संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
\ पूर्वभाग-द्वितीय पाद ३९७
* पूर्वभाग-द्वितीय पाद * ३९७
उदाहरण—
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'अन्यस्त्रीभिः सङ्गस्त्याज्यः।'
(३) तीन-तीन अक्षरोंके चार पादोंसे ‘मध्या’ नामक छन्द बनता है। प्रस्तारसे उसके भेदोंकी संख्या आठ होती है। इसके प्रथम भेदका, जिसमें तीनों अक्षर गुरु होते हैं, आचार्य पिङ्गलने 'नारी' नाम नियत किया है।
उदाहरण—
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१-'सर्वासां नारीणाम्। भर्ता स्यादाराध्यः॥'
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२-'प्राणतः प्रेयसी। राधिका श्रीपतेः॥'
यह दूसरा उदाहरण मध्याका तृतीय भेद है। इसे 'मृगी' छन्द कहते हैं। इसके प्रत्येक चरणमें एक-एक रगण होता है।
(४) चार-चार अक्षरोंके चार पादवाले छन्द-समूहका नाम 'प्रतिष्ठा' है। प्रस्तारसे इसके सोलह भेद होते हैं। इसके प्रथम भेदका नाम 'कन्या' है। उदाहरण पढ़िये—
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भास्वत्कन्या सैका धन्या। यस्याः कूले कृष्णोऽखेलत् ॥
(५) पाँच-पाँच अक्षरके चार पादवाले छन्दसमुदायका नाम 'सुप्रतिष्ठा' है। प्रस्तारसे इसके बत्तीस भेद होते हैं। इनमें सातवाँ भेद 'पंक्ति' है, उसे यहाँ बतलाया जाता है। भगण तथा दो गुरु अक्षरोंसे पंक्ति छन्दकी सिद्धि होती है।
उदाहरण—
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कृष्णसनाथा तूर्णकंपक्तिः। यामुनकच्छे चारु चचार ॥
(६) जिसके चारों चरणोंमें छः-छः अक्षर हों, उस छन्द-समूहका नाम गायत्री है। प्रस्तारसे इसके चौंसठ भेद होते हैं। इसके प्रथम भेदका नाम विद्युल्लेखा, तेरहवें भेदका नाम तनुमध्या, सोलहवेंका नाम शशिवदना तथा उन्तीसवेंका नाम वसुमती है। यहाँ केवल इन्हीं चरणोंका उल्लेख किया जाता है। दो मगण (S S S S S S) होनेसे विद्युल्लेखा, एक तगण (SS।) और एक यगण (। S S) होनेसे तनुमध्या, एक नगण (।।।) और एक यगण (। S S) होनेसे शशिवदना तथा एक तगण (S S ।) और एक सगण (।।S) होनेसे वसुमती नामक छन्द बनता है। उदाहरण क्रमशः इस प्रकार हैं—
'विद्युल्लेखा'—
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गोगोपीगोपानां प्रेयांसं प्राणेशम्। विद्युल्लेखावस्त्रं वन्देऽहं गोविन्दम् ॥
'तनुमध्या'—
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प्रीत्या प्रतिवेलं नानाविधखेलम्। सेवे गततन्द्रं वृन्दावनचन्द्रम् ॥
'शशिवदना'—
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परममुदारं विपिनविहारम्। भज प्रतिपालं व्रजपतिबालम् ॥
'वसुमती'—
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भक्तार्तिकदनं संसिद्धिसदनम्। नौमीन्दुवदनं गोविन्दमधुना ॥
(७) सात-सात अक्षरोंके चार पादवाले छन्दसमुदायको 'उष्णिक्' कहा गया है, प्रस्तारसे इसके एक सौ अट्ठाईस भेद होते हैं। इनमेंसे पचीसवाँ भेद 'मदलेखा' और तीसवाँ भेद 'कुमारललिता' के नामसे प्रसिद्ध है। मगण, सगण तथा एक गुरु—इन सात अक्षरोंसे 'मदलेखा' तथा जगण, सगण और एक गुरुसे 'कुमारललिता' छन्दकी सिद्धि होती है। प्रथमका उदाहरण यों है—
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रङ्गे बाहुविरुग्णाद् दन्तीन्द्रान्मदलेखा। लग्नाभून्मुरशत्रौ कस्तूरीरसचर्चा ॥
३९८ * संक्षिप्त नारदपुराण *
(८) आठ अक्षरवाले चार पदोंसे जो छन्द बनते हैं, उनकी जातिवाचक संज्ञा 'अनुष्टुप्' है। प्रस्तारसे अनुष्टुप्के दो सौ छप्पन भेद होते हैं। इसके विद्युन्माला, माणवकाक्रीड, चित्रपदा, हंसरुत, प्रमाणिका या नगस्वरूपिणी, समानिका, श्लोक तथा वितान आदि अनेक भेद-प्रभेद हैं। श्लोक-छन्दके प्रत्येक चरणमें छठा अक्षर गुरु और पाँचवाँ लघु होता है। प्रथम और तृतीय चरणोंमें सातवाँ अक्षर दीर्घ होता है तथा द्वितीय तथा चतुर्थ चरणोंमें वह ह्रस्व हुआ करता है। शेष अक्षरोंका विशेष नियम न होनेसे इस श्लोक-छन्दके भी बहुत-से अवान्तर भेद हो जाते हैं। उपर्युक्त छन्दोंमें विद्युन्माला अनुष्टुप्का प्रथम भेद है; क्योंकि उसमें सभी अक्षर गुरु होते हैं। इसमें चार-चार अक्षरोंपर विराम होता है। प्रमाणिका या नगस्वरूपिणी छियासीवाँ भेद है। इसमें जगण, रगण १ लघु तथा १ गुरु होते हैं। प्रमाणिका और समानिकाके सिवा अनुष्टुप्के जितने भेद हैं, वे सब वितानके अन्तर्गत माने जाते हैं। यहाँ विद्युन्माला, नगस्वरूपिणी, श्लोक (अनुष्टुप्) तथा माणवकाक्रीडका एक-एक उदाहरण दिया जाता है—
'विद्युन्माला'—
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विद्युन्मालालोलान् भोगान् मुक्त्वा मुक्तौ यत्नं कुर्यात्। ध्यानोत्पन्नं निःसामान्यं सौख्यं भोक्तुं यद्याकाङ्क्षेत् ॥
'नगस्वरूपिणी'—
शिवताण्डवस्तोत्र 'नगस्वरूपिणी' छन्दमें ही लिखा गया है। उसके एक-एक पद्यमें दो-दो नगस्वरूपिणी छन्द आ गये हैं। कुछ लोग उस संयुक्तछन्दको 'पञ्चचामर' आदि नाम देते हैं। इसमें ज. र. ज. र. ज. और १ गुरु होते हैं। उदाहरण यह है—
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जटाकटाहसंभ्रमभ्रमन्निलिम्पनिर्झरीविलोलवीचिवल्लरीविराजमानमूर्द्धनि।
धगद्धगद्धगज्ज्वलल्ललाटपट्टपावके किशोरचन्द्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम॥
'श्लोक' —
यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्। स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः ॥
माणवकाक्रीडमें भगण, तगण, एक लघु और एक गुरु होते हैं।
जैसे—
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आदिगतं तुर्यगतं पञ्चमकं चान्त्यगतम्। स्याद् गुरु चेत् तत् कथितं माणवकाक्रीडमिदम्॥
(९) नौ-नौ अक्षरोंके चार चरणोंसे सिद्ध होनेवाले छन्दसमूहका नाम 'बृहती' है। प्रस्तारसे इसके पाँच सौ बारह भेद होते हैं। इसके 'हलमुखी' (१ रगण १ नगण १ सगण) तथा 'भुजङ्गशिशुभृता' (२ नगण १ भगण) भेद यहाँ बतलाये जाते हैं। इनमें एक तो २५१ वाँ भेद है और दूसरा ६४ वाँ। उदाहरण क्रमशः यों हैं—
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१—हस्तयोर्मधुरमुरलीं धारयन्नधरशयने। सन्निवेश्य रवममृतं संसृजञ्जयति स हरिः ॥
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२—प्रणमत नयनारामं विकचकुवलयश्यामम्। अधहरयमुनानीरे भुजगशिरसि नृत्यन्तम्॥
(१०) दस अक्षरके पादवाले छन्द-समुदायको 'पङ्क्ति' कहते हैं। प्रस्तारसे इसके १०२४ भेद होते हैं। इसके शुद्धविराट्, पणव, रुक्मवती, मयूरसारिणी, मत्ता, मनोरमा, हंसी, उपस्थिता तथा चम्पकमाला आदि अनेक अवान्तर भेद हैं। शुद्धविराट् पङ्क्तिका ३४५ वाँ भेद है। यहाँ शुद्धविराट् (मगण, सगण, जगण, १ गुरु) तथा चम्पकमालाके उदाहरण दिये जाते हैं—
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विश्वं तिष्ठति कुक्षिकोटरे वक्त्रे यस्य सरस्वती सदा।
सर्वेषां प्रपितामहो गुरुर्ब्रह्मा शुद्धविराट् पुनातु नः॥
'चम्पकमाला' के प्रत्येक पादमें भगण, मगण, सगण और एक गुरु होते हैं तथा पाँच-पाँच अक्षरोंपर विराम होता है। प्रत्येक चरणमें इसके अन्तिम अक्षरको कम कर देनेसे 'मणिबन्ध' छन्द हो जाता है।
उदाहरण—
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सौम्य गुरु स्यादाद्यचतुर्थं पञ्चमषष्ठं चान्त्यमुपान्त्यम्।
इन्द्रियबाणैर्यत्र विरामः सा कथनीया चम्पकमाला॥