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संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

पूर्वभाग-द्वितीय पाद ३७७

  • पूर्वभाग-द्वितीय पाद * ३७७

शतभिषा, श्रवण, अनुराधा और धनिष्ठा—इन नक्षत्रोंमें तथा मङ्गलवारको छोड़कर अन्य वारोंमें देव-प्रतिष्ठा करनी चाहिये। स्थापना करनेवाले (यजमान)-के लिये सूर्य, तारा और चन्द्रमा बलवान् हों, उस दिनके पूर्वाह्नमें, शुभ समय, शुभ लग्न और शुभ नवमांशमें तथा यजमानकी जन्मराशिसे अष्टम राशिको छोड़कर अन्य लग्नोंमें देवताओंकी प्रतिष्ठा शुभदायक होती है॥ ५२४-५२९॥

मेष आदि सब राशियाँ शुभ ग्रहसे युक्त या दृष्ट हों तो देवस्थापनके लिये श्रेष्ठ समझी जाती हैं। प्रत्येक कार्यमें पञ्चाङ्ग (तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण) शुभ होने चाहिये और लग्नसे अष्टम स्थान भी शुभ (ग्रहवर्जित) होना आवश्यक है॥ ५३०॥ (१) लग्नमें चन्द्रमा, सूर्य, मङ्गल, राहु, केतु और शनि कर्ताके लिये घातक होते हैं। अन्य (बुध, गुरु और शुक्र) लग्नमें धन, धान्य और सब सुखोंको देनेवाले होते हैं। (२) द्वितीय भावमें पापग्रह अनिष्ट फल देनेवाले और शुभग्रह धनकी वृद्धि करनेवाले होते हैं। (३) तृतीय भावमें शुभ और पाप सब ग्रह पुत्र-पौत्रादि सुखको बढ़ानेवाले होते हैं। (४) चतुर्थ भावमें शुभग्रह शुभफल और पापग्रह पाप-फलको देते हैं। (५) पञ्चम भावमें पापग्रह कष्टदायक और शुभग्रह पुत्रादि सुख देनेवाले होते हैं। (६) षष्ठ भावमें शुभग्रह शत्रुको बढ़ानेवाले और पापग्रह शत्रुके लिये घातक होते हैं। (७) सप्तम भावमें पापग्रह रोगकारक और शुभग्रह शुभ फल देनेवाले होते हैं। (८) अष्टम भावमें शुभग्रह और पापग्रह सभी कर्ता (यजमान)-के लिये घातक होते हैं। (९) नवम भावमें पापग्रह हों तो वे धर्मको नष्ट करनेवाले हैं और शुभग्रह शुभ फल देनेवाले होते हैं। (१०) दशम भावमें पापग्रह दुःखदायक और शुभग्रह सुयशकी वृद्धि करनेवाले होते हैं। (११) एकादश स्थानमें पाप और शुभ सब ग्रह सब प्रकारसे लाभकारक ही होते हैं। (१२) लग्नसे द्वादश स्थानमें पाप या शुभ सभी ग्रह व्यय (खर्च)-को बढ़ानेवाले होते हैं॥ ५३१-५३६॥

(प्रतिष्ठामें अन्य विशेष बात—) प्रतिष्ठा करानेवाले पुरोहित (या आचार्य)-को अर्थज्ञान न हो तो यजमानका अनिष्ट होता है। मन्त्रोंका अशुभ उच्चारण हो तो ऋत्विजों (यज्ञ करानेवालों)-का और कर्म विधिहीन हो तो कर्ताकी स्त्रीका अनिष्ट होता है। इसलिये नारद! देव-प्रतिष्ठाके समान दूसरा शत्रु भी नहीं है। यदि लग्नमें अधिक गुण हों और थोड़े-से दोष हों तो उसमें देवताओंकी प्रतिष्ठा कर लेनी चाहिये। इससे कर्ता (यजमान)-के अभीष्ट मनोरथकी सिद्धि होती है। मुने! अब मैं संक्षेपसे ग्राम, मन्दिर तथा गृह आदिके निर्माणकी बात बताता हूँ॥ ५३७-५३९॥

(गृहनिर्माणके विषयमें ज्ञातव्य बातें—) गृह आदि बनाना हो तो पहले गन्ध, वर्ण, रस तथा आकृतिके द्वारा क्षेत्र (भूमि)-की परीक्षा कर लेनी चाहिये। यदि उस स्थानकी मिट्टीमें मधु (शहद)-के समान गन्ध हो तो ब्राह्मणोंके, पुष्पसदृश गन्ध हो तो क्षत्रियोंके, आम्ल (खटाई)-के समान गन्ध हो तो वैश्योंके और मांसकी-सी गन्ध हो तो वह स्थान शूद्रोंके बसनेयोग्य जानना चाहिये। वहाँकी मिट्टीका रंग श्वेत हो तो ब्राह्मणोंके, लाल हो तो क्षत्रियोंके, पीत (पीला) हो तो वैश्योंके और कृष्ण (काला) हो तो वह शूद्रोंके निवासके योग्य है। यदि वहाँकि मिट्टीका स्वाद मधुर हो तो ब्राह्मणोंके, कडुवा (मिर्चके समान) हो तो क्षत्रियोंके, तिक्त हो तो वैश्योंके और कषाय (कसैला) स्वाद हो तो उस स्थानको शूद्रोंके निवास करनेयोग्य समझना चाहिये ॥ ५४०-५४१॥ ईशान, पूर्व और उत्तर दिशामें प्लव (नीची) भूमि सबके लिये अत्यन्त वृद्धि देनेवाली होती है। अन्य दिशाओंमें प्लव (नीची) भूमि सबके लिये हानि करनेवाली होती है॥ ५४२॥

(गृहभूमि-परीक्षा—) जिस स्थानमें घर बनाना

३७८* संक्षिप्त नारदपुराण *

हो वहाँ अरत्नि (कोहिनीसे कनिष्ठा अंगुलितक) के बराबर लम्बाई, चौड़ाई और गहराई करके कुण्ड बनावे। फिर उसे उसी खोदी हुई मिट्टीसे भरे। यदि भरनेसे मिट्टी शेष बच जाय तो उस स्थानमें वास करनेसे सम्पत्तिकी वृद्धि होती है। यदि मिट्टी कम हो जाय तो वहाँ रहनेसे सम्पत्तिकी हानि होती है। यदि सारी मिट्टीसे वह कुण्ड भर जाय तो मध्यम फल समझना चाहिये॥ ५४३॥ अथवा उसी प्रकार अरत्निके मापका कुण्ड बनाकर सायंकाल उसको जलसे पूरित कर दे और प्रातःकाल देखे; यदि कुण्डमें जल अवशिष्ट हो तो उस स्थानमें वृद्धि होगी। यदि कीचड़ (गीली मिट्टी) ही बची हो तो मध्यम फल है और यदि कुण्डकी भूमिमें दरार पड़ गयी हो तो उस स्थानमें वास करनेसे हानि होगी॥ ५४४॥

मुने ! इस प्रकार निवास करनेयोग्य स्थानकी भलीभाँति परीक्षा करके उक्त लक्षणयुक्त भूमिमें दिक्साधन (दिशाओंका ज्ञान) करनेके लिये समतल भूमिमें वृत्त (गोल रेखा) बनावे। वृत्तके मध्य भागमें द्वादशांगुल शंकु (बारह विभाग या पर्वसे युक्त एक सीधी लकड़ी)-की स्थापना करे और दिक्साधनविधिसे दिशाओंका ज्ञान करे। फिर कर्ताके नामके अनुसार षड्वर्ग शुद्ध क्षेत्रफल (वास्तुभूमिकी लम्बाई-चौड़ाईका गुणनफल) ठीक करके अभीष्ट लम्बाई-चौड़ाईके बराबर (दिशासाधित रेखानुसार) चतुर्भुज बनावे। उस चतुर्भुज रेखामार्गपर सुन्दर प्राकार (चहारदीवारी) बनावे। लम्बाई और चौड़ाईमें पूर्व आदि चारों दिशाओंमें आठ-आठ द्वारके भाग होते हैं। प्रदक्षिणक्रमसे उनके निम्नाङ्कित फल हैं। (जैसे पूर्वभागमें उत्तरसे दक्षिणतक) १- हानि, २- निर्धनता, ३- धनलाभ, ४- राजसम्मान, ५- बहुत धन, ६- अति चोरी, ७-अति क्रोध तथा ८- भय—ये क्रमशः आठ द्वारोंके फल हैं। दक्षिण दिशामें क्रमशः १- मरण, २- बन्धन, ३- भय, ४-धनलाभ, ५- धनवृद्धि, ६-निर्भयता, ७- व्याधिभय तथा ८-निर्बलता—ये (पूर्वसे पश्चिम तकके) आठ द्वारोंके फल हैं। पश्चिम दिशामें क्रमशः १-पुत्रहानि, २-शत्रुवृद्धि, ३-लक्ष्मीप्राप्ति, ४-धनलाभ, ५-सौभाग्य, ६-अति दौर्भाग्य, ७-दुःख तथा ८-शोक—ये दक्षिणसे उत्तरतकके आठ द्वारोंके फल हैं। इसी प्रकार उत्तर दिशामें (पश्चिमसे पूर्वतक) १-स्त्री-हानि, २-निर्बलता, ३- हानि, ४-धान्यलाभ, ५-धनागम, ६-सम्पत्ति-वृद्धि, ७-भय तथा ८-रोग—ये क्रमशः आठ द्वारोंके फल हैं॥ ५४५-५५२ ॥

इसी तरह पूर्व आदि दिशाओंके गृहादिमें भी द्वार और उसके फल समझने चाहिये। द्वारका जितना विस्तार (चौड़ाई) हो, उससे दुगुनी ऊँची किवाड़ें बनाकर उन्हें घरमें (चहारदीवारीके) दक्षिण या पश्चिम भागमें लगावे॥ ५५३॥ चहारदीवारीके भीतर जितनी भूमि हो, उसके इक्यासी पद (समान खण्ड) बनावे। उनके बीचके नौ खण्डोंमें ब्रह्माका स्थान समझे। यह गृहनिर्माणमें अत्यन्त निन्दित है। चहारदीवारीसे मिले हुए जो चारों ओरके ३२ भाग हैं, वे पिशाचांश कहलाते हैं। उनमें घर बनाना दुःख, शोक और भय देनेवाला होता है। शेष अंशों (पदों)-में घर बनाये जायें तो पुत्र, पौत्र और धनकी वृद्धि करनेवाले होते हैं॥ ५५४-५५५ ½॥

वास्तुभूमिकी दिशा-विदिशाओंकी रेखा वास्तुकी शिरा कहलाती है। एवं ब्रह्मभाग, पिशाचभाग तथा शिराका जहाँ-जहाँ योग हो, वहाँ-वहाँ वास्तुकी मर्मसन्धि समझनी चाहिये। वह मर्मसन्धि गृहारम्भ तथा गृह-प्रवेशमें अनिष्टकारक समझी जाती है॥ ५५६-५५७ ½ ॥

(गृहारम्भमें प्रशस्त मास—) मार्गशीर्ष, फाल्गुन, वैशाख, माघ, श्रावण और कार्तिक—ये मास गृहारम्भमें पुत्र, आरोग्य और धन देनेवाले होते हैं॥ ५५८ ½ ॥

(दिशाओंमें वर्ग और वर्गेश—) पूर्व आदि आठों दिशाओंमें क्रमशः अकारादि आठ वर्ग होते हैं। इन दिशावर्गोंके क्रमशः गरुड, मार्जार, सिंह,