके रूप इस प्रकार हैं—स्वयम्भूः स्वयम्भुवौ २ स्वयम्भुवः २। स्वयम्भुवम्। स्वयम्भुवा स्वयम्भूभ्याम् ३। स्वयम्भूभिः। स्वयम्भुवे स्वयम्भूभ्यः २। स्वयम्भुवः २। स्वयम्भुवोः २। स्वयम्भुवाम्। स्वयम्भुवि स्वयम्भूषु।

२. इसके पूरे रूप इस प्रकार हैं—कर्ता कर्तारौ २ कर्तारः। कर्तारम् कर्तॄन्। कर्त्रा कर्तृभ्याम् ३ कर्तृभिः। कर्त्रे कर्तृभ्यः २। कर्तुः २। कर्त्रोः २ कर्तॄणाम्। कर्तरि कर्तृषु। हे कर्तः हे कर्तारौ हे कर्तारः।

३. उसके रूप इस प्रकार हैं—राः रायौ २ रायः २। रायम्। राया राभ्याम् ३ राभिः। राये राभ्यः २। रायः २। रायोः ४. रायाम्। रायि रासु। सम्बोधने प्रथमावत्।

२. दोनों लिङ्गोंमें इसके एक-से ही रूप होते हैं, जो इस प्रकार हैं—गौः गावौ २ गावः। गाम् गाः। गवा गोभ्याम् ३ गोभिः। गवे गोभ्यः २। गोः २। गवोः २ गवाम्। गवि गोषु। हे गौः हे गावौ हे गावः।

५. इसका प्रयोग स्त्रीलिङ्गमें होता है, तथापि यहाँ पुँल्लिङ्गके प्रकरणमें इसे लिखा गया है, प्रकरणके अनुसार 'सुनौ' शब्द यहाँ ग्रहण करना चाहिये। इसके रूप इस प्रकार हैं—नौः नावौ २ नावः २। नावम्। नावा नौभ्याम् ३ नौभिः। नावे नौभ्यः २। नावः २। नावोः २ नावाम्। नावि नौषु।

६. इसके पूरे रूप इस प्रकार हैं—अनड्वान् अनड्वाहौ २ अनड्वाहः। अनड्वाहम् अनडुहः। अनडुहा अनडुद्भ्याम् ३ अनडुद्भिः। अनडुहे अनडुद्भ्यः २। अनडुहः २। अनडुहोः २ अनडुहाम्। अनडुहि अनडुत्सु। सम्बोधनके एकवचनमें हे अनड्वन्।

७. इसके रूप इस प्रकार होते हैं—गोधुक् गोधुग् गोधुहौ २ गोदुहः २। गोदुहम्। गोदुहा गोधुग्भ्याम् गोधुग्भिः। गोदुहे गोधुग्भ्यः २। गोदुहः २। गोदुहोः २ गोदुहाम्। गोदुहि गोधुक्षु।

८. इसके रूप इस प्रकार हैं—लिट् लिड् लिहौ लिहः २। लिहम्। लिहा लिड्भ्याम् ३ लिड्भिः। लिहे लिड्भ्यः २। लिहः २। लिहोः २ लिहाम्। लिहि लिट्सु लिड्सु।

९. रूप क्रमशः इस प्रकार हैं—द्वौ २ द्वाभ्याम् ३ द्वयोः २। त्रयः। त्रीन्। त्रिभिः। त्रिभ्यः २। त्रयाणाम्। त्रिषु चत्वारः। चतुरः। चतुर्भिः। चतुर्भ्यः २। चतुर्णाम्। चतुर्षु।

१०. इसके पूरे रूप इस प्रकार हैं—राजा राजानौ २ राजानः। राजानम् राज्ञः। राज्ञा राजभ्याम् ३ राजभिः। राज्ञे राजभ्यः २। राज्ञः २। राज्ञोः २ राज्ञाम्। राज्ञि राजनि राजसु। हे राजन् हे राजानौ हे राजानः।

११. शेष रूप इस प्रकार समझने चाहिये—पन्थानौ २ पन्थानः पन्थानम् पथः। पथा पथिभ्याम् ३ पथिभिः। पथे पथिभ्यः २। पथः २। पथोः २ पथाम्। पथि पथिषु।

१२. इसका मूल शब्द दण्डिन् है, जिसके रूप इस प्रकार हैं—दण्डी दण्डिनौ २ दण्डिनः २। दण्डिनम्। दण्डिना दण्डिभ्याम् ३ दण्डिभिः। दण्डिने दण्डिभ्यः २। दण्डिनः २। दण्डिनोः २ दण्डिनाम्। दण्डिनि दण्डिषु। हे दण्डिन्।

१३. इसके रूप इस प्रकार हैं—ब्रह्महा ब्रह्महणौ २ ब्रह्महणः। ब्रह्महणम् ब्रह्मघ्नः। ब्रह्मघ्ना ब्रह्महभ्याम् ब्रह्महभिः। ब्रह्मघ्ने ब्रह्महभ्यः २। ब्रह्मघ्नः २। ब्रह्मघ्नोः २ ब्रह्मघ्नाम्। ब्रह्मघ्नि ब्रह्महसु।