संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पूर्वभाग-द्वितीय पाद
- पूर्वभाग-द्वितीय पाद *
४०१
यशसि चाभिरुचिर्व्यसनं श्रुतौ प्रकृतिसिद्धमिदं हि महात्मनाम् ॥
'तोटकवृत्त'— (में चार सगण होते हैं और पादान्तमें विराग हुआ करता है— )
उदाहरण—
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अधरं मधुरं वदनं मधुरं नयनं मधुरं हसितं मधुरम् । हृदयं मधुरं गमनं मधुरं मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ॥
'भुजङ्गप्रयात'— (—में चार यगण और पादान्तमें विराम होते हैं— )
उदाहरण—
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अयं त्वत्कथामृष्टपीयूषनद्यां मनोवारणः क्लेशदावाग्निदग्धः ।
तृषार्तोऽवगाढो न सस्मार दावं न निष्क्रामति ब्रह्मसम्पन्नवन्नः ॥
'स्रग्विणी'— (में चार रगण तथा पादान्तमें विराम होते हैं— )
उदाहरण—
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स्वागतं ते प्रसीदेश तुभ्यं नमः श्रीनिवास श्रिया कान्तया त्राहि नः ।
त्वामृतेऽधीश नाङ्गैरिमैखः शोभते शीर्षहीनः कबन्धो यथा पूरुषः ॥
'प्रमिताक्षरा—(—में सगण, जगण, सगण, सगण तथा पादान्तमें विराम होते हैं— )
उदाहरण—
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परिशुद्धवाक्यरचनातिशयं परिषिञ्चती श्रवणयोरमृतम् ।
प्रमिताक्षरापि विपुलार्थवती कविभारती हरति मे हृदयम् ॥
'वैश्वदेवी'—(में २ मगण और २ यगण होते हैं तथा पाँचवें, सातवें अक्षरोंपर विराम होता है— )
उदाहरण—
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अर्चामन्येषां त्वं विहायामराणामद्वैतनेकं विष्णुमभ्यर्च भक्त्या ।
तत्राशेषात्मन्यर्चिते भाविनी ते भ्रातः सम्पन्नाऽऽराधना वैश्वदेवी ॥
उपर्युक्त छन्दोंके अतिरिक्त बृहतीके अन्य भेद पुट, जलोद्धतगति, नत, कुसुमविचित्रा, चञ्चलाक्षिका, कान्तोत्पीडा, वाहिनी, नवमालिनी, चन्द्रवर्त्म, प्रमुदितवदना, प्रियंवदा, मणिमाला, ललिता, मोहितोज्ज्वला, जलधरमाला, प्रभा, मालती तथा अभिनव तामरस आदिके भी लक्षण और उदाहरण ग्रन्थान्तरोंमें मिलते हैं ।
(१३) तेरह-तेरह अक्षरोंके चार पादोंसे सम्पन्न होनेवाले छन्द-समूहका नाम 'अतिजगती' है। प्रस्तारसे इसके ८१९२ भेद होते हैं। अतिजगतीके भेदोंमें ही एक 'प्रहर्षिणी' नामक भेद है। इसके प्रत्येक पादमें मगण, नगण, जगण, रगण तथा एक गुरु होते हैं। तीन तथा दस अक्षरोंपर यति होती है।
उदाहरण—
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जागर्ति प्रसभविपाकसंविधात्री श्रीविष्णोर्ललितकपोलजा नदी चेत्।
संकीर्ण यदि भवितास्ति को विषादः संवादः सकलजगत्पितामहेन ॥
इसके सिवा क्षमा, अतिरुचिरा मत्तमयूर, गौरी, मञ्जुभाषिणी और चन्द्रिका आदि भेद भी ग्रन्थान्तरोंमें वर्णित हैं। उनके उदाहरण वहीं देखने चाहिये ।
(१४) चौदह-चौदह अक्षरोंके चार पादोंवाले छन्दसमुदायको 'शक्वरी' कहते है। प्रस्तारसे इसके १६३८४ भेद होते हैं। इसके भेदोंमें वसन्ततिलका नामक छन्द यहाँ बतलाया जाता है। इसमें तगण, भगण, २ जगण और २ गुरु होते हैं। पादान्तमें विराम होता है। वसन्ततिलकाको ही कुछ विद्वान् 'सिंहोन्नता' और 'उद्धर्षिणी' भी कहते हैं।
४०२ * संक्षिप्त नारदपुराण *
उदाहरण—
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या दोहनेऽवहनने मथनोपलेपप्रेङ्खेऽखनाभर्भुदितोक्षणमार्जनादौ।
गायन्ति चैनमनुरक्तधियोऽश्रुकण्ठ्यो धन्या व्रजस्त्रिय उरुक्रमचित्तयानाः ॥
इसके सिवा असंबाधा, अपराजिता तथा प्रहरणकलिता आदि और भी अनेक भेद हैं। उनमेंसे प्रहरणकलिताका उदाहरण यहाँ दिया जाता है, प्रहरणकलितामें २ नगण, १ भगण, १ नगण, १ लघु, १ गुरु होते हैं। सात-सात अक्षरोंपर विराम होता है।
यथा—
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सुरमुनिमनुजैरुपचितचरणां रिपुभयचकितत्रिभुवनशरणाम्।
प्रणमत महिषासुरवधकुपितां प्रहरणकलितां पशुपतिदयिताम्॥
(१५) पंद्रह-पंद्रह अक्षरोंके चार चरणोंसे सिद्ध होनेवाले छन्दोंका नाम ‘अतिशक्वरी’ है। प्रस्तारसे इसके ३२७६८ भेद होते हैं। इन भेदोंमें चन्द्रावर्ता और मालिनी—ये दो ही यहाँ बताये जाते हैं। ४ नगण और १ सगणसे ‘चन्द्रावर्ता’ छन्द बनता है। इसमें सात और आठ अक्षरोंपर विराम है। यदि छः और नौ अक्षरोंपर विराम हो तो इसका नाम ‘माला’ होता है। इसी तरह आठ और सात अक्षरोंपर विराम होनेसे उसकी ‘मणिनिकर’ संज्ञा होती है। चन्द्रावर्ताका उदाहरण इस प्रकार है—
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पटुजवपवनचलितजललहरीतरलितविहगनिचयरवमुखरम् ।
विकसितकमलसुरभिशुचिसलिलं विशति हरिरिह शरदि शुभसरः॥
‘मालिनी’—(—में २ नगण, १ मगण और २ भगण होते हैं। इसमें सात और आठ अक्षरोंपर विराम होता है—)
उदाहरण—
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असितगिरिसमं स्यात् कज्जलं सिन्धुपात्रे सुरतरुवरशाखा लेखनी पत्रमुर्वी।
लिखति यदि गृहीत्वा शारदा सर्वकालं तदपि तव गुणानामीश पारं न याति॥
(१६) सोलह-सोलह अक्षरोंके चार चरणोंसे सिद्ध होनेवाले छन्द-समुदायका नाम ‘अष्टि’ है। प्रस्तारसे इसके भेदोंकी संख्या ६५५३६ होती है। इसके भेदोंमें दोके लक्षण और उदाहरण यहाँ दिये जाते हैं। एकका नाम है ऋषभगजविलसित और दूसरेका नाम है वाणिनी। ऋषभगजविलसितमें भगण, रगण, तीन नगण तथा एक गुरु होते हैं। सात, नौ अक्षरोंपर विराम होता है।
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यो हरिरुच्चखान खरतरनखशिखरैर्दुर्जयदैत्यसिंहसुविकटहृदयतटम्।
किं न्विह चित्रमेष यदखिलमपहत्वान् कंसनिदेशदृप्यदृषभगजविलसितम्॥
‘वाणिनी’— (में नगण, जगण, भगण, जगण, रगण तथा १ गुरु होते हैं—)
उदाहरण—
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स्फुरतु ममाननेऽद्य न नु वाणि नीतिरम्यं तव चरणप्रसादपरिपाकजः कवित्वम्।
भवजलराशिपारकरणक्षमं मुकुन्दं सततमहं स्तवैः स्वरचितैः स्तवानि नित्यम्॥
(१७) सत्रह-सत्रह अक्षरोंके चार चरणोंवाले छन्दसमूहका नाम ‘अत्यष्टि’ है। प्रस्तारसे इसकी संख्या १३१०७२ होती है। इसके भेदोंमेंसे केवल हरिणी, पृथ्वी, वंशपत्रपतित, मन्दाक्रान्ता और शिखरिणीके लक्षण और उदाहरण यहाँ दिये जाते हैं।
‘हरिणी’ (के प्रत्येक चरणमें नगण, सगण, मगण, रगण, सगण, एक लघु तथा एक गुरु होते हैं। ६, ४, ७ अक्षरोंपर विराम होता है।)
उदाहरण—
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न समरसनाः काले भोगाश्चलं धनयौवनं कुरुत सुकृतं यावन्नेयं तनुः प्रविशीर्यते॥
किमपि कलना कालस्येयं प्रभावति सत्वरा तरुणहरिणीसंत्रस्तेव प्लवप्रविसारिणी॥
‘पृथ्वी’ (के प्रत्येक पादमें जगण, सगण, जगण, सगण, यगण, एक लघु, एक गुरु होते हैं। आठ-नौ अक्षरोंपर विराम होता है।)
उदाहरण—
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हताः समितिशत्रवस्त्रिभुवने प्रकीर्णं यशः कृतश्च गुणिनां गृहे निरवधिर्महानुत्सवः।
त्वया कृतपरिग्रहे रघुपतेऽद्य सिंहासने नितान्तनिरवग्रहा फलवती च पृथ्वी कृता॥