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संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

पूर्वभाग-तृतीय पाद ४२३

  • पूर्वभाग-तृतीय पाद * ४२३

आच्छादन कर लेता है और यही जीवात्माओंके लिये देहान्तरकी प्राप्तिमें कारण होता है। धर्म और अधर्मका नाम है कर्म, जो विचित्र फल-भोग प्रदान करनेवाला है। यह 'कर्म' प्रवाहरूपसे नित्य है। बीजांकुर-न्यायसे इसकी स्थिति अनादि मानी गयी है। इस प्रकार ये प्रथम दो (मलज और कर्मज) पाश बताये गये। ब्रह्मन्! अब 'मायेय' आदि पाशोंका वर्णन सुनो।

('विन्दुज पाश' अपरामुक्ति-स्वरूप है और शिव-स्वरूपकी प्राप्ति करानेवाला है, उसका स्वरूप यह है—) सत्, चित् और आनन्द जिनका स्वरूपभूत वैभव है, वे एकमात्र सर्वव्यापी सनातन परमात्मा ही सबके कारण तथा सम्पूर्ण जीवोंके पतिरूपसे विराज रहे हैं। जो मनमें तो आता है, किंतु प्रकट नहीं होता और संसारसे निवृत्ति (वैराग्य) प्रदान करता है; तथा दृक्-शक्ति और क्रियाशक्तिके रूपमें जो स्वयं ही विद्यमान है, वह उत्कृष्ट शैव तेज है। इसके सिवा, जिस शक्तिसे समर्थ होकर जीव परमात्माके समीप दिव्य भोगसे सम्पन्न होता और पशु-समुदायकी कोटिसे सदाके लिये मुक्त हो जाता है, परमात्माकी उस एकान्तस्वरूपा आद्या शक्तिको चिद्रूपा कहते हैं। उस चिद्रूपा शक्तिसे उत्कर्षको प्राप्त हुआ 'विन्दु' दृक् (ज्ञान) और क्रिया-स्वरूप होकर शिव-नामसे प्रतिपादित होता है, उसीको सम्पूर्ण तत्त्वोंका कारण बताया गया है। वह सर्वत्र व्यापक तथा अविनाशी है। उसीमें संनिहित हुई इच्छा आदि सम्पूर्ण शक्तियाँ उसके सकाशसे अपना-अपना कार्य करती हैं। मुने! इसलिये यह सबपर अनुग्रह करनेवाला है। जड और चेतनपर अनुग्रह करनेके लिये विश्वकी सृष्टि करते समय इसका प्रथम उन्मेष नादके रूपमें हुआ है, जो शान्ति आदिसे युक्त तथा भुवन-स्वरूप है। विप्रवर! वह शक्ति-तत्त्व सावयव बताया गया है। इससे ज्ञानशक्ति और क्रियाशक्तिका तथा उत्कर्ष और अपकर्षका प्रसार एवं अभाव होता है; अतः यह तत्त्व सदा शिवरूप है। जहाँ दृक्-शक्ति तिरोहित होती है और क्रियाशक्ति बढ़ जाती है, वह ईश्वर नामक तत्त्व कहा गया है; जो समस्त मनोरथोंका साधक है, जहाँ क्रियाशक्तिका तिरोभाव और ज्ञानशक्तिका उद्रेक


विज्ञानकल पशु (जीव)-के भी दो भेद हैं—'समास-कलुष' और 'असमास-कलुष'। (१) जीवात्मा जो कर्म करता है, उस प्रत्येक कर्मकी तह मलपर जमती रहती है। इसी कारण उस मलका परिपाक नहीं होने पाता, किंतु जब कर्मोंका त्याग हो जाता है, तब तह न जमनेके कारण मलका परिपाक हो जाता है और जीवात्माके सारे कलुष समास हो जाते हैं, इसीलिये वह 'समास-कलुष' कहलाता है। ऐसे जीवात्माओंको भगवान् आठ प्रकारके 'विद्येश्वर' पदपर पहुँचा देते हैं, उनके नाम ये हैं—

'अनन्तश्चैव सूक्ष्मश्च तथैव च शिवोत्तमः। एकनेत्रस्तथैवैकरुद्रश्चापि त्रिमूर्तिकः ॥
श्रीकण्ठश्च शिखण्डी च प्रोक्ता विद्येश्वरा इमे।'

(१) अनन्त, (२) सूक्ष्म, (३) शिवोत्तम, (४) एकनेत्र, (५) एकरुद्र, (६) त्रिमूर्ति, (७) श्रीकण्ठ और (८) शिखण्डी।

(२) 'असमास-कलुष' वे हैं, जिनकी कलुषराशि अभी समाप्त नहीं हुई है। ऐसे जीवात्माओंको परमेश्वर 'मन्त्र' स्वरूप दे देता है। कर्म तथा शरीरसे रहित किंतु मलरूपी पाशमें बँधे हुए जीवात्मा ही मन्त्र हैं और इनकी संख्या सात करोड़ है। ये सब अन्य जीवात्माओंपर अपनी कृपा करते रहते हैं। तत्त्व-प्रकाश नामक ग्रन्थमें उपर्युक्त विषयके संग्राहक श्लोक इस प्रकार हैं—

पशवस्त्रिविधाः प्रोक्ता विज्ञानप्रलयाकलौ सकलः। मलयुक्तस्तत्राद्यो मलकर्मयुतो द्वितीयः स्यात्।
मलमायाकर्मयुतः सकलस्तेषु द्विधा भवेदाद्यः । आद्यः समाप्तकलुषोऽसमाप्तकलुषो द्वितीयः स्यात्।
आद्याननुगृह्य शिवो विद्येशत्वे नियोजयत्यष्टौ । मन्त्रांश्च करोत्यपरान् ते चोक्ताः कोटयः सप्त ॥

'प्रलयाकल' भी दो प्रकारके होते हैं—'पक्वपाशद्वय' और 'अपक्वपाशद्वय'। (१) जिनके मल तथा कर्मरूपी

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होता है, वह विद्यातत्त्व कहलाता है। जो ज्ञानस्वरूप एवं प्रकाशक है। नाद, विन्दु और सकल—ये सत्-नामक तत्त्वके आश्रित हैं। आठ विद्येश्वरगण ईशतत्त्वके और सात करोड़ 'मन्त्र' गण विद्यातत्त्वके आश्रित हैं। ये सब तत्त्व शुद्धमार्गके नामसे कहे गये हैं। यहाँ ईश्वर साक्षात् निमित्त कारण हैं। वे ही बिन्दुरूपसे सुशोभित हो यहाँ उपादानकारण बनते हैं। पाँच प्रकारके जो पाश हैं, उनका कोई समय न होनेके कारण उनका कोई निश्चित क्रम नहीं है; उनका व्यापार देखकर ही उनकी कल्पना की जाती है। वास्तवमें विचित्र शक्तियोंसे युक्त एक ही शिव नामक तत्त्व विराजमान है। वह शक्तियुक्त होनेसे 'शाक्त' कहा गया है। अन्तःकरणकी वृत्तियोंके भेदसे ही अनेक प्रकारकी कल्पनाएँ की गयी हैं, प्रभु शिव जड-चेतनपर अनुग्रह करने लिये विविध रूप धारण करके अनादि मलसे आबद्ध जीवोंपर कृपा करते हैं। सबपर दया करनेवाले शिव सम्पूर्ण जीवोंको भोग और मोक्ष तथा जडवर्गको अपने व्यापारमें लगनेकी शक्ति-सामर्थ्य देते हैं। भगवान् शिवके समान रूपका हो जाना ही मोक्ष है, यही चेतन जीवोंपर ईश्वरका अनुग्रह है। कर्म अनादि होनेके कारण सदा वर्तमान रहते हैं; अतः उनका भोग किये बिना भी भगवत्कृपासे मोक्ष हो जाता है। इसीलिये भगवान् शङ्करको अनुग्राहक (कृपा करनेवाला) कहा गया है। अविनाशी प्रभु जीवोंके भोगके लिये सूक्ष्म करणोंद्वारा अनायास ही जगत्‌की उत्पत्ति करते हैं। कोई भी कर्ता किसी भी कार्यमें उपादान और करणोंके बिना नहीं देखा जाता।

(अब 'मायापाश'का प्रसङ्ग है—) यहाँ शक्तियाँ ही करण हैं। मायाको उपादान माना गया है। वह नित्य, एक और कल्याणमयी है। उसका न आदि है न अन्त; वह माया अपनी शक्तिद्वारा मनुष्यों और लोकोंकी उत्पत्तिका सामान्य कारण है। माया अपने कर्मोंद्वारा स्वभावतः मोहजनक होती है। उससे भिन्न 'परा माया' है, जो सूक्ष्म एवं व्यापक है। इन विकारयुक्त कार्योंसे वह सर्वथा परे मानी गयी है। विद्याके स्वामी भगवान् शिव जीवके कर्मोंको देखकर अपनी शक्तियोंसे मायाको क्षोभमें डालते और जीवोंके भोगके लिये मायाके द्वारा ही शरीर एवं इन्द्रियोंकी सृष्टि करते हैं। अनेक शक्तियोंसे सम्पन्न माया पहले कालतत्त्वकी दोनों पाशोंका परिपाक हो गया है, वे 'पक्वपाशद्वय' मोक्षको प्राप्त हो जाते हैं। (२) 'अपक्वपाशद्वय' जीव पृथक् देह धारण करके नाना प्रकारके कर्मोंको करते हुए नाना योनियोंमें घूमा करते हैं।

'सकल' जीवोंके भी दो भेद हैं—'पक्व-कलुष' और 'अपक्व-कलुष'। (१) जैसे-जैसे जीवात्माके मल, कर्म तथा माया—इन पाशोंका परिपाक बढ़ता जाता है, वैसे-वैसे ये सब पाश शक्तिहीन होते जाते हैं। तब ये पक्व-कलुष जीवात्मा 'मन्त्रेश्वर' कहलाते हैं। सात करोड़ मन्त्ररूपी जीव-विशेषोंके, जिनका ऊपर वर्णन हो चुका है, अधिकारी ये ही ११८ मन्त्रेश्वर जीव हैं। (२) अपक्व-कलुष जीव भवकूपमें गिरते हैं।

पाश

नारदपुराणमें शैव-महातन्त्रकी मान्यताके अनुसार पाँच प्रकारके पाश बताये गये हैं—(१) मलज, (२) कर्मज, (३) मायेय (मायाजन्य), (४) तिरोधान-शक्ति और (५) बिन्दुज। आधुनिक शैवदर्शनमें चार प्रकारके पाशोंका उल्लेख है—मल, रोध, कर्म तथा माया। रोधशक्ति या तिरोधानशक्ति एक ही वस्तु है। 'विन्दु' मायास्वरूप है, वह 'शिव-तत्त्व' नामसे भी जानने योग्य है। यद्यपि शिवपदप्राप्तिरूप परम मोक्षकी अपेक्षासे वह भी पाश ही है, तथापि विद्येश्वरादि पदकी प्राप्तिमें परम हेतु होनेके कारण विन्दु-शक्तिको 'अपरा मुक्ति' कहा गया है, अतः उसे आधुनिक शैवदर्शनमें 'पाश' नाम नहीं दिया गया है। इसलिये यहाँ शेष चार पाशों (मल, कर्म, रोध और माया)-के ही स्वरूपका विचार किया जाता है—(१) जो आत्माकी स्वाभाविक ज्ञान तथा क्रिया-शक्तिको ढक ले, वह 'मल' (अर्थात् अज्ञान) कहलाता है। यह मल आत्मस्वरूपका केवल आच्छादन ही नहीं करता; किंतु जीवात्माको