संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पूर्वभाग-द्वितीय पाद २२१
- पूर्वभाग-द्वितीय पाद * २२१
'अन्नात् परिस्रुतो०' इत्यादि मन्त्र शुक्रके, 'शन्नो देवी०' इत्यादि मन्त्र शनैश्चरके, 'काण्डाट् काण्डाट्०' इत्यादि मन्त्र राहुके और 'केतुं कृण्वन्नकेतवे०' इत्यादि मन्त्र केतुके हैं। आक, पलाश, खैर, अपामार्ग, पीपल, गूलर, शमी, दूर्वा और कुशा—ये क्रमशः सूर्य आदि ग्रहोंकी समिधा हैं। सूर्यादि ग्रहोंमेंसे प्रत्येकके लिये एक सौ आठ या अट्ठाईस बार मधु, घी, दही अथवा खीरकी आहुति देनी चाहिये। गुड़ मिलाया हुआ भात, खीर, हविष्य (मुनि-अन्न), दूध मिलाया हुआ साठीके चावलका भात, दही-भात, घी-भात, तिलचूर्णमिश्रित भात, माष (उड़द) मिलाया हुआ भात और खिचड़ी—इनको ग्रहके क्रमानुसार विद्वान् पुरुष ब्राह्मणके लिये भोजन दे। अपनी शक्तिके अनुसार यथाप्राप्त वस्तुओंसे ब्राह्मणोंका विधिपूर्वक सत्कार करके उनके लिये क्रमशः धेनु, शङ्ख, बैल, सुवर्ण, वस्त्र, अश्व, काली गौ, लोहा और बकरा—ये वस्तुएँ दक्षिणामें दे। ये ग्रहोंकी दक्षिणाएँ बतायी गयी हैं। जिस-जिस पुरुषके लिये जो ग्रह जब अष्टम आदि दुष्ट स्थानोंमें स्थित हो, वह पुरुष उस ग्रहकी उस समय विशेष यत्नपूर्वक पूजा करे। ब्रह्माजीने इन ग्रहोंको वर दिया है कि 'जो तुम्हारी पूजा करें, उनकी तुम भी पूजा (मनोरथपूर्तिपूर्वक सम्मान) करना। राजाओंके धन और जातिका उत्कर्ष तथा जगत्की जन्म-मृत्यु भी ग्रहोंके ही अधीन है; अतः ग्रह सभीके लिये पूजनीय हैं। जो सदा सूर्यदेवकी पूजा एवं स्कन्दस्वामीको तथा महागणपतिको तिलक करता है, वह सिद्धिको प्राप्त होता है। इतना ही नहीं, उसे प्रत्येक कर्ममें सफलता एवं उत्तम लक्ष्मीकी प्राप्ति होती है। जो मातृयाग किये बिना ग्रहपूजन करता है, उसपर मातृकाएँ कुपित होती हैं और उसके प्रत्येक कार्यमें विघ्न डालती हैं। शुभकी इच्छा रखनेवाले मनुष्योंको 'वसोः पवित्रम्०' इस मन्त्रसे वसुधारा समर्पित करके प्रत्येक माङ्गलिक कर्ममें गौरी आदि मातृकाओंकी पूजा करनी चाहिये। उनके नाम ये हैं—गौरी, पद्मा, शची, मेधा, सावित्री, विजया, जया, देवसेना, स्वधा, स्वाहा, मातृकाएँ, वैधृति, धृति, पुष्टि, हृष्टि और तुष्टि। इनके साथ अपनी कुलदेवी और गणेशजी अधिक हैं। वृद्धिके अवसरोंपर इन सोलह मातृकाओंकी अवश्य पूजा करनी चाहिये। इन सबकी प्रसन्नताके लिये क्रमशः आवाहन, पाद्य, अर्घ्य, (आचमनीय), स्नान, (वस्त्र), चन्दन, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप, फल, नैवेद्य, आचमनीय, ताम्बूल, पूगीफल, आरती तथा दक्षिणा—ये उपचार समर्पित करने चाहिये।
अब मैं पितृकल्पका वर्णन करूँगा, जो धन और संततिकी वृद्धि करनेवाला है। अमावस्या, अष्टका, वृद्धि (विवाहादिका अवसर), कृष्णपक्ष, दोनों अयनोंके आरम्भका दिन, श्राद्धीय द्रव्यकी उपस्थिति, उत्तम ब्राह्मणकी प्राप्ति, विषुवत् योग, सूर्यकी संक्रान्ति, व्यतीपात योग, गजच्छाया, चन्द्रग्रहण, सूर्यग्रहण तथा श्राद्धके लिये रुचिका होना—ये सभी श्राद्धके समय अथवा अवसर कहे गये हैं। सम्पूर्ण वेदोंके ज्ञानमें अग्रगण्य, श्रोत्रिय, ब्रह्मवेत्ता, युवक, मन्त्र और ब्राह्मणरूप वेदका तत्त्वज्ञ, ज्येष्ठ सामका गान करनेवाला, त्रिमधु¹, त्रिसुपर्ण², भानजा, ऋत्विक्, जामाता, यजमान, श्वशुर, मामा, त्रिणाचिकेत³, दौहित्र,
१. 'मधु वाता०' इत्यादि तीन ऋचाओंका जप और तदनुकूल व्रतका आचरण करनेवाला। २. त्रिसौपर्णी ऋचाओंका अध्येता और तत्सम्बन्धी व्रतका पालन करनेवाला। ३. त्रिणाचिकेत-संज्ञक त्रिविध अग्निविद्याको जाननेवाला और तदनुकूल व्रतका पालक।
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* संक्षिप्त नारदपुराण *
शिष्य, सम्बन्धी, बान्धव, कर्मनिष्ठ, तपोनिष्ठ, पञ्चाग्निसेवी*, ब्रह्मचारी तथा पिता-माताके भक्त ब्राह्मण श्राद्धकी सम्पत्ति हैं। रोगी, न्यूनाङ्ग, अधिकाङ्ग, काना, पुनर्भूकी संतान, अवकीर्णी (ब्रह्मचर्य-आश्रममें रहते हुए ब्रह्मचर्य भंग करनेवाला), कुण्ड (पतिके जीते-जी पर-पुरुषसे उत्पन्न की हुई संतान), गोलक (पतिकी मृत्युके बाद जारज संतान), खराब नखवाला, काले दाँतवाला, वेतन लेकर पढ़ानेवाला, नपुंसक, कन्याको कलङ्कित करनेवाला, स्वयं जिसपर दोषारोपण किया गया हो वह, मित्र-द्रोही, चुगलखोर, सोमरस बेचनेवाला, बड़े भाईके अविवाहित रहते विवाह करनेवाला, माता, पिता और गुरुका त्याग करनेवाला, कुण्ड और गोलकका अन्न खानेवाला, शूद्रसे उत्पन्न, एक पतिको छोड़कर आयी हुई स्त्रीका पति, चोर और कर्मभ्रष्ट—ये ब्राह्मण श्राद्धमें निन्दित हैं (अतः इनका त्याग करना चाहिये)।
श्राद्धकर्ता पुरुष मन और इन्द्रियोंको वशमें रखकर, पवित्र हो, श्राद्धसे एक दिन पहले ब्राह्मणोंको निमन्त्रित करे। उन ब्राह्मणोंको भी उसी समयसे मन, वाणी, शरीर तथा क्रियाद्वारा पूर्ण संयमशील रहना चाहिये। श्राद्धके दिन अपराह्नकालमें आये हुए ब्राह्मणोंका स्वागतपूर्वक पूजन करे। स्वयं हाथमें कुशकी पवित्री धारण किये रहे। जब ब्राह्मणलोग आचमन कर लें, तब उन्हें आसनपर बिठाये। देवकार्यमें अपनी शक्तिके अनुसार युग्म (दो, चार, छः आदि संख्यावाले) ब्राह्मणोंको और श्राद्धमें अयुग्म (एक, तीन, पाँच, आदि संख्यावाले) ब्राह्मणोंको निमन्त्रित करे। सब ओरसे घिरे हुए गोबर आदिसे लिपे-पुते पवित्र स्थानमें, जहाँ दक्षिण दिशाकी ओर भूमि कुछ नीची हो, श्राद्ध करना चाहिये। वैश्वदेव-श्राद्धमें दो ब्राह्मणोंको पूर्वाभिमुख बिठाये और पितृकार्यमें तीन ब्राह्मणोंको उत्तराभिमुख। अथवा दोनोंमें एक-एक ब्राह्मणको ही सम्मिलित करे। मातामहोंके श्राद्धमें भी ऐसा ही करना चाहिये। अर्थात् दो वैश्वदेव-श्राद्धमें और तीन मातामहादि श्राद्धमें अथवा उभयपक्षमें एक-ही-एक ब्राह्मण रखे।
वैश्वदेव-श्राद्धके लिये ब्राह्मणका हाथ धुलानेके निमित्त उसके हाथमें जल दे और आसनके लिये कुश दे। फिर ब्राह्मणसे पूछे—‘मैं विश्वेदेवोंका आवाहन करना चाहता हूँ।' तब ब्राह्मण आज्ञा दें—‘आवाहन करो।' इस प्रकार उनकी आज्ञा पाकर ‘विश्वेदेवास आगत०' इत्यादि ऋचा पढ़कर विश्वेदेवोंका आवाहन करे। तब ब्राह्मणके समीपकी भूमिपर जौ बिखेरे। फिर पवित्रीयुक्त अर्घ्यपात्रमें ‘शं नो देवी०' इस मन्त्रसे जल छोड़े, ‘यवोऽसि०' इत्यादिसे जौ डाले, फिर बिना मन्त्रके ही गन्ध और पुष्प भी छोड़ दे। तत्पश्चात् ‘या दिव्या आपः०' इस मन्त्रसे अर्घ्यको अभिमन्त्रित करके ब्राह्मणके हाथमें संकल्पपूर्वक अर्घ्य दे और कहे—‘अमुकश्राद्धे विश्वेदेवाः इदं वो हस्तार्घ्यं नमः।' यों कहकर वह अर्घ्यजल कुशयुक्त ब्राह्मणके हाथमें या कुशापर गिरा दे। तत्पश्चात् हाथ धोनेके लिये जल देकर क्रमशः गन्ध, पुष्प, धूप, दीप तथा आच्छादन वस्त्र अर्पण करे; पुनः हस्तशुद्धिके लिये जल दे। (विश्वेदेवोंको जो कुछ भी दे, सव्यभावसे उत्तराभिमुख होकर दे और पितरोंको प्रत्येक वस्तु अपसव्यभावसे दक्षिणाभिमुख होकर देनी चाहिये)।
वैश्वदेवकाण्डके अनन्तर यज्ञोपवीत अपसव्य
*सभ्य, आवसथ्य तथा त्रिणाचिकेत—इन पाँच अग्नियोंका उपासक।
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करके पिता आदि तीनके लिये तीन द्विगुण-भुग्न कुशोंको उनके आसनके लिये अप्रदक्षिण-क्रमसे दे। फिर पूर्ववत् ब्राह्मणोंकी आज्ञा लेकर 'उशन्तस्त्वा०' इत्यादि मन्त्रसे पितरोंका आवाहन करके 'आयन्तु नः०' इत्यादिका जप करे। 'अपहता असुरा रक्षांसि वेदिषदः०' यह मन्त्र पढ़ कर सब ओर तिल बिखेरे। वैश्वदेव-श्राद्धमें जो कार्य जैसे किया जाता है, वही पितृश्राद्धमें तिलसे करना चाहिये। अर्घ्य आदि पूर्ववत् करे। संस्रव (ब्राह्मणके हाथसे चुए हुए जल) पितृपात्रमें ग्रहण करके भूमिपर दक्षिणाग्र कुश रखकर उसके ऊपर उस पात्रको अधोमुख करके ढुलका दे और कहे 'पितृभ्यः स्थानमसि।' फिर उसके ऊपर अर्घ्यपात्र और पवित्रक आदि रखकर गन्ध, पुष्प, धूप, दीप आदि पितरोंको निवेदित करे।
इसके बाद 'अग्नौ करण' कर्म करे। घीसे तर किया हुआ अन्न लेकर ब्राह्मणोंसे पूछे—'अग्नौ करिष्ये' (मैं अग्निमें इसकी आहुति देना चाहता हूँ)। तब ब्राह्मण इसके लिये आज्ञा दें। इस प्रकार आज्ञा लेकर वह पिण्डपितृयज्ञकी भाँति उस अन्नकी दो आहुति दे (उस समय ये दो मन्त्र क्रमशः पढ़े—अग्नये कव्यवाहनाय स्वाहा नमः। सोमाय पितृमते स्वाहा नमः।)। फिर होमशेष अन्नको एकाग्रचित्त होकर यथाप्राप्त पात्रोंमें—विशेषतः चाँदीके पात्रोंमें परोसे। इस प्रकार अन्न परोसकर 'पृथिवी ते पात्रं द्यौरपिधानम्०' इत्यादि मन्त्र पढ़कर पात्रको अभिमन्त्रित करे। फिर 'इदं विष्णु०' इत्यादि मन्त्रका उच्चारण करके अन्नमें ब्राह्मणके अँगूठेका स्पर्श कराये। तदनन्तर तीनों व्याहृतियोंसहित गायत्रीमन्त्र तथा 'मधु वाता०' इत्यादि तीन ऋचाओंका जप करे और ब्राह्मणोंसे कहे—'आप सुखपूर्वक अन्न ग्रहण करें।' फिर वे ब्राह्मण भी मौन होकर प्रसन्नतापूर्वक भोजन करें।
उस समय यजमान क्रोध और उतावलीको त्याग दे और जबतक ब्राह्मणलोग पूर्णतः तृप्त न हो जायँ, तबतक पूछ-पूछकर प्रिय अन्न और हविष्य उन्हें परोसता रहे। उस समय पूर्वोक्त मन्त्रोंका तथा पावमानी आदि ऋचाओंका जप या पाठ करते रहना चाहिये। तत्पश्चात् अन्न लेकर ब्राह्मणोंसे पूछे—'क्या आप पूर्ण तृप्त हो गये?' ब्राह्मण कहें—'हाँ, हम तृप्त हो गये।' यजमान फिर पूछे—'शेष अन्न क्या किया जाय?' ब्राह्मण कहें—'इष्टजनोंके साथ भोजन करो।' उनकी इस आज्ञाको 'बहुत अच्छा' कहकर स्वीकार करे। फिर हाथमें लिये हुए अन्नको ब्राह्मणोंके आगे उनकी जूठनके पास ही दक्षिणाग्र कुश भूमिपर रखकर उन कुशोंपर तिल-जल छोड़कर वह अन्न रख दे। उस समय 'ये अग्निदग्धाः०' इत्यादि मन्त्रका पाठ करे। फिर ब्राह्मणोंके हाथमें कुल्ला करनेके लिये एक-एक बार जल दे। फिर पिण्डके लिये तैयार किया हुआ सारा अन्न लेकर दक्षिणाभिमुख हो पिण्डपितृयज्ञ-कल्पके अनुसार तिलसहित पिण्डदान करे। इसी प्रकार मातामह आदिके लिये पिण्ड दे। फिर ब्राह्मणोंके आचमनार्थ जल दे, तदनन्तर ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराये और उनके हाथमें जल देकर उनसे प्रार्थनापूर्वक कहे—आपलोग 'अक्षय्यमस्तु' कहें। तब ब्राह्मण 'अक्षय्यम् अस्तु' बोलें। इसके बाद उन्हें यथाशक्ति दक्षिणा देकर कहे—'अब मैं स्वधावाचन कराऊँगा।' ब्राह्मण कहें—'स्वधावाचन कराओ।' इस प्रकार उनकी आज्ञा पाकर पितरों और मातामहादिके लिये 'आप यह स्वधावाचन करें, ऐसा कहे। तब ब्राह्मण बोलें—'अस्तु स्वधा।' इसके अनन्तर पृथ्वीपर जल सींचे और 'विश्वेदेवाः प्रीयन्ताम्' यों कहे। ब्राह्मण भी इस वाक्यको दुहरायें—'प्रीयन्तां विश्वेदेवाः।' तदनन्तर ब्राह्मणोंकी आज्ञासे
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श्राद्धकर्ता निम्नाङ्कित मन्त्रका जप करे—
दातारो नोऽभिवर्धन्तां वेदाः सन्ततिरेव च।
श्रद्धा च नो मा व्यगमद् बहु देयं च नोऽस्त्विति ॥
'मेरे दाता बढ़ें। वेद और संतति बढ़े। हमारी श्रद्धा कम न हो और हमारे पास दानके लिये बहुत धन हो।'
यह कहकर ब्राह्मणोंसे नम्रतापूर्वक प्रिय वचन बोले और उन्हें प्रणाम करके विसर्जन करे—'वाजे-वाजे०' इत्यादि ऋचाओंको पढ़कर प्रसन्नतापूर्वक विसर्जन करे। पहले पितरोंका, फिर विश्वेदेवोंका विसर्जन करना चाहिये। पहले जिस अर्घ्यपात्रमें संस्रवका जल डाला गया था, उस पितृपात्रको उत्तान करके ब्राह्मणोंको विदा करना चाहिये। ग्रामकी सीमातक ब्राह्मणोंके पीछे-पीछे जाकर उनके कहनेपर उनकी परिक्रमा करके लौटे और पितृसेवित श्राद्धान्नको इष्टजनोंके साथ भोजन करे। उस रात्रिमें यजमान और ब्राह्मण—दोनोंको ब्रह्मचारी रहना चाहिये।
इसी प्रकार पुत्र-जन्म और विवाहादि वृद्धिके अवसरोंपर प्रदक्षिणावृत्तिसे नान्दीमुख पितरोंका यजन करे। दही और बेर मिले हुए अन्नका पिण्ड दे और तिलसे किये जानेवाले सब कार्य जौसे करे। एकोद्दिष्ट श्राद्ध बिना वैश्वदेवके होता है। उसमें एक ही अर्घ्यपात्र तथा एक ही पवित्रक दिया जाता है। इसमें आवाहन और अग्नौकरणकी क्रिया नहीं होती। सब कार्य जनेऊको अपसव्य रखकर किये जाते हैं। 'अक्षय्यमस्तु' के स्थानमें 'उपनिष्ठताम्' का प्रयोग करे। 'वाजे-वाजे०' इस मन्त्रसे ब्राह्मणका विसर्जन करते समय 'अभिरम्यताम्' यों कहे और ये ब्राह्मणलोग 'अभिरताः स्मः' ऐसा उत्तर दें। सपिण्डीकरण श्राद्धमें पूर्वोक्त विधिसे अर्घ्यसिद्धिके लिये गन्ध, जल और तिलसे युक्त चार अर्घ्यपात्र तैयार करे। (इनमेंसे तीन तो पितरोंके पात्र हैं और एक प्रेतका पात्र होता है।) इनमें प्रेतके पात्रका जल पितरोंके पात्रोंमें डाले। उस समय 'ये समाना०' इत्यादि दो मन्त्रोंका उच्चारण करे। शेष क्रिया पूर्ववत् करे। यह सपिण्डीकरण और एकोद्दिष्ट श्राद्ध माताके लिये भी करना चाहिये। जिसका सपिण्डीकरणश्राद्ध वर्ष पूर्ण होनेसे पहले हो जाता है, उसके लिये एक वर्षतक ब्राह्मणको सान्नोदक कुम्भदान देते रहना चाहिये। एक वर्षतक प्रतिमास मृत्युतिथिको एकोद्दिष्ट करना चाहिये; फिर प्रत्येक वर्षमें एक बार क्षयाहतिथिको एकोद्दिष्ट करना उचित है। प्रथम एकोद्दिष्ट तो मरनेके बाद ग्यारहवें दिन किया जाता है। सभी श्राद्धोंमें पिण्डोंको गाय, बकरे अथवा लेनेकी इच्छावाले ब्राह्मणोंको दे देना चाहिये। अथवा उन्हें अग्निमें या अगाध जलमें डाल देना चाहिये। जबतक ब्राह्मणलोग भोजन करके वहाँसे उठ न जायँ, तबतक उच्छिष्ट स्थानपर झाडू न लगाये। श्राद्धमें हविष्यान्नके दानसे एक मासतक और खीर देनेसे एक वर्षतक पितरोंकी तृप्ति बनी रहती है। भाद्रपद कृष्णा त्रयोदशीको विशेषतः मघा नक्षत्रका योग होनेपर जो कुछ पितरोंके निमित्त दिया जाता है वह अक्षय होता है। एक चतुर्दशीको छोड़कर प्रतिपदासे अमावास्यातककी चौदह तिथियोंमें श्राद्ध-दान करनेवाला पुरुष क्रमशः इन चौदह फलोंको पाता है—रूप-शीलयुक्त कन्या, बुद्धिमान् तथा रूपवान् दामाद, पशु, श्रेष्ठ पुत्र, द्यूत-विजय, खेतीमें लाभ, व्यापारमें लाभ, दो खुर और एक खुरवाले पशु, ब्रह्मतेजसे सम्पन्न पुत्र, सुवर्ण, रजत, कुप्यक (त्रपु-सीसा आदि), जाति-भाइयोंमें श्रेष्ठता और सम्पूर्ण मनोरथ। जो लोग शस्त्रद्वारा मारे गये हों, उन्हींके लिये उस चतुर्दशी तिथिको श्राद्ध प्रदान किया जाता है।
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स्वर्ग, संतान, ओज, शौर्य, क्षेत्र, बल, पुत्र, श्रेष्ठता, सौभाग्य, समृद्धि, प्रधानता, शुभ, प्रवृत्तचक्रता (अप्रतिहत शासन), वाणिज्य आदि, नीरोगता, यश, शोकहीनता, परम गति, धन, वेद, चिकित्सामें सफलता, कुप्य (त्रपु-सीसा आदि), गौ, बकरी, भेड़, अश्व तथा आयु—इन सत्ताईस प्रकारके काम्य पदार्थोंको क्रमशः वही पाता है जो कृत्तिकासे लेकर भरणीपर्यन्त प्रत्येक नक्षत्रमें विधिपूर्वक श्राद्ध करता है तथा आस्तिक, श्रद्धालु एवं मद-मात्सर्य आदि दोषोंसे रहित होता है। वसु, रुद्र और आदित्य—ये तीन प्रकारके पितर श्राद्धके देवता हैं। ये श्राद्धसे संतुष्ट किये जानेपर मनुष्योंके पितरोंको तृप्त करते हैं। जब पितर तृप्त होते हैं, तब वे मनुष्योंको आयु, प्रजा, धन, विद्या, स्वर्ग, मोक्ष, सुख तथा राज्य प्रदान करते हैं। इस प्रकार मैंने कल्पाध्यायका विषय थोड़ेमें बताया है। वेद तथा पुराणान्तरसे विशेष बातें जाननी चाहिये। मुनीश्वर! जो विद्वान् इस कल्पाध्यायका चिन्तन करता है, वह इस लोकमें कर्म-कुशल होता है और परलोकमें शुभ गति पाता है। जो मनुष्य देवकार्य तथा पितृकार्यमें इस कल्पाध्यायका भक्तिपूर्वक श्रवण करता है, वह यज्ञ और श्राद्धका पूरा फल पाता है। इतना ही नहीं, वह इस लोकमें धन, विद्या, यश और पुत्र पाता है तथा परलोकमें उसे परम गति प्राप्त होती है। अब मैं वेदके मुखस्वरूप व्याकरणका संक्षेपसे वर्णन करूँगा। एकाग्रचित्त होकर सुनो। (पूर्वभाग, द्वितीय पाद, अध्याय ५१)
व्याकरण-शास्त्रका वर्णन
सनन्दन उवाच
अथ व्याकरणं वक्ष्ये संक्षेपात्तव नारद।
सिद्धरूपप्रबन्धेन मुखं वेदस्य साम्प्रतम्॥ १॥
सनन्दनजी कहते हैं—अब मैं शब्दोंके सिद्धरूपोंका उल्लेख करते हुए तुमसे संक्षेपमें व्याकरणका वर्णन करता हूँ; क्योंकि व्याकरण वेदका मुख है॥ १॥
सुप्तिङन्तं पदं विप्र सुपां सप्त विभक्तयः।
स्वौजसः प्रथमा प्रोक्ता सा प्रातिपदिकात्मिका॥ २॥
विप्रवर! सुबन्त¹ और तिङन्त² पदको शब्द कहते हैं (जिसके अन्तमें ‘सुप्’ प्रत्यय हों, वह सुबन्त कहलाता है)। सुप्की सात विभक्तियाँ हैं। उनमेंसे प्रथमा (पहली) विभक्ति सु, औ, जस्—इस प्रकार बतायी गयी है (‘सु’ प्रथमाका एकवचन है, ‘औ’ द्विवचन है और ‘जस्’ बहुवचन है)। प्रथमा विभक्ति प्रातिपदिक (नाम) स्वरूप मानी गयी है॥ २॥
सम्बोधने च लिङ्गादावुक्ते कर्मणि कर्तरि।
अर्थवत्प्रातिपदिकं धातुप्रत्ययवर्जितम्॥ ३॥
सम्बोधनमें³ प्रथमा विभक्तिका प्रयोग होता
१. रामः, हरिम्, पितुः, रमायाः, ज्ञानम् इत्यादि। २. तिङ् विभक्ति जिसके अन्तमें हो, उसे तिङन्त कहते हैं। तिङ्के दो विभाग हैं—परस्मैपद और आत्मनेपद। इन दोनोंमें तीन पुरुष होते हैं—प्रथम, मध्यम तथा उत्तम। प्रत्येक पुरुषमें तीन वचन होते हैं—एकवचन, द्विवचन और बहुवचन। परस्मैपदके प्रथम पुरुषसम्बन्धी प्रत्यय इस प्रकार हैं—‘तिप्, तस्, अन्ति।’ ये क्रमशः एकवचन, द्विवचन तथा बहुवचन हैं। इसी प्रकार आगे भी समझना चाहिये। आत्मनेपदके प्रथम पुरुषमें ‘ते, आते, अन्ते’ ये प्रत्यय होते हैं। इस प्रकार दोनों पदोंके तीनों पुरुषसम्बन्धी प्रत्ययोंका मूलमें ही उल्लेख हुआ है। यहाँ संक्षेपसे दिग्दर्शन कराया गया है। ‘ति’ से लेकर ‘महे’ तकके समस्त प्रत्ययोंका संक्षिप्त नाम ‘तिङ्’ है। ये जिसके अन्तमें हों, वह ‘तिङन्त’ है। उसीकी ‘पद’ संज्ञा होती है। उदाहरण—‘भवति’ (होता है), ‘पपाठ’ (पढ़ा), ‘गमिष्यति’ (जायगा), ‘एधते’ (बढ़ता है) इत्यादि। ३. ‘सम्बोधनमें प्रथमा विभक्तिका प्रयोग होता है—‘हे राम’ इत्यादि।
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है; जहाँ प्रतिपदिकके अतिरिक्त लिङ्ग^१, परिमाण^२ और वचन^३ आदिका बोध कराना हो, वहाँ भी प्रथमा विभक्तिका ही प्रयोग होता है। उक्त^४ कर्ममें (जहाँ कर्म वाच्य हो, उसमें) तथा उक्त कर्तामें^५ (जहाँ कर्ता वाच्य हो, उसमें) भी प्रथमा विभक्तिका ही प्रयोग होता है। धातु और प्रत्ययसे रहित सार्थक शब्दकी प्रातिपदिक^६ संज्ञा होती है॥ ३॥
अमौशसो द्वितीया स्यात् तत्कर्म क्रियते च यत्।
द्वितीया कर्मणि प्रोक्तान्तरान्तरेण संयुते ॥ ४॥
अम्, औ, शस्—यह द्वितीया विभक्ति है (यहाँ भी 'अम्' आदिको क्रमशः एकवचन, द्विवचन और बहुवचन समझना चाहिये)। जो किया जाता है, उसे कर्म कहते हैं। अनुक्त^७ कर्ममें द्वितीया विभक्तिका प्रयोग कहा गया है (कर्तृवाच्य वाक्योंमें कर्म अनुक्त होता है, वहाँ उसकी प्रधानता नहीं रहती, इसीलिये उसे 'अनुक्त' कहा गया है)। 'अन्तरा', 'अन्तरेण' इन शब्दोंका जिसके साथ संयोग या अन्वय हो, उस शब्दमें द्वितीया विभक्तिका^८ प्रयोग करना चाहिये ॥ ४॥
टाभ्याम्भिसस्तृतीया स्यात् करणे कर्तरिरीता।
येन क्रियते तत्करणं स कर्ता स्यात्करोति यः ॥ ५॥
'टा', 'भ्याम्', 'भिस्'—यह तृतीया विभक्ति है (यहाँ भी पूर्ववत् एकवचन आदिका विभाग समझना चाहिये)। करणमें^९ और अनुक्त^१० कर्तामें तृतीया विभक्ति बतायी गयी है। जिसकी सहायतासे कार्य किया जाता है, उसका नाम करण है और जो कार्य करता है, उसे कर्ता कहते हैं (जिस वाक्यमें कर्मकी प्रधानता होती है, वहाँ कर्ता अनुक्त माना गया है) ॥ ५॥
ङेभ्याम्भ्यसश्चतुर्थी स्यात्सम्प्रदाने च कारके।
यस्मै दित्सां धारयेद्द्वै रोचते सम्प्रदानकम् ॥ ६ ॥
'ङे', 'भ्याम्', 'भ्यस्'—यह चतुर्थी विभक्ति है। इसका प्रयोग सम्प्रदान कारकमें होता है। जिस व्यक्तिको कोई वस्तु देनेकी इच्छा मनमें धारण की जाय, उसकी 'सम्प्रदान^११' संज्ञा होती है तथा जिसको कोई वस्तु रुचिकर प्रतीत होती है, वह भी सम्प्रदान^१२ है (सम्प्रदानमें चतुर्थी विभक्ति होती है) ॥ ६॥
१. 'तटः', 'तटी', 'तटम्'। २. परिमाणका उदाहरण 'द्रोणो व्रीहिः' (एक दोन धान है) इत्यादि है। ३. 'एकः', 'द्वौ', 'बहवः'। ४. 'हरिः सेव्यते' (श्रीहरि भक्तोंद्वारा सेवित होते हैं), 'लक्ष्म्या सेवितः' (भगवान् विष्णु लक्ष्मीद्वारा सेवित हैं) इत्यादि। ५. 'रामः करोति' (राम करते हैं)। ६. धातुसे रहित इसलिये कहा गया कि 'अहन्' इत्यादि पदोंमें प्रातिपदिक संज्ञा होकर 'न' लोप न हो जाय। प्रत्ययरहित कहनेका कारण यह है कि 'हरिषु', 'करोषि' इत्यादिमें भी 'सु' की प्रातिपदिक संज्ञा न हो जाय। यदि प्रातिपदिक संज्ञा हो जाती तो औत्सर्गिक एकवचन लाकर पदसंज्ञा करनेपर उक्त उदाहरणोंमें दन्त्य 'स' के स्थानमें 'मूर्धन्य 'ष' नहीं हो पाता; क्योंकि पदादि 'स' कारके स्थानमें 'ष' कार होनेका निषेध है। प्रत्ययके निषेधसे प्रत्ययान्तका भी निषेध समझना चाहिये। इससे 'हरिषु' इत्यादि समुदायकी प्रातिपदिक संज्ञा नहीं होगी। सार्थक शब्दकी ही प्रातिपदिक संज्ञा होती है, निरर्थककी नहीं। इसलिये 'धनम्, वनम्' इत्यादिमें प्रत्येक अक्षरकी अलग-अलग 'प्रातिपदिक' संज्ञा नहीं हो सकती।
७. 'हरिं भजति' (श्रीहरिको भजता है)। इत्यादि वाक्योंमें 'हरि' इत्यादि पद अनुक्त है; इसलिये उनमें द्वितीया विभक्तिका प्रयोग होता है। ८. इसका उदाहरण है 'अन्तरा त्वां मां हरिः' (तुम्हारे और मेरे भीतर भी भगवान् हैं)। 'अन्तरेण हरिं न सुखम्' (भगवान्के बिना सुख नहीं है) इत्यादि। ९-१०. 'रामेण बाणेन हतो वाली' (श्रीरामने बाणसे वालीको मारा) इस वाक्यमें राम अनुक्त कर्ता हैं और बाण करण। अतः इन दोनोंमें तृतीया विभक्तिका प्रयोग हुआ है। ११. 'ब्राह्मणाय गां ददाति' (ब्राह्मणको गाय देता है) इस वाक्यमें ब्राह्मण सम्प्रदान है, इसलिये उसमें चतुर्थी हुई है। १२. इसका उदाहरण है—'हरये रोचते भक्तिः' (भगवान्को भक्ति पसंद है)।