संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पूर्वभाग-द्वितीय पाद २११
- पूर्वभाग-द्वितीय पाद * २११
व्यञ्जनसे उत्तरपदका आरम्भ हो, उसे पराङ्ग समझे। संयोगसे परवर्ती भागको स्वरयुक्त करना चाहिये, क्योंकि वह उत्तम एवं संयोगका नायक है, वहीं प्रधानतया स्वरकी विश्रान्ति होती है तथा व्यञ्जनसंयुक्त वर्णका पूर्व अक्षर स्वरित है; उसे बिना स्वरके ही बोलना चाहिये। अनुस्वार, पदान्त, प्रत्यय तथा सवर्णपद परे रहनेपर होनेवाला द्वित्व तथा रेफस्वरूप स्वरभक्ति—यह सब पूर्वाङ्ग कहलाता है। पादादिमें, पदादिमें, संयोग तथा अवग्रहोंमें भी 'य' कारके द्वित्वका प्रयोग करना चाहिये; उसे 'य्य' शब्द जानना चाहिये। अन्यत्र 'य' केवल 'य' के रूपमें ही रहता है। पदादिमें रहते हुए भी विच्छेद (विभाग) न होनेपर अथवा संयोगके अन्तमें स्थित होनेपर र् ह् रेफविशिष्ट य—इनको छोड़कर अन्य वर्णोंका अयादेश (द्वित्वाभाव) देखा जाता है। स्वयं संयोगयुक्त अक्षरको गुरु जानना चाहिये। अनुस्वारयुक्त तथा विसर्गयुक्त वर्णका गुरु होना तो स्पष्ट ही है। शेष अणु (ह्रस्व) है। 'हि' 'गो' इनमें प्रथम संयुक्त और दूसरा विसर्गयुक्त है। संयोग और विसर्ग दोनोंके आदि अक्षरका गुरुत्व भी स्पष्ट है। जो उदात्त है, वह उदात्त ही रहता है; जो स्वरित है, वह पदमें नीच (अनुदात्त) होता है। जो अनुदात्त है, वह तो अनुदात्त रहता ही है; जो प्रचयस्थ स्वर है, वह भी अनुदात्त हो जाता है। विभिन्न मन्त्रोंमें आये हुए 'अग्निः', 'सुतः' 'मित्रम्, 'इदम्', 'वयम्', 'अया', 'वहा', 'प्रियम्', 'दूतम्', 'घृतम्', 'चित्तम्' तथा 'अभि'—ये पद नीच (अर्थात् अनुदात्तसे आरम्भ) होते हैं। 'अर्क', 'सुत', 'यज्ञ', 'कलश', 'शत' तथा 'पवित्र'—इन शब्दोंमें अनुदात्तसे श्रुतिका उच्चारण प्रारम्भ किया जाता है। 'हरि', 'वरुण', 'वरेण्य', 'धारा' तथा 'पुरुष'—इन शब्दोंमें रेफयुक्त स्वर ही स्वरित होता है। 'विश्वानर' शब्दमें नकारयुक्त और अन्यत्र 'नर' शब्दोंमें रेफयुक्त स्वर ही स्वरित होता है। परंतु 'उदुत्तमं त्वं वरुण' इत्यादि वरुण-सम्बन्धी दो मन्त्रोंमें 'व' कार ही स्वरित होता है, रेफ नहीं। 'उरु धारा मरं कृतम्', 'उरु धारेव दोहने' इत्यादि मन्त्रोंमें 'धारा'का 'धाकार' ही स्वरित होता है, रेफ नहीं। (यह पूर्व नियमका अपवाद है) ह्रस्व या दीर्घ जो अक्षर यहाँ स्वरित होता है, उसकी पहली आधी मात्रा उदात्त होती है और शेष आधी मात्रा उससे परे अनुदात्त होती है (पाणिनिने भी यही कहा है—'तस्यादित उदात्तमर्धह्रस्वम्' [१। २। ३२]) कम्प, उत्स्वरित और अभिगीतके विषयमें जो द्विस्वरका प्रयोग होता है, वहाँ ह्रस्वको दीर्घके समान करे और ह्रस्व कर्षण करे। पलक मारनेमें जितना समय लगता है, वह एक मात्रा है। दूसरे आचार्य ऐसा मानते हैं कि बिजली चमककर जितने समयमें अदृश्य हो जाती है, वह एक 'मात्रा' का मान है। कुछ विद्वानोंका ऐसा मत है कि ऋ, छ अथवा श के उच्चारणमें जितना समय लगता है, उतने कालकी एक मात्रा होती है। समासमें यदि अवग्रह (विग्रह या पद-विच्छेद) करे तो उसमें समासपदको संहितायुक्त ही रखे; क्योंकि वहाँ जिससे अक्षरादिकरण होता है, उसी स्वरको उस समास-पदका अन्त मानते हैं। सर्वत्र, पुत्र, मित्र, सखि, अद्रि, शतक्रतु, आदित्य, प्रजातवेद, सत्पति, गोपति, वृत्रहा, समुद्र—ये सभी शब्द अवग्राह्य (अवग्रहके योग्य) हैं। 'स्वर्युवः', 'देवयुवः', 'अरतिम्', 'देवतातये', 'चिकितिः', 'चुक्रुधम्'—इन सबमें एक पद होनेके कारण पण्डितलोग अवग्रह नहीं करते। अक्षरोंके नियोगसे चार प्रकारकी विवृत्तियाँ जाननी चाहिये, ऐसा मेरा मत है। अब तुम मुझसे उनके
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नाम सुनो—वत्सानुसृता, वत्सानुसारिणी, पाकवती और पिपीलिका। जिसके पूर्वपदमें ह्रस्व और उत्तरपदमें दीर्घ है, वह ह्रस्वादिस्वरूप बछड़ोंसे अनुगत होनेके कारण 'वत्सानुसृता' विवृत्ति कही गयी है। जिसमें पहले ही पदमें दीर्घ और उत्तर पदमें ह्रस्व हो, वह 'वत्सानुसारिणी' विवृत्ति है। जहाँ दोनों पदोंमें ह्रस्व है, वह 'पाकवती' कहलाती है तथा जिसके दोनों पदोंमें दीर्घ है, वह 'पिपीलिका' कही गयी है। इन चारों विवृत्तियोंमें एक मात्राका अन्तर होता है। दूसरोंके मतमें यह अन्तर आधा मात्रा है और किन्हींके मतमें अणु मात्रा है। रेफ तथा श ष स—ये जिनके आदिमें हों, ऐसे प्रत्यय परे होनेपर 'मकार' अनुस्वारभावको प्राप्त होता है। य व ल परे हों तो वह परसवर्ण होता है और स्पर्शवर्ण परे हों तो उन-उन वर्गोंके पञ्चम वर्णको प्राप्त होता है। नकारान्त पद पूर्वमें हो और स्वर परे हो तो नकारके द्वारा पूर्ववर्ती आकार अनुरञ्जित होता है, अतः उसे 'रक्त' कहते हैं (यथा 'महाँ३असि' इत्यादि)। यदि नकारान्त पद पूर्वमें हो और य व हि आदि व्यञ्जन परे हों तो पूर्वकी आधी मात्रा—अणु मात्रा अनुरञ्जित होती है। पूर्वमें स्वरसे संयुक्त हलन्त नकार यदि पदान्तमें स्थित हो और उसके परे भी पद हो तो वह चार रूपोंसे युक्त होता है। कहीं वह रेफ होता है, कहीं रंग (या रक्त) बनता है, कहीं उसका लोप और कहीं अनुस्वार हो जाता है (यथा 'भवांश्चिनोति'में रेफ होता है। 'महाँ ३ असि' में रंग है। 'महाँ इन्द्र' में 'न' का लोप हुआ है। पूर्वका अनुनासिक या अनुस्वार हुआ है)। 'रंग' हृदयसे उठता है, कांस्यके वाद्यकी भाँति उसकी ध्वनि होती है। वह मृदु तथा दो मात्राका (दीर्घ) होता है। दधन्वाँ २ यह उदाहरण है। नारद! जैसे सौराष्ट्र देशकी नारी 'अरां' बोलती है, उसी प्रकार 'रंग' का प्रयोग करना चाहिये—यह मेरा मत है। नाम, आख्यात, उपसर्ग तथा निपात—इन चार प्रकारके पदोंके अन्तमें स्वरपूर्वक ग ड द व ङ ण न म ष स—ये दस अक्षर 'पदान्त' कहे गये हैं। उदात्त स्वर, अनुदात्त स्वर और स्वरित स्वर जहाँ भी स्थित हों, व्यञ्जन उनका अनुसरण करते हैं। आचार्यलोग तीनों स्वरोंकी ही प्रधानता बताते हैं। व्यञ्जनोंको तो मणियोंके समान समझे और स्वरको सूत्रके समान; जैसे बलवान् राजा दुर्बलके राज्यको हड़प लेता है, उसी प्रकार बलवान् दुर्बल व्यञ्जनको हर लेता है। ओभाव, विवृत्ति, श, ष, स, र, जिह्वामूलीय तथा उपध्मानीय—ये ऊष्माकी आठ गतियाँ हैं। ऊष्मा (सकार) इन आठ भावोंमें परिणत होता है। संहितामें जो स्वर-प्रत्यया विवृत्ति होती है, वहाँ विसर्ग समझे अथवा उसका तालव्य होता है। जिसकी उपधामें संध्यक्षर (ए, ओ, ऐ, औ) हों ऐसी सन्धिमें यदि य और व लोपको प्राप्त हुए हों तो वहाँ व्यञ्जननामक विवृत्ति और स्वरनामक प्रतिसंहिता होती है। जहाँ ऊष्मान्त विरत हो और सन्धिमें 'व' होता हो, वहाँ जो विवृत्ति होती है, उसे 'स्वर विवृत्ति' नामसे कहना चाहिये। यदि 'ओ' भावका प्रसंधान हो तो उत्तर पद ऋकारादि होता है; वैसे प्रसंधानको स्वरान्त जानना चाहिये। इससे भिन्न ऊष्माका प्रसंधान होता है (यथा 'वायो ऋ' इति। यहाँ ओभावका प्रसंधान है। 'क इह' यहाँ ऊष्माका प्रसंधान है)। जब श ष स आदि परे हों, उस समय यदि प्रथम (वर्गके पहले अक्षर) और उत्तम (वर्गके अन्तिम अक्षर) पदान्तमें स्थित हों तो वे द्वितीय स्थानको प्राप्त होते हैं। ऊष्मसंयुक्त होनेपर अर्थात् सकारादि परे होनेपर प्रथम जो तकार आदि अक्षर हैं, उनको