संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पूर्वभाग-तृतीय पाद
- पूर्वभाग-तृतीय पाद *
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सम्पूर्ण सिद्धियोंका स्वामी हो जाता है। पूर्वोक्त वैष्णव पीठपर मूलमन्त्रसे मूर्ति-निर्माण करके उसमें गोपीजनमनोहर श्यामसुन्दर श्रीकृष्णका आवाहन और पूजन करे। मुखमें वेणुकी पूजा करके, वक्षःस्थलमें वनमाला, कौस्तुभ तथा श्रीवत्सका पूजन करे। इसके बाद पुष्पाञ्जलि चढ़ावे। तत्पश्चात् बुद्धिमान् उपासक देवेश्वर श्रीकृष्णका चिन्तन करते हुए उनके दक्षिणभागमें श्वेतचन्दनचर्चित श्वेत तुलसीको तथा वामभागमें रक्तचन्दनचर्चित लाल तुलसीको समर्पित करे। इसके बाद दो अश्वमार (कनेर) पुष्पोंसे उनके हृदय और मस्तककी पूजा करे। तदनन्तर शीर्षभागमें विधिपूर्वक दो कमलपुष्प समर्पित करे। तत्पश्चात् उनके सम्पूर्ण अङ्गोंमें दो तुलसीदल, दो कमलपुष्प और दो अश्वमार (श्वेत-रक्त कनेर) कुसुम चढ़ाकर फिर सब प्रकारके पुष्प अर्पण करे। गोपाल श्रीकृष्णके दक्षिणभागमें अविनाशी निर्मल चैतन्यस्वरूप भगवान् वासुदेवका तथा वामभागमें रजोगुणस्वरूपा नित्य अनुरक्ता रुक्मिणी देवीका पूजन करे। इस प्रकार गोपालका भलीभाँति पूजन करके आवरण देवताओंकी पूजा करे। दाम, सुदाम, वसुदाम और किंकिणी—इनका क्रमशः पूर्व, दक्षिण, पश्चिम और उत्तरमें पूजन करे। दाम आदि शब्दोंके आदिमें प्रणव और अन्तमें 'ङे' विभक्ति तथा 'नमः' पद जोड़ने चाहिये। (यथा— ॐ दामाय नमः इत्यादि, यदि दाम शब्द नान्त हो तो 'दाम्ने नमः' यह रूप होगा) अग्नि, नैर्ऋत्य, वायव्य तथा ईशान कोणोंमें क्रमशः हृदय, सिर, शिखा तथा कवचका पूजन करके सम्पूर्ण दिशाओंमें अस्त्रोंका पूजन करे। फिर आठों दलोंमें रुक्मिणी आदि पटरानियोंकी पूजा करे। रुक्मिणी, सत्यभामा, नाग्नजिती, सुविन्दा, मित्रविन्दा, लक्ष्मणा, जाम्बवती तथा सुशीला*। ये सब-की-सब सुन्दर, सुरम्य एवं विचित्र वस्त्राभूषणोंसे विभूषित हैं। तदनन्तर अष्टदलोंके अग्रभागमें वसुदेव-देवकी, नन्द-यशोदा, बलभद्र-सुभद्रा तथा गोप और गोपियोंका पूजन करे। इन सबके मन, बुद्धि तथा नेत्र गोविन्दमें ही लगे हुए हैं। दोनों पिता वसुदेव और नन्द क्रमशः पीत और पाण्डु वर्णके हैं। माताएँ (देवकी और यशोदा) दिव्य हार, दिव्य वस्त्र, दिव्याङ्गराग तथा दिव्य आभूषणोंसे विभूषित हैं। दोनोंने चरु तथा खीरसे भरे हुए पात्र ले रखे हैं। देवकीका रंग लाल है और यशोदाका श्याम। दोनोंने सुन्दर हार और मणिमय कुण्डलोंसे अपनेको विभूषित किया है। बलरामजी शङ्ख तथा चन्द्रमाके समान गौरवर्णके हैं। वे मूसल और हल धारण करते हैं। उनके श्रीअङ्गोंपर नीले रंगका वस्त्र सुशोभित होता है। हलधरके एक कानमें कुण्डल शोभा पाता है। भगवान्की जो श्यामला कला है, वही भद्रस्वरूपा सुभद्रा है। उसके आभूषण भी भद्र (मङ्गल)-रूप हैं। सुभद्राजीके एक हाथमें वर और दूसरेमें अभय है। वे पीताम्बर धारण करती हैं। गोपगणोंके हाथमें वेणु, वीणा, सोनेकी छड़ी, शङ्ख और सींग आदि हैं। गोपियोंके करकमलोंमें नाना प्रकारके खाद्य पदार्थ हैं। इन सबके बाह्यभागमें मन्दार आदि कल्पवृक्षोंकी पूजा करे। मन्दार, सन्तान, पारिजात, कल्पवृक्ष और हरिचन्दन (ये ही उन वृक्षोंके नाम हैं)। उक्त पाँच वृक्षोंसे चारकी चारों दिशाओंमें और एककी मध्यभागमें पूजा करके उनके बाह्यभागमें इन्द्र आदि दिक्पालों और उनके वज्र आदि अस्त्रोंकी पूजा करे। तत्पश्चात् श्रीकृष्णके आठ नामोंद्वारा उनका यजन करना चाहिये। वे नाम इस प्रकार हैं—कृष्ण, वासुदेव, देवकीनन्दन, नारायण, यदुश्रेष्ठ, वार्ष्णेय, धर्मपालक तथा असुराक्रान्त-भूभारहारी। विद्वान् पुरुषोंको सम्पूर्ण कामनाओंकी प्राप्तिके लिये तथा संसार-सागरसे पार होनेके लिये इन आवरणोंसहित असुरारि श्रीकृष्णकी आराधना करनी चाहिये।
* अन्यत्र सुशीला और सुविन्दाके स्थानमें भद्रा और कालिन्दी—ये दो नाम उपलब्ध होते हैं।
४७८ * संक्षिप्त नारदपुराण *
अब मैं भगवान् श्रीकृष्णके त्रिकाल पूजनका वर्णन करता हूँ, जो समस्त मनोरथोंकी सिद्धि प्रदान करनेवाला है।
प्रातःकालिक ध्यान
श्रीमदुद्यानसंवीतहेमभूरत्नमण्डपे ॥
लसत्कल्पद्रुमाधःस्थरत्नाब्जपीठसंस्थितम् ।
सुत्रामरत्नसंकाशं गुडस्निग्धालकं शिशुम् ॥
चलत्कनककुण्डलोल्लसितचारुगण्डस्थलं
सुघोणधरमद्भुतस्मितमुखाम्बुजं सुन्दरम् ।
स्फुरद्विमलरत्नयुक्तकनकसूत्रनद्धं दधत्-
सुवर्णपरिमण्डितं सुभगपौण्डरीकं नखम् ॥
समुद्धूसरोरःस्थले धेनुधूल्या
सुपुष्टाङ्गमष्टापदाकल्पदीप्तम् ।
कटीरस्थले चारुजङ्घान्तयुग्मं
पिनद्धं क्वणत्किङ्किणीजालदाम्ना ॥
हसन्तं हसद्बन्धुजीवप्रसून-
प्रभापाणिपादाम्बुजोदारकान्त्या ।
दधानं करे दक्षिणे पायसान्नं
सुहैयंगवीनं तथा वामहस्ते ॥
लसद्गोपगोपीगवां वृन्दमध्ये
स्थितं वासवाद्यैः सुरैरर्चिताङ्घ्रिम् ।
महीभारभूतामरारातियूथां-
स्ततः पूतनादीन् निहन्तुं प्रवृत्तम् ॥
(ना० पूर्व० ८० । ७५-८०)
'एक सुन्दर उद्यानसे घिरी हुई सुवर्णमयी भूमिपर रत्नमय मण्डप बना हुआ है। वहाँ शोभायमान कल्पवृक्षके नीचे स्थित रत्ननिर्मित कमलयुक्त पीठपर एक सुन्दर शिशु विराजमान है; जिसकी अङ्गकान्ति इन्द्रनीलमणिके समान श्याम है। उसके काले-काले केश चिकने और घुँघराले हैं। उसके मनोहर कपोल हिलते हुए स्वर्णमय कुण्डलोंसे अत्यन्त सुन्दर लगते हैं, उसकी नासिका बड़ी सुघड़ है। उस सुन्दर बालकके मुखारविन्दपर मन्द मुसकानकी अद्भुत छटा छा रही है। वह सोनेके तारमें गूँथा और सोनेसे ही मढ़ा हुआ सुन्दर बघनखा धारण करता है, जिसमें परम उज्ज्वल चमकीले रत्न जड़े हुए हैं। गोधूलिसे धूसर वक्षःस्थलपर धारण किये हुए स्वर्णमय आभूषणोंसे उसकी दीप्ति बहुत बढ़ी हुई है। उसका एक-एक अङ्ग अत्यन्त पुष्ट है। उसकी दोनों पिण्डलियोंका अन्तिम भाग अत्यन्त मनोहर है। उसने अपने कटिभागमें घुँघरूदार करधनीकी लड़ बाँध रखी है, जिससे मधुर झनकार होती रहती है। खिले हुए बन्धुजीव (दुपहरिया)-के फूलकी अरुण प्रभासे युक्त करारविन्द और चरणारविन्दोंकी उदार कान्तिसे सुशोभित वह शिशु मन्द-मन्द हँस रहा है। उसने दाहिने हाथमें खीर और बायें हाथमें तुरन्तका निकाला हुआ माखन ले रखा है। ग्वालों, गोपसुन्दग्रियों और गौओंकी मण्डलीमें स्थित होकर वह बड़ी शोभा पा रहा है। इन्द्र आदि देवता उसके चरणोंकी समाराधना करते हैं। वह पृथ्वीके भारभूत दैत्यसमुदाय पूतना आदिका संहार करनेमें लगा है।'
इस प्रकार ध्यान करके पूर्ववत् एकाग्रचित्त हो भगवान्का पूजन करे। दही और गुड़का नैवेद्य लगाकर एक हजार मन्त्र-जप करे। इसी प्रकार मध्याह्नकालमें नारदादि मुनिगणों और देवताओंसे