सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

\ पूर्वभाग-द्वितीय पाद \ २१९

* पूर्वभाग-द्वितीय पाद * २१९


प्रवेश कर जाता है, मूँड मुड़ाये मनुष्योंको तथा गेरुआ वस्त्र धारण करनेवाले पुरुषोंको देखता है। कच्चा मांस खानेवाले गृध्र आदि पक्षियों तथा व्याघ्र आदि पशुओंपर चढ़ता है। एक स्थानपर चाण्डालों, गदहों और ऊँटोंके साथ उनसे घिरा हुआ बैठता है। चलते समय भी अपने-आपको शत्रुओंसे अनुगत मानता है—उसे ऐसा भान होता है कि शत्रु मेरा पीछा कर रहे हैं। (जाग्रत्-अवस्थामें भी) उसका चित्त विक्षिप्त रहता है। उसके द्वारा किये हुए प्रत्येक कार्यका आरम्भ निष्फल होता है। वह अकारण खिन्न रहता है। विघ्नराजका सताया हुआ मनुष्य राजाका पुत्र होकर भी राज्य नहीं पाता। कुमारी कन्या अनुकूल पति नहीं पाती, विवाहिता स्त्रीको अभीष्ट पुत्रकी प्राप्ति नहीं होती। श्रोत्रियको आचार्यपद नहीं मिलता, शिष्य स्वाध्याय नहीं कर पाता, वैश्यको व्यापारमें और किसानको खेतीमें लाभ नहीं हो पाता।

ऐसे पुरुषको किसी पवित्र दिन एवं शुभ मुहूर्तमें विधिपूर्वक स्नान कराना चाहिये। पीली सरसों पीसकर उसे घीसे ढीला करे और उस मनुष्यके शरीरमें उसीका उबटन लगाये। प्रियङ्गु, नागकेसर आदि सब प्रकारकी ओषधियों और चन्दन, अगुरु, कस्तूरी आदि सब प्रकारकी सुगन्धित वस्तुओंको उसके मस्तकमें लगाये। फिर उसे भद्रासनपर बिठाकर उसके लिये ब्राह्मणोंसे शुभ स्वस्तिवाचन (पुण्याहवाचन) कराये। अश्वशाला, गजशाला, वल्मीक (बाँबी), नदीसङ्गम तथा जलाशयसे लायी हुई पाँच प्रकारकी मिट्टी, गोरोचन, गन्ध (चन्दन, कुंकुम, अगुरु आदि) और गुग्गुल—ये सब वस्तुएँ जलमें छोड़े और उसी जलमें छोड़े, जो गहरे और कभी न सूखनेवाले जलाशयसे एक रंगके चार नये कलशोंद्वारा लाया गया हो। तदनन्तर लाल रंगके वृषभचर्मपर भद्रासन* स्थापित करे। (इसी भद्रासनपर यजमानको बैठाकर ब्राह्मणोंसे पूर्वोक्त स्वस्तिवाचन कराना चाहिये। इसके सिवा स्वस्तिवाचनके अनन्तर जिनके पति और पुत्र जीवित हों, ऐसी सुवेशधारिणी स्त्रियोंद्वारा मङ्गल-गान कराते हुए पूर्वादिशावर्ती कलशको लेकर आचार्य निम्नाङ्कित मन्त्रसे यजमानका अभिषेक करे—)

सहस्राक्षं शतधारमृषिभिः पावनं कृतम्।
तेन त्वामभिषिञ्चामि पावमान्यः पुनन्तु ते॥

‘जो सहस्रों नेत्रों (अनेक प्रकारकी शक्तियों)-से युक्त हैं, जिसकी सैकड़ों धाराएँ (बहुत-से प्रवाह) हैं और जिसे महर्षियोंने पावन बनाया है, उस पवित्र जलसे मैं तुम्हारा अभिषेक करता हूँ। पावमानी ऋचाएँ तथा यह पवित्र जल तुम्हें पवित्र करें (और विनायकजनित विघ्नकी शान्ति हो)।'

(तदनन्तर दक्षिण दिशामें स्थित द्वितीय कलश लेकर नीचे लिखे मन्त्रको पढ़ते हुए अभिषेक करे—)

भगं ते वरुणो राजा भगं सूर्यो बृहस्पतिः।
भगमिन्द्रश्च वायुश्च भगं सप्तर्षयो ददुः॥

‘राजा वरुण, सूर्य, बृहस्पति, इन्द्र, वायु तथा


*पूर्वोक्त गन्ध-औषधादिसहित चार कलशोंमें आम्र आदिके पल्लव रखकर उनके कण्ठमें माला पहनाये, उन्हें चन्दनसे चर्चित करे और नूतन वस्त्रसे विभूषित करके उन कलशोंको पूर्वादि चारों दिशाओंमें स्थापित कर दे। फिर पवित्र एवं लिपी-पुती वेदीपर पाँच रंगोंसे स्वस्तिक बनाकर लाल रंगका वृषभचर्म, जिसका लोम उत्तरकी ओर तथा ग्रीवा पूर्वकी ओर हो, बिछाये और उसके ऊपर श्वेत वस्त्रसे आच्छादित काष्ठनिर्मित आसन रखे। यही भद्रासन है।

२२० * संक्षिप्त नारदपुराण *

सप्तर्षिगण तुम्हें कल्याण प्रदान करें।'

(फिर तीसरा पश्चिम कलश लेकर निम्नाङ्कित मन्त्रसे अभिषेक करे—)

यत्ते केशेषु दौर्भाग्यं सीमन्ते यच्च मूर्धनि।
ललाटे कर्णयोरक्षणोरापस्तद् घ्नन्तु सर्वदा॥

'तुम्हारे केशोंमें, सीमन्तमें, मस्तकपर, ललाटमें, कानोंमें और नेत्रोंमें भी जो दुर्भाग्य (या अकल्याण) है, वह सब सदाके लिये जल शान्त कर दे।'

(तत्पश्चात् चौथा कलश लेकर पूर्वोक्त तीनों मन्त्र पढ़कर अभिषेक करे। इस प्रकार स्नान करनेवाले यजमानके मस्तकपर बायें हाथमें लिये हुए कुशोंको रखकर उसपर गूलरकी स्रुवासे सरसोंका तेल उठाकर डाले, उस समय निम्नाङ्कित मन्त्र पढ़े—) 'ॐ मिताय स्वाहा। ॐ संमिताय स्वाहा। ॐ शालाय स्वाहा। ॐ कटंकटाय स्वाहा। ॐ कूष्माण्डाय स्वाहा। ॐ राजपुत्राय स्वाहा।' मस्तकपर होमके पश्चात् लौकिक अग्निमें भी स्थालीपाककी विधिसे चरु तैयार करके उक्त छः मन्त्रोंसे ही उसी अग्निमें हवन करे। फिर होमशेष चरुद्वारा बलिमन्त्रोंको पढ़कर इन्द्रादि दिक्पालोंको बलि भी अर्पित करे। तत्पश्चात् कृताकृत आदि उपहार-द्रव्य भगवान् विनायकको अर्पित करके उनके समीप रहनेवाली माता पार्वतीको भी उपहार भेंट करे। फिर पृथ्वीपर मस्तक रखकर 'तत्पुरुषाय विद्महे। वक्रतुण्डाय धीमहि। तन्नो दन्ती प्रचोदयात्।' इस मन्त्रसे गणेशजीको और 'सुभागायै विद्महे। काममालिन्यै धीमहि। तन्नो गौरी प्रचोदयात्।' इस मन्त्रसे अम्बिकादेवीको नमस्कार करे। फिर गणेशजननी अम्बिकाका उपस्थान करे। उपस्थानसे पूर्व फूल और जलसे अर्घ्य देकर दूर्वा, सरसों और पुष्पसे पूर्ण अञ्जलि अर्पण करे। (उपस्थानका मन्त्र इस प्रकार है—)

रूपं देहि यशो देहि भगं भगवति देहि मे।
पुत्रान् देहि धनं देहि सर्वकामांश्च देहि मे॥

'भगवति! मुझे रूप दो, यश दो, कल्याण प्रदान करो, पुत्र दो, धन दो और सम्पूर्ण कामनाओंको पूर्ण करो।'

पार्वतीजीका उपस्थान करके धूप, दीप, गन्ध, माल्य, अनुलेप और नैवेद्य आदिके द्वारा उमापति श्रीभगवान् शङ्करकी पूजा करे। तदनन्तर श्वेत वस्त्र धारण करके श्वेत चन्दन और मालासे अलंकृत हो ब्राह्मणोंको भोजन कराये और गुरुको भी दक्षिणासहित दो वस्त्र अर्पित करे।

इस प्रकार विनायककी पूजा करके लक्ष्मी, शान्ति, पुष्टि, वृद्धि तथा आयुकी इच्छा रखनेवाले वीर्यवान् पुरुषको ग्रहोंकी भी पूजा करनी चाहिये। सूर्य, सोम, मङ्गल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु तथा केतु—इन नवों ग्रहोंकी क्रमशः स्थापना करनी चाहिये। सूर्यकी प्रतिमा ताँबेसे, चन्द्रमाकी रजत (या स्फटिक)—से, मङ्गलकी लाल चन्दनसे, बुधकी सुवर्णसे, गुरुकी सुवर्णसे, शुक्रकी रजतसे, शनिकी लोहेसे तथा राहु—केतुकी सीसेसे बनाये, इससे शुभकी प्राप्ति होती है। अथवा वस्त्रपर उनके-उनके रंगके अनुसार वर्णकसे उनका चित्र अङ्कित कर लेना चाहिये। अथवा मण्डल बनाकर उनमें गन्ध (चन्दन-कुंकुम आदि)—से ग्रहोंकी आकृति बना ले। ग्रहोंके रंगके अनुसार ही उन्हें फूल और वस्त्र भी देने चाहिये। सबके लिये गन्ध, बलि, धूप और गुग्गुल देना चाहिये। प्रत्येक ग्रहके लिये (अग्निस्थापनपूर्वक) समन्त्रक चरुका होम करना चाहिये। 'आ कृष्णेन रजसा०' इत्यादि सूर्य देवताके, 'इमं देवाः०' इत्यादि चन्द्रमाके, 'अग्निर्मूर्धा दिवः ककुत्०' इत्यादि मङ्गलके, 'उद्बुध्यस्व०' इत्यादि मन्त्र बुधके, 'बृहस्पते अति यदर्यः०' इत्यादि मन्त्र बृहस्पतिके,