संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पूर्वभाग-प्रथम पाद ११७
- पूर्वभाग-प्रथम पाद * ११७
देता है, उस समय प्रायश्चित्तका भागी होता है।
साधुशिरोमणे! अपने शरीरको सफेद बाल आदि दोषोंसे युक्त देखकर अपनी पत्नीको पुत्रोंके संरक्षणमें छोड़ दे। स्वयं घरसे विरक्त होकर वनमें चला जाय अथवा पत्नीको भी साथ ही लेता जाय। वहाँ तीनों समय स्नान करे। नख, दाढ़ी, मूँछ और जटा धारण किये रहे। नीचे भूमिपर सोये। ब्रह्मचर्यका पालन करे और पञ्चमहायज्ञोंके अनुष्ठानमें तत्पर रहे। प्रतिदिन फल-मूलका भोजन करे और स्वाध्यायमें लगा रहे। भगवान् विष्णुके भजनमें संलग्न होकर सब प्राणियोंके प्रति दयाभाव रखे। गाँवमें पैदा हुए फल-मूलको त्याग दे। प्रतिदिन आठ ग्रास भोजन करे तथा रातमें उपवासपूर्वक रहे। वानप्रस्थ-आश्रममें रहनेवाला द्विज उबटन, तेल, मैथुन, निद्रा और आलस्य त्याग दे। वानप्रस्थी पुरुष शङ्ख, चक्र और गदा धारण करनेवाले भगवान् नारायणका चिन्तन तथा चान्द्रायण आदि तपोमय व्रत करे। सर्दी-गरमी आदि द्वन्द्वोंको सहन करे। सदा अग्निकी सेवा (अग्निहोत्र)-में संलग्न रहे।
जब मनमें सब वस्तुओंकी ओरसे वैराग्य हो जाय तभी संन्यास ग्रहण करे, अन्यथा वह पतित हो जाता है। संन्यासीको वेदान्तके अभ्यासमें तत्पर, शान्त, संयमी और जितेन्द्रिय, द्वन्द्वोंसे रहित तथा ममता और अहंकारसे शून्य रहना चाहिये। वह शम-दम आदि गुणोंसे युक्त तथा काम-क्रोधादि दोषोंसे दूर रहे। संन्यासी द्विज नग्न रहे या पुराना कौपीन पहने। उसे अपना मस्तक मुँड़ाये रहना चाहिये। वह शत्रु-मित्र तथा मान-अपमानमें समान भाव रखे। गाँवमें एक रात और नगरमें अधिक-से-अधिक तीन रात रहे। संन्यासी सदा भिक्षासे ही जीवन-निर्वाह करे। किसी एकके घरका अन्न खानेवाला न हो। जब चूल्हेकी आग बुझ जाय, घरके लोगोंका खाना-पीना हो गया हो, कोई बाकी न हो, उस समय किसी उत्तम द्विजके घरमें, जहाँ लड़ाई-झगड़ा न हो, भिक्षाके लिये संन्यासीको जाना चाहिये। संन्यासी तीनों काल स्नान और भगवान् नारायणका ध्यान करे। और मनको जीतकर इन्द्रियोंको वशमें रखते हुए प्रतिदिन प्रणवका जप करता रहे। अगर कोई लम्पट संन्यासी कभी एक व्यक्तिका अन्न खाकर रहने लगे तो दस हजार प्रायश्चित्त करनेपर भी उसका उद्धार नहीं दिखायी देता। ब्रह्मन्! यदि संन्यासी लोभवश केवल शरीरके ही पालन-पोषणमें लगा रहे तो उसे चाण्डालके समान समझना चाहिये। सभी वर्णों और आश्रमोंमें उसकी निन्दा होती है। संन्यासी अपने आत्मस्वरूप भगवान् नारायणका चिन्तन करे। जो रोग-शोकसे रहित, द्वन्द्वोंसे परे, ममताशून्य, शान्त, मायातीत, ईर्ष्यारहित, अव्यय, परिपूर्ण, सच्चिदानन्दस्वरूप ज्ञानमय, निर्मल, परम ज्योतिर्मय, सनातन, अधिकारी, अनादि, अनन्त जगत्की चिन्मयताके कारण गुणातीत तथा परात्पर परमात्मा हैं, उन्हींका नित्य ध्यान करना चाहिये। वह उपनिषद्-वाक्योंका पाठ एवं वेदान्तशास्त्रके अर्थका विचार करता रहे। जितेन्द्रिय रहकर सदा सहस्रों मस्तकवाले भगवान् श्रीहरिका ध्यान करे। जो ईर्ष्या छोड़कर इस प्रकार भगवान्के ध्यानमें तत्पर रहता है, वह परमानन्दस्वरूप उत्कृष्ट सनातन ज्योतिको प्राप्त होता है। जो द्विज इस तरह क्रमशः आश्रमसम्बन्धी आचारोंका पालन करता है, वह परम धाममें जाता है। वहाँ जाकर कोई शोक नहीं करता। वर्ण और आश्रम-सम्बन्धी धर्मके पालनमें तत्पर एवं सब पापोंसे रहित भगवद्भक्त भगवान् विष्णुके परम धामको प्राप्त होते हैं।
श्राद्धकी विधि तथा उसके विषयमें अनेक ज्ञातव्य विषयोंका वर्णन
श्रीसनकजी कहते हैं— मुनिश्रेष्ठ! मैं श्राद्धकी उत्तम विधिका वर्णन करता हूँ, सुनो। उसे सुनकर मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। पिताकी क्षयाह तिथिके पहले दिन स्नान करके एक समय
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भोजन करे। जमीनपर सोये, ब्रह्मचर्यका पालन करे तथा रातमें ब्राह्मणोंको निमन्त्रण दे। श्राद्धकर्ता पुरुष दाँतुन करना, पान खाना, तेल और उबटन लगाना, मैथुन, औषध-सेवन तथा दूसरोंके अन्नका भोजन अवश्य त्याग दे। रास्ता चलना, दूसरे गाँव जाना, कलह, क्रोध और मैथुन करना, बोझ ढोना तथा दिनमें सोना—ये सब कार्य श्राद्धकर्ता और श्राद्धभोक्ताको छोड़ देने चाहिये। यदि श्राद्धमें निमन्त्रित पुरुष मैथुन करता है तो वह ब्रह्महत्याको प्राप्त होता और नरकमें जाता है। श्राद्धमें वेदके ज्ञाता और वैष्णव ब्राह्मणको नियुक्त करना चाहिये। जो अपने वर्ण और आश्रमधर्मके पालनमें तत्पर, परम शान्त, उत्तम कुलमें उत्पन्न, राग-द्वेषसे रहित, पुराणोंके अर्थज्ञानमें निपुण, सब प्राणियोंपर दया करनेवाला, देवपूजापरायण, स्मृतियोंका तत्त्व जाननेमें कुशल, वेदान्त-तत्त्वका ज्ञाता, सम्पूर्ण लोकोंके हितमें संलग्न, कृतज्ञ, उत्तम गुणयुक्त, गुरुजनोंकी सेवामें तत्पर तथा उत्तम शास्त्रवचनोंद्वारा धर्मका उपदेश देनेवाला हो, उसे श्राद्धमें निमन्त्रित करे।
किसी अङ्गसे हीन अथवा अधिक अङ्गवाला, कदर्य, रोगी, कोढ़ी, बुरे नखोंवाला, अपने व्रतको खण्डित करनेवाला, ज्योतिषी, मुर्दा जलानेवाला, कुत्सित वचन बोलनेवाला, परिवेत्ता (बड़े भाईके अविवाहित रहते हुए स्वयं विवाह करनेवाला), देवल, दुष्ट, निन्दक, असहनशील, धूर्त, गाँवभरका पुरोहित, असत्-शास्त्रोंमें अनुराग रखनेवाला, वृषली¹पति, कुण्डगोलक, यज्ञके अनधिकारियोंसे यज्ञ करानेवाला, पाखण्डपूर्ण आचरणवाला, अकारण सिर मुँड़ानेवाला, परायी स्त्री और पराये धनका लोभ रखनेवाला, भगवान् विष्णुकी भक्तिसे रहित, भगवान् शिवकी भक्तिसे विमुख, वेद बेचनेवाला, व्रतका विक्रय करनेवाला, स्मृतियों तथा मन्त्रोंको बेचनेवाला, गवैया, मनुष्योंकी झूठी प्रशंसाके लिये कविता करनेवाला, वैद्यक-शास्त्रसे जीविका चलानेवाला, वेदनिन्दक, गाँव और वनमें आग लगानेवाला, अत्यन्त कामी, रस बेचनेवाला, झूठी युक्ति देनेमें तत्पर रहनेवाला—ये सब ब्राह्मण यत्नपूर्वक श्राद्धमें त्याग देने योग्य हैं। श्राद्धसे एक दिन पहले या श्राद्धके दिन ब्राह्मणोंको निमन्त्रित करे। श्राद्धकर्ता पुरुष हाथमें कुश लेकर इन्द्रियोंको वशमें रखते हुए विद्वान् ब्राह्मणको निमन्त्रण दे और इस प्रकार कहे ‘हे साधुशिरोमणे! श्राद्धमें अपना समय देकर मुझपर कृपा प्रसाद करें।’
तदनन्तर प्रातःकाल उठकर सबेरेका नित्यकर्म समाप्त करके विद्वान् पुरुष कुतपकालमें² श्राद्ध प्रारम्भ करे। दिनके आठवें मुहूर्तमें जब सूर्यका तेज कुछ मन्द हो जाता है, उस समयको ‘कुतपकाल’ कहते हैं। उसमें पितरोंकी तृप्तिके लिये दिया हुआ दान अक्षय होता है। ब्रह्माजीने पितरोंको अपराह्नकाल ही दिया है। मुनिश्रेष्ठ! विभिन्न द्रव्योंके साथ जो कव्य असमयमें पितरोंके लिये दिया जाता है, उसे राक्षसका भाग समझना चाहिये। वह पितरोंके पास नहीं पहुँच पाता है। सायंकालमें दिया हुआ कव्य राक्षसका भाग हो जाता है। उसे देनेवाला नरकमें पड़ता है और उसको भोजन करनेवाला भी नरकगामी होता है। ब्रह्मन्! यदि निधनतिथिका मान पहले दिन एक दण्ड ही हो और दूसरे दिन वह अपराह्नतक व्याप्त हो तो विद्वान् पुरुषको दूसरे ही दिन श्राद्ध करना चाहिये। किंतु मृत्युतिथि यदि दोनों दिन अपराह्नकालमें व्याप्त हो तो क्षयपक्षमें पूर्वतिथिको श्राद्धमें ग्रहण करना चाहिये और वृद्धिपक्षमें
१. वृषली शूद्रजातिकी स्त्रीको कहते हैं। स्मृतियोंके अनुसार जो कन्या अविवाहित अवस्थामें अपने पिताके यहाँ रजस्वला हो जाती है, उसकी भी वृषली संज्ञा होती है।
२. सम्पूर्ण दिन १५ मुहूर्तका होता है। उसमें आठवाँ मुहूर्त मध्याह्नके बाद आता है। वही पितरोंके श्राद्धके लिये उत्तम माना गया है, उसीका नाम ‘कुतप’ है।