संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पूर्वभाग- चतुर्थ पाद ५३३
- पूर्वभाग- चतुर्थ पाद * ५३३
माघकी पूर्णिमाको प्रत्यक्ष धेनुके साथ इसका दान करता है, वह अज्ञानबन्धनसे मुक्त हो ब्रह्मलोकको प्राप्त कर लेता है। जो इस विषय-सूचीको पढ़ता अथवा सुनता है, वह भी भगवान् श्रीकृष्णकी कृपासे मनोवाञ्छित फल पा लेता है।
लिङ्गपुराणका परिचय तथा उसके पाठ, श्रवण एवं दानका फल
ब्रह्माजी कहते हैं—बेटा! सुनो, अब मैं लिङ्गपुराणका वर्णन करता हूँ, जो पढ़ने तथा सुननेवालोंको भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाला है। भगवान् शङ्करने अग्निलिङ्गमें स्थित होकर अग्नि-कल्पकी कथाका आश्रय ले धर्म आदिकी सिद्धिके लिये मुझे जिस लिङ्गपुराणका उपदेश किया था, उसीको व्यासदेवने दो भागोंमें बाँटकर कहा है। अनेक प्रकारके उपाख्यानोंसे विचित्र प्रतीत होनेवाला यह लिङ्गपुराण ग्यारह हजार श्लोकोंसे युक्त है और भगवान् शिवकी महिमाका सूचक है। यह सब पुराणोंमें श्रेष्ठ तथा त्रिलोकीका सारभूत है। पुराणके आरम्भमें पहले प्रश्न है। फिर संक्षेपसे सृष्टिका वर्णन किया गया है। तत्पश्चात् योगाख्यान और कल्पाख्यानका वर्णन है। इसके बाद लिङ्गके प्रादुर्भाव और उसकी पूजाकी विधि बतायी गयी है। फिर सनत्कुमार और शैल आदिका पवित्र संवाद है। तदनन्तर दधीचि-चरित्र, युगधर्मनिरूपण, भुवन-कोश-वर्णन तथा सूर्यवंश और चन्द्रवंशका परिचय है। तत्पश्चात् विस्तारपूर्वक सृष्टिवर्णन, त्रिपुरकी कथा, लिङ्गप्रतिष्ठा तथा पशुपाश-विमोक्षका प्रसङ्ग है। भगवान् शिवके व्रत, सदाचार-निरूपण, प्रायश्चित्त, अरिष्ट, काशी तथा श्रीशैलका वर्णन है। फिर अन्धकासुरकी कथा, वाराह-चरित्र, नृसिंह-चरित्र और जलन्धर-वधकी कथा है। तदनन्तर शिवसहस्रनाम, दक्ष-यज्ञ-विध्वंस, मदन-दहन और पार्वतीके पाणिग्रहणकी कथा है। तत्पश्चात् विनायककी कथा, भगवान् शिवके ताण्डव-नृत्य-प्रसङ्ग तथा उपमन्युकी कथा है। ये सब विषय लिङ्गपुराणके पूर्वभागमें कहे गये हैं। मुने! इसके बाद विष्णुके माहात्म्यका कथन, अम्बरीषकी कथा तथा सनत्कुमार और नन्दीश्वरका संवाद है। फिर शिव-माहात्म्यके साथ ज्ञान, याग आदिका वर्णन, सूर्यपूजाकी विधि तथा मुक्तिदायिनी शिवपूजाका वर्णन है। तदनन्तर अनेक प्रकारके दान कहे गये हैं। फिर श्राद्ध-प्रकरण और प्रतिष्ठातन्त्रका वर्णन है। तत्पश्चात् अघोरकीर्तन, वज्रेश्वरी महाविद्या, गायत्री-महिमा, त्र्यम्बक-माहात्म्य और पुराणश्रवणके फलका वर्णन है। इस प्रकार मैंने तुम्हें व्यासरचित लिङ्गपुराणके उत्तरभागका परिचय दिया है। यह भगवान् रुद्रके माहात्म्यका सूचक है। जो इस पुराणको लिखकर फाल्गुनकी पूर्णिमाको तिलधेनुके साथ ब्राह्मणको भक्तिपूर्वक इसका दान करता है। वह जरा-मृत्युरहित शिवसायुज्य प्राप्त कर लेता है। जो मनुष्य पापनाशक लिङ्गपुराणका पाठ या श्रवण करता है, वह इस लोकमें उत्तम भोग भोगकर अन्तमें शिवलोकको चला जाता है। वे दोनों भगवान् शिवके भक्त हैं और गिरिजावल्लभ शिवके प्रसादसे इहलोक और परलोकका यथावत् उपभोग करते हैं, इसमें तनिक भी संशय नहीं है।
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वाराहपुराणका लक्षण तथा उसके पाठ, श्रवण एवं दानका माहात्म्य
**श्रीब्रह्माजी कहते हैं—**वत्स! सुनो, अब मैं वाराहपुराणका वर्णन करता हूँ। यह दो भागोंसे युक्त है और सनातन भगवान् विष्णुके माहात्म्यका सूचक है। पूर्वकालमें मेरे द्वारा निर्मित जो मानव-कल्पका प्रसङ्ग है, उसीको विद्वानोंमें श्रेष्ठ साक्षात् नारायणस्वरूप वेदव्यासने भूतलपर इस पुराणमें लिपिबद्ध किया है। वाराहपुराणकी श्लोक-संख्या चौबीस हजार है। इसमें सबसे पहले पृथ्वी और वाराहभगवान्का शुभ संवाद है। तदनन्तर आदि सत्ययुगके वृत्तान्तमें रैभ्यका चरित्र है। फिर दुर्जयके चरित्र और श्राद्धकल्पका वर्णन है। तत्पश्चात् महातपाका आख्यान, गौरीकी उत्पत्ति, विनायक, नागगण, सेनानी (कार्तिकेय), आदित्यगण, देवी, धनद तथा वृषका आख्यान है। उसके बाद सत्यतपाके व्रतकी कथा दी गयी है। तदनन्तर अगस्त्यगीता तथा रुद्रगीता कही गयी है। महिषासुरके विध्वंसमें ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र—तीनोंकी शक्तियोंका माहात्म्य प्रकट किया गया है। तत्पश्चात् पर्वाध्याय, श्वेतोपाख्यान, गोप्रदानिक इत्यादि सत्ययुगका वृत्तान्त मैंने प्रथम भागमें दिखाया है। फिर भगवद्धर्ममें व्रत और तीर्थोंकी कथाएँ हैं। बत्तीस अपराधोंका शारीरिक प्रायश्चित्त बताया गया है। प्रायः सभी तीर्थोंके पृथक्-पृथक् माहात्म्यका वर्णन है। मथुराकी महिमा विशेषरूपसे दी गयी है। उसके बाद श्राद्ध आदिकी विधि है। तदनन्तर ऋषिपुत्रके प्रसङ्गसे यमलोकका वर्णन, कर्मविपाक एवं विष्णुव्रतका निरूपण है। गोकर्णके पापनाशक माहात्म्यका भी वर्णन किया गया है। इस प्रकार वाराहपुराणका यह पूर्वभाग कहा गया है। उत्तर भागमें पुलस्त्य और पुरुराजके संवादमें विस्तारके साथ सब तीर्थोंके माहात्म्यका पृथक्-पृथक् वर्णन है। फिर सम्पूर्ण धर्मोंकी व्याख्या और पुष्कर नामक पुण्य-पर्वका भी वर्णन है। इस प्रकार मैंने तुम्हें पापनाशक वाराहपुराणका परिचय दिया है। यह पढ़ने और सुननेवालोंके मनमें भगवद्भक्ति बढ़ानेवाला है। जो मनुष्य इस पुराणको लिखकर और सोनेकी गरुड़-प्रतिमा बनवाकर तिलधेनुके साथ चैत्रकी पूर्णिमाके दिन भक्तिपूर्वक ब्राह्मणको दान देता है, वह देवताओं तथा महर्षियोंसे वन्दित होकर भगवान् विष्णुका धाम प्राप्त कर लेता है। जो वाराहपुराणकी इस अनुक्रमणिकाका श्रवण या पाठ करता है, वह भी भगवान् विष्णुके चरणोंमें संसार-बन्धनका नाश करनेवाली भक्ति प्राप्त कर लेता है।