संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
(पूर्वभाग द्वितीयपाद अध्याय ५३)
| २६२ | * संक्षिप्त नारदपुराण * |
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हेतु है (पारायण-जनित पुण्यलाभके लिये ही उनका संकलन होता है)। सिद्ध शब्दोंका ही प्रकृति, प्रत्यय, आदेश और आगम आदिके द्वारा लघुमार्गसे सम्यक् निरूपण किया जाता है। इस प्रकार तुमसे निरुक्तका यत्किंचित् ही वर्णन किया गया है। नारद! इसका पूर्णरूपसे वर्णन तो कोई भी कर ही नहीं सकता॥ ८६-८८॥
(पूर्वभाग द्वितीयपाद अध्याय ५३)
त्रिस्कन्ध ज्योतिषके वर्णन-प्रसङ्गमें गणितविषयका प्रतिपादन
सनन्दन उवाच
ज्यौतिषाङ्गं प्रवक्ष्यामि यदुक्तं ब्रह्मणा पुरा।
यस्य विज्ञानमात्रेण धर्मसिद्धिर्भवेन्नृणाम् ॥ १ ॥
त्रिस्कन्धं ज्यौतिषं शास्त्रं चतुर्लक्षमुदाहृतम्।
गणितं जातकं विप्र संहितास्कन्धसंज्ञितम् ॥ २ ॥
गणिते परिकर्माणि खगमध्यस्फुटक्रिये।
अनुयोगश्चन्द्रसूर्यग्रहणं चोदयास्तकम् ॥ ३ ॥
छाया शृङ्गोन्नतिर्युती पातसाधनमीरितम्।
निषेकजन्मारिष्टानि ह्यायुर्दायो दशाक्रमः।
कर्माजीवं चाष्टवर्गो राजयोगाश्च नाभसाः ॥ ५ ॥
चन्द्रयोगाः प्रव्रज्याख्या राशिशीलं च दृक्फलम्।
ग्रहभावफलं चैवाश्रययोगप्रकीर्णके ॥ ६ ॥
अनिष्टयोगाः स्त्रीजन्मफलं निर्याणमेव च।
नष्टजन्मविधानं च तथा द्रेष्काणलक्षणम् ॥ ७ ॥
श्रीसनन्दनजी कहते हैं—देवर्षे! अब मैं ज्योतिष नामक वेदाङ्गका वर्णन करूँगा, जिसका पूर्वकालमें साक्षात् ब्रह्माजीने उपदेश किया है तथा जिसके विज्ञानमात्रसे मनुष्योंके धर्मकी सिद्धि हो सकती है॥ १॥ ब्रह्मन्! ज्योतिषशास्त्र चार लाख श्लोकोंका बताया गया है। उसके तीन^१ स्कन्ध हैं, जिनके नाम ये हैं—गणित (सिद्धान्त), जातक (होरा) और संहिता॥ २॥ गणितमें परिकर्म^२, ग्रहोंके मध्यम एवं स्पष्ट करनेकी रीतियाँ बतायी गयी हैं। इसके सिवा अनुयोग (देश, दिशा और कालका ज्ञान), चन्द्रग्रहण, सूर्यग्रहण, उदय, अस्त, छायाधिकार, चन्द्र-शृङ्गोन्नति^३, ग्रहयुति (ग्रहोंका योग) तथा पात (महापात=सूर्य-चन्द्रमाके क्रान्तिसाम्य)-का साधन-प्रकार कहा गया है॥ ३\frac{१}{२}॥
जातकस्कन्धमें राशिभेद, ग्रहयोनि, (ग्रहोंकी जाति, रूप और गुण आदि) वियोनिज (मानवेतर-जन्मफल), गर्भाधान, जन्म, अरिष्ट, आयुर्दाय, दशाक्रम, कर्माजीव (आजीविका), अष्टकवर्ग, राजयोग, नाभसयोग, चन्द्रयोग, प्रव्रज्यायोग, राशिशील, ग्रहदृष्टिफल, ग्रहोंके भावफल, आश्रययोग, प्रकीर्ण, अनिष्टयोग, स्त्रीजातक-फल, निर्याण (मृत्युविषयक विचार), नष्ट-जन्म-विधान (अज्ञात जन्म-कालको जाननेका प्रकार) तथा द्रेष्काणों^४के स्वरूप—इन सब विषयोंका वर्णन है॥ ४—७॥
जातके राशिभेदाश्च ग्रहयोनिवियोनिजे ॥ ४ ॥
संहिताशास्त्ररूपं च ग्रहचारोऽब्दलक्षणम्।
तिथिवासरनक्षत्रयोगतिथ्यर्द्धसंज्ञकाः ॥ ८ ॥
मुहूर्तोपग्रहाः सूर्यसंक्रान्तिर्गोचरः क्रमात्।
चन्द्रताराबलं चैव सर्वलग्नार्तवाह्वयः ॥ ९ ॥
आधानपुंससीमन्तजातनामान्नभुक्तयः ।
चौल कर्णच्छिदा मौञ्जी क्षुरिकाबन्धनं तथा ॥ १० ॥
१. किसी-किसीके मतसे ज्योतिषके पाँच स्कन्ध हैं—सिद्धान्त, होरा, संहिता, स्वर और सामुद्रिक। सिद्धान्तको ही गणित कहते हैं। होराका ही दूसरा नाम जातक है।
२. योग, अन्तर, गुणन, भजन, वर्ग, वर्गमूल, घन और घनमूल—ये परिकर्म कहे गये हैं।
३. द्वितीयाको जो चन्द्रोदय होता है, उसमें कभी चन्द्रमाका दक्षिण सींग और कभी उत्तर सींग (नोक) ऊपरको उठा रहता है, उसीको 'चन्द्रशृङ्गोन्नति' कहा गया है। ज्योतिषमें उसके परिणामका विचार किया गया है।
४. राशिके तृतीय भाग (१० अंश)-की 'द्रेष्काण' संज्ञा है।
- पूर्वभाग-द्वितीय पाद * | २६३
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समावर्तनवैवाहप्रतिष्ठासद्मलक्षणम् ।
यात्रा प्रवेश नं सद्योवृष्टिः कर्मविलक्षणम् ॥ ११ ॥
उत्पत्तिलक्षणं चैव सर्वं संक्षेपतो ब्रुवे।
अब संहितास्कन्धके स्वरूपका परिचय दिया जाता है। उसमें ग्रहचार (ग्रहोंकी गति), वर्षलक्षण, तिथि, दिन, नक्षत्र, योग, करण, मुहूर्त, उपग्रह, सूर्य-संक्रान्ति, ग्रहगोचर, चन्द्रमा और ताराका बल, सम्पूर्ण लग्नों तथा ऋतुदर्शनका विचार, गर्भाधान, पुंसवन, सीमन्तोन्नयन, जातकर्म, नामकरण, अन्न-प्राशन, चूडाकरण, कर्णवेध, उपनयन, मौञ्जीबन्धन (वेदारम्भ), क्षुरिकाबन्धन, समावर्तन, विवाह, प्रतिष्ठा, गृहलक्षण, यात्रा, गृहप्रवेश, तत्काल वृष्टिज्ञान, कर्मवैलक्षण्य तथा उत्पत्तिका लक्षण—इन सब विषयोंका संक्षेपसे वर्णन करूँगा (८-११\frac{१}{२}॥
एकं दश शतं चैव सहस्रायुतलक्षकम् ॥ १२ ॥
प्रयुतं कोटिसंज्ञा चार्बुदमब्जं च खर्वकम् ।
निखर्वं च महापद्मं शङ्कुर्जलधिरेव च ॥ १३ ॥
अन्त्यं मध्यं परार्द्धं च संज्ञा दशगुणोत्तराः ।
क्रमादुत्क्रमतो वापि योगः कार्योंऽन्तरं तथा ॥ १४ ॥
हन्याद्गुणेन गुण्यं स्यात् तेनैवोपान्तिमादिकान् ।
शुद्ध्येद्बरो यद्गुणश्च भाज्यान्न्यात् तत्फलं मुने ॥ १५ ॥
| [ अब गणितका प्रकरण प्रारम्भ किया जाता है—] एक (इकाई), दश (दहाई), शत (सैकड़ा), सहस्र (हजार), अयुत (दस हजार), लक्ष (लाख), प्रयुत (दस लाख), कोटि (करोड़), अर्बुद (दस करोड़), अब्ज (अरब), खर्व (दस अरब), निखर्व (खर्व), महापद्म (दस खर्व), शङ्कु (नील), जलधि (दस नील), अन्त्य (पद्म), मध्य (दस पद्म), परार्ध (शङ्ख) इत्यादि संख्याबोधक संज्ञाएँ उत्तरोत्तर दसगुनी मानी गयी हैं। यथास्थानीय अङ्कोंका योग या अन्तर क्रम या व्युत्क्रमसे करना चाहिये¹ ॥ १२-१४ ॥
गुण्यके अन्तिम अङ्कको गुणकसे गुणना चाहिये। फिर उसके पार्श्ववर्ती अङ्कको भी उसी गुणकसे गुणना चाहिये। इस तरह आदि अङ्कतक गुणन करनेपर गुणनफल प्राप्त हो जाता है², मुने ! इसी प्रकार भागफल जाननेके लिये भी यत्न करे। जितने अङ्कसे भाजकके साथ गुणा करनेपर भाज्यमेंसे घट जाय, वही अङ्क लब्धि अथवा भागफल होता है³ ॥ १५ ॥
समाङ्कघातो वर्गः स्यात् तमेवाहुः कृतिं बुधाः ।
अन्त्यात्तु विषमात्त्यक्त्वा कृतिं मूलं न्यसेत्पृथक् ॥ १६ ॥
१. यथा—२+५+३२+१९३+१८+१०+१००—इन्हें क्रम या व्युत्क्रम (इकाई या सैकड़ाकी ओर)-से जोड़ा जाय, समान स्थानीय अङ्कोंका परस्पर योग किया जाय—अर्थात् इकाईको इकाईके साथ और दहाई आदिके दहाई आदिके साथ जोड़ा जाय तो सर्वथा योगफल ३६० ही होगा। इसी प्रकार १००००-३६० इसमें ३६० को १०००० के नीचे लिखकर पूर्ववत् समान स्थानीय अङ्कमेंसे उसी स्थानवाले अङ्कको क्रम या व्युत्क्रमसे भी घटाया जाय तो शेष सर्वथा ९६४० ही होगा।
२. यहाँपर 'अङ्कानां वामतो गतिः' इस उक्तिके अनुसार आदि-अन्त समझने चाहिये। जैसे—'१३५×१२' इसमें १३५ गुण्य है और १२ गुणक है। गुण्यका अन्तिम अङ्क हुआ १ उसमें १२ से गुणा पहले होगा, फिर उसके बादवाले ३ के साथ फिर ५ के साथ।
यथा— १३५
१६२० वास्तवमें यह गुणन-शैली उस समयकी है, जब लोग धूल बिछाकर उसपर अङ्गुलिसे गणित किया करते थे। आधुनिक शैली उससे भिन्न है। रूप-विभाग और स्थान-विभागसे इस गुणनके अनेक प्रकार हो जाते हैं; इसका विस्तार लीलावतीमें देखना चाहिये।
३. १६२०÷१२=१३५ भागफल हुआ। जैसे—
भाजक भाज्य भागफल
१२)१६२०(१३५
१२
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४२
३६
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६०
६०
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२६४ * संक्षिप्त नारदपुराण *
द्विगुणेनामुना भक्ते फलं मूले न्यसेत् क्रमात्।
तत्कृतिं च त्यजेद्विप्र मूलेन विभजेत् पुनः॥ १७॥
एवं मुहुर्वर्गमूलं जायते च मुनीश्वर।
दो समान अङ्कोंके गुणनफलको वर्ग कहा गया है। विद्वान् पुरुष उसीको कृति कहते हैं। (जैसे ४ का वर्ग ४×४ = १६ और ९ का वर्ग ९×९=८१ होता है)¹ [वर्गमूल जाननेके लिये दाहिने अङ्कसे लेकर बायें अङ्कतक अर्थात् आदिसे अन्ततक विषम और समका चिह्न कर देना चाहिये। खड़ी लकीरको विषमका और पड़ीको समका चिह्न माना गया है]। अन्तिम विषममें जितने वर्ग घट सकें उतने घटा देना चाहिये। उस वर्गका मूल लेना और उसे पृथक् रख देना चाहिये॥ १६॥ फिर द्विगुणित मूलसे सम अङ्कमें भाग दे और जो लब्धि आवे उसका वर्ग विषममें घटा दे, फिर उसे दूना करके पङ्क्तिमें रख दे। मुनीश्वर! इस प्रकार बार-बार करनेसे पङ्क्तिका आधा वर्गमूल² होता है॥ १७\frac{१}{२}॥
समत्र्यङ्कहतिः प्रोक्तो घनस्तत्र विधिः पदे॥ १८॥
प्रोच्यते विषमं त्वाद्यं समे द्वे च ततः परम्।
विशोध्यं विषमादन्त्याद्घनं तन्मूलमुच्यते॥ १९॥
त्रिन्घ्न्याप्तं मूलकृत्या समं मूले न्यसेत् फलम्।
तत्कृतिघ्नान्त्यनिहतान्त्रिघ्नीं चापि विशोधयेत्॥ २०॥
घनं च विषमादेवं घनमूलं मुहुर्भवेत्।
समान तीन अङ्कोंके गुणनफलको 'घन'³ कहा गया है। अब घनमूल निकालनेकी विधि बतायी जाती है—दाहिनेके प्रथम अङ्कपर घन या विषमका चिह्न (खड़ी लकीरके रूपमें) लगावे, उसके वामभागमें पार्श्ववर्ती दो अङ्कोंपर (पड़ी लकीरके रूपमें) अघन या समका चिह्न लगावे। इसी प्रकार अन्तिम अङ्कतक एक घन (विषम) और दो अघन (सम)-के चिह्न लगाने चाहिये। अन्तिम या विषम घनमें जितने घन घट सकें उतने घटा दे। उस घनको अलग रखें। उसका घनमूल ले और उस घनमूलका वर्ग करे, फिर उसमें तीनसे गुणा करे। उससे आदि अङ्कमें भाग दे, लब्धिको अलग लिख ले, उस लब्धिका वर्ग करे और उसमें अन्त्य (प्रथम मूलाङ्क) एवं तीनसे गुणा करे, फिर उसके बादके अङ्कमें उसे घटा दे तथा अलग रखी हुई लब्धिके घनको
१. वर्ग या कृति निकालनेके और भी बहुत-से प्रकार लीलावतीमें दिये गये हैं।
२. जैसे १६३८४ का वर्गमूल उपर्युक्त विधिसे निकालनेपर १२८ आता है—
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१६३ ८४
१ १२८
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×६ २५६ पंक्ति
४
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२३ अङ्कोंको स्थापनकर दायेंसे बायें
४ तरफ खड़ी-पड़ी रेखा देकर विषम-
--- सम अङ्क समझना चाहिये।
१९८
१९२
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६४
६४
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३. जैसे ३ का घन हुआ ३×३×३=२७।