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संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

पूर्वभाग-द्वितीय पाद २५७

  • पूर्वभाग-द्वितीय पाद * २५७

'अव्यादवद्या०' इत्यादि सूत्रके अनुसार व्यपर 'अ' परे होनेपर एङ् (ओ)-का प्रकृतिभाव हुआ है। 'आपो अस्मान् मातरः' इत्यादि प्रयोग भी 'आपो जुषाणो०' आदि नियमके अनुसार प्रकृति-भावसे सिद्ध होते हैं। आकार परे रहनेपर 'आपो' आदिमें प्रकृतिभाव होता है॥ ११॥ 'समानो गर्भः सगर्भस्तत्र भवः सगर्भ्यः।' यहाँ 'समानस्य सः' इत्यादि सूत्रसे समानका 'स' आदेश हुआ है। 'सगर्भसयूथसनुताद् यत्' से यत्-प्रत्यय हुआ है। 'अष्टापदी' यहाँ 'छन्दसि च'-के नियमानुसार उत्तरपद परे रहते अष्टन्‌के 'न'का 'आ' आदेश हो गया है। 'ऋतौ भवम् ऋत्त्व्यम्'—जो ऋतुमें हो, उसे 'ऋत्त्व्य' कहते हैं। 'ऋत्त्व्यास्त्व्यः' इत्यादि सूत्रसे निपातन करनेपर 'ऋत्त्व्यम्' पदकी सिद्धि होती है। अतिशयेन 'ऋजु' इति 'रजिष्ठम्'—जो अत्यन्त ऋजु (कोमल या सरल) हो, उसे 'रजिष्ठ' कहा गया है। 'विभाषर्जोश्छन्दसि' के नियमानुसार इष्ठ, इमन् और ईयस् परे रहनेपर ऋजुके 'ऋ'के स्थानमें 'र' होता है। 'ऋजु+इष्ठ' इस अवस्थामें ऋके स्थानमें 'र' तथा उकार लोप होनेसे 'रजिष्ठ' शब्द बना है। 'त्रिपञ्चकम्'—त्रीणि पञ्चकानि यत्र तत् 'त्रिपञ्चकम्' इस विग्रहके अनुसार बहुव्रीहि समास करनेपर 'त्रिपञ्चकम्' की सिद्धि होती है। 'हिरण्ययेन सविता रथेन' इस मन्त्र-वाक्यमें 'ऋत्त्व्यास्त्व्य' आदि सूत्रके अनुसार हिरण्य-शब्दसे 'मयट्' प्रत्यय और उसके 'म'- का लोप निपातन किया जाता है। इससे 'हिरण्यय' शब्दकी सिद्धि होती है। 'इतरम्'—वेदमें इतर शब्दसे 'अड्ड' का निषेध है। अतः 'सु' का 'अम्' आदेश होनेसे 'इतरम्' पद सिद्ध होता है। यथा—'वार्त्रघ्नमिरतम्'। 'परमे व्योमन्' यहाँ 'व्योमनि' रूप प्राप्त था; किंतु 'सुपां सुलुक्' इत्यादि नियमसे ङि-विभक्तिका लुक् हो गया॥ १२॥ 'उर्विया' की जगह 'उरुणा' रूप प्राप्त था। 'टा' का 'इया' आदेश होनेसे 'उर्विया' रूप बना। 'इयाडियाजीकाराणामुपसंख्यानम्' इस वार्तिकसे यहाँ 'इयाज्' हुआ है। 'स्वप्रया'के स्थानमें 'स्वप्रेन' यह रूप प्राप्त था, किंतु 'सुपां सुलुक०' इत्यादि नियमके अनुसार 'टा' का 'अयाच्' हो गया; अतः 'स्वप्रया' रूप बना। 'वारयध्वम्' रूप प्राप्त था, किंतु 'ध्वमो ध्वात्' सूत्रसे 'ध्वम्' के स्थानमें 'ध्वात्' आदेश होनेसे 'वारयध्वात्' हो गया। 'अदुहत' के स्थानमें 'अदुह' यह वैदिक प्रयोग है। 'लोपस्त आत्मनेपदेषु' इस सूत्रसे तलोप और 'बहुलं छन्दसि' से रुटका आगम हुआ है। 'वै' पादपूर्तिके लिये है। 'अवधिषम्' यह रूप प्राप्त था, इसके स्थानमें 'वधीं' रूप हुआ है। यहाँ 'अम्'का 'म्' आदेश और अडागमका अभाव तथा 'ईट्' का आगम हुआ है—वधीं वृत्रम्। 'यजध्वैनं'—यहाँ 'यजध्वम्+एनम्' इस दशामें 'ध्वम्' के 'म्' का लोप होकर वृद्धि होनेसे उक्त रूपकी सिद्धि हुई है। 'तमो भरन्त एमसि'—यहाँ 'इमः'के स्थानमें 'इदन्तो मसि' इस सूत्रके अनुसार 'एमसि' रूप हुआ है। 'स्विन्नः स्नात्वी मलादिव'— इस मन्त्रमें 'स्नात्वा' रूप प्राप्त था; किंतु 'स्नात्यादयश्च'—इस सूत्रके अनुसार उसके स्थानमें 'स्नात्वी' निपातन हुआ। 'गत्वाय'—गत्वाके स्थानमें 'क्त्वो यक्' सूत्रके अनुसार 'यक्'का आगम होनेसे उक्त पद सिद्ध होता है। 'अस्थभिः' में अस्थि-शब्दके 'इ'को 'अनङ्' आदेश होकर नलोप हो गया है। 'छन्दस्यपि दृश्यते' इस नियमसे हलादि विभक्ति परे रहनेपर भी 'अनङ्' आदेश होता है॥ १३॥ 'गोनाम्' यहाँ आम्-विभक्ति परे रहते नुट्का आगम हुआ है। किसी छन्दके पादान्तमें गो-शब्द हो तो प्रायः षष्ठी-बहुवचनमें वहाँ नुट्का आगम हो जाता है। 'अपरिह्वुताः' यहाँ 'हु ह्वरेश्छन्दसि'से प्राप्त हुए ''हु' आदेशका अभाव निपातित हुआ है। 'ततुरिः', 'जगुरिः' इत्यादि पद भी 'बहुलं छन्दसि' के नियमसे निपातनद्वारा सिद्ध होते हैं। 'ग्रसिताम्' 'ग्रसु' अदनेका निष्ठान्त रूप है। यहाँ

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इट्का निषेध प्राप्त था, किंतु निपातनसे इट् हो गया है। इसी प्रकार 'स्कभित' आदिको भी समझना चाहिये। 'पश्वे' यहाँ 'जसादिषु छन्दसि वा वचनं०' इत्यादिसे वैकल्पिक घि-संज्ञा होनेके कारण घि-संज्ञाके अभावमें यण् होनेसे 'पश्वे' रूप बना है। इसी तरह 'दधद्' यह दधातिके स्थानमें निपातित हुआ है; लेट्का रूप है। 'दधद्रत्नानि दाशुषे' यह मन्त्र है। 'बभूथ' यह लिट् लकारके मध्यम पुरुषका एकवचन है। वेदमें इसके 'इट्' का अभाव निपातित हुआ है। 'प्रमिणन्ति'—यहाँ 'प्रमीणन्ति' रूप प्राप्त था। 'मीनातेर्निगमे' सूत्रसे ह्रस्व हो गया। 'अवीवृधत्'—'नित्यं छन्दसि' से चङ् परे रहते उपधा ऋवर्णका 'ऋ'-भाव नित्य होता है॥१४॥ 'मित्रयुः' यहाँ दीर्घका निषेध होता है। 'दुष्ट इवाचरति' इस अर्थमें क्यच् परे रहते दुष्ट शब्दका 'दुरस्' आदेश होता है। 'दुरस्युः' यह निपातनात् सिद्ध रूप है। इसी प्रकार 'द्रविणस्युः' इत्यादि भी है। वेदमें 'क्त्वा' परे रहते हा धातुका 'हि' आदेश विकल्पसे होता है। 'हि' आदेश न होनेपर 'घुमास्था०' इत्यादि सूत्रसे 'आ' के स्थानमें 'ई' हो जाता है; अतः 'हित्वा' और 'हीत्वा' दोनों रूप होते हैं। 'सु' पूर्वक धा-धातुसे 'क्त'प्रत्यय परे होनेपर 'इत्व' निपातन किया जाता है; इससे 'सुधितम्' रूप बनता है—यथा 'गर्भं माता सुधितं वक्षणासु।' 'दार्धर्ति', 'दर्दति' और 'दर्धर्षि' आदि रूप निपातनसे सिद्ध हैं। ये 'धृ'-धातुके यङ्लुगन्त रूप हैं। 'स्ववद्भिः' अव-धातुसे असुन् करनेपर 'अवस्' रूप होता है। 'शोभनमवो येषां ते स्ववसः, तैः स्ववद्भिः' यह उसकी व्युत्पत्ति है। 'स्ववःस्वतवसोरुषसश्चेष्यते' इस वार्तिकसे भकारादि प्रत्यय परे रहते 'स्ववस्' आदि शब्दोंके 'स्' का 'त्' हो जाता है। प्रसवार्थक 'सू' धातुके लिट्में 'ससूवेति निगमे' सूत्रसे 'ससूव' यह निपातसिद्ध रूप है। यथा—'गृष्टिः ससूव स्थविरम्'। 'सुधित' इत्यादि सूत्रसे 'धत्स्व' के स्थानमें 'धिश्व' निपातित होता है—'धिश्व वज्रं दक्षिण इन्द्रहस्ते' ॥१५॥ 'प्रप्रायमग्निः' यहाँ 'प्रसमुपोदः पादपूरणे' से पादपूर्तिके लिये 'प्र' उपसर्गका द्वित्व हो गया है। 'हरिवते हर्यश्वाय' यहाँ 'छन्दसीरः' से 'मतुप्' के 'म' का 'व' हुआ है। 'अक्षण्वन्तः' में अक्षि-शब्दसे मतुप्, 'छन्दस्यपि दृश्यते' से अनङ्-आदेश तथा 'अनो नुट्' से 'नुट्' का आगम हुआ है। 'सुपथिन्तरः' में 'नाद्घस्य' से 'नुट्' का आगम विशेष कार्य है। 'रथीतरः' में 'ईद्रथिनः' से 'ई' हुआ है। 'नसत्तम्' में नञ्पूर्वक सद्-धातुसे निष्ठामें नत्वका अभाव निपातित हुआ है। इसी प्रकार सूत्रोक्त 'निषत्त' आदि शब्दोंको जानना चाहिये। 'अम्रैव'—इसमें 'अम्रस्' शब्द ईषत् अर्थमें है। वेदमें सकारका वैकल्पिक रेफ निपातित हुआ है। 'भुवरथो इति' यहाँ 'भुवश्च महाव्याहृतेः' से भुवस्के 'स्'का 'र्' हुआ है॥१६॥ 'ब्रूहि' यहाँ 'ब्रूहि प्रेष्य०' इत्यादि सूत्रसे उकार प्लुत हुआ है। यथा—अग्नयेऽनुब्रू३हि। 'अद्यामावास्येत्या३त्थ' यहाँ 'निगृह्यानुयोगे च' इस सूत्रसे वाक्यके 'टि'का प्लुतभाव होता है। 'अग्नीत्प्रेषणे परस्य च' इस सूत्रसे आदि और परका भी प्लुत होता है। उदाहरणके लिये 'ओ३श्रा ३ वय' इत्यादि पद है। इन सबमें प्लुत हुआ है। 'दाश्वान्' आदि पद क्वसु-प्रत्ययान्त निपातित होते हैं। 'स्वतवान्' शब्दके नकारका विकल्पसे 'रु' होता है, पायु-शब्द परे रहनेपर—स्वतवाँः पायुरग्ने।' 'त्रिभिष्ट्वं देव सवितः।' यहाँ 'त्रिभिस्+त्वम्' इस दशामें 'युष्मत्तत्ततक्षुष्वन्तःपादम्' इस सूत्रमें 'स्' के स्थानमें 'ष्' होकर ष्टुत्व होनेसे 'त्रिभिष्ट्वम्' बनता है। 'नृभिष्टः' यहाँ 'स्तुतस्तोमयोश्छन्दसि' इस सूत्रसे 'नृभिस्' के 'स्' का 'ष्' होकर ष्टुत्व हुआ है॥१७॥ 'अभीषुणः' यहाँ 'सुञः' सूत्रसे 'स्' का 'ष्' हुआ है। 'ऋताषाहम्' में 'सहेः पृतनर्त्तीभ्यां च' इस सूत्रसे 'स्'का मूर्धन्य आदेश हुआ है। 'न्यषीदत्' यहाँ भी 'निव्यभिभ्योऽङ्ग्व्यवाये वा