संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पूर्वभाग-द्वितीय पाद १७९
- पूर्वभाग-द्वितीय पाद * १७९
कुछ नास्तिक ऐसा कहा करते हैं कि 'देहरूपी आत्माका विनाश प्रत्यक्ष देखा जा रहा है, सम्पूर्ण लोक इसका साक्षी है; फिर भी यदि कोई शास्त्र-प्रमाणकी ओट लेकर देहसे भिन्न आत्माकी सत्ताका प्रतिपादन करता है तो वह परास्त ही है; क्योंकि उसका कथन लोकानुभवके विरुद्ध है। आत्माके स्वरूपका अभाव हो जाना ही उसकी मृत्यु है। जो लोग मोहवश आत्माको देहसे भिन्न मानते हैं, उनकी वह मान्यता ठीक नहीं है। यदि ऐसी वस्तुका भी अस्तित्व मान लिया जाय, जो लोकमें सम्भव नहीं है अर्थात् यदि शास्त्रके आधारपर यह स्वीकार किया जाय कि शरीरसे भिन्न कोई अजर-अमर आत्मा है, जो स्वर्ग आदि लोकोंमें दिव्य सुख भोगता है, तब तो बंदीलोग, जो राजाको अजर-अमर कहते हैं, उनकी वह बात भी ठीक माननी पड़ेगी। सारांश यह है कि जैसे बंदीलोग आशीर्वादमें उपचारतः राजाको अजर-अमर कहते हैं, उसी प्रकार शास्त्रका वह वचन भी औपचारिक ही है। नीरोग शरीरको ही अजर-अमर और यहाँके प्रत्यक्ष सुख-भोगको ही स्वर्गीय सुख कहा गया है। यदि आत्मा है या नहीं—यह संशय उपस्थित होनेपर अनुमानसे उसके अस्तित्वका साधन किया जाय तो इसके लिये कोई ऐसा ज्ञापक हेतु नहीं उपलब्ध होता, जो कहीं व्यभिचरित न होता हो; फिर किस अनुमानका आश्रय लेकर लोक-व्यवहारका निश्चय किया जा सकता है। अनुमान और आगम—इन दोनों प्रमाणोंका मूल्य प्रत्यक्ष प्रमाण है। आगम या अनुमान यदि प्रत्यक्ष अनुभवके विरुद्ध है तो वह कुछ भी नहीं है, उसकी प्रामाणिकता स्वीकार नहीं की जा सकती। जिस किसी भी अनुमानमें ईश्वर, अदृष्ट अथवा नित्य आत्माकी सिद्धिके लिये की हुई भावना भी व्यर्थ है; अतः नास्तिकोंके मतमें शरीरसे भिन्न जीवका अस्तित्व नहीं है, यह बात स्थिर हुई। जैसे वटवृक्षके बीजमें पत्र, पुष्प, फल, मूल तथा त्वचा आदि अन्तर्हित होते हैं, जैसे गायके द्वारा खायी हुई घासमेंसे घी, दूध आदि प्रकट हो जाते हैं तथा जिस प्रकार अनेक औषध-द्रव्योंका पाक एवं अधिवासन करनेसे उसमें नशा पैदा करनेवाली शक्ति आ जाती है, उसी प्रकार वीर्यसे ही शरीर आदिके साथ चेतनता भी प्रकट होती है।'
(इस नास्तिक मतका खण्डन इस प्रकार समझना चाहिये) मरे हुए शरीरमें जो चेतनताका अतिक्रमण देखा जाता है, वही देहातिरिक्त आत्माके अस्तित्वमें प्रमाण है। यदि चेतनता देहका ही धर्म होता तो मृतक शरीरमें भी उसकी उपलब्धि होती। मृत्युके पश्चात् कुछ कालतक शरीर तो रहता है, पर उसमें चेतनता नहीं रहती। अतः चेतन आत्मा शरीरसे भिन्न है—यह सिद्ध होता है। नास्तिक भी रोग आदिकी निवृत्तिके लिये मन्त्रजप तथा तान्त्रिक-पद्धतिसे देवता आदिकी आराधना करते हैं। वह देवता क्या है? यदि पाञ्चभौतिक है तो घट आदिकी भाँति उसका दर्शन होना चाहिये और यदि वह भौतिक पदार्थोंसे भिन्न है तो चेतनकी सत्ता स्वतः सिद्ध हो गयी। अतः देहसे भिन्न आत्मा है—यह प्रत्यक्ष अनुभवसे सिद्ध हो जाता है; और देह ही आत्मा है, यह प्रत्यक्ष अनुभवके विरुद्ध जान पड़ता है। यदि शरीरकी मृत्युके साथ आत्माकी भी मृत्यु मान ली जाय, तब तो उसके किये हुए कर्मोंका भी नाश मानना पड़ेगा; फिर तो उसके शुभाशुभ कर्मोंका फल भोगनेवाला कोई नहीं रह जायगा और देहकी उत्पत्तिमें अकृताभ्यागम (बिना किये हुए कर्मका ही भोग प्राप्त हुआ ऐसा) माननेका प्रसङ्ग उपस्थित होगा। ये सब प्रमाण यह सिद्ध करते हैं कि देहातिरिक्त चेतन आत्माकी सत्ता
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अवश्य है। नास्तिकोंकी ओरसे जो हेतुभूत दृष्टान्त दिये गये हैं, वे मूर्त पदार्थ हैं। मूर्त जड-पदार्थसे मूर्त जड-पदार्थकी ही उत्पत्ति होती है—यही उनके द्वारा सिद्ध होता है। जैसे काष्ठसे अग्निकी उत्पत्ति आदि।
पञ्चभूतोंसे आत्माकी उत्पत्तिकी भाँति यदि मूर्तसे अमूर्तकी उत्पत्ति मानी जाय तो पृथ्वी आदि मूर्त भूतोंसे अमूर्त आकाशकी भी उत्पत्ति स्वीकार करनी पड़ेगी, जो असम्भव है। अतः स्थूल भूतोंके संयोगसे अमूर्त चेतन आत्माकी उत्पत्ति सर्वथा असम्भव है।
आत्माकी सत्ता न माननेपर लोकयात्राका निर्वाह नहीं होगा। दान, धर्मके फलकी प्राप्तिके लिये कोई आस्था नहीं रहेगी; क्योंकि वैदिक शब्द तथा लौकिक व्यवहार सब आत्माको ही सुख देनेके लिये हैं। इस प्रकार मनमें अनेक प्रकारके तर्क उठते हैं और उन तर्कों तथा युक्तियोंसे आत्माकी सत्ता या असत्ताका निर्धारण कुछ भी होता नहीं दिखायी देता। इस प्रकार विचार करते हुए भिन्न-भिन्न मतोंकी ओर दौड़नेवाले लोगोंकी बुद्धि कहीं एक जगह प्रवेश करती है और वहीं वृक्षकी भाँति जड़ जमाये जीर्ण हो जाती है। इस प्रकार अर्थ और अनर्थसे सभी प्राणी दुःखी रहते हैं। केवल शास्त्र ही उन्हें खींचकर राहपर लाते हैं, ठीक उसी तरह, जैसे महावत हाथीपर अङ्कुश रखकर उन्हें काबूमें किये रहते हैं। बहुत-से शुष्क हृदयवाले लोग ऐसे विषयोंकी लिप्सा रखते हैं, जो अत्यन्त सुखदायक हों; किंतु इस लिप्सामें उन्हें भारी-से-भारी दुःखोंका ही सामना करना पड़ता है और अन्तमें वे भोगोंको छोड़कर मृत्युके ग्रास बन जाते हैं। जो एक दिन नष्ट होनेवाला है, जिसके जीवनका कुछ ठिकाना नहीं, ऐसे अनित्य शरीरको पाकर इन बन्धु-बान्धवों तथा स्त्री-पुत्रादिसे क्या लाभ है? यह सोचकर जो मनुष्य इन सबको क्षणभरमें वैराग्यपूर्वक त्यागकर चल देता है, उसे मृत्युके बाद फिर जन्म नहीं लेना पड़ता। पृथ्वी, आकाश, जल, अग्नि और वायु—ये सदा शरीरकी रक्षा करते रहते हैं, इस बातको अच्छी तरह समझ लेनेपर इसके प्रति आसक्ति कैसे हो सकती है? जो एक दिन मृत्युके मुखमें पड़नेवाला है, ऐसे शरीरसे सुख कहाँ?
पञ्चशिखने फिर कहा—राजन्! अब मैं उस परम उत्तम सांख्यशास्त्रका वर्णन करता हूँ, जिसका नाम है—सम्यङ्मन (मनको संदेहरहित करनेवाला), उसमें त्यागकी प्रधानता है। तुम ध्यान देकर सुनो। उसका उपदेश तुम्हारे मोक्षमें सहायक होगा। जो लोग मुक्तिके लिये प्रयत्नशील हों, उन सबको चाहिये कि सम्पूर्ण सकाम कर्मोंका और धन आदिका भी त्याग करें। जो त्याग किये बिना व्यर्थ ही विनीत (शम-दमादि साधनोंमें तत्पर) होनेका झूठा दावा करते हैं, उन्हें दुःख देनेवाले अविद्यारूप क्लेश प्राप्त होते रहते हैं। शास्त्रोंमें द्रव्यका त्याग करनेके लिये यज्ञ आदि कर्म, भोगका त्याग करनेके लिये व्रत, दैहिक सुखोंके त्यागके लिये तप और सब कुछ त्यागनेके लिये योगके अनुष्ठानकी आज्ञा दी गयी है। यही त्यागकी सीमा है। सर्वस्व-त्यागका यह एकमात्र मार्ग ही दुःखोंसे छुटकारा पानेके लिये उत्तम बताया गया है। इसका आश्रय न लेनेवालोंको दुर्गति भोगनी पड़ती है।
छठे मनसहित पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ बतायी हैं, जिनकी स्थिति बुद्धिमें है, इनका वर्णन करके पाँच कर्मेन्द्रियोंका निरूपण करता हूँ। दोनों हाथ काम करनेवाली इन्द्रिय हैं। दोनों पैर चलने-फिरनेका कार्य करनेवाली इन्द्रिय हैं। लिङ्ग मैथुन-जनक सुख और सन्तानोत्पादन आदिके
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लिये है। गुदा नामक इन्द्रियका कार्य मलत्याग करना है। वाक्-इन्द्रिय शब्दविशेषका उच्चारण करनेके लिये है। मनको इन पाँचोंसे संयुक्त माना गया है। इस प्रकार पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय और मन—ये सब मिलकर ग्यारह इन्द्रियाँ हैं। इन सबको मनरूप जानकर बुद्धिके द्वारा शीघ्र इनका त्याग कर देना चाहिये। श्रवणकालमें श्रोत्ररूपी इन्द्रिय, शब्दरूपी विषय और चित्तरूपी कर्ता—इन तीनका संयोग होता है। इसी प्रकार स्पर्श, रूप, रस तथा गन्धके अनुभवकालमें भी इन्द्रिय, विषय एवं मनका संयोग अपेक्षित है। इस तरह तीन-तीनके पाँच समुदाय हैं। ये सब गुण कहे गये हैं। इनसे शब्दादि विषयोंका ग्रहण होता है और इसीके लिये ये कर्ता, कर्म और करणरूपी त्रिविध भाव बारी-बारीसे उपस्थित होते हैं। इनमेंसे एक-एकसे सात्त्विक, राजस और तामस तीन-तीन भेद होते हैं। हर्ष, प्रीति, आनन्द, सुख और चित्तकी शान्ति—ये सब भाव बिना किसी कारणके हों या किसी कारणवश हों¹, सात्त्विक गुण माने गये हैं। असंतोष, संताप, शोक, लोभ तथा क्षमाका अभाव—ये किसी कारणसे हों या अकारण—रजोगुणके चिह्न हैं। अविवेक, मोह, प्रमाद, स्वप्र और आलस्य—ये किसी तरह भी क्यों न हों, तमोगुणके ही नाना रूप हैं²।
जो इस मोक्ष-विद्याको जानकर सावधानीके साथ आत्मतत्त्वका अनुसंधान करता है, वह जलसे कमलके पत्तेकी भाँति कर्मके अनिष्ट फलोंसे कभी लिप्त नहीं होता। संतानोंके प्रति आसक्ति और भिन्न-भिन्न देवताओंके लिये सकाम यज्ञोंका अनुष्ठान—ये सब मनुष्यके लिये नाना प्रकारके दृढ़ बन्धन हैं। जब वह इन बन्धनोंसे छूटकर दुःख-सुखकी चिन्ता छोड़ देता है, उस समय सर्वश्रेष्ठ गति (मुक्ति) प्राप्त कर लेता है। श्रुतिके महावाक्योंका विचार और शास्त्रमें बताये हुए मङ्गलमय साधनोंका अनुष्ठान करनेसे मनुष्य जरा तथा मृत्युके भयसे रहित होकर सुखसे रहता है। जब पुण्य और पापका क्षय तथा उनसे मिलनेवाले सुख-दुःखादि फलोंका नाश हो जाता है, उस समय सब वस्तुओंकी आसक्तिसे रहित
१. मनमें हर्ष, प्रीति आदि भावोंका उदय जब किसी अभीष्ट वस्तुकी प्राप्ति आदिसे होता है तो उसे कारणवश हुआ कहा गया है और जब वैराग्य आदिसे स्वतः उक्त भावोंका उदय हो तो उसे अकारण माना गया है।
२.महाभारत शान्तिपर्व अध्याय २१८ और २१९ में भी यही प्रसङ्ग आया है। २१९ के २८ वें श्लोकतक यह प्रसङ्ग ज्यों-का-त्यों है। इसके आगे महाभारतमें पंद्रह श्लोक अधिक हैं, जो इस प्रसङ्गकी दृष्टिसे अत्यन्त आवश्यक हैं। नारदपुराणके श्लोक सतहत्तरके बाद ही उन श्लोकोंका भाव अपेक्षित है। अतः प्रसङ्गकी पूर्तिके लिये यहाँ उन श्लोकोंमेंसे कुछका संक्षिप्त भाव दिया जाता है।
'शब्दका आधार श्रोत्रेन्द्रिय है और श्रोत्रेन्द्रियका आधार आकाश है, अतः वह आकाशरूप ही है। इसी प्रकार त्वचा, नेत्र, जिह्वा और नासिका भी क्रमशः स्पर्श, रूप, रस और गन्धका आश्रय तथा अपने आधारभूत महाभूतोंके स्वरूप हैं। इन सबका अधिष्ठान है मन; इसलिये सब-के-सब मनःस्वरूप हैं। क्योंकि जब सब इन्द्रियोंका कार्य एक समय प्रारम्भ होता है, तब उन सबके विषयोंको एक साथ अनुभव करनेके लिये मन ही सबमें अनुगतरूपसे उपस्थित रहता है; अतः मनको ग्यारहवीं इन्द्रिय कहा गया है और बुद्धि बारहवीं मानी गयी है। इस प्रकार समस्त प्राणी अनादि अविद्याके कारण स्वभावतः व्यवहारपरायण हो रहे हैं। ऐसी दशामें ज्ञानद्वारा अविद्याकी निवृत्ति हो जाती है। तब केवल सनातन आत्मा ही रह जाता है। जैसे नद और नदियाँ समुद्रमें मिलकर अपने नाम-रूपको त्याग देती हैं, उसी प्रकार समस्त प्राणी अपने नाम और रूपको त्यागकर महत्स्वरूपमें प्रतिष्ठित होते हैं। यही उनका मोक्ष है।
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पुरुष आकाशके समान निर्लेप एवं निर्गुण आत्माका साक्षात्कार कर लेता है। जो शरीरमें आसक्ति न रखकर उसके प्रति अपनेपनका अभिमान त्याग देता है, वह दुःखसे छूट जाता है। जैसे वृक्षके प्रति आसक्ति न रखनेवाला पक्षी जलमें गिरते हुए वृक्षको छोड़कर उड़ जाता है, उसी प्रकार जो शरीरकी आसक्तिको छोड़ चुका है, वह मुक्त पुरुष सुख और दुःख दोनोंका त्याग करके उत्तम गतिको प्राप्त होता है।
आचार्य पञ्चशिखके बताये हुए इस अमृतमय ज्ञानको सुनकर राजा जनक उसे पूर्णरूपसे विचार करके एक निश्चित सिद्धान्तपर पहुँच गये और शोकरहित हो बड़े सुखसे रहने लगे। फिर तो उनकी स्थिति ऐसी हो गयी कि एक बार मिथिलानगरीको आगसे जलती देखकर भूपालने स्वयं यह उद्गार प्रकट किया कि 'इस नगरके जलनेसे मेरा कुछ भी नहीं जलता।' महामुनि नारदजी! इस अध्यायमें मोक्षतत्त्वका निर्णय किया गया है। जो सदा इसका स्वाध्याय और चिन्तन करता रहता है, वह दुःख-शोकसे रहित हो कभी किसी प्रकारके उपद्रवका अनुभव नहीं करता तथा जिस प्रकार राजा जनक पञ्चशिखके समागमसे इस ज्ञानको पाकर मुक्त हो गये थे, उसी प्रकार वह भी मोक्ष प्राप्त करता है।
त्रिविध तापोंसे छूटनेका उपाय, भगवान् तथा वासुदेव आदि शब्दोंकी व्याख्या, परा और अपरा विद्याका निरूपण, खाण्डिक्य और केशिध्वजकी कथा, केशिध्वजद्वारा अविद्याके बीजका प्रतिपादन
**सूतजी कहते हैं—**महर्षियो! उत्तम अध्यात्मज्ञान सुनकर उदारबुद्धि नारदजी बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने पुनः प्रश्न किया।
**नारदजी बोले—**दयानिधे! मैं आपकी शरणमें हूँ। मुने! मनुष्यको आध्यात्मिक आदि तीनों तापोंका अनुभव न हो, वह उपाय मुझे बतलाइये।
**सनन्दनजीने कहा—**विद्वन्! गर्भमें, जन्मकालमें और बुढ़ापा आदि अवस्थाओंमें प्रकट होनेवाले जो तीन प्रकारके दुःख-समुदाय हैं, उनकी एकमात्र अमोघ एवं अनिवार्य ओषधि भगवान्की प्राप्ति ही मानी गयी है। जब भगवत्प्राप्ति होती है, उस समय ऐसे लोकोत्तर आनन्दकी अभिव्यक्ति होती है, जिससे बढ़कर सुख और आह्लाद कहीं है ही नहीं। यही उस भगवत्प्राप्तिकी पहचान है। अतः विद्वान् मनुष्योंको भगवान्की प्राप्तिके लिये अवश्य प्रयत्न करना चाहिये। महामुने! भगवत्प्राप्तिके दो ही उपाय बताये गये हैं—ज्ञान और (निष्काम) कर्म। ज्ञान भी दो प्रकारका कहा जाता है। एक तो शास्त्रके अध्ययन और अनुशीलनसे प्राप्त होता है और दूसरा विवेकसे प्रकट होता है। शब्दब्रह्म अर्थात् वेदका ज्ञान शास्त्रज्ञान है और परब्रह्म परमात्माका बोध विवेकजन्य ज्ञान है। मुनिश्रेष्ठ! मनुजीने भी वेदार्थका स्मरण करके इस विषयमें जो कुछ कहा है, उसे मैं स्पष्ट बताता हूँ—सुनो। जानने योग्य ब्रह्म दो प्रकारका है—एक शब्दब्रह्म और दूसरा परब्रह्म। जो शब्दब्रह्म (शास्त्रज्ञान)-में पारङ्गत हो जाता है, वह विवेकजन्य ज्ञानद्वारा परब्रह्मको प्राप्त कर लेता है*। अथर्ववेदकी श्रुति कहती है कि दो प्रकारकी विद्याएँ जानने योग्य हैं—परा और अपरा। परासे निर्गुण-सगुणरूप
* द्वे ब्रह्मणी वेदितव्ये शब्दब्रह्म परं च यत्। शब्दब्रह्मणि निष्णातः परं ब्रह्माधिगच्छति॥ (ना० पूर्व० ४६।८)
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परमात्माकी प्राप्ति होती है। जो अव्यक्त, अजर, चेष्टारहित, अजन्मा, अविनाशी, अनिर्देश्य (नाम आदिसे रहित), रूपहीन, हाथ-पैर आदि अङ्गोंसे शून्य, व्यापक, सर्वगत, नित्य, भूतोंका आदिकारण तथा स्वयं कारणहीन है, जिससे सम्पूर्ण व्याप्य वस्तुएँ व्याप्त हैं, समस्त जगत् जिससे प्रकट हुआ है एवं ज्ञानीजन ज्ञानदृष्टिसे जिसका साक्षात्कार करते हैं, वही परमधामस्वरूप ब्रह्म है। मोक्षकी इच्छा रखनेवाले पुरुषोंको उसीका ध्यान करना चाहिये। वही वेदवाक्योंद्वारा प्रतिपादित, अतिसूक्ष्म भगवान् विष्णुका परम पद है। परमात्माका वह स्वरूप ही 'भगवत्' शब्दका वाच्यार्थ है और 'भगवत्' शब्द उस अविनाशी परमात्माका वाचक कहा गया है। इस प्रकार जिसका स्वरूप बतलाया गया है, वही परमात्माका यथार्थ तत्त्व है। जिससे उसका ठीक-ठीक बोध होता है, वही परा विद्या अथवा परम ज्ञान है। इससे भिन्न जो तीनों वेद हैं उन्हें अपर ज्ञान या अपरा विद्या कहा गया है।
ब्रह्मन्! यद्यपि वह ब्रह्म किसी शब्द या वाणीका विषय नहीं है, तथापि उपासनाके लिये 'भगवान्' इस नामसे उसका कथन किया जाता है। देवर्षे! जो समस्त कारणोंका भी कारण है, उस परम शुद्ध महाभूति नामवाले परब्रह्मके लिये ही भगवत् शब्दका प्रयोग हुआ है। 'भगवत्' शब्दके 'भ' कारके दो अर्थ हैं—सम्भर्ता (भरण-पोषण करनेवाला) तथा भर्ता (धारण करनेवाला)। मुने! 'ग' कारके तीन अर्थ हैं—गमयिता (प्रेरक), नेता (सञ्चालक) तथा स्रष्टा (जगत्की सृष्टि करनेवाला)। 'भ' और 'ग' के योगसे 'भग' शब्द बनता है, जिसका अर्थ इस प्रकार है—सम्पूर्ण ऐश्वर्य, सम्पूर्ण धर्म, सम्पूर्ण यश, सम्पूर्ण श्री, सम्पूर्ण ज्ञान तथा सम्पूर्ण वैराग्य—इन छःका नाम 'भग' है<sup>१</sup>। उस सर्वात्मा परमेश्वरमें सम्पूर्ण भूत-प्राणी निवास करते हैं तथा वह स्वयं भी सब भूतोंमें वास करता है, इसलिये वह अव्यय परमात्मा ही 'व' कारका अर्थ है। साधुशिरोमणे! इस प्रकार 'भगवान्' यह महान् शब्द परब्रह्मस्वरूप भगवान् वासुदेवका ही बोध करानेवाला है। पूज्यपदका जो अर्थ है, उसको सूचित करनेकी परिभाषासे युक्त यह भगवत्-शब्द परमात्माके लिये तो प्रधानरूपसे प्रयुक्त होता है और दूसरोंके लिये गौणरूपसे। जो सब प्राणियोंकी उत्पत्ति और प्रलयको, आवागमनको तथा विद्या और अविद्याको जानता है, वही भगवान् कहलाने योग्य है। त्याग करने योग्य अवगुण आदिको छोड़कर जो अलौकिक ज्ञान, शक्ति, बल, ऐश्वर्य, वीर्य और तेज आदि सद्गुण हैं, वे सभी भगवत् शब्दके वाच्यार्थ हैं। उन परमात्मामें सम्पूर्ण भूत वास करते हैं और वह भी समस्त भूतोंमें निवास करता है, इसीलिये उसे 'वासुदेव' कहा गया है<sup>२</sup>। पूर्वकालमें खाण्डिक्य जनकसे उनके पूछनेपर केशिध्वजने भगवान् अनन्तके वासुदेव नामकी यथार्थ व्याख्या इस प्रकार की थी। परमात्मा सम्पूर्ण भूतोंमें वास
१. ऐश्वर्यस्य समग्रस्य धर्मस्य यशसः श्रियः। ज्ञानवैराग्ययोश्चैव षण्णां भग इतीरणा ॥
(ना० पूर्व० ४६। १७)
२. उत्पत्तिं प्रलयं चैव भूतानामागतिं गतिम्। वेत्ति विद्यामविद्यां च स वाच्यो भगवानिति ॥
ज्ञानशक्तिबलैश्वर्यवीर्यतेजांस्यशेषतः । भगवच्छब्दवाच्यानि विना हेयैर्गुणादिभिः ॥
सर्वाणि तत्र भूतानि वसन्ति परमात्मनि। भूतेषु वसनादेव वासुदेवस्ततः स्मृतः ॥
(ना० पूर्व० ४६। २१—२३)
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करते हैं और वे भूतप्राणी भी उनके भीतर रहते हैं तथा वे परमात्मा ही जगत्के धारण-पोषण करनेवाले और स्रष्टा हैं; अतः उन सर्वशक्तिमान् प्रभुको ‘वासुदेव’ कहा गया है*। मुने! जो सम्पूर्ण जगत्के आत्मा तथा समस्त आवरणोंसे परे हैं, वे परमात्मा सम्पूर्ण भूतोंकी प्रकृति, प्राकृत विकार तथा गुण और दोषोंसे ऊपर उठे हुए हैं। पृथ्वी और आकाशके बीचमें जो कुछ स्थित है, वह सब उन्हींसे व्यास है। सम्पूर्ण कल्याणमय गुण उनके स्वरूप हैं। उन्होंने अपनी शक्तिके लेशमात्रसे सम्पूर्ण भूतसमुदायको व्याप्त कर रखा है। वे अपनी इच्छामात्रसे मनके अनुकूल अनेक शरीर धारण करते हैं और सारे जगत्का हित-साधन करते रहते हैं। वे तेज, बल, ऐश्वर्य, महान् ज्ञान, उत्तम वीर्य और शक्ति आदि गुणोंकी एकमात्र राशि हैं। प्रकृति आदिसे भी परे हैं और उन समस्त कार्य-कारणोंके स्वामी परमेश्वरमें समस्त क्लेशोंका सर्वथा अभाव है। वे सबका शासन करनेवाले ईश्वर हैं। व्यष्टि और समष्टि जगत् उन्हींका स्वरूप है। वे ही व्यक्त हैं और वे ही अव्यक्त। वे सबके स्वामी, सम्पूर्ण सृष्टिके ज्ञाता, सर्वशक्तिमान् तथा परमेश्वर नामसे प्रसिद्ध हैं। जिसके द्वारा निर्दोष, विशुद्ध निर्मल तथा एकरूप परमात्माके स्वरूपका साक्षात्कार अथवा बोध होता है, उसीका नाम ज्ञान है और इसके विपरीत जो कुछ है, वह अज्ञान कहा गया है। भगवान् पुरुषोत्तमका दर्शन स्वाध्याय और संयमसे होता है। ब्रह्मकी प्राप्तिका कारण होनेसे वेदका भी नाम ब्रह्म ही है। इसीलिये वेदोंका स्वाध्याय किया जाता है। स्वाध्यायसे योगका अनुष्ठान करे और योगसे स्वाध्यायका अभ्यास करे। इस प्रकार स्वाध्याय और योग—दोनों साधनोंका सम्पादन होनेसे परमात्मा प्रकाशित होते हैं। उनका दर्शन करनेके लिये स्वाध्याय और योग दोनों नेत्र हैं।
**नारदजीने पूछा—**भगवान्! जिसके जान लेनेपर मैं सर्वाधार परमेश्वरका दर्शन कर सकूँ, उस योगको मैं जानना चाहता हूँ। कृपा करके उसका वर्णन कीजिये।
**सनन्दनजीने कहा—**पूर्वकालमें केशिध्वजने महात्मा खाण्डिक्य जनकको जिस प्रकार योगका उपदेश दिया था, वही मैं तुम्हें बतलाता हूँ।
**नारदजीने पूछा—**ब्रह्मन्! खाण्डिक्य और केशिध्वज कौन थे? तथा उनमें योगसम्बन्धी बातचीत किस प्रकार हुई थी?
**सनन्दनजीने कहा—**नारदजी! पूर्वकालमें धर्मध्वज जनक नामक एक राजा हो गये हैं। उनके बड़े पुत्रका नाम अमितध्वज था। उसके छोटे भाई कृतध्वजके नामसे विख्यात थे। राजा कृतध्वज सदा अध्यात्मचिन्तनमें ही अनुरक्त रहते थे। कृतध्वजके पुत्र केशिध्वज हुए। ब्रह्मन्! वे अपने सद्ज्ञानके कारण धन्य हो गये थे। अमितध्वजके पुत्रका नाम खाण्डिक्य जनक था। खाण्डिक्य कर्मकाण्डमें निपुण थे। एक समय केशिध्वजने खाण्डिक्यको परास्त करके उन्हें राज्यसिंहासनसे उतार दिया। राज्यसे भ्रष्ट होनेपर खाण्डिक्य थोड़ी-सी साधन-सामग्री लेकर पुरोहित और मन्त्रियोंके साथ एक दुर्गम वनमें चले गये। इधर केशिध्वजने ज्ञाननिष्ठ होते हुए भी निष्कामभावसे अनेक यज्ञोंका अनुष्ठान
* भूतेषु वसते सोऽन्तर्वसन्त्यत्र च तानि यत्। धाता विधाता जगतां वासुदेवस्ततः प्रभुः॥ (ना० पूर्व० ४६। २५)
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किया। योगवेत्ताओंमें श्रेष्ठ नारदजी! एक समय केशिध्वज जब यज्ञमें लगे हुए थे, उनकी दूध देनेवाली गायको निर्जन वनमें किसी भयङ्कर व्याघ्रने मार डाला। व्याघ्रद्वारा गौको मारी गयी जानकर राजाने ऋत्विजोंसे इसका प्रायश्चित्त पूछा—'इस विषयमें क्या करना चाहिये?' ऋत्विज् बोले—'महाराज! हम नहीं जानते। आप कशेरुसे पूछिये।' नारदजी! जब राजाने कशेरुसे यह बात पूछी तो उन्होंने भी वैसा ही उत्तर देते हुए कहा—'राजेन्द्र! मैं इस विषयमें कुछ नहीं जानता। आप शौनकसे पूछिये, वे जानते होंगे।' तब राजाने शौनकके पास जाकर यही प्रश्न किया। मुने! प्रश्न सुनकर शौनक ने भी वैसा ही उत्तर दिया—'राजन्! इस विषयमें न तो कशेरु कुछ जानते हैं और न मैं। इस समय पृथ्वीपर दूसरा कोई भी इसका ज्ञाता नहीं है। एक ही व्यक्ति इस बातको जानता है, वह है तुम्हारा शत्रु 'खाण्डिक्य', जिसे तुमने परास्त किया है।' मुने! शौनककी यह बात सुनकर राजाने कहा—अच्छा तो अब मैं अपने शत्रुसे ही यह बात पूछनेके लिये जाता हूँ। यदि वह मुझे मार देगा तो भी इस यज्ञका फल तो प्राप्त ही हो जायगा। मुनिश्रेष्ठ! यदि मेरा वह शत्रु पूछनेपर मुझे प्रायश्चित्त बतला देगा तब तो यह यज्ञ साङ्गोपाङ्ग पूर्ण होगा ही।' ऐसा कहकर राजा केशिध्वज काला मृगचर्म धारण किये रथपर बैठे और जहाँ महाराज खाण्डिक्य रहते थे, उस वनमें गये। खाण्डिक्यने अपने उस शत्रुको आते देख धनुष चढ़ा लिया और क्रोधसे आँखें लाल करके कहा।
खाण्डिक्य बोले—अरे! क्या तू काले मृगचर्मको कवचके रूपमें धारण करके हमें मारेगा?
केशिध्वजने कहा—खाण्डिक्यजी! मैं आपसे एक संदेह पूछनेके लिये आया हूँ। आपको मारनेके लिये नहीं आया हूँ।
तदनन्तर परम बुद्धिमान् खाण्डिक्यने अपने समस्त मन्त्रियों और पुरोहितके साथ एकान्तमें सलाह की। मन्त्रियोंने कहा—'यह शत्रु इस समय हमारे वशमें है, अतः इसे मार डालना चाहिये। इसके मारे जानेपर यह सारी पृथ्वी आपके अधीन हो जायगी।' यह सुनकर खाण्डिक्य उन सबसे बोले—'निःसंदेह ऐसी ही बात है। इसके मारे जानेपर यह सारी पृथ्वी अवश्य मेरे अधीन हो जायगी। परंतु इसे पारलौकिक विजय प्राप्त होगी और मुझे सम्पूर्ण पृथ्वी। यदि इसे न मारूँ तो पारलौकिक विजय मेरी होगी और इसे सारी पृथ्वी मिलेगी। पारलौकिक विजय अनन्तकालके लिये होती है तथा पृथ्वीकी जीत थोड़े ही दिन रहती है। इसलिये मैं तो इसे मारूँगा नहीं। यह जो कुछ पूछेगा उसे बतलाऊँगा।' ऐसा निश्चय करके खाण्डिक्य जनक अपने शत्रुके समीप गये और इस प्रकार बोले—'तुम्हें जो कुछ पूछना हो वह सब पूछ लो, मैं बताऊँगा।' नारदजी! खाण्डिक्यके ऐसा कहनेपर केशिध्वजने
१८६ * संक्षिप्त नारदपुराण *
होमसम्बन्धी गायके मारे जानेका सब वृत्तान्त ठीक-ठीक बता दिया और उसके लिये कोई व्रतरूप प्रायश्चित्त पूछा! खाण्डिक्यने भी वह सम्पूर्ण प्रायश्चित्त जिसका कि उसके लिये विधान था, केशिध्वजको विधिपूर्वक बता दिया। सब बातें जान लेनेपर महात्मा खाण्डिक्यकी आज्ञा ले केशिध्वजने यज्ञभूमिको प्रस्थान किया और वहाँ पहुँचकर क्रमशः प्रायश्चित्तका सारा कार्य पूर्ण किया। फिर धीरे-धीरे यज्ञ समाप्त होनेपर राजाने अवभृथस्नान किया। तत्पश्चात् कृतकार्य होकर राजा केशिध्वजने मन-ही-मन सोचा—‘मैंने सम्पूर्ण ऋत्विजोंका पूजन तथा सब सदस्योंका सम्मान किया। साथ ही याचकोंको भी उनकी मनोवाञ्छित वस्तुएँ दीं। इस लोकके अनुसार जो कुछ कर्तव्य था, वह सब मैंने पूरा किया। तथापि न जाने क्यों मेरे मनमें ऐसा अनुभव होता है कि मेरा कोई कर्तव्य अधूरा रह गया है।' इस प्रकार सोचते-सोचते राजाके ध्यानमें यह बात आयी कि मैंने अभीतक खाण्डिक्यजीको गुरुदक्षिणा नहीं दी है। नारदजी! तब वे रथपर बैठकर फिर उसी दुर्गम वनमें गये, जहाँ खाण्डिक्य रहते थे। खाण्डिक्यने पुनः उन्हें आते देख हथियार उठा लिया। यह देख राजा केशिध्वजने कहा—‘खाण्डिक्यजी! क्रोध न कीजिये। मैं आपका अहित करनेके लिये नहीं, गुरुदक्षिणा देनेके लिये आया हूँ। आपके उपदेशके अनुसार मैंने अपना यज्ञ भलीभाँति पूरा कर लिया है। अतः अब मैं आपको गुरुदक्षिणा देना चाहता हूँ। आपकी जो इच्छा हो, माँग लीजिये।'
उनके ऐसा कहनेपर खाण्डिक्यने पुनः अपने मन्त्रियोंसे सलाह ली और कहा—‘यह मुझे गुरुदक्षिणा देना चाहता है, मैं इससे क्या माँगूँ?' मन्त्रियोंने कहा—‘आप इससे सम्पूर्ण राज्य माँग लीजिये।' तब राजा खाण्डिक्यने उन मन्त्रियोंसे हँसकर कहा—‘पृथ्वीका राज्य तो थोड़े ही समयतक रहनेवाला है, उसे मेरे-जैसे लोग कैसे माँग सकते हैं? आपका कथन भी ठीक ही है, क्योंकि आपलोग स्वार्थ-साधनके मन्त्री हैं। परमार्थ क्या और कैसा है? इस विषयमें आपलोगोंको विशेष ज्ञान नहीं है।' ऐसा कहकर वे राजा केशिध्वजके पास आये और इस प्रकार बोले—‘क्या तुम निश्चय ही गुरुदक्षिणा दोगे?' उन्होंने कहा—‘जी हाँ।' उनके ऐसा कहनेपर खाण्डिक्यने कहा—‘आप अध्यात्मज्ञानरूप परमार्थविद्याके ज्ञाता हैं। यदि मुझे अवश्य ही गुरुदक्षिणा देना चाहते हैं तो जो कर्म सम्पूर्ण क्लेशोंका नाश करनेमें समर्थ हो, उसका उपदेश कीजिये।'
केशिध्वजने पूछा—राजन्! आपने मेरा निष्कण्टक राज्य क्यों नहीं माँगा? क्योंकि क्षत्रियोंके लिये राज्य मिलनेसे बढ़कर प्रिय वस्तु और कोई नहीं है।
खाण्डिक्य बोले—केशिध्वजजी! मैंने आपका सम्पूर्ण राज्य क्यों नहीं माँगा, इसका कारण सुनिये। विद्वान् पुरुष राज्यकी इच्छा नहीं करते। क्षत्रियोंका यह धर्म है कि वे प्रजाकी रक्षा करें और अपने राज्यके विरोधियोंका धर्मयुद्धके द्वारा वध करें। मैं इस कर्तव्यके पालनमें असमर्थ हो गया था, इसलिये यदि आपने मेरे राज्यका अपहरण कर लिया है तो इसमें कोई दोषकी बात नहीं है। यह राजकार्य अविद्या ही है। यदि समझपूर्वक इसका त्याग न किया जाय तो यह बन्धनका ही कारण होती है। यह राज्यकी चाह जन्मान्तरके कर्मोंद्वारा प्राप्त सुख-भोगके लिये होती है। अतः मुझे राज्य लेनेका अधिकार नहीं है। इसके सिवा क्षत्रियोंका किसीसे याचना करना धर्म नहीं है। यह साधु पुरुषोंका मत है।