संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पूर्वभाग-तृतीय पाद ४४३
- पूर्वभाग-तृतीय पाद * ४४३
क्रोधनी, क्रियाकारी, मृत्यु, पीता, श्वेता, अरुणा, असिता और अनन्ता—इस प्रकार कलामातृका कही गयी है। भक्त पुरुष उन-उन मातृकाओंका न्यास करे। इस कलामातृकाके प्रजापति ऋषि कहे गये हैं। इसका छन्द गायत्री और देवता शारदा हैं। ह्रस्व और दीर्घ स्वरके बीचमें प्रणव रखकर उसीके द्वारा षडङ्गन्यास करे (यथा—अं ॐ आं हृदयाय नमः, इं ॐ ईं शिरसे स्वाहा, उँ ॐ ऊँ शिखायै वषट्, एँ ॐ ऐं कवचाय हुम्, ओं ॐ औं नेत्रत्रयाय वौषट्, अं ॐ अः अस्त्राय फट्)। विद्वान् पुरुष मोतियोंके आभूषणोंसे विभूषित पञ्चमुखी शारदादेवीका भजन (ध्यान) करे। उनके तीन नेत्र हैं तथा वे अपने हाथोंमें पद्म, चक्र, गुण (त्रिशूल अथवा पाश) तथा एण (मृगचर्म) धारण करती हैं। इस प्रकार ध्यान करके ॐपूर्वक चतुर्थ्यन्त कलायुक्त मातृकाका न्यास करे (यथा—ॐ अं निवृत्यै नमः ललाटे, ॐ आं प्रतिष्ठायै नमः मुखवृत्ते इत्यादि)। तदनन्तर मूलमन्त्रके छहों अङ्गोंका न्यास करना चाहिये। 'हृदय' आदि चतुर्थ्यन्त पदमें अङ्गन्यास-सम्बन्धी जातियोंका संयोग करके न्यास करे। 'नमः', 'स्वाहा', 'वषट्', 'हुम्', 'वौषट्' और 'फट्' ये छः जातियाँ कही गयी हैं (अर्थात् हृदयाय नमः, शिरसे स्वाहा, शिखायै वषट्, कवचाय हुम्, नेत्रत्रयाय वौषट्, अस्त्राय फट्—इस प्रकार संयोजना करे)। तत्पश्चात् आयुध और आभूषणोंसहित इष्टदेवका ध्यान करके उनकी मूर्तिमें छः अङ्गोंका न्यास करनेके पश्चात् पूजन प्रारम्भ करे। (पूर्व० ६६ अध्याय)
देवपूजनकी विधि
सनत्कुमारजी कहते हैं—अब मैं साधकोंका अभीष्ट मनोरथ सिद्ध करनेवाली देवपूजाका वर्णन करता हूँ। अपने वाम भागमें त्रिकोण अथवा चतुष्कोणकी रचना करके उसकी पूजा करे और अस्त्र-मन्त्रद्वारा उसपर जल छिड़के। तत्पश्चात् हृदयसे आधारशक्तिकी भावना करके उसमें अग्निमण्डलका पूजन करे। फिर अस्त्रबीजसे पात्र धोकर आधारस्थानमें चमस रखकर उसमें सूर्यमण्डलकी भावना करे। विलोम मातृका मूलका उच्चारण करते हुए उस पात्रको जलसे भरे। फिर उसमें चन्द्रमण्डलकी पूजा करके पूर्ववत् उसमें तीर्थोंका आवाहन करे। तदनन्तर धेनुमुद्रासे अमृतीकरण करके कवचसे उसको आच्छादित करे। फिर अस्त्रसे उसका संक्षालन करके उसके ऊपर आठ बार प्रणवका जप करे। यह मनुष्योंके लिये सर्वसिद्धिदायक सामान्य अर्घ्य बताया गया है। श्रेष्ठ साधक उस जलमेंसे किञ्चित् निकालकर उसको अपने आपपर तथा सम्पूर्ण पूजन-सामग्रियोंपर पृथक्-पृथक् छिड़के। अपने वाम भागमें आगेकी ओर एक त्रिकोण मण्डल अङ्कित करे। उस त्रिकोणको षट्कोणसे आवृत करके उस सबको गोल रेखासे घेर दे, फिर सबको चतुष्कोण रेखासे आवृत करके अर्घ्य जलसे अभिषेक करे। तत्पश्चात् श्रेष्ठ साधक शङ्खमुद्रासे स्तम्भन करे। आग्नेय आदि चार कोणोंमें हृदय, सिर, शिखा और कवच (भुजमूल)—इन चार अङ्गोंकी पूजा करके मध्यभागमें नेत्रकी तथा दिशाओंमें अस्त्रकी (पुष्पाक्षत आदिसे) पूजा करे। फिर त्रिकोण मण्डलके मध्यमें स्थित आधारशक्तिका मूलखण्डत्रयसे पूजन करे। इस प्रकार विधिवत् पूजन करके अस्त्र (फट्)-के उच्चारणपूर्वक प्रक्षालित की हुई त्रिपादिका (तिरपाई) स्थापित करके निम्नाङ्कित मन्त्रसे उसकी पूजा करे। 'मं वह्निमण्डलाय दशकलात्मने देवतार्घ्यपात्रासनाय नमः' आधारपूजनके लिये यह चौबीस अक्षरोंका मन्त्र है। तत्पश्चात् शङ्खको तत्सम्बन्धी मन्त्रद्वारा धोकर उसे स्थापित करनेके अनन्तर उसकी पूजा करे। शङ्खके स्थापनका मन्त्र इस प्रकार है, पहले तार (ॐ) है, फिर काम (क्लीं) है, उसके बाद 'महा' शब्द है, तत्पश्चात् 'जलचराय' है। फिर वर्म (हुम्), 'फट्'
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| 'स्वाहा' 'पाञ्चजन्याय' तथा हृदय (नमः पद) है। पूरा मन्त्र इस प्रकार समझना चाहिये—'ॐ क्लीं महाजलचराय हुं फट् स्वाहा पाञ्चजन्याय नमः।' इसके बाद 'ॐ अर्कमण्डलाय द्वादशकलात्मने······ देवार्घ्यपात्राय नमः' इस तेईस अक्षरवाले मन्त्रसे शङ्खकी पूजा करनी चाहिये। (इष्टदेवका नाम जोड़नेसे अक्षर-संख्या पूरी होती है। उस मन्त्रसे पूजन करनेके अनन्तर उसमें सूर्यकी बारह कलाओंका क्रमशः पूजन करे। तत्पश्चात् विलोमक्रमसे मूलमातृका वर्णोंका उच्चारण करते हुए शुद्ध जलसे शङ्खको भर दे और उसकी निम्नाङ्कित मन्त्रसे पूजा | करे—'ॐ सोममण्डलाय षोडशकलात्मने देवार्घ्यामृताय नमः'। अर्घ्यपूजनके लिये यही मन्त्र है। फिर उस जलमें चन्द्रमाकी सोलह कलाओंकी पूजा करे। तदनन्तर पहले बताये अनुसार 'गङ्गे च यमुने चैव' इत्यादि मन्त्रसे सब तीर्थोंका उसमें आवाहन करके धेनुमुद्राद्वारा¹ उसका अमृतीकरण² करे और मत्स्यमुद्राद्वारा³ उसे आच्छादित करे। फिर कवच (हुं बीज) द्वारा अवगुण्ठन⁴ करके पुनः अस्त्र (फट्)-द्वारा उसकी रक्षा करे। तदनन्तर इष्टदेवका चिन्तन करके मुद्रा प्रदर्शन करे। शङ्ख⁵, मुसल⁶, चक्र⁷, परमीकरण⁸, महामुद्रा⁹, तथा योनिमुद्राका¹⁰, विद्वान् |
१. धेनुमुद्राका लक्षण इस प्रकार है—
वामाङ्गुलीनां मध्येषु दक्षिणाङ्गुलिकास्तथा । संयोज्य तर्जनीं दक्षां मध्यमानामयोस्तथा ॥
दक्षमध्यमयोर्वामां तर्जनीं च नियोजयेत् । वामयानामया दक्षकनिष्ठां च नियोजयेत् ॥
दक्षयानामया वामां कनिष्ठां च नियोजयेत् । विहिताधोमुखी चैषा धेनुमुद्रा प्रकीर्तिता ॥
'बायें हाथकी अंगुलियोंके बीचमें दाहिने हाथकी अंगुलियोंको संयुक्त करके दाहिनी तर्जनीको मध्यमाके बीचमें लगावे। दाहिने हाथकी मध्यमामें बायें हाथकी तर्जनीको मिलावे। फिर बायें हाथकी अनामिकासे दाहिने हाथकी कनिष्ठिका और दाहिने हाथकी अनामिकाके साथ बायें हाथकी कनिष्ठिकाको संयुक्त करे। फिर इन सबका मुख नीचेकी ओर करे—यही धेनुमुद्रा कही गयी है।'
२. अमृतीकरणकी विधि यह है—'वं' इस अमृतबीजका उच्चारण करके उस धेनुमुद्राको दिखावे। ३. मत्स्यमुद्रा इस प्रकार है—बायें हाथके पृष्ठ भागपर दाहिने हाथकी हथेली रखे। दोनों अंगूठोंको फैलाये रखे। ४. बायीं मुट्ठी इस प्रकार बाँध ले, जिससे तर्जनी अंगुली निकली रहे, इस प्रकारकी मुट्ठीको शङ्खके ऊपर घुमाना अवगुण्ठनी मुद्रा है। ५. शङ्खमुद्राका लक्षण इस प्रकार है—बायें अंगूठेको दाहिनी मुट्ठीसे पकड़ ले। मुट्ठी उत्तान करके अँगूठेको फैला दे। बायें हाथकी चारों अंगुलियोंको सटी हुई रखे और उन्हें फैलाकर दाहिने अँगूठेसे सटा दे। यह शङ्खकी मुद्रा ऐश्वर्य देनेवाली है। ६. मुसलमुद्रा—
मुष्टिं कृत्वा तु हस्ताभ्यां वामस्योपरि दक्षिणम्। कुर्यान्मुसलमुद्रेयं सर्वविघ्नविनाशिनी ॥
दोनों हाथोंकी मुट्ठी बाँधकर बायींके ऊपर दाहिनी मुट्ठी रख दे। यह सब विघ्नोंका नाश करनेवाली मुसलमुद्रा कही गयी है।
७. चक्रमुद्रा—
हस्तौ च सम्मुखौ कृत्वा सुभुग्न सुप्रसारितौ। कनिष्ठाङ्गुष्ठको लग्नौ मुद्रैषा चक्रसंज्ञिका ॥
दोनों हाथोंको आमने-सामने करके उन्हें भलीभाँति फैलाकर मोड़ दे और दोनों कनिष्ठिकाओं तथा अँगूठोंको परस्पर सटा दे। यह चक्रमुद्रा है। ८. दोनों हाथोंकी अंगुलियोंको परस्पर सटाकर हाथोंको अलग रखे—यही परमीकरण मुद्रा है।
९. महामुद्रा—
अन्योन्यग्रथिताङ्गुष्ठा प्रसारितकराङ्गुली। महामुद्रेयमुदिता परमीकरणे बुधैः॥
अँगूठोंको परस्पर ग्रथित करके दोनों हाथोंकी अंगुलियोंको फैला दे। विद्वानोंने इसीको परमीकरणमें महामुद्रा कहा है। १०. दोनों हाथोंको उत्तान रखते हुए दायें हाथकी अनामिकासे बायें हाथकी तर्जनीको और बायें हाथकी
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पुरुष क्रमशः प्रदर्शन करावे। गारुड़ी११ और गालिनी१२—ये दो मुद्राएँ मुख्य कही गयी हैं। गन्ध-पुष्प आदिसे वहाँ देवताका पूजन और स्मरण करे। आठ बार मूल मन्त्रका तथा आठ बार प्रणवका जप करे। शङ्खसे दक्षिण दिशाकी ओर प्रोक्षणीपात्र रखे। शङ्खका थोड़ा-सा जल प्रोक्षणीपात्रमें डालकर उससे अपने ऊपर तीन बार अभिषेक करे। उस समय क्रमशः इन तीन मन्त्रोंका उच्चारण करे—'ॐ आत्मतत्त्वात्मने नमः, ॐ विद्यातत्त्वात्मने नमः, ॐ शिवतत्त्वात्मने नमः।' विद्वान् पुरुष इन मन्त्रोंद्वारा अपने साथ ही उस मण्डलका भी विधिवत् प्रोक्षण करे और उसमें पुष्प तथा अक्षत भी बिखेरे अथवा मूलगायत्रीसे पूजाद्रव्योंका प्रोक्षण करे। फिर किसी आधार (चौकी)-पर पाद्य, अर्घ्य, आचमनीय तथा मधुपर्कके लिये अपने आगे अनेक पात्र विधिवत् रख ले। श्यामाक (सावाँ), दूर्वा, कमल, विष्णुक्रान्ता नामक ओषधि और जल—इनके मेलसे भगवान्के लिये पाद्य बनता है। फूल, अक्षत, जौ, कुशाग्र, तिल, सरसों, गन्ध तथा दूर्वादल, इनके द्वारा भगवान्के लिये अर्घ्य देनेकी विधि है। आचमनके लिये शुद्ध जलमें जायफल, कंकोल और लवङ्ग मिलाकर रखना चाहिये। मधु, घी और दहीके मेलसे मधुपर्क बनता है। अथवा एक पात्रमें पाद्य आदिकी व्यवस्था | करे। भगवान् शङ्कर और सूर्यदेवके पूजनमें शङ्खमय पात्र अच्छा नहीं माना गया है। श्वेत, कृष्ण, अरुण, पीत, श्याम, रक्त, शुक्ल, असित (काली), लाल वस्त्र धारण करनेवाली और हाथमें अभयकी मुद्रासे युक्त पीठ-शक्तियोंका ध्यान करना चाहिये। सुवर्ण आदिके पत्रपर लिखे हुए यन्त्रमें, शालग्राम-शिलामें, मणिमें अथवा विधिपूर्वक स्थापित की हुई प्रतिमामें इष्टदेवकी पूजा करनी चाहिये। घरमें प्रतिदिन पूजाके लिये वही प्रतिमा कल्याणदायिनी होती है जो स्वर्ण आदि धातुओंकी बनी हो और कम-से-कम अँगूठेके बराबर तथा अधिक-से-अधिक एक बित्तेकी हो। जो टेढ़ी हो, जली हुई हो, खण्डित हो, जिसका मस्तक या आँख फूटी हुई हो अथवा जिसे चाण्डाल आदि अस्पृश्य मनुष्योंने छू दिया हो, वैसी प्रतिमाकी पूजा नहीं करनी चाहिये। अथवा समस्त शुभ लक्षणोंसे सुशोभित बाण आदि लिङ्गमें पूजा करे या मूलमन्त्रके उच्चारणपूर्वक मूर्तिका निर्माण करके इष्टदेवके शास्त्रोक्त स्वरूपका ध्यान करे। फिर उसमें देवताका परिवारसहित आवाहन करके पूजा करे। शालग्राम-शिलामें तथा पहले स्थापित की हुई देवप्रतिमामें आवाहन और विसर्जन नहीं किये जाते।<br><br>तदनन्तर पुष्पाञ्जलि लेकर इष्टदेवका ध्यान करते हुए इस मन्त्रका उच्चारण करे—
अनामिकासे दायें हाथकी तर्जनीको पकड़ ले और दोनों मध्यमाओं तथा कनिष्ठिकाओंको परस्पर सटी रखकर दोनों अङ्गुष्ठोंको तर्जनीके मूलसे मिलाये रखे—यही योनिमुद्रा है।
११. गरुडमुद्राका लक्षण इस प्रकार है—
सम्मुखौ तु करौ कृत्वा ग्रन्थयित्वा कनिष्ठिके। पुनश्चाधोमुखे कृत्वा तर्जन्यौ योजयेत्तयोः ॥
मध्यमानामिके द्वे तु पक्षाविव विचालयेत् । मुद्रैषा पक्षिराजस्य सर्वविघ्ननिवारिणी ॥
\hfill (मन्त्रमहोदधि)
दोनों हाथोंको सम्मुख करके दोनों कनिष्ठिकाओंको परस्पर बद्ध कर दे और अधोमुख करके उनमें तर्जनियोंको मिला दे। फिर मध्यमा और अनामिकाओंको पाँखकी भाँति हिलावे। यह गरुडमुद्रा सब विघ्नोंका निवारण करनेवाली है।
१२. कनिष्ठाङ्गुष्ठकौ सक्तौ करयोरितरेतरम्। तर्जनीमध्यमानामाः संहता भुग्नवर्जिताः ॥
दोनों हाथोंकी कनिष्ठिका और अँगूठे परस्पर सटे रहें और तर्जनी, मध्यमा तथा अनामिका अंगुलियाँ सीधी-सीधी रहकर परस्पर मिली रहें। यह गालिनीमुद्रा कही गयी है।
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आत्मसंस्थमजं शुद्धं त्वामहं परमेश्वर।
अरण्यामिव हव्यांशं मूर्तावावाहयाम्यहम्॥
तवेयं हि महामूर्तिस्तस्यां त्वां सर्वगं प्रभो।
भक्तस्नेहसमाकृष्टं दीपवत्स्थापयाम्यहम्॥
सर्वान्तर्यामिणे देव सर्वबीजमयं शुभम्।
स्वात्मस्थाय परं शुद्धमासनं कल्पयाम्यहम्॥
अनन्या तव देवेश मूर्तिशक्तिरियं प्रभो।
सांनिध्यं कुरु तस्यां त्वं भक्तानुग्रहकारक॥
अज्ञानादुत मत्तत्वाद् वैकल्यात्साधनस्य च।
यद्यपूर्णं भवेत् कल्पं तथाप्यभिमुखो भव॥
दृशा पीयूषवर्षिण्या पूरयन् यज्ञविष्टरे।
मूर्ती वा यज्ञसम्पूत्यै स्थितो भव महेश्वर॥
अभक्तवाङ्मनश्चक्षुःश्रोत्रदूरायितद्युते ।
स्वतेजःपञ्जरेणाशु वेष्टितो भव सर्वतः॥
यस्य दर्शनमिच्छन्ति देवाः स्वाभीष्टसिद्धये।
तस्मै ते परमेशाय स्वागतं स्वागतं च मे॥
कृतार्थोऽनुगृहीतोऽस्मि सफलं जीवितं मम।
आगतो देवदेवेशः सुस्वागतमिदं पुनः॥
(ना० पूर्व० ६७। ३७-४५)
परमेश्वर! आप अपने-आपमें स्थित, अजन्मा एवं शुद्ध-बुद्ध-स्वरूप हैं। जैसे अरणीमें अग्नि छिपी हुई है, उसी प्रकार इस मूर्तिमें आप गूढरूपसे व्याप्त हैं, मैं आपका आवाहन करता हूँ। प्रभो! यह आपकी महामूर्ति है, मैं इसके भीतर आप सर्वव्यापी परमात्माको, जो कि भक्तके प्रति स्नेहवश स्वयं खिंच आये हैं, दीपकी भाँति स्थापित करता हूँ। देव! अपने अन्तःकरणमें स्थित आप सर्वान्तर्यामी प्रभुके लिये मैं सर्वबीजमयं, शुभ एवं शुद्ध आसन प्रस्तुत करता हूँ। देवेश! यह आपकी अनन्य मूर्ति-शक्ति है। भक्तोंपर अनुग्रह करनेवाले प्रभो! आप इसमें निवास कीजिये। अज्ञानसे, प्रमादसे अथवा साधनहीनताके कारण यदि मेरा यह अनुष्ठान अपूर्ण रह जाय तो भी आप अवश्य सम्मुख हों। महेश्वर! आप अपनी सुधावर्षिणी दृष्टिद्वारा सब त्रुटियोंको पूर्ण करते हुए यज्ञकी पूर्णताके लिये इस यज्ञासनपर अथवा मूर्तिमें स्थित होइये। आपका प्रकाश या तेज अभक्त जनोंके मन, वचन, नेत्र और कानसे कोसों दूर है। भगवन्! आप सब ओर अपने तेजःपुञ्जसे शीघ्र आवृत हो जाइये। देवतालोग अपने अभीष्ट मनोरथकी सिद्धिके लिये सदा जिनका दर्शन चाहते हैं, उन्हीं आप परमेश्वरके लिये मेरा बारम्बार स्वागत है, स्वागत है। देवदेवेश्वर प्रभु आ गये। मैं कृतार्थ हो गया। मुझपर बड़ी कृपा हुई। आज मेरा जीवन सफल हो गया। मैं पुनः इस शुभागमनके लिये प्रभुका स्वागत करता हूँ।
पाद्य
यद्भक्तिलेशसम्पर्कात् परमानन्दसम्भवः।
तस्मै ते चरणाब्जाय पाद्यं शुद्धाय कल्प्यते॥ ४६॥
जिनकी लेशमात्र भक्तिका सम्पर्क होनेसे परमानन्दका समुद्र उमड़ आता है, आपके उन शुद्ध चरण-कमलोंके लिये पाद्य प्रस्तुत किया जाता है।
अर्घ्य
तापत्रयहरं दिव्यं परमानन्दलक्षणम्।
तापत्रयविनिर्मुक्त्यै तवार्घ्यं कल्पयाम्यहम्॥ ४८॥
देव! मैं तीन प्रकारके तापोंसे छुटकारा पानेके लिये आपकी सेवामें त्रितापहारी परमानन्द-स्वरूप दिव्य अर्घ्य अर्पण करता हूँ।
आचमनीय
वेदानामपि वेदाय देवानां देवतात्मने।
आचामं कल्पयामीश शुद्धानां शुद्धिहेतवे॥ ४७॥
भगवन्! आप वेदोंके भी वेद और देवताओंके भी देवता हैं। शुद्ध पुरुषोंकी भी परम शुद्धिके हेतु हैं। मैं आपके लिये आचमनीय प्रस्तुत करता हूँ।
मधुपर्क
सर्वकालुष्यहीनाय परिपूर्णसुखात्मने।
मधुपर्कमिदं देव कल्पयामि प्रसीद मे॥ ४९॥
देव! आप सम्पूर्ण कलुषतासे रहित तथा