संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पूर्वभाग-द्वितीय पाद
- पूर्वभाग-द्वितीय पाद *
१९९
निदाघने कहा—द्विजश्रेष्ठ! मेरे घरमें सत्तू, जौकी लपसी और बाटी बनी हैं। आपको इनमेंसे जो कुछ रुचे, वही इच्छानुसार भोजन कीजिये।
ऋभु बोले—ब्रह्मन्! इन सबमें मेरी रुचि नहीं है। मुझे तो मीठा अन्न दो। हलुआ, खीर और खाँडके बने हुए पदार्थ भोजन कराओ।
निदाघने अपनी स्त्रीसे कहा—शोभने! हमारे घरमें जो अच्छी-से-अच्छी भोजन-सामग्री उपलब्ध हो, उसके द्वारा इन अतिथि-देवताके लिये मिष्टान्न बनाओ।
पतिके ऐसा कहनेपर ब्राह्मणपत्नीने स्वामीकी आज्ञाका आदर करते हुए ब्राह्मण देवताके लिये मीठा भोजन तैयार किया। राजन्! महामुनि ऋभुके इच्छानुसार मिष्टान्न भोजन कर लेनेपर निदाघने विनीतभावसे खड़े होकर पूछा।
निदाघ बोले—ब्रह्मन्! कहिये, भोजनसे आपको भलीभाँति तृप्ति हुई? आप संतुष्ट हो गये न? अब आपका चित्त पूर्णतः स्वस्थ है न? विप्रवर! आप कहाँके रहनेवाले हैं, कहाँ जानेको उद्यत हैं और कहाँसे आपका आगमन हुआ है? यह सब बताइये।
ऋभुने कहा—ब्रह्मन्! जिसे भूख लगती है, उसीको अन्न भोजन करनेपर तृप्ति भी होती है। मुझे तो न कभी भूख लगी और न तृप्ति हुई। फिर मुझसे क्यों पूछते हो? जठराग्निसे पार्थिव धातु (पहलेके खाये हुए पदार्थ)-के पच जानेपर क्षुधाकी प्रतीति होती है। इसी प्रकार पिये हुए जलके क्षीण हो जानेपर मनुष्योंको प्यासका अनुभव होता है। द्विज! ये भूख और प्यास देहके ही धर्म हैं, मेरे नहीं। अतः मुझे कभी भूख लगनेकी सम्भावना ही नहीं है। इसलिये मुझे तो सर्वदा तृप्ति रहती ही है। ब्रह्मन्! मनकी स्वस्थता और संतोष—ये दोनों चित्तके धर्म (विकार) हैं। अतः आत्मा इन धर्मोंसे संयुक्त नहीं होता और तुमने जो यह पूछा है कि आपका निवास कहाँ है, आप कहाँ जायँगे और आप कहाँसे आते हैं—इन तीनों प्रश्नोंके विषयमें मेरा मत सुनो। आत्मा सबमें व्याप्त है। यह आकाशकी भाँति सर्वव्यापक है, अतः इसके विषयमें कहाँसे आये, कहाँ रहते हैं और कहाँ जायँगे—यह प्रश्न कैसे सार्थक हो सकता है? इसलिये मैं न जानेवाला हूँ और न आनेवाला। (तू, मैं और अन्यका भेद भी शरीरको लेकर ही है) वास्तवमें न तू तू है, न अन्य अन्य है और न मैं मैं हूँ (केवल विशुद्ध आत्मा ही सर्वत्र विराजमान है)। इसी प्रकार मीठा भी मीठा नहीं है। मैंने जो तुमसे मिष्टान्नके लिये पूछा था उसमें भी मेरा यही भाव था कि देखूँ, ये क्या कहते हैं। द्विजश्रेष्ठ! इस विषयमें मेरा विचार सुनो। मीठा अन्न भी तृप्त हो जानेके बाद मीठा नहीं लगता तो वही उद्वेगजनक हो जाता है। कभी-कभी जो मीठा नहीं है, वह भी मीठा लगता है अर्थात् अधिक भूख होनेपर फीका अन्न भी मीठा (अमृतके समान) लगता है। ऐसा कौन-सा अन्न है, जो आदि, मध्य और अन्त—तीनों कालमें रुचिकर ही हो। जैसे मिट्टीका घर मिट्टीसे लिपनेपर स्थिर होता है, उसी प्रकार यह पार्थिव शरीर पार्थिव परमाणुओंसे पुष्ट होता है। जौ, गेहूँ, मूँग, घी, तेल, दूध, दही, गुड़ और फल आदि सभी भोज्य-पदार्थ पार्थिव परमाणु ही तो हैं (इनमेंसे कौन स्वादिष्ट है और कौन नहीं)। अतः ऐसा समझकर जो मीठे और बे-मीठेका विचार करनेवाला है, उस मनको तुम्हें समदर्शी बनाना चाहिये; क्योंकि समता ही मोक्षका उपाय है।
राजन्! ऋभुके ये परमार्थयुक्त वचन सुनकर महाभाग निदाघने उन्हें प्रणाम करके कहा—
| २०० | * संक्षिप्त नारदपुराण * |
|---|
'ब्रह्मन्! आप प्रसन्न होइये और बताइये, मेरा हितसाधन करनेके लिये यहाँ पधारे हुए आप कौन हैं? आपके इन वचनोंको सुनकर मेरा सम्पूर्ण मोह नष्ट हो गया है।'
ऋभु बोले— द्विजश्रेष्ठ! मैं तुम्हारा आचार्य ऋभु हूँ और तुम्हें तत्त्वको समझनेवाली बुद्धि देनेके लिये यहाँ आया था। अब मैं जाता हूँ। जो कुछ परमार्थ है, वह सब मैंने तुम्हें बता दिया। इस प्रकार परमार्थ-तत्त्वका विचार करते हुए तुम इस सम्पूर्ण जगत्को एकमात्र वासुदेवसंज्ञक परमात्माका स्वरूप समझो। इसमें भेदका सर्वथा अभाव है।
ब्राह्मण जड़भरत कहते हैं— तदनन्तर निदाघने 'बहुत अच्छा' कहकर गुरुदेवको प्रणाम किया और बड़ी भक्तिसे उनकी पूजा की। तत्पश्चात् वे निदाघकी इच्छा न होनेपर भी वहाँसे चले गये। नरेश्वर! तदनन्तर एक सहस्र दिव्य वर्ष बीतनेके बाद गुरुदेव महर्षि ऋभु निदाघको ज्ञानोपदेश करनेके लिये पुनः उसी नगरमें आये। उन्होंने नगरसे बाहर ही निदाघको देखा। वहाँका राजा बहुत बड़ी सेना आदिके साथ धूम-धामसे नगरमें प्रवेश कर रहा था और निदाघ मनुष्योंकी भीड़-भाड़से दूर हटकर खड़े थे। वे जंगलसे समिधा और कुशा लेकर आये थे और भूख-प्याससे उनका गला सूख रहा था। निदाघको देखकर ऋभु उनके समीप गये और अभिवादन करके बोले—'बाबाजी! आप यहाँ एकान्तमें कैसे खड़े हैं?'
निदाघ बोले— विप्रवर! आज इस रमणीय नगरमें यहाँके राजा प्रवेश करना चाहते हैं। अतः यहाँ मनुष्योंकी यह बहुत बड़ी भीड़ इकट्ठी हो गयी है। इसीलिये मैं यहाँ खड़ा हूँ।
ऋभुने पूछा— द्विजश्रेष्ठ! आप यहाँकी बातोंके जानकार मालूम होते हैं। अतः बताइये, यहाँ राजा कौन है और दूसरे लोग कौन हैं?
निदाघ बोले— यह जो पर्वतशिखरके समान ऊँचे और मतवाले गजराजपर चढ़ा हुआ है, वही राजा है और दूसरे लोग उसके परिजन हैं।
ऋभुने पूछा— महाभाग! मैंने हाथी तथा राजाको एक ही साथ देखा है। आपने विशेषरूपसे इनका पृथक्-पृथक् चिह्न नहीं बताया; इसलिये मैं पहचान न सका। अतः आप इनकी विशेषता बतलाइये। मैं जानना चाहता हूँ कि इनमें कौन राजा है और कौन हाथी?
निदाघ बोले— ब्रह्मन्! इनमें यह जो नीचे है, वह हाथी है और इसके ऊपर ये राजा बैठे हैं। इन दोनोंमें एक वाहन है और दूसरा सवार। भला, वाह्य-वाहक-सम्बन्धको कौन नहीं जानता?
ऋभुने पूछा— ब्रह्मन्! जिस प्रकार मैं अच्छी तरह समझ सकूँ, उस तरह मुझे समझाइये। 'नीचे' इस शब्दका क्या अभिप्राय है और 'ऊपर' किसे कहते हैं?