संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
\ उत्तरभाग \ ६७७
* उत्तरभाग * ६७७
दूसरे दिन पवित्र होकर प्रेतपर्वतपर जाय और वहाँ ब्रह्मकुण्डमें स्नान करके विद्वान् पुरुष देवता आदिका तर्पण करे। फिर पवित्र होकर प्रेतपर्वतपर पितरोंका आवाहन करे और पूर्ववत् संकल्प करके पिण्ड दे। परम उत्तम पितृदेवताओंकी उनके नाम-मन्त्रोंद्वारा भलीभाँति पूजा करके उनके लिये पिण्डदान करे। मनुष्य पितृ-कर्ममें जितने तिल ग्रहण करता है, उतने ही असुर भयभीत होकर इस प्रकार भागते हैं, जैसे गरुड़को देखकर सर्प भाग जाते हैं। मोहिनी! उस प्रेतपर्वतपर पूर्ववत् सब कार्य करे। तत्पश्चात् वहाँ तिलमिश्रित सत्तू दे और इस प्रकार प्रार्थना करे—
ये केचित्प्रेतरूपेण वर्तन्ते पितरो मम॥
ते सर्वे तृप्तिमायान्तु सक्तुभिस्तिलमिश्रितैः।
आब्रह्मस्तम्बपर्यन्तं यत्किञ्चित् सचराचरम्॥
मया दत्तेन पिण्डेन तृप्तिमायान्तु सर्वशः।
(ना० उत्तर० ४५। ६४—६६)
‘जो कोई मेरे पितर प्रेतरूपमें विद्यमान हैं, वे सब इन तिलमिश्रित सत्तुओंके दानसे तृप्ति-लाभ करें। ब्रह्माजीसे लेकर कीटपर्यन्त जो कुछ भी चराचर जगत् है, वह मेरे दिये हुए पिण्डसे पूर्णतः तृप्त हो जाय।’
सबसे पहले पाँच तीर्थोंमें तथा उत्तरमानसमें श्राद्ध करनेकी विधि है। हाथमें कुश लेकर आचमन करके कुशयुक्त जलसे अपना मस्तक सींचे और उत्तरमानसमें जाकर मन्त्रोच्चारणपूर्वक स्नान करे। उस समय इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये—
उत्तरे मानसे स्नानं करोम्यात्मविशुद्धये।
सूर्यलोकादिसम्प्राप्तिसिद्धये पितृमुक्तये॥ ६८॥
‘मैं उत्तरमानसमें आत्मशुद्धि, सूर्यादि लोकोंकी प्राप्ति तथा पितरोंकी मुक्तिके लिये स्नान करता हूँ।’
इस प्रकार स्नान करके विधिपूर्वक देवता आदिका तर्पण करे और अन्तमें इस प्रकार कहे—
आब्रह्मस्तम्बपर्यन्तं देवर्षिपितृमानवाः।
तृप्यन्तु पितरः सर्वे मातृमातामहादयः॥ ६९-७०॥
‘ब्रह्माजीसे लेकर कीटपर्यन्त समस्त जगत्, देवता, ऋषि, दिव्य पितर, मनुष्य, पिता, पितामह, प्रपितामह, माता, पितामही, प्रपितामही, मातामह और प्रमातामह आदि सब लोग तृप्त हो जायँ।’
अपनी शाखाके गृह्यसूत्रमें बतायी हुई विधिके अनुसार पिण्डदानसहित श्राद्ध करना चाहिये। अष्टकाश्राद्ध, आभ्युदयिकश्राद्ध, गयाश्राद्ध तथा क्षयाह तिथिको किये जानेवाले एकोद्दिष्ट श्राद्धमें माताके लिये पृथक् श्राद्ध करना चाहिये और अन्यत्र पतिके साथ ही संयुक्तरूपसे उसके लिये श्राद्ध करना उचित है। तदनन्तर—
ॐ नमोऽस्तु भानवे भर्त्रे सोमभौमज्ञरूपिणे।
जीवभार्गवशनैश्चरराहुकेतुस्वरूपिणे ॥ ७२ ॥
‘सोम, मङ्गल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनैश्चर, राहु तथा केतु—ये सब जिनके स्वरूप हैं, सबका भरण-पोषण करनेवाले उन भगवान् सूर्यको नमस्कार है।’
—इस मन्त्रसे भगवान् सूर्यको नमस्कार करके उनकी पूजा करे। ऐसा करनेवाला पुरुष अपने पितरोंको सूर्यलोकमें पहुँचा देता है। मानसरोवर पूर्वोक्त प्रेतपर्वत आदिसे यहाँ उत्तरमें स्थित है, इसलिये इसे उत्तरमानस कहते हैं। उत्तरमानससे मौन होकर दक्षिणमानसकी यात्रा करनी चाहिये। उत्तरमानससे उत्तर दिशामें उदीची नामक तीर्थ है, जो पितरोंको मोक्ष देनेवाला है। उदीची और मुण्डपृष्ठके मध्यभागमें देवताओं, ऋषियों तथा मनुष्योंको तृप्त करनेवाला कनखलतीर्थ है, जो पितरोंको उत्तम गति देनेवाला है। वहाँ स्नान करके मनुष्य कुकनककी भाँति प्रकाशित होता है और अत्यन्त पवित्र हो जाता है; इसीलिये वह परम उत्तम तीर्थ लोकमें कनखल नामसे विख्यात है। कनखलसे दक्षिण भागमें दक्षिणमानसतीर्थ
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है। दक्षिणमानसमें तीन तीर्थ बताये गये हैं। उन सबमें विधिपूर्वक स्नान करके पृथक्-पृथक् श्राद्ध करना चाहिये। स्नानके समय निम्नाङ्कित मन्त्रका उच्चारण करे—
दिवाकर करोमीह स्नानं दक्षिणमानसे।
ब्रह्महत्यादिपापौघघातनाय विमुक्तये ॥ ७८-७९ ॥
‘भगवन् दिवाकर! मैं ब्रह्महत्या आदि पापोंके समुदायका नाश करने और मोक्ष पानेके लिये यहाँ दक्षिणमानसतीर्थमें स्नान करता हूँ।’
यहाँ स्नान-पूजन आदि करके पिण्डसहित श्राद्ध करे और अन्तमें पुनः भगवान् सूर्यको प्रणाम करते हुए निम्नाङ्कित वाक्य कहे—
नमामि सूर्यं तृप्त्यर्थं पितॄणां तारणाय च।
पुत्रपौत्रधनैश्वर्याद्यायुरारोग्यवृद्धये ॥८०॥
‘मैं पितरोंकी तृप्ति तथा उद्धारके लिये और पुत्र, पौत्र, धन, ऐश्वर्य आदि आयु तथा आरोग्यकी वृद्धिके लिये भगवान् सूर्यको प्रणाम करता हूँ।’
इस प्रकार मौनभावसे सूर्यका दर्शन और पूजन करके नीचे लिखे मन्त्रका उच्चारण करे—
कव्यवाडादयो ये च पितॄणां देवतास्तथा।
मदीयैः पितृभिः सार्द्धं तर्पिताः स्थ स्वधाभुजः ॥ ८१-८२ ॥
‘कव्यवाड्, अनल आदि जो पितरोंके देवता हैं, वे मेरे पितरोंके साथ तृप्त होकर स्वधाका उपभोग करें।’
वहाँसे सब तीर्थोंमें परम उत्तम फल्गुतीर्थको जाय। वहाँ श्राद्ध करनेसे सदा पितरोंकी तथा श्राद्धकर्ताकी भी मुक्ति होती है। पूर्वकालमें ब्रह्माजीकी प्रार्थनासे भगवान् विष्णु स्वयं फल्गुरूपसे प्रकट हुए थे। दक्षिणाग्निमें ब्रह्माजीके द्वारा जो होम किया गया, निश्चय ही उसीसे फल्गुतीर्थका प्रादुर्भाव हुआ; जिसमें स्नान आदि करनेसे घरकी लक्ष्मी फलती-फूलती है, गौ कामधेनु होकर मनोवाञ्छित फल देती है तथा वहाँका जल और भूतल भी मनोवाञ्छित फल देता है। सृष्टिके अन्तर्गत फल्गुतीर्थ कभी निष्फल नहीं होता। समस्त लोकोंमें जो सम्पूर्ण तीर्थ हैं, वे सब फल्गुतीर्थमें स्नान करनेके लिये आते हैं। गङ्गाजी भगवान् विष्णुका चरणोदक हैं और फल्गुरूपमें साक्षात् भगवान् आदिगदाधर प्रकट हुए हैं। वे स्वयं ही द्रव (जल)-रूपमें विराजमान हैं, अतः फल्गुतीर्थको गङ्गासे अधिक माना गया है। फल्गुके जलमें स्नान करनेसे सहस्र अश्वमेध-यज्ञोंका फल प्राप्त होता है। (उसमें स्नान करते समय निम्नाङ्कित मन्त्रका उच्चारण करना चाहिये—)
फल्गुतीर्थे विष्णुजले करोमि स्नानमद्य वै।
पितॄणां विष्णुलोकाय भुक्तिमुक्तिप्रसिद्धये ॥८८॥
‘भगवान् विष्णु ही जिसके जल हैं, उस फल्गुतीर्थमें आज मैं स्नान करता हूँ। इसका उद्देश्य यह है कि पितरोंको विष्णुलोककी और मुझे भोग एवं मोक्षकी प्राप्ति हो।’
फल्गुतीर्थमें स्नान करके मनुष्य अपने गृह्यसूत्रमें बतायी हुई विधिके अनुसार तर्पण एवं पिण्डदानपूर्वक श्राद्ध करे। तत्पश्चात् शिवलिङ्गरूपमें स्थित ब्रह्माजीको नमस्कार करे—
नमः शिवाय देवाय ईशानपुरुषाय च।
अघोरवामदेवाय सद्योजाताय शम्भवे ॥ ९० ॥
‘ईशान, तत्पुरुष, अघोर, वामदेव तथा सद्योजात—इन पाँच नामोंसे प्रसिद्ध कल्याणमय भगवान् शिवको नमस्कार है।’
इस मन्त्रसे पितामहको नमस्कार करके उनकी पूजा करनी चाहिये। फल्गुतीर्थमें स्नान करके यदि मनुष्य भगवान् गदाधरका दर्शन और उनको नमस्कार करे तो वह पितरोंसहित अपने-आपको वैकुण्ठधाममें ले जाता है। (भगवान् गदाधरको नमस्कार करते समय निम्नाङ्कित मन्त्र पढ़ना चाहिये—)
ॐ नमो वासुदेवाय नमः संकर्षणाय च।
प्रद्युम्नायानिरुद्धाय श्रीधराय च विष्णवे ॥ ९२-९३ ॥
‘वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न तथा अनिरुद्ध—