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संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

\ पूर्वभाग-द्वितीय पाद \ २१५

* पूर्वभाग-द्वितीय पाद * २१५

और उसके द्वारा सुन्दर मुख एवं शोभन स्वरसे उच्चारित वेदकी बड़ी शोभा होती है। जो नाक, आँख, कान आदिके विकृत होनेसे विकराल दिखायी देता है, जिसके ओठ लंबे-लंबे हैं, जो सब बात नाकसे ही बोलता है, जो गद्गद-कण्ठसे बोलता है अथवा जिसकी जीभ बँधी-सी रहती है अर्थात् जो रुक-रुककर बोलता है, वह वेदमन्त्रोंके प्रयोगका अधिकारी नहीं है। जिसका चित्त एकाग्र है, अन्तःकरण वशमें है और जिसके दाँत तथा ओष्ठ सुन्दर हैं, ऐसा व्यक्ति यदि स्नानसे शुद्ध हो गाना छोड़ दे तो वह मन्त्राक्षरोंका ठीक प्रयोग कर सकता है। जो अत्यन्त क्रोधी, स्तब्ध, आलसी तथा रोगी हैं और जिनका मन इधर-उधर फैला हुआ है, वे पाँच प्रकारके मनुष्य विद्या ग्रहण नहीं कर पाते। विद्या धीरे-धीरे पढ़ी जाती है। धन धीरे-धीरे कमाया जाता है, पर्वतपर धीरे-धीरे चढ़ना चाहिये। मार्गका अनुसरण भी धीरे-धीरे ही करे और एक दिनमें एक योजनसे अधिक न चले। चींटी धीरे-धीरे चलकर सहस्रों योजन चली जाती है। किंतु गरुड़ भी यदि चलना शुरू न करे तो वह एक पग भी आगे नहीं जा सकता। पापीकी पापदूषित वाणी प्रयोगों (वेदमन्त्रों)-का उच्चारण नहीं कर सकती—ठीक उसी तरह, जैसे बातचीतमें चतुर सुलोचना रमणी बहरेके आगे कुछ नहीं कह सकती*। जो उपांशु (सूक्ष्म) उच्चारण करता है, जो उच्चारणमें जल्दबाजी करता है तथा जो डरता हुआ-सा अध्ययन करता है, वह सहस्र रूपों (शब्दोच्चारण)-के विषयमें सदा संदेहमें ही पड़ा रहता है। जिसने केवल पुस्तकके भरोसे पढ़ा है, गुरुके समीप अध्ययन नहीं किया है, वह सभामें सम्मानित नहीं होता—वैसे ही, जैसे जारपुरुषसे गर्भ धारण करनेवाली स्त्री समाजमें प्रतिष्ठा नहीं पाती। प्रतिदिन व्यय किये जानेपर अञ्जनकी पर्वतराशिका भी क्षय हो जाता है और दीमकोंके द्वारा थोड़ी-थोड़ी मिट्टीके संग्रहसे भी बहुत ऊँचा वल्मीक बन जाता है, इस दृष्टान्तको सामने रखते हुए दान और अध्ययनादि सत्कर्मोंमें लगे रहकर जीवनके प्रत्येक दिनको सफल बनावे—व्यर्थ न बीतने दे। कीड़े चिकने धूलकणोंसे जो बहुत ऊँचा वल्मीक बना लेते हैं, उसमें उनके बलका प्रभाव नहीं है, उद्योग ही कारण है। विद्याको सहस्रों बार अभ्यासमें लाया जाय और सैकड़ों बार शिष्योंको उसे पढ़ाया जाय, तब वह उसी प्रकार जिह्वाके अग्रभागपर आ जायगी, जैसे जल ऊँचे स्थानसे नीचे स्थानमें स्वयं बह आता है। अच्छी जातिके घोड़े आधी रातमें भी आधी ही नींद सोते हैं अथवा वे आधी रातमें सिर्फ एक पहर सोते हैं, उन्हींकी भाँति विद्यार्थियोंके नेत्रोंमें चिरकालतक निद्रा नहीं ठहरती। विद्यार्थी भोजनमें आसक्त होकर अध्ययनमें विलम्ब न करे। नारीके मोहमें न फँसे। विद्याकी अभिलाषा रखनेवाला छात्र आवश्यकता हो तो गरुड़ और हंसकी भाँति बहुत दूरतक भी चला जाय। विद्यार्थी जनसमूहसे उसी तरह डरे, जैसे सर्पसे डरता है। दोस्ती बढ़ानेके व्यसनको नरक समझकर उससे भी दूर रहे। स्त्रियोंसे उसी तरह बचकर रहे, जैसे राक्षसियोंसे। इस तरह करनेवाला पुरुष ही विद्या प्राप्त कर सकता है। शठ प्रकृतिके मनुष्य विद्यारूप अर्थकी सिद्धि नहीं कर पाते।


* शिक्षा-संग्रहमें जो नारदी-शिक्षा संकलित हुई है, उसमें इस श्लोकका पाठ इस प्रकार है—
न हि पाष्णिहता वाणी प्रयोगान् वक्तुमर्हति। बधिरस्येव तत्पस्था विदग्धा वामलोचना॥

२१६ * संक्षिप्त नारदपुराण *

कायर तथा अहंकारी भी विद्या एवं धनका उपार्जन नहीं कर पाते। लोकापवादसे डरनेवाले लोग भी विद्या और धनसे वञ्चित रह जाते हैं तथा 'जो आज नहीं कल' करते हुए सदा आगामी दिनकी प्रतीक्षामें बैठे रहते हैं, वे भी न विद्या पढ़ पाते हैं न धन ही लाभ करते हैं। जैसे खनतीसे धरती खोदनेवाला पुरुष एक दिन अवश्य पानी प्राप्त कर लेता है, उसी प्रकार गुरुकी निरन्तर सेवा करनेवाला छात्र गुरुमें स्थित विद्याको अवश्य ग्रहण कर लेता है। गुरुसेवासे विद्या प्राप्त होती है अथवा बहुत धन व्यय करनेसे उनकी प्राप्ति होती है। अथवा एक विद्या देनेसे दूसरी विद्या मिलती है; अन्यथा उसकी प्राप्ति नहीं होती। यद्यपि बुद्धिके गुणोंसे सेवा किये बिना भी विद्या प्राप्त हो जाती है; तथापि वन्ध्या युवतीकी भाँति वह सफल नहीं होती। नारद ! इस प्रकार मैंने तुमसे शिक्षाग्रन्थका संक्षेपसे वर्णन किया है। इस आदिवेदाङ्गको जानकर मनुष्य ब्रह्मभावकी प्राप्तिके योग्य हो जाता है। (पूर्वभाग—द्वितीय पाद, अध्याय ५०)


वेदके द्वितीय अङ्ग कल्पका वर्णन—गणेशपूजन, ग्रहशान्ति तथा श्राद्धका निरूपण

सनन्दनजी कहते हैं—मुनीश्वर ! अब मैं कल्पग्रन्थका वर्णन करता हूँ; जिसके विज्ञानमात्रसे मनुष्य कर्ममें कुशल हो जाता है। कल्प पाँच प्रकारके माने गये हैं—नक्षत्रकल्प, वेदकल्प, संहिताकल्प, आङ्गिरसकल्प और शान्तिकल्प। नक्षत्रकल्पमें नक्षत्रोंके स्वामीका विस्तारपूर्वक यथार्थ वर्णन किया गया है; वह यहाँ भी जानने योग्य है। मुनीश्वर ! वेदकल्पमें ऋगादि-विधानका विस्तारसे वर्णन है—जो धर्म, अर्थ, काम और मोक्षकी सिद्धिके लिये कहा गया है। संहिताकल्पमें तत्त्वदर्शी मुनियोंने मन्त्रोंके ऋषि, छन्द और देवताओंका निर्देश किया है। आङ्गिरसकल्पमें स्वयं ब्रह्माजीने अभिचार-विधिसे विस्तारपूर्वक छः कर्मोंका वर्णन किया है। मुनिश्रेष्ठ ! शान्तिकल्पमें दिव्य, भौम और अन्तरिक्ष-सम्बन्धी उत्पातोंकी पृथक्-पृथक् शान्ति बतायी गयी है। यह संक्षेपसे कल्पके स्वरूपका परिचय दिया गया है, अन्य शाखाओंमें इसका विशेष रूपसे पृथक्-पृथक् निरूपण किया गया है। द्विजश्रेष्ठ ! गृहकल्प सबके लिये उपयोगी है, अतः इस समय उसीका वर्णन करूँगा। सावधान होकर सुनो। पूर्वकालमें 'ॐकार' और 'अथ' शब्द—ये दोनों ब्रह्माजीके कण्ठका भेदन करके निकले थे, अतः ये मङ्गल-सूचक हैं। जो शास्त्रोक्त कर्मोंका अनुष्ठान करके उन्हें ऊँचे उठाना चाहता है, वह 'अथ' शब्दका प्रयोग करे। इससे वह कर्म अक्षय होता है। परिसमूहनके लिये परिगणित शाखावाले कुश कहे गये हैं, न्यून या अधिक संख्यामें उन्हें ग्रहण करनेपर वे अभीष्ट कर्मको निष्फल कर देते हैं। पृथ्वीपर जो कृमि, कीट और पतंग आदि भ्रमण करते हैं, उनकी रक्षाके लिये परिसमूहन कहा गया है। ब्रह्मन् ! वेदीपर जो तीन रेखाएँ कही गयी हैं, उनको बराबर बनाना चाहिये; उन्हें न्यूनाधिक नहीं करना चाहिये; ऐसा ही शास्त्रका कथन है। नारद ! यह पृथ्वी मधु और कैटभ नामवाले दैत्योंके मेदेसे व्याप्त है, इसलिये इसे गोबरसे लीपना चाहिये। जो गाय वन्ध्या, दुष्टा, दीनाङ्गी और मृतवत्सा (जिसके बछड़े मर जाते