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संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

मार्कण्डेयपुराणका परिचय तथा उसके श्रवण एवं दानका माहात्म्य

  • पूर्वभाग-चतुर्थ पाद * | ५२९
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मार्कण्डेयपुराणका परिचय तथा उसके श्रवण एवं दानका माहात्म्य

श्रीब्रह्माजी कहते हैं—मुने! अब मैं तुम्हें मार्कण्डेयपुराणका परिचय देता हूँ। यह महापुराण पढ़ने और सुननेवाले पुरुषोंके लिये सदा पुण्यदायक है। जिसमें पक्षियोंको प्रवचनका अधिकारी बनाकर उनके द्वारा सब धर्मोंका निरूपण किया गया है, वह मार्कण्डेयपुराण नौ हजार श्लोकोंका है, ऐसा कहा जाता है। इसमें पहले मार्कण्डेयमुनिके समीप जैमिनिके प्रश्नका वर्णन है। फिर धर्मसंज्ञक पक्षियोंके जन्मकी कथा कही गयी है। फिर उनके पूर्वजन्मकी कथा और देवराज इन्द्रके कारण उन्हें शापरूप विकारकी प्राप्तिका कथन है। तदनन्तर बलभद्रजीकी तीर्थयात्रा, द्रौपदीके पाँचों पुत्रोंकी कथा, हरिश्चन्द्रकी पुण्यमयी कथा, आडी और बक पक्षियोंका युद्ध, पिता और पुत्रका उपाख्यान, दत्तात्रेयजीकी कथा, महान् आख्यानसहित हैहयचरित्र, अलर्कचरित्रके साथ मदालसाकी कथा, नौ प्रकारकी सृष्टिका पुण्यमय वर्णन, कल्पान्तकालका निर्देश, यक्ष-सृष्टि-निरूपण, रुद्र आदिकी सृष्टि, द्वीपचर्याका वर्णन, मनुओंकी अनेक पापनाशक कथाओंका कीर्तन और उन्हींमें दुर्गाजीकी अत्यन्त पुण्यदायिनी कथा है, जो आठवें मन्वन्तरके प्रसङ्गमें कही गयी है। तत्पश्चात् तीन वेदोंके तेजसे प्रणवकी उत्पत्ति, सूर्यदेवके जन्मकी कथा, उनका माहात्म्य, वैवस्वत मनुके वंशका वर्णन, वत्सप्रीका चरित्र, तदनन्तर महात्मा खनित्रकी पुण्यमयी कथा, राजा अविक्षित्का चरित्र, किमिच्छिक व्रतका वर्णन, नरिष्यन्त-चरित्र, इक्ष्वाकु-चरित्र, नल-चरित्र, श्रीरामचन्द्रजीकी उत्तम कथा, कुशके वंशका वर्णन, सोमवंशका वर्णन, पुरूरवाकी पुण्यमयी कथा, नहुषका अद्भुत वृत्तान्त, ययातिका पवित्र चरित्र, यदुवंशका वर्णन, श्रीकृष्णकी बाललीला, उनकी मथुरा और द्वारकाकी लीलाएँ, सब अवतारोंकी कथा, सांख्यमतका वर्णन, प्रपञ्चके मिथ्यात्वका वर्णन, मार्कण्डेयजीका चरित्र तथा पुराणश्रवण आदिका फल—ये सब विषय हैं। वत्स! जो मनुष्य इस मार्कण्डेयपुराणका भक्तिभावसे आदरपूर्वक श्रवण करता है, वह परम गतिको पाता है। जो इसकी व्याख्या करता है, वह भगवान् शिवके लोकमें जाता है। जो इसे लिखकर हाथीकी स्वर्णमयी प्रतिमाके साथ कार्तिककी पूर्णिमाके दिन श्रेष्ठ ब्राह्मणको दान देता है, वह ब्रह्मपदको प्राप्त कर लेता है। जो मार्कण्डेयपुराणकी इस विषय-सूचीको सुनता अथवा सुनाता है, वह मनोवाञ्छित फल पाता है।

५३० * संक्षिप्त नारदपुराण *


अग्निपुराणकी अनुक्रमणिका तथा उसके पाठ, श्रवण एवं दानका फल

श्रीब्रह्माजी कहते हैं— अब मैं अग्निपुराणका वर्णन करता हूँ। जिसमें अग्निदेवने महर्षि वसिष्ठसे ईशान-कल्पका वर्णन किया है, वह अग्निपुराण पंद्रह हजार श्लोकोंसे पूर्ण है। उसमें अनेक प्रकारके चरित्र हैं। यह पुराण अद्भुत है। जो लोग इसका पाठ और श्रवण करते हैं, उनके समस्त पापोंको यह हर लेनेवाला है। इसमें पहले पुराणविषयक प्रश्न है, फिर सब अवतारोंकी कथा कही गयी है। तत्पश्चात् सृष्टिका प्रकरण और विष्णुपूजा आदिका वर्णन है। तदनन्तर अग्निकार्य, मन्त्र, मुद्रादिलक्षण, सर्वदीक्षाविधान और अभिषेकनिरूपण है। इसके बाद मण्डल आदिका लक्षण, कुशापामार्जन, पवित्रारोपणविधि, देवालयविधि, शालग्राम आदिकी पूजा तथा मूर्तियोंके पृथक्-पृथक् चिह्नका वर्णन है। फिर न्यास आदिका विधान, प्रतिष्ठा, पूर्तकर्म, विनायक आदिका पूजन, नाना प्रकारकी दीक्षाओंकी विधि, सर्वदेवप्रतिष्ठा, ब्रह्माण्डका वर्णन, गङ्गादि तीर्थोंका माहात्म्य, द्वीप और वर्षका वर्णन, ऊपर और नीचेके लोकोंकी रचना, ज्योतिश्चक्रका निरूपण, ज्योतिः-शास्त्र, युद्धजयार्णव, षट्कर्म, मन्त्र, यन्त्र, औषधसमूह, कुब्जिका आदिकी पूजा, छः प्रकारकी न्यासविधि, कोटिहोमविधि, मन्वन्तरनिरूपण, ब्रह्मचर्यादि आश्रमोंके धर्म, श्राद्धकल्पविधि, ग्रहयज्ञ, श्रौतस्मार्तकर्म, प्रायश्चित्तवर्णन, तिथि-व्रत आदिका वर्णन, वार-व्रतका कथन, नक्षत्रव्रतकी विधिका प्रतिपादन, मासिक व्रतका निर्देश, उत्तम दीपदानविधि, नवव्यूहपूजन, नरक-निरूपण, व्रतों और दानोंकी विधिका प्रतिपादन, नाडीचक्रका संक्षिप्त वर्णन, संध्याकी उत्तम विधि, गायत्रीके अर्थका निर्देश, लिङ्गस्तोत्र, राज्याभिषेकके मन्त्रका प्रतिपादन, राजाओंके धार्मिक कृत्य, स्वप्नसम्बन्धी विचारका अध्याय (या प्रसङ्ग), शकुन आदिका निरूपण, मण्डल आदिका निर्देश, रत्नदीक्षाविधि, रामोक्त नीतिका वर्णन, रत्नोंके लक्षण, धनुर्विद्या, व्यवहारदर्शन, देवासुरसंग्रामकी कथा, आयुर्वेद-निरूपण, गज आदिकी चिकित्सा, उनके रोगोंकी शान्ति, गोचिकित्सा, मनुष्यादि चिकित्सा, नाना प्रकारकी पूजा-पद्धति, विविध प्रकारकी शान्ति, छन्दःशास्त्र, साहित्य, एकाक्षर आदि कोष, सिद्ध शब्दानुशासन (व्याकरण), स्वर्गादि वर्गोंसे युक्त कोश, प्रलयका लक्षण, शारीरक (वेदान्त)-का निरूपण, नरक-वर्णन, योगशास्त्र, ब्रह्मज्ञान तथा पुराणश्रवणका फल—इन विषयोंका प्रतिपादन हुआ है। ब्रह्मन्! यही अग्निपुराण कहा गया है। जो अग्निपुराणको लिखकर सुवर्णमय कमल और तिलमयी धेनुके साथ मार्गशीर्षकी पूर्णिमाके दिन पौराणिक ब्राह्मणको विधिपूर्वक दान देता है, वह स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है। इस प्रकार तुम्हें अग्निपुराणकी अनुक्रमणिका बतायी गयी है, जो इसे पढ़ने और सुननेवाले मनुष्योंको इहलोक और परलोकमें भी मोक्ष देनेवाली है।