संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पूर्वभाग-द्वितीय पाद
- पूर्वभाग-द्वितीय पाद *
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राशिके समान वर्ण (गौर आदि) समझना चाहिये। एवं द्रेष्काणवश लग्न आदि भावोंसे जातकके मस्तक आदि अङ्ग-विभाग जानना चाहिये। यथा-लग्नमें प्रथम द्रेष्काण हो तो लग्न मस्तक, २।१२ नेत्र, ३।११ कान, ४।१० नाक, ५।९ कपोल, ६।८ हनु (ठुड्डी) और ७ (सप्तम) भाव मुख। द्वितीय द्रेष्काण हो तो लग्न कण्ठ, २।१२ कंधा, ३।११ पसली, ४।१० हृदय, ५।९ भुज, ६।८ पेट और ७ नाभि। तृतीय द्रेष्काण हो तो लग्न वस्ति (नाभि और लिङ्गके मध्यका स्थान), २।१२ लिङ्ग, गुदमार्ग, ३।१२ अण्डकोश, ४।१० जाँघ, ५।९ घुटना, ६।८ पिण्डली और सप्तम भाव पैर समझना चाहिये ॥९१-९३॥
जिस अङ्गकी राशिमें पापग्रह हो, उस अङ्गमें व्रण और यदि उसपर शुभ ग्रहकी दृष्टि हो तो उस अङ्गमें चिह्न (तिल मशक आदि) समझना चाहिये। पापग्रह अपनी राशि या नवमांशमें, अथवा स्थिर राशिमें हो तो जन्मके साथ ही व्रण होता है अन्यथा उस ग्रहकी दशा-अन्तर्दशामें आगे चलकर व्रण होता है। शनिके स्थानमें वात या पत्थरके आघातसे, मङ्गलके स्थानमें विष, शस्त्र और अग्निसे, बुधके स्थानमें पृथ्वी (मिट्टी)-के आघातसे, सूर्याश्रित अङ्गमें काष्ठ और पशुसे, क्षीण चन्द्राश्रित अङ्गमें सींगवाले पशु और जलचरके आघातसे व्रण होता है। जिस अङ्गकी राशिमें तीन पापग्रह हों, उस अङ्गमें निश्चितरूपसे व्रण होता ही है। षष्ठ भावमें पापग्रह हो तो उस राशिके आश्रित अङ्गमें व्रण होता है। यदि उसपर शुभग्रहकी दृष्टि हो तो उस अङ्गमें तिल या मसा होता है। यदि शुभग्रहका योग हो तो उस अङ्गमें चिह्न (दाग) मात्र होता है ॥९४-९६\frac{१}{२}॥
(ग्रहोंके स्वरूप और गुणका वर्णन-) सूर्यकी आकृति चतुरस्र* है, शरीरकी कान्ति और नेत्र पिङ्गल हैं। पित्तप्रधान प्रकृति है और उनके मस्तकपर थोड़े-से केश हैं। चन्द्रमाका आकार गोल है; उनकी प्रकृतिमें वात और कफकी प्रधानता है, वे पण्डित और मृदुभाषी हैं तथा उनके नेत्र बड़े सुन्दर हैं। मङ्गलकी दृष्टि क्रूर है, युवावस्था है, पित्तप्रधान प्रकृति है और वह चञ्चल स्वभावका है। बुधकी प्रकृतिमें कफ, पित्त और वातकी प्रधानता है, वह हास्यप्रिय और अनेकार्थक शब्द बोलनेवाला है। बृहस्पतिकी अङ्गकान्ति, केश और नेत्र पिङ्गल हैं, उनका शरीर बड़ा है, प्रकृतिमें कफकी प्रधानता है और वे बड़े बुद्धिमान् हैं। शुक्रके अङ्ग और नेत्र सुन्दर हैं, मस्तकपर काले घुँघराले केश हैं और वे सर्वदा सुखी रहनेवाले हैं। शनिका शरीर लम्बा और नेत्र कपिश वर्णके हैं, उनकी वातप्रधान प्रकृति है, उनके केश कठोर हैं और वे बड़े आलसी हैं ॥९७-१००॥
(ग्रहोंके धातु-) स्नायु (शिरा), हड्डी, शोणित, त्वचा, वीर्य, वसा और मज्जा-ये क्रमशः शनि, सूर्य, चन्द्र, बुध, शुक्र, गुरु और मङ्गलके धातु हैं ॥१०१॥
(अरिष्टकथन-) चन्द्रमा, लग्न और पापग्रह-ये राशिके अन्तिमांशमें हों अथवा चन्द्रमा और तीनों पापग्रह ये लग्नादि चारों केन्द्रोंमें हों तथा कर्क लग्न हो तो जातककी मृत्यु होती है। दो पापग्रह लग्न और सप्तम भावमें हों तथा चन्द्रमा एक पापग्रहसे युक्त हो और उसपर शुभग्रहकी दृष्टि न हो तो शिशुका शीघ्र मरण होता है ॥१०२-१०३॥ क्षीण चन्द्रमा १२ वें भावमें हो, पापग्रह लग्न और अष्टम भावमें हों तथा शुभग्रह केन्द्रमें न हों तो उत्पन्न शिशुकी मृत्यु होती है। अथवा पापयुक्त चन्द्रमा सप्तम, द्वादश या लग्नमें स्थित हो तथा उसपर केन्द्रसे भिन्नस्थानमें स्थित शुभग्रहकी दृष्टि न हो तो जातककी मृत्यु होती है। यदि चन्द्रमा ६, ८ स्थानमें रहकर पापग्रहसे
* जिसकी लम्बाई-चौड़ाई बराबर हो, वह चौकोर वस्तु 'चतुरस्र' कहलाती है।
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देखा जाता हो तो शिशुका शीघ्र मरण होता है। शुभग्रहसे दृष्ट हो तो ८ वर्षमें और शुभ तथा पापग्रह दोनोंसे दृष्ट हो तो ४ वर्षमें जातककी मृत्यु हो जाती है। क्षीण चन्द्रमा लग्नमें तथा पापग्रह ८, १, ४, ७, १० में स्थित हों तो उत्पन्न बालकका मरण होता है। अथवा दो पापग्रहोंके बीचमें होकर चन्द्रमा ४, ७, ८ स्थानमें स्थित हो या लग्न ही दो पापग्रहोंके बीचमें हो तो जातककी मृत्यु होती है। पापग्रह ७, ८ में हों और उनपर शुभग्रहकी दृष्टि न हो तो मातासहित शिशुकी मृत्यु होती है। राशिके अन्तिमांशमें चन्द्रमा पापग्रहसे अदृष्ट हो तथा पापग्रह त्रिकोण (५, ९)-में हो अथवा लग्नमें चन्द्रमा और सप्तममें पापग्रह हो तो शिशुका मरण होता है। राहुग्रस्त चन्द्रमा पापग्रहसे युक्त हो और मङ्गल अष्टम स्थानमें स्थित हो तो माता और शिशु दोनोंकी मृत्यु होती है। इसी प्रकार राहुग्रस्त सूर्य यदि पापग्रहसे युक्त हो तथा बली पापग्रह अष्टम भावमें स्थित हो तो माता और शिशुका शस्त्रसे मरण होता है॥ १०४-१०९॥
(आयुर्दायकथन—) चन्द्रमा और बृहस्पतिसे युक्त कर्क लग्न हो, बुध और शुक्र केन्द्रमें हों और शेष ग्रह (रवि, मङ्गल एवं शनि) ३, ६, ११ स्थानमें हों तो ऐसे योगमें उत्पन्न जातककी आयु बहुत अधिक होती है। मीन लग्नमें मीनका नवमांश हो, बुध वृषमें २५ कलापर हो तथा शेष सब ग्रह अपने-अपने उच्च स्थानमें हों तो जातककी आयु परम (१२० वर्ष ५ दिनकी) होती है। लग्नेश बली होकर केन्द्रमें हो, उसपर शुभग्रहकी दृष्टि हो तो बालक धनसहित दीर्घायु होता है। चन्द्रमा अपने उच्चमें हो, शुभग्रह अपनी राशिमें हों, बली लग्नेश लग्नमें हो तो जातककी ६० वर्षकी आयु होती है। केन्द्रमें शुभग्रह हों और अष्टम भाव शुद्ध (ग्रहरहित) हो तो ७० वर्षकी आयु होती है। शुभग्रह अपने-अपने मूल त्रिकोणमें हों, गुरु अपने उच्चमें हो तथा लग्नेश बलवान् हों तो ८० वर्षकी आयु होती है। सबल शुभग्रह केन्द्रमें हों और अष्टम भावमें कोई ग्रह न हो तो ३० वर्षकी आयु होती है। अष्टमेश नवम भावमें हों, बृहस्पति अष्टम भावमें रहकर पापग्रहसे दृष्ट हों तो २४ वर्षकी आयु होती है। लग्नेश और अष्टमेश दोनों अष्टम भावमें स्थित हों तो २७ वर्षकी आयु होती है। लग्नमें पापग्रहसहित बृहस्पति हों, उसपर चन्द्रमाकी दृष्टि हो तथा अष्टममें कोई ग्रह न हो तो २२ वर्षकी आयु समझनी चाहिये। शनि नवम भाव या लग्नमें हो, शुक्र केन्द्रमें हो और चन्द्रमा १२ या ९ में हो तो १०० वर्षकी आयु होती है। बृहस्पति कर्कमें होकर केन्द्रमें हो अथवा बृहस्पति और शुक्र दोनों केन्द्रमें हों तो १०० वर्षकी आयु समझनी चाहिये। अष्टमेश लग्नमें हो और अष्टम भावमें शुभग्रह न हो तो ४० वर्षकी आयु होती है। लग्नेश अष्टम भावमें और अष्टमेश लग्नमें हों तो ५ वर्षकी आयु होती है। शुक्र और बृहस्पति एक राशिमें हों अथवा बुध और चन्द्रमा लग्न या अष्टम भावमें हों तो ५० वर्षकी आयु होती है॥ ११०-११८॥
मुने! मैंने इस प्रकार ग्रहयोग-सम्बन्धसे आयुर्दायका प्रमाण कहा है। अब गणितद्वारा स्पष्टायुर्दायका वर्णन करता हूँ। (सूर्य, चन्द्रमा और लग्नमेंसे) यदि सूर्य अधिक बली हो तो पिण्डायु, चन्द्रमा बली हो तो निसर्गायु और लग्न बली हो तो अंशायुका साधन करना चाहिये। उसका साधन-प्रकार मैं बतलाता १ हूँ॥ ११९ १/२॥
(पिण्डायु और निसर्गायुका २ साधन—) सूर्य आदि ग्रह अपने-अपने उच्चमें हों तो क्रमशः १९, २५, १५, १२, १५, २१ और २० वर्ष
१-'पिण्डायु' वह है, जिसमें उच्च और नीच स्थानमें आयुके पिण्ड (मान-संख्या)-का निर्देश किया हुआ है, उसके द्वारा इष्टस्थानस्थित ग्रहसे आयुका साधन किया जाता है।
२-'निसर्गायु' वह है, जो ग्रहोंके निसर्ग (स्वभाव)-से ही सिद्ध है, जिसमें कभी परिवर्तन नहीं होता।