संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
उत्तरभाग ७०५
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है। मुसलको आयुधरूपमें रखनेवाले! आपको नमस्कार है। रेवतीरमण! आपको नमस्कार है। भक्तवत्सल! आपको नमस्कार है। बलवानोंमें श्रेष्ठ! आपको नमस्कार है। पृथ्वीको मस्तकपर धारण करनेवाले शेषजी! आपको नमस्कार है। प्रलम्बशत्रो! आपको नमस्कार है। श्रीकृष्णके अग्रज! मेरी रक्षा कीजिये।'
इस प्रकार कैलासशिखरके समान गौर शरीर तथा चन्द्रमासे भी कमनीय श्रेष्ठ मुखवाले, नीलवस्त्रधारी, देवपूजित, अनन्त, अज्ञेय, एक कुण्डलसे विभूषित और फणोंके द्वारा विकट मस्तकवाले रोहिणीनन्दन महाबली हलधरको भक्तिपूर्वक प्रसन्न करे। ऐसा करनेवाला पुरुष मनोवाञ्छित फल पाता है और समस्त पापोंसे मुक्त हो भगवान् विष्णुके धाममें जाता है। बलरामजीकी पूजाके पश्चात् विद्वान् पुरुष एकाग्रचित्त हो द्वादशाक्षर-मन्त्र (ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ) - से भगवान् श्रीकृष्णकी पूजा करे। जो धीर पुरुष द्वादशाक्षर-मन्त्रसे भक्तिपूर्वक भगवान् पुरुषोत्तमकी सदा पूजा करते हैं, वे मोक्षको प्राप्त होते हैं। मोहिनि! देवता, योगी तथा सोमपान करनेवाले याज्ञिक भी उस गतिको नहीं पाते, जिसे द्वादशाक्षर-मन्त्रका जप करनेवाले पुरुष प्राप्त करते हैं। अतः उसी मन्त्रसे भक्तिपूर्वक गन्ध-पुष्प आदि सामग्रियोंद्वारा जगद्गुरु श्रीकृष्णकी पूजा करके उन्हें प्रणाम करे। तत्पश्चात् इस प्रकार प्रार्थना करे—
जय कृष्ण जगन्नाथ जय सर्वाघनाशन।
जय चाणूरकेशिघ्न जय कंसनिषूदन॥
जय पद्मपलाशाक्ष जय चक्रगदाधर।
जय नीलाम्बुदश्याम जय सर्वसुखप्रद॥
जय देव जगत्पूज्य जय संसारनाशन।
जय लोकपते नाथ जय वाञ्छाफलप्रद॥
संसारसागरे घोरे निःसारे दुःखफेनिले।
क्रोधग्राहाकुले रौद्रे विषयोदकसम्प्लवे॥
नानारोगोर्मिकलिले मोहावर्तसुदुस्तरे।
निमग्नोऽहं सुरश्रेष्ठ त्राहि मां पुरुषोत्तम॥
(ना० उत्तर० ५५। ४४-४८)
'जगन्नाथ श्रीकृष्ण! आपकी जय हो। सब पापोंका नाश करनेवाले प्रभो! आपकी जय हो। चाणूर और केशीके नाशक! आपकी जय हो। कंसनाशन! आपकी जय हो। कमललोचन! आपकी जय हो। चक्रगदाधर! आपकी जय हो। नील मेघके समान श्यामवर्ण! आपकी जय हो। सबको सुख देनेवाले परमेश्वर! आपकी जय हो। जगत्पूज्य देव! आपकी जय हो। संसार संहारक आपकी जय हो। लोकपते! नाथ! आपकी जय हो। मनोवाञ्छित फल देनेवाले देवता! आपकी जय हो। यह भयंकर संसार-सागर सर्वथा निःसार है। इसमें दुःखमय फेन भरा हुआ है। यह क्रोधरूपी ग्राहसे पूर्ण है। इसमें विषयरूपी जलराशि भरी हुई है। भाँति-भाँतिके रोग ही इसमें उठती हुई लहरें हैं। मोहरूपी भँवरोंके कारण यह अत्यन्त दुस्तर जान पड़ता है। सुरश्रेष्ठ! मैं इस संसाररूपी घोर समुद्रमें डूबा हुआ हूँ। पुरुषोत्तम! मेरी रक्षा कीजिये।'
मोहिनि! इस प्रकार प्रार्थना करके जो देवेश्वर, वरदायक, भक्तवत्सल, सर्वपापहारी, द्युतिमान्, सम्पूर्ण कमनीय फलोंके दाता, मोटे कंधे और दो भुजाओंवाले, श्यामवर्ण, कमलदलके समान विशाल नेत्रोंवाले, चौड़ी छाती, विशाल भुजा, पीत वस्त्र और सुन्दर मुखवाले, शङ्ख-चक्र-गदाधर, मुकुटाङ्गद-भूषित, समस्त शुभलक्षणोंसे युक्त और वनमाला-विभूषित भगवान् श्रीकृष्णका दर्शन करके हाथ जोड़कर उन्हें प्रणाम करता है, वह हजारों अश्वमेध यज्ञोंका फल पाता है। सब तीर्थोंमें स्नान और दान करनेका अथवा सम्पूर्ण वेदोंके स्वाध्याय तथा समस्त यज्ञोंके अनुष्ठानका जो फल है, उसीको मनुष्य भगवान् श्रीकृष्णका दर्शन और
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प्रणाम करके पा लेता है। सब प्रकारके दान, व्रत और नियमोंका पालन करके मनुष्य जिस फलको पाता है, अथवा ब्रह्मचर्य-व्रतका विधिपूर्वक पालन करनेसे जो फल बताया गया है, उसी फलको मनुष्य भगवान् श्रीकृष्णका दर्शन और प्रणाम करके प्राप्त कर लेता है। भामिनि! भगवद्दर्शनके माहात्म्यके सम्बन्धमें अधिक कहनेकी क्या आवश्यकता? भगवान् श्रीकृष्णका भक्तिपूर्वक दर्शन करके मनुष्य दुर्लभ मोक्षतक प्राप्त कर लेता है।
ब्रह्मकुमारी मोहिनी! तदनन्तर भक्तोंपर स्नेह रखनेवाली सुभद्रादेवीका भी नाम-मन्त्रसे पूजन करके उन्हें प्रणाम करे और हाथ जोड़कर इस प्रकार प्रार्थना करे—
नमस्ते सर्वगे देवि नमस्ते शुभसौख्यदे।
त्राहि मां पद्मपत्राक्षि कात्यायनि नमोऽस्तु ते॥
(ना० उत्तर० ५५। ६७)
'देवि! तुम सर्वत्र व्याप्त रहनेवाली और शुभ सौख्य प्रदान करनेवाली हो। तुम्हें बारम्बार नमस्कार है। पद्मपत्रोंके समान विशाल नेत्रोंवाली कात्यायनी-स्वरूपा सुभद्रे! मेरी रक्षा करो। तुम्हें नमस्कार है।'
इस प्रकार सम्पूर्ण जगत्को धारण करनेवाली लोकहितकारिणी, वरदायिनी एवं कल्याणमयी बलभद्रभगिनी सुभद्रादेवीको प्रसन्न करके मनुष्य इच्छानुसार चलनेवाले विमानके द्वारा श्रीविष्णुलोकमें जाता है।
इस प्रकार बलराम, श्रीकृष्ण और सुभद्रादेवीको प्रणाम करके भगवान्के मन्दिरसे बाहर निकले। उस समय मनुष्य कृतकृत्य हो जाता है। तत्पश्चात् जगन्नाथजीके मन्दिरको प्रणाम करके एकाग्रचित्त हो उस स्थानपर जाय जहाँ भगवान् विष्णुकी इन्द्रनीलमयी प्रतिमा बालूके भीतर छिपी है। वहाँ अदृश्यरूपसे स्थित भगवान् पुरुषोत्तमको प्रणाम करके मनुष्य श्रीविष्णुके धाममें जाता है। देवि! जो भगवान् सर्वदेवमय हैं, जिन्होंने आधा शरीर सिंहका बनाकर हिरण्यकशिपुका उद्धार किया था, वे भगवान् नृसिंह भी पुरुषोत्तमतीर्थमें नित्य निवास करते हैं। शुभे! जो भक्तिपूर्वक उन भगवान् नृसिंहदेवका दर्शन करके उन्हें प्रणाम करता है, वह मनुष्य समस्त पातकोंसे मुक्त हो जाता है। जो मानव इस पृथ्वीपर भगवान् नृसिंहके भक्त होते हैं, उन्हें कोई पाप छू नहीं सकता और मनोवाञ्छित फलकी प्राप्ति होती है। अतः सब प्रकारसे यत्न करके भगवान् नृसिंहकी शरण ले; क्योंकि वे धर्म, अर्थ, काम और मोक्षसम्बन्धी फल प्रदान करते हैं। ब्रह्मपुत्री! अतः सम्पूर्ण कामनाओं और फलोंके देनेवाले महापराक्रमी श्रीनृसिंहदेवकी सदा भक्तिपूर्वक पूजा करनी चाहिये। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, स्त्री, शूद्र और अन्त्यज आदि सभी मनुष्य भक्तिभावसे सुरश्रेष्ठ भगवान् नृसिंहकी आराधना करके करोड़ों जन्मोंके अशुभ एवं दुःखसे छुटकारा पा जाते हैं। विधिनन्दिनी! मैं अजित, अप्रमेय तथा भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाले भगवान् नृसिंहका प्रभाव बतलाता हूँ, सुनो! सुव्रते! उनके समस्त गुणोंका वर्णन कौन कर सकता है? अतः मैं भी श्रीनृसिंहदेवके गुणोंका संक्षेपसे ही वर्णन करूँगा। इस लोकमें जो कोई दैवी अथवा मानुषी सिद्धियाँ सुनी जाती हैं, वे सब भगवान् नृसिंहके प्रसादसे ही सिद्ध होती हैं। भगवान् नृसिंहदेवके कृपाप्रसादसे स्वर्ग, मर्त्यलोक, पाताल, अन्तरिक्ष, जल, असुरलोक तथा पर्वत—इन सब स्थानोंमें मनुष्यकी अबाध गति होती है। सुभगे! इस सम्पूर्ण चराचर जगत्में कोई भी ऐसी वस्तु नहीं है, जो भक्तोंपर निरन्तर कृपा करनेवाले भगवान् नृसिंहके लिये असाध्य हो।
अब मैं श्रीनृसिंहदेवके पूजनकी विधि बतलाता
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हूँ, जो भक्तोंके लिये उपकारक है, जिससे वे भगवान् नृसिंह प्रसन्न होते हैं। भगवान् नृसिंहका यथार्थ तत्त्व देवताओं और असुरोंको भी ज्ञात नहीं है। उत्तम साधकको चाहिये कि साग, जौकी लपसी, मूल, फल, खली अथवा सत्तूसे भोजनकी आवश्यकता पूरी करे अथवा भद्रे! दूध पीकर रहे। घास-फूस या कौपीनमात्र वस्त्रसे अपने शरीरको ढक ले। इन्द्रियोंको वशमें करके (भगवान् नृसिंहके) ध्यानमें तत्पर रहे। वनमें, एकान्त प्रदेशमें, नदीके सङ्गम या पर्वतपर, सिद्धक्षेत्रमें, ऊसरमें तथा भगवान् नृसिंहके आश्रममें जाकर अथवा जहाँ-कहीं भी स्वयं भगवान् नृसिंहकी स्थापना करके जो विधिपूर्वक उनकी पूजा करता है, देवि! वह उपपातकी हो या महापातकी, उन समस्त पातकोंसे वह साधक मुक्त हो जाता है। वहाँ नृसिंहजीकी परिक्रमा करके उनकी गन्ध, पुष्प और धूप आदि सामग्रियोंद्वारा पूजा करनी चाहिये। तत्पश्चात् धरतीपर मस्तक टेककर भगवान्को प्रणाम करे और कर्पूर एवं चन्दन लगे हुए चमेलीके फूल भगवान् नृसिंहके मस्तकपर चढ़ावे। इससे सिद्धि प्राप्त होती है। भगवान् नृसिंह किसी भी कार्यमें कभी प्रतिहत नहीं होते। नृसिंह-कवचका एक बार जप करनेसे मनुष्य आगकी लपटद्वारा सम्पूर्ण उपद्रवोंका नाश कर सकता है। तीन बार जप करनेपर वह दिव्य कवच दैत्यों और दानवोंसे रक्षा करता है। तीन बार जप करके सिद्ध किया हुआ कवच भूत, पिशाच, राक्षस, अन्यान्य लुटेरे तथा देवताओं और असुरोंके लिये भी अभेद्य होता है। ब्रह्मपुत्री मोहिनी! सम्पूर्ण कामनाओं और फलोंके दाता महापराक्रमी नृसिंहजीकी सदा भक्तिपूर्वक पूजा करनी चाहिये। शुभे! भगवान् नृसिंहका दर्शन, स्तवन, नमस्कार और पूजन करके मनुष्य राज्य, स्वर्ग तथा दुर्लभ मोक्ष भी प्राप्त कर लेते हैं। भगवान् नृसिंहका दर्शन करके मनुष्यको मनोवाञ्छित फलकी प्राप्ति होती है तथा वह सब पापोंसे मुक्त हो भगवान् विष्णुके लोकमें जाता है। जो भक्तिपूर्वक नृसिंहरूपधारी भगवान्का एक बार भी दर्शन कर लेता है, वह मन, वाणी और शरीरद्वारा होनेवाले सम्पूर्ण पातकोंसे मुक्त हो जाता है। दुर्गम संकटमें, चोर और व्याघ्र आदिकी पीड़ा उपस्थित होनेपर, दुर्गम प्रदेशमें, प्राणसंकटके समय, विष,अग्नि और जलसे भय होनेपर, राजा आदिसे भय प्राप्त होनेपर, घोर संग्राममें और ग्रह तथा रोग आदिकी पीड़ा प्राप्त होनेपर जो पुरुष भगवान् नृसिंहका स्मरण करता है, वह संकटोंसे छूट जाता है। जैसे सूर्योदय होनेपर भारी अन्धकार नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार भगवान् नृसिंहका दर्शन होनेपर सब प्रकारके उपद्रव मिट जाते हैं। भगवान् नृसिंहके प्रसन्न होनेपर गुटिका, अञ्जन, पातालप्रवेश, पैरोंमें लगाने योग्य दिव्यलेप, दिव्य रसायन तथा अन्य मनोवाञ्छित पदार्थ भी मनुष्य प्राप्त कर लेता है। मानव जिन-जिन कामनाओंका चिन्तन करते हुए भगवान् नृसिंहका भजन करता है, उन-उनको अवश्य प्राप्त कर लेता है।
श्वेतमाधव, मत्स्यमाधव, कल्पवृक्ष और अष्टाक्षर-मन्त्र, स्नान, तर्पण आदिकी महिमा
पुरोहित वसु कहते हैं— महाभागे! उस पुरुषोत्तमक्षेत्रमें तीर्थोंका समुदायरूप एक दूसरा तीर्थ है जो परम पुण्यमय तथा दर्शनमात्रसे पापोंका नाश करनेवाला है, उसका वर्णन करता हूँ, सुनो। उस तीर्थके आराध्य हैं—अनन्त नामक वासुदेव। उनका भक्तिपूर्वक दर्शन और प्रणाम
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करके मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो परम पदको प्राप्त होता है। जो मनुष्य श्वेतगङ्गामें स्नान करके श्वेतमाधव तथा मत्स्यमाधवका दर्शन करता है, वह श्वेतद्वीपमें जाता है। जो हिमके समान श्वेतवर्ण और शुद्ध हैं, जिन्होंने शङ्ख, चक्र और गदा धारण कर रखे हैं, जो समस्त शुभ लक्षणोंसे संयुक्त तथा विकसित कमलके समान विशाल नेत्रवाले हैं, जिनका वक्षःस्थल श्रीवत्सचिह्नसे सुशोभित है, जो अत्यन्त प्रसन्न एवं चार भुजाधारी हैं, जिनका वक्षःस्थल वनमालासे अलंकृत है, जो माथेपर मुकुट और भुजाओंमें अङ्गद धारण करते हैं, जिनके कंधे हृष्ट-पुष्ट हैं और जो पीताम्बरधारी तथा कुण्डलोंसे अलंकृत हैं, उन भगवान् (श्वेतमाधव)- का जो लोग कुशके अग्रभागसे भी स्पर्श कर लेते हैं, वे एकाग्रचित्त विष्णुभक्त मानव दिव्यलोकमें जाते हैं। जो शङ्ख, गोदुग्ध और चन्द्रमाके समान उज्ज्वल कान्तिवाली सर्वपापहारिणी माधव नामक प्रतिमाका दर्शन करता है तथा विकसित कमलके सदृश नेत्रवाली उस भगवन्मूर्तिको एक बार भक्तिभावसे प्रणाम कर लेता है, वह सम्पूर्ण कामनाओंका त्याग करके विष्णुलोकमें प्रतिष्ठित होता है।
श्वेतमाधवका दर्शन करके उनके समीप ही मत्स्यमाधवका दर्शन करे। वे ही पूर्वकालमें एकार्णवके जलमें मत्स्यरूप धारण करके प्रकट हुए और वेदोंका उद्धार करनेके लिये रसातलमें स्थित थे। पहले पृथ्वीका चिन्तन करके प्रतिष्ठित हुए भगवान् मत्स्यावतारका चिन्तन करना चाहिये। भगवान् लक्ष्मीपति तरुणावस्थासे युक्त मत्स्यमाधवका रूप धारण करके विराज रहे हैं। जो पवित्रचित्त होकर उन्हें प्रणाम करता है, वह सब प्रकारके क्लेशोंसे छूट जाता है और उस परम धामको जाता है जहाँ साक्षात् श्रीहरि विराजमान हैं।
शुभे! अब मैं मार्कण्डेयसरोवर एवं समुद्रमें मार्जन आदिकी विधि बतलाता हूँ। तुम भक्तिभावसे तन्मय होकर पुण्य एवं मुक्ति देनेवाले इस पुराण-प्रसङ्गको सुनो। मार्कण्डेयसरोवरमें सब समय स्नान उत्तम माना गया है, किंतु चतुर्दशीको उसका विशेष माहात्म्य है, उस दिनका स्नान सब पापोंका नाश करनेवाला है। उसी प्रकार समुद्रका स्नान हर समय उत्तम बताया गया है, किंतु पूर्णिमाको उस स्नानका विशेष महत्त्व है। उस दिन समुद्र-स्नान करनेसे अश्वमेध यज्ञका फल मिलता है। जब ज्येष्ठ मासकी पूर्णिमाको ज्येष्ठा नक्षत्र हो उस समय परम कल्याणमय तीर्थराज समुद्रमें स्नान करनेके लिये विशेषरूपसे जाना चाहिये। समुद्र-स्नानके लिये जाते समय मन, वाणी, शरीरसे शुद्ध रहना चाहिये। भीतरका भाव भी शुद्ध हो, मन भगवत्-चिन्तनके सिवा अन्यत्र न जाय। सब प्रकारके द्वन्द्वोंसे मुक्त, वीतराग एवं ईर्ष्यासे रहित होकर स्नान करना चाहिये।
कल्पवृक्ष नामक वट बड़ा रमणीय है। उसके ऊपर साक्षात् भगवान् बालमुकुन्द विराजते हैं। वहाँ स्नान करके एकाग्रचित्तसे तीन बार भगवान्की