संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पूर्वभाग-प्रथम पाद १०३
- पूर्वभाग-प्रथम पाद * १०३
व्रत करनेवाले थे, वहाँ एकत्र हुए। उन सबको मैंने देखा। उन्हीं लोगोंके साथ निराहार रहकर बिना सेनाके ही मैं अकेला रातमें वहाँ जागरण करता रहा। और हे तात! जागरण समाप्त होनेपर मेरी वहीं मृत्यु हो गयी। तब बड़ी-बड़ी दाढ़ोंसे भय उत्पन्न करनेवाले यमराजके दूतोंने मुझे बाँध लिया और अनेक प्रकारके क्लेशसे भरे हुए मार्गद्वारा यमराजके निकट पहुँचाया। वहाँ जाकर मैंने यमराजको देखा, जो सबके प्रति समान बर्ताव करनेवाले हैं। तब यमराजने चित्रगुप्तको बुलाकर कहा—'विद्वन्! इसको दण्ड-विधान कैसे करना है, बताओ।' साधुशिरोमणे! धर्मराजके ऐसा कहनेपर चित्रगुप्तने देरतक विचार किया; फिर इस प्रकार कहा—'धर्मराज! यद्यपि यह सदा पापमें लगा रहा है, यह ठीक है, तथापि एक बात सुनिये। एकादशीको उपवास करनेवाला मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। नर्मदाके रमणीय तटपर एकादशीके दिन यह निराहार रहा है। वहाँ जागरण और उपवास करके यह सर्वथा निष्पाप हो गया है। इसने जो कोई भी बहुत-से पाप किये थे, वे सब उपवासके प्रभावसे नष्ट हो चुके हैं।' बुद्धिमान् चित्रगुप्तके ऐसा कहनेपर धर्मराज मेरे सामने काँपने लगे। उन्होंने भूमिपर दण्डकी भाँति पड़कर मुझे साष्टाङ्ग प्रणाम किया और भक्तिभावसे मेरी पूजा की। तदनन्तर धर्मराजने अपने सब दूतोंको बुलाकर इस प्रकार कहा।
धर्मराज बोले—'दूतो! मेरी बात सुनो। मैं तुम्हारे हितकी बड़ी उत्तम बात बतलाता हूँ। धर्ममार्गमें लगे हुए मनुष्योंको मेरे पास न लाया करो। जो भगवान् विष्णुके पूजनमें तत्पर, संयमी, कृतज्ञ, एकादशी-व्रतपरायण तथा जितेन्द्रिय हैं और जो 'हे नारायण! हे अच्युत! हे हरे! मुझे शरण दीजिये' इस प्रकार शान्तभावसे निरन्तर कहते रहते हैं, ऐसे लोगोंको तुम तुरंत छोड़ देना। मेरे दूतो! जो सम्पूर्ण लोकोंके हितैषी तथा परम शान्तभावसे रहनेवाले हैं और जो नारायण! अच्युत! जनार्दन! कृष्ण! विष्णो! कमलाकान्त! ब्रह्माजीके पिता! शिव! शंकर! इत्यादि नामोंका नित्य कीर्तन किया करते हैं, उन्हें दूरसे ही त्याग दिया करो। उनपर मेरा शासन नहीं चलता। मेरे सेवको! जो अपना सम्पूर्ण कर्म भगवान् विष्णुको समर्पित कर देते हैं, उन्हींके भजनमें लगे रहते हैं, अपने वर्णाश्रमोचित आचारके मार्गमें स्थित हैं, गुरुजनोंकी सेवा किया करते हैं, सत्पात्रको दान देते, दीनोंकी रक्षा करते और निरन्तर भगवन्नामके जप-कीर्तनमें संलग्न रहते हैं, उनको भी त्याग देना। दूतगण! जो पाखण्डियोंके संगसे रहित, ब्राह्मणोंके प्रति भक्ति रखनेवाले, सत्संगके लोभी, अतिथि-सत्कारके प्रेमी, भगवान् शिव और विष्णुमें समता रखनेवाले तथा लोगोंके उपकारमें तत्पर हों, उन्हें त्याग देना। मेरे दूतो! जो लोग भगवान्की कथारूप अमृतके सेवनसे वञ्चित हैं, भगवान् विष्णुके चिन्तनमें मन लगाये रखनेवाले साधु-महात्माओंसे जो दूर रहते हैं, उन पापियोंको ही मेरे घरपर लाया करो। मेरे किङ्करो! जो माता और पिताको डाँटनेवाले, लोगोंसे द्वेष रखनेवाले, हितैषी-जनोंका भी अहित करनेवाले, देवताकी सम्पत्तिके लोभी, दूसरे लोगोंका नाश करनेवाले तथा सदैव दूसरोंके अपराधमें ही तत्पर रहनेवाले हैं, उनको यहाँ पकड़कर लाओ। मेरे दूतो! जो एकादशी-व्रतसे विमुख, क्रूर स्वभाववाले, लोगोंको कलङ्क लगानेवाले, परनिन्दामें तत्पर, ग्रामका विनाश करनेवाले, श्रेष्ठ पुरुषोंसे वैर रखनेवाले तथा ब्राह्मणके धनका लोभ करनेवाले हैं, उनको यहाँ ले आओ। जो भगवान् विष्णुकी भक्तिसे मुँह मोड़ चुके हैं, शरणागतपालक भगवान् नारायणको प्रणाम नहीं करते हैं तथा जो मूर्ख मनुष्य कभी भगवान् विष्णुके मन्दिरमें नहीं जाते हैं, उन अतिशय पापमें रत रहनेवाले दुष्ट लोगोंको ही
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तुम बलपूर्वक पकड़कर यहाँ ले आओ।
इस प्रकार जब मैंने यमराजकी कही हुई बातें सुनीं तो पश्चात्तापसे दग्ध होकर अपने किये हुए उस निन्दित कर्मको स्मरण किया। पापकर्मके लिये पश्चात्ताप और श्रेष्ठ धर्मका श्रवण करनेसे मेरे सब पाप वहीं नष्ट हो गये। उसके बाद मैं उस पुण्यकर्मके प्रभावसे इन्द्रलोकमें गया। वहाँपर मैं सब प्रकारके भोगोंसे सम्पन्न रहा। सम्पूर्ण देवता मुझे नमस्कार करते थे। बहुत कालतक स्वर्गमें रहकर फिर वहाँसे मैं भूलोकमें आया। यहाँ भी आप-जैसे विष्णु-भक्तोंके कुलमें मेरा जन्म हुआ। मुनीश्वर ! जातिस्मर होनेके कारण मैं यह सब बातें जानता हूँ। इसलिये मैं बालकोंके साथ भगवान् विष्णुके पूजनकी चेष्टा करता हूँ। पूर्वजन्ममें एकादशी-व्रतका ऐसा माहात्म्य है, यह बात मैं नहीं जान सका था। इस समय पूर्वजन्मकी बातोंकी स्मृतिके प्रभावसे मैने एकादशी-व्रतको जान लिया है। पहले विवश होकर भी जो व्रत किया गया था, उसका यह फल मिला | है। प्रभो! फिर जो भक्तिपूर्वक एकादशी-व्रत करते हैं, उनको क्या नहीं मिल सकता। अतः विप्रेन्द्र! 'मैं शुभ एकादशी-व्रतका पालन तथा प्रतिदिन भगवान् विष्णुकी पूजा करूँगा। भगवान्के परम धामको पानेकी आकाङ्क्षा ही इसमें हेतु है। जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक एकादशी-व्रत करते हैं, उन्हें निश्चय ही परमानन्ददायक वैकुण्ठधाम प्राप्त होता है।' अपने पुत्रका ऐसा वचन सुनकर गालव मुनि बहुत प्रसन्न हुए। उन्हें बड़ा संतोष प्राप्त हुआ। उनका हृदय अत्यन्त हर्षसे भर गया। वे बोले—'वत्स! मेरा जन्म सफल हो गया। मेरा कुल भी पवित्र हो गया; क्योंकि तुम्हारे-जैसा विष्णुभक्त पुरुष मेरे घरमें पैदा हुआ है।' इस प्रकार पुत्रके उत्तम कर्मसे मन-ही-मन संतुष्ट होकर महर्षि गालवने उसे भगवान्की पूजाका विधान ठीक-ठीक समझाया। मुनिश्रेष्ठ नारद! तुम्हारे प्रश्नके अनुसार मैंने ये सब बातें कुछ विस्तारके साथ तुम्हें बता दी हैं। तुम और क्या सुनना चाहते हो?
चारों वर्णों और द्विजका परिचय तथा विभिन्न वर्णोंके विशेष और सामान्य धर्मका वर्णन
**सूतजी कहते हैं—**महर्षियो! सनकजीके मुखसे एकादशी-व्रतका यह माहात्म्य जो अप्रमेय, पवित्र, सर्वोत्तम तथा पापराशिको शान्त करनेवाला है, सुनकर ब्रह्मपुत्र नारदजी बड़े प्रसन्न हुए और फिर इस प्रकार बोले।
**नारदजीने कहा—**महर्षे! आप बड़े तत्त्वज्ञ हैं। आपने भगवान्की भक्ति देनेवाले तथा परम पुण्यमय व्रत-सम्बन्धी इस आख्यानका यथार्थरूपसे पूरा-पूरा वर्णन किया है। मुने! अब मैं चारों वर्णोंके आचारकी विधि और सम्पूर्ण आश्रमोंके आचार तथा प्रायश्चित्तकी विधि सुनना चाहता हूँ। महाभाग! मुझपर बड़ी भारी कृपा करके यह सब | मुझे यथार्थरूपसे बताइये।
**श्रीसनकजी बोले—**मुनिश्रेष्ठ! सुनिये। भक्तोंका प्रिय करनेवाले अविनाशी श्रीहरि वर्णाश्रम-धर्मका पालन करनेवाले पुरुषोंद्वारा जिस प्रकार पूजित होते हैं, वह सब बतलाता हूँ। मनु आदि स्मृतिकारोंने वर्ण और आश्रम-सम्बन्धी धर्मका जैसा वर्णन किया है, वह सब आपको विधिपूर्वक बतलाता हूँ; क्योंकि आप भगवान्के भक्त हैं। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र—ये चार ही वर्ण कहे गये हैं। इन सबमें ब्राह्मण श्रेष्ठ है। ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य—ये तीन द्विज कहे गये हैं। पहला जन्म मातासे और दूसरा उपनयन-संस्कारसे