संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पूर्वभाग- चतुर्थ पाद ५७१
- पूर्वभाग- चतुर्थ पाद * ५७१
विग्रहोंकी पूजा करनी चाहिये। मत्स्य, कूर्म, वराह, नृसिंह, त्रिविक्रम (वामन), परशुराम, राम, कृष्ण, बुद्ध तथा कल्कि—इन दसोंकी सुवर्णमयी मूर्ति बनवाकर विधिपूर्वक पूजा करे और दस ब्राह्मणोंका सत्कार करके उन्हें उन मूर्तियोंका दान कर दे। नारद! उस दिन उपवास या एक समय भोजनका व्रत करके ब्राह्मणोंको भोजन करावे और उन्हें विदा करके एकाग्रचित्त हो स्वयं इष्टजनोंके साथ भोजन करे। जो भक्तिपूर्वक इस व्रतका पालन करता है, वह इस लोकमें उत्तम भोग भोगकर अन्तमें विमानद्वारा सनातन विष्णुलोकको जाता है। आश्विन शुक्ला दशमीको ‘विजयादशमी' कहते हैं। उस दिन प्रातःकाल घरके आँगनमें गोबरके चार पिण्ड मण्डलाकार रखे। उनके भीतर श्रीराम, लक्ष्मण, भरत तथा शत्रुघ्न—इन चारोंकी पूजा करे। गोबरके ही बने हुए चार ढक्कनदार पात्रोंमें भीगा हुआ धान और चाँदी रखकर उसे धुले हुए वस्त्रसे ढक देना चाहिये। फिर पिता, माता, भाई, पुत्र, स्त्री और भृत्यसहित गन्ध, पुष्प और नैवेद्य आदिसे उस धान्यकी विधिपूर्वक पूजा करके नमस्कार करे। फिर पूजित ब्राह्मणोंको भोजन कराकर स्वयं भी भोजन करे। इस प्रकारकी विधिका पालन करके मनुष्य निश्चय ही एक वर्षतक सुखी और धन-धान्यसे सम्पन्न होता है। नारद! कार्तिक शुक्ला दशमीको ‘सार्वभौम-व्रत’का पालन करे। उस दिन उपवास या एक समय भोजनका व्रत करके आधी रातके समय घर अथवा गाँवसे बाहर पूए आदिके द्वारा दसों दिशाओंमें बलि दे। गोबरसे लिपी हुई भूमिपर मण्डल बनाकर उसमें अष्टदल कमल अङ्कित करे और उसमें गणेश आदि देवताओंकी पूजा करे।
मार्गशीर्ष शुक्ला दशमीको ‘आरोग्यव्रत'का आचरण करे। दस ब्राह्मणोंका गन्ध आदिसे पूजन करे और उन्हें दक्षिणा देकर विदा करे। स्वयं उस दिन एक समय भोजन करके रहे। इस प्रकार व्रत करके मनुष्य इस भूतलपर आरोग्य पाता और धर्मराजके प्रसादसे देवलोकमें देवताकी भाँति आनन्दका अनुभव करता है। पौष शुक्ला दशमीको विश्वेदेवोंकी पूजा करनी चाहिये। विश्वेदेव दस हैं, जिनके नाम इस प्रकार हैं—क्रतु, दक्ष, वसु, सत्य, काल, काम, मुनि, गुरु, विप्र और राम। इन सबमें भगवान् विष्णु भलीभाँति विराजमान हैं। विश्वेदेवोंकी कुशमयी प्रतिमाएँ बनाकर उन्हें कुशके ही आसनोंपर स्थापित करे। आसनोंपर स्थित हो जानेपर उनमेंसे प्रत्येकका गन्ध, पुष्प, धूप, दीप और नैवेद्य आदिके द्वारा पूजन करे। प्रत्येकको दक्षिणा देकर प्रणाम करनेके अनन्तर उन सबका विसर्जन करे। उनपर चढ़ी हुई दक्षिणाको श्रेष्ठ द्विजों अथवा गुरुको समर्पित करे। विप्रर्षे! इस प्रकार एक समय भोजनका व्रत करके जो व्रती पुरुष उक्त विधिका पालन करता है, वह उभय लोकके उत्तम भोगोंका अधिकारी होता है। नारद! माघ शुक्ला दशमीको इन्द्रियसंयमपूर्वक उपवास करके अङ्गिरा नामवाले दस देवताओंकी स्वर्णमयी प्रतिमा बनाकर गन्ध आदि उपचारोंसे उनकी भलीभाँति पूजा करनी चाहिये। आत्मा, आयु, मन, दक्ष, मद, प्राण, बर्हिष्मान्, गविष्ठ, दत्त और सत्य—ये दस अङ्गिरा हैं। उनकी पूजा करके दस ब्राह्मणोंको मिष्टान्न भोजन करावे और उक्त स्वर्णमयी मूर्तियाँ उन्हींको अर्पित कर दे। इससे स्वर्गलोककी प्राप्ति होती है। फाल्गुन शुक्ला दशमीको चौदह यमोंकी पूजा करे। यम, धर्मराज, मृत्यु, अन्तक, वैवस्वत, काल, सर्वभूतक्षय, औदुम्बर, दघ्न, नील, परमेष्ठी, वृकोदर, चित्र और चित्रगुप्त—ये चौदह यम हैं। गन्ध आदि उपचारोंसे इनकी भलीभाँति पूजा करके कुशसहित तिलमिश्रित जलकी तीन-तीन अञ्जलियोंसे प्रत्येकका तर्पण करे। तदनन्तर ताँबेके पात्रमें लाल चन्दन, तिल, अक्षत, जौ और जल रखकर उन सबके द्वारा सूर्यको अर्घ्य दे। अर्घ्यका मन्त्र इस प्रकार है—
५७२ * संक्षिप्त नारदपुराण *
एहि सूर्य सहस्रांशो तेजोराशे जगत्पते।
गृहाणार्घ्यं मया दत्तं भक्त्या मामनुकम्पय॥
(ना० पूर्व० ११९। ६३)
'सहस्रों किरणोंसे सुशोभित तेजोराशि जगदीश्वर सूर्यदेव! आइये, भक्तिपूर्वक मेरा दिया हुआ अर्घ्य स्वीकार कीजिये। साथ ही मुझे अपनी सहज कृपासे अपनाइये।'
इस मन्त्रसे अर्घ्य देकर चौदह ब्राह्मणोंको भोजन करावे तथा रजतमयी दक्षिणा दे। उन्हें विदा करके स्वयं भी भोजन करे। ब्रह्मन्! इस प्रकार विधिका पालन करके मनुष्य धर्मराजकी कृपासे इहलोकके धन, पुत्र आदि देवदुर्लभ भोगोंको भोगता है और देहावसान होनेपर श्रेष्ठ विमानपर बैठकर भगवान् विष्णुके लोकका भागी होता है।
द्वादश मासके एकादशी-व्रतोंकी विधि और महिमा तथा दशमी आदि तीन दिनोंके पालनीय विशेष नियम
सनातनजी कहते हैं—मुने! दोनों पक्षोंकी एकादशीको मनुष्य निराहार रहे और एकाग्रचित्त हो नाना प्रकारके पुष्पोंसे शुभ एवं विचित्र मण्डप बनावे। फिर शास्त्रोक्त विधिसे भलीभाँति स्नान करके उपवास और इन्द्रियसंयमपूर्वक श्रद्धा और एकाग्रताके साथ नाना प्रकारके उपचार जप, होम, प्रदक्षिणा, स्तोत्रपाठ, दण्डवत्-प्रणाम तथा मनको प्रिय लगनेवाले जय-जयकारके शब्दोंसे विधिवत् श्रीविष्णुकी पूजा करे तथा रात्रिमें जागरण करे। ऐसा करनेसे मनुष्य भगवान् विष्णुके परम पदको प्राप्त होता है। चैत्र शुक्ला एकादशीको उपवास करके श्रेष्ठ मनुष्य तीन दिनके लिये आगे बताये जानेवाले सभी नियमोंका पालन करनेके पश्चात् द्वादशीको भक्तिपूर्वक सनातन वासुदेवकी षोडशोपचारसे पूजा करे। तदनन्तर ब्राह्मणोंको भोजन कराकर उन्हें दक्षिणा दे और उनको विदा करके स्वयं भी भोजन करे। यह 'कामदा' नामक एकादशी है, जो सब पापोंका नाश करनेवाली है। यदि भक्तिपूर्वक इस तिथिको उपवास किया जाय तो यह भोग और मोक्ष देनेवाली होती है। वैशाख कृष्णा एकादशीको 'वरूथिनी' कहते हैं। उस दिन उपवास करके दूसरे दिन भगवान् मधुसूदनकी पूजा करनी चाहिये। इसमें सुवर्ण, अन्न, कन्या और धेनुका दान उत्तम माना गया है। वरूथिनीका व्रत करके नियमपरायण मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो वैष्णवपद प्राप्त कर लेता है। वैशाख शुक्ला एकादशीको 'मोहिनी' कहते हैं। उस दिन उपवास करके दूसरे दिन स्नानके पश्चात् गन्ध आदिसे भगवान् पुरुषोत्तमकी पूजा करे। तदनन्तर ब्राह्मणभोजन कराकर वह सब पातकोंसे मुक्त हो जाता है।
ज्येष्ठ कृष्णा एकादशीको 'अपरा' कहते हैं। उस दिन नियमपूर्वक उपवास करके द्वादशीको प्रातः-काल नित्यकर्मसे निवृत्त हो भगवान् त्रिविक्रमकी विधिवत् पूजा करे। तदनन्तर श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको भोजन कराकर उन्हें दक्षिणा दे। ऐसा करनेवाला मानव सब पापोंसे मुक्त हो भगवान् विष्णुके लोकमें जाता है। ज्येष्ठ शुक्ला एकादशीको 'निर्जला' एकादशी कहते हैं। द्विजोत्तम! सूर्योदयसे लेकर सूर्योदयतक निर्जल उपवास करके दूसरे दिन द्वादशीके प्रातः-काल नित्यकर्म करनेके अनन्तर विविध उपचारोंसे भगवान् हृषीकेशका पूजन करे। तदनन्तर भक्तिपूर्वक ब्राह्मणोंको भोजन कराकर मनुष्य चौबीस एकादशियोंका फल प्राप्त कर लेता है। आषाढ़ कृष्ण एकादशीको 'योगिनी' कहते हैं। उस दिन उपवास करके द्वादशीको नित्यकर्मके पश्चात् भगवान् नारायणकी पूजा करे। तत्पश्चात् श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको भोजन कराकर उन्हें दक्षिणा दे।