संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पूर्वभाग- चतुर्थ पाद ५८५
- पूर्वभाग- चतुर्थ पाद * ५८५
चाहिये और यदि शक्ति न हो तो एक समय भोजन करके करना चाहिये। सायंकालमें दैत्यसूदन भगवान् नृसिंहको पञ्चामृत आदिसे स्नान कराकर षोडशोपचारसे उनकी पूजा करे। तत्पश्चात् इस मन्त्रका उच्चारण करते हुए भगवान्से क्षमा-प्रार्थना करे—
तप्तहाटककेशान्त ज्वलत्पावकलोचन।
वज्राधिकनखस्पर्श दिव्यसिंह नमोऽस्तु ते॥
(ना० पूर्व० १२३। ११)
'दिव्यसिंह! आपके अयाल तपाये हुए सोनेके समान दमक रहे हैं, नेत्र प्रज्वलित अग्निके समान दहक रहे हैं और आपके नखोंका स्पर्श वज्रसे भी अधिक कठोर है, आपको नमस्कार है।'
देवेश्वर भगवान् नृसिंहसे इस प्रकार प्रार्थना करके व्रती पुरुष मिट्टीकी वेदीपर सोये। इन्द्रियों और क्रोधको काबूमें रखे और सब प्रकारके भोगोंसे अलग रहे। जो इस प्रकार प्रत्येक वर्षमें विधिपूर्वक उत्तम व्रतका पालन करता है, वह सम्पूर्ण भोगोंको भोगकर अन्तमें श्रीहरिके पदको प्राप्त कर लेता है। मुनीश्वर! इसी तिथिको ॐकारेश्वरकी यात्रा करनी चाहिये। वहाँ ॐकारेश्वरके पूजनका अवसर दुर्लभ है। उनका दर्शन पापोंका नाश करनेवाला है। ॐकारेश्वरका पूजन, ध्यान, जप और दर्शन जो भी हो जाय, वह मनुष्योंके लिये ज्ञान और मोक्ष देनेवाला बताया गया है। इस तिथिको पापनाशक 'लिङ्गव्रत' भी करना चाहिये। आटेका शिवलिङ्ग बनाकर उसे पञ्चामृतसे स्नान करावे। फिर उसपर कुंकुमका लेप करे और वस्त्र, आभूषण, धूप, दीप तथा नैवेद्यके द्वारा उसकी पूजा करे। जो इस प्रकार सब मनोरथोंकी सिद्धि प्रदान करनेवाले पिष्टमय शिवलिङ्गका पूजन करता है, वह महादेवजीकी कृपासे भोग और मोक्ष प्राप्त कर लेता है। ज्येष्ठ शुक्ला चतुर्दशीको दिनमें पञ्चाग्निका सेवन करे और सायंकाल सुवर्णमयी धेनुका दान करे। यह 'रुद्र-व्रत' कहा गया है। जो मनुष्य आषाढ़ शुक्ला चतुर्दशीको देश-कालमें उत्पन्न हुए फूलोंद्वारा भगवान् शिवका पूजन करता है, वह समस्त सम्पदाओंको प्राप्त कर लेता है। द्विजश्रेष्ठ ! श्रावण शुक्ला चतुर्दशीको अपनी शाखामें बतायी हुई विधिके अनुसार पवित्रारोपण करना चाहिये। पहले पवित्रकको सौ बार अभिमन्त्रित करके देवीको समर्पित करे। स्त्री हो या पुरुष यदि वह पवित्रारोपण करता है तो महादेवजीके प्रसादसे भोग एवं मोक्ष प्राप्त कर लेता है।
भाद्रपद शुक्ला चतुर्दशीको उत्तम 'अनन्त-व्रत' का पालन करना चाहिये। इसमें एक समय भोजन किया जाता है। एक सेर गेहूँका आटा लेकर उसे शक्कर और घीमें मिलाकर पकावे—पूआ तैयार करे और वह भगवान् अनन्तको अर्पण करे। इससे पहले कपास अथवा रेशमके सुन्दर सूतको चौदह गाँठोंसे युक्त करके उसका गन्ध आदि उपचारोंसे पूजन करे। फिर पुराने सूतको बाँहमेंसे उतारकर उसे किसी जलाशयमें डाल दे और नये अनन्त सूत्रको नारी बायीं भुजामें और पुरुष दायीं भुजामें बाँध ले। आटेका पूआ या पिट्ठी पकाकर दक्षिणासहित उसका दान करे। फिर स्वयं भी परिमित मात्रामें उसे भोजन करे। इस प्रकार इस उत्तम व्रतका चौदह वर्षोंतक पालन करना चाहिये। इसके बाद विद्वान् पुरुष उसका उद्यापन करे। मुने ! रँगे हुए चावलोंसे सुन्दर सर्वतोभद्रमण्डल बनाकर उसमें ताँबेका कलश स्थापित करे। उस कलशके ऊपर रेशमी पीताम्बरसे आच्छादित भगवान् अनन्तकी सुन्दर सुवर्णमयी प्रतिमा स्थापित करे और उसका विधिपूर्वक यजन करे। इसके सिवा गणेश, मातृका, नवग्रह तथा लोकपालोंका भी पृथक्-पृथक् पूजन करे। फिर हविष्यसे होम करके
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पूर्णाहुति दे। द्विजोत्तम! तत्पश्चात् आवश्यक सामग्रियोंसहित शय्या, दूध देनेवाली गाय तथा अनन्तजीकी प्रतिमा आचार्यको भक्तिपूर्वक अर्पण करे और दूसरे चौदह ब्राह्मणोंको मीठे पकवान भोजन कराकर उन्हें दक्षिणाद्वारा संतुष्ट करे। इस प्रकार किये गये 'अनन्तव्रत'का जो आदरपूर्वक प्रत्यक्ष दर्शन करता है, वह भी भगवान् अनन्तके प्रसादसे भोग और मोक्षका भागी होता है।
आश्विन कृष्णा चतुर्दशीको विष, शस्त्र, जल, अग्नि, सर्प, हिंसक जीव तथा वज्रपात आदिके द्वारा मरे हुए मनुष्यों तथा ब्रह्महत्यारे पुरुषोंके लिये एकोद्दिष्टकी विधिसे श्राद्ध करना चाहिये और ब्राह्मणवर्गको मिष्टान्न भोजन कराना चाहिये। उस दिन तर्पण, गोग्रास, कुक्कुरबलि और काकबलि आदि देकर आचमन करनेके पश्चात् स्वयं भी भाई-बन्धुओंके साथ भोजन करे। जो इस प्रकार दक्षिणा देकर श्राद्ध करता है, वह पितरोंका उद्धार करके सनातन देवलोकमें जाता है। द्विजश्रेष्ठ! आश्विन शुक्ला चतुर्दशीको धर्मराजकी सुवर्णमयी प्रतिमा बनाकर गन्ध आदिसे उनकी विधिवत् पूजा करे और ब्राह्मणको भोजन कराकर उसे वह प्रतिमा दान कर दे। नारद! इस पृथ्वीपर धर्मराज उस दाता पुरुषकी रक्षा करते हैं। जो इस प्रकार धर्मराजकी प्रतिमाका उत्तम दान करता है, वह इस लोकमें श्रेष्ठ भोगोंको भोगकर धर्मराजकी आज्ञासे स्वर्गलोकमें जाता है। कार्तिक कृष्णा चतुर्दशीको सबेरे चन्द्रोदय होनेपर शरीरमें तेल और उबटन लगाकर स्नान करे। स्नानके पश्चात् वह धर्मराजकी पूजा करे। ऐसा करनेसे उस मनुष्यको नरकसे अभय प्राप्त होता है। प्रदोषकालमें तेलके दीपक जलाकर यमराजकी प्रसन्नताके लिये चौराहेपर या घरसे बाहरके प्रदेशमें एकाग्रचित्त हो दीपदान करे। हेमलम्ब नामक संवत्सरमें श्रीसम्पन्न कार्तिक मास आनेपर शुक्लपक्षकी चतुर्दशीको अरुणोदयकालमें भगवान् विश्वनाथजीने अन्य देवताओंके साथ मणिकर्णिका-तीर्थमें स्नान करके भस्मसे त्रिपुण्ड्र तिलक लगाया और स्वयं अपने-आपकी पूजा करके 'पाशुपत-व्रत'का पालन किया था; अतः वहाँ गन्ध आदिके द्वारा शिवलिङ्गकी महापूजा करनी चाहिये। द्रोणपुष्प, बिल्वपत्र, अर्कपुष्प, केतकीपुष्प, भाँति-भाँतिके फल, मीठे पकवान एवं नाना प्रकारके नैवेद्योंद्वारा उस शिवलिङ्गकी पूजा करनी चाहिये। नारद! ऐसा करके भगवान् विश्वनाथके संतोषके लिये जो एक समय भोजनका व्रत करता है, वह इहलोक और परलोकमें मनोवाञ्छित भोगोंको प्राप्त करता है। समृद्धिकी इच्छा रखनेवाले पुरुषको उस दिन 'ब्रह्मकूर्चव्रत' भी करना चाहिये। दिनमें उपवास करके रातमें पञ्चगव्य पान करे और जितेन्द्रिय रहे। कपिला गायका मूत्र, काली गौका गोबर, सफेद गौका दूध, लाल गायका दही और कबरी गायका घी लेकर एकमें मिला दे। अन्तमें कुशोदक मिलावे (यही 'पञ्चगव्य' एवं 'ब्रह्मकूर्च' है, जिसको व्रतके दिन उपवास करके रातमें पीया जाता है)। तदनन्तर प्रातःकाल कुशयुक्त जलसे स्नान करके देवताओंका तर्पण करे और ब्राह्मणोंको भोजन आदिसे संतुष्ट करके स्वयं मौन होकर भोजन करे। यह 'ब्रह्मकूर्चव्रत' सब पातकोंका नाश करनेवाला है। बाल्यावस्था, कुमारावस्था और वृद्धावस्थामें भी जो पाप किया गया है, वह 'ब्रह्मकूर्चव्रत'से तत्काल नष्ट हो जाता है। नारद! उसी दिन 'पाषाणव्रत' भी बताया गया है। उसका परिचय सुनो, दिनमें उपवास करके रातमें भोजन करे। गन्ध आदिसे गौरी देवीकी पूजा करे और उन्हें घीमें पकायी हुई पाषाणके आकारकी पिट्टी अर्पण करे। (उसी प्रसादको स्वयं भी ग्रहण करे।) द्विजश्रेष्ठ! शास्त्रोक्त विधिसे इस व्रतका आचरण करके मनुष्य ऐश्वर्य,